घाना में खनन से बर्बाद होती खेती की ज़मीन

26 फ़रवरी 2024 को पश्चिमी घाना के समरेबोई समुदाय में गैलमसी यानी सोने के अवैध खनन से प्रभावित किसानों से मुलाकात करती 52 वर्षीय किसान जेनेट ग्याम्फी.
26 फ़रवरी 2024 को पश्चिमी घाना के समरेबोई समुदाय में गैलमसी यानी सोने के अवैध खनन से प्रभावित किसानों से मुलाकात करती 52 वर्षीय किसान जेनेट ग्याम्फी.
23 February, 2026

We’re glad this article found its way to you. If you’re not a subscriber, we’d love for you to consider subscribing—your support helps make this journalism possible. Either way, we hope you enjoy the read. Click to subscribe: subscribing

ये पश्चिमी घाना का समरेबोई शहर है. एक कोको फ़ार्म में एक कार लावारिस खड़ी है, जिसके अंदर भरी मिट्टी में घास उग आई है. फ़ार्म सोने के अवैध खनन से बर्बाद हो गया है. और ऐसा घाना और कोटे डी आइवर के कई कोको बाग़ानों के साथ भी हुआ है. ये दोनों पश्चिम अफ्रीकी देश 2022 तक कोको बीज की वैश्विक आपूर्ति में 60 प्रतिशत से अधिक योगदान करते थे. समरेबोई में 52 वर्षीय कोको किसान जेनेट ग्याम्फी ने लगभग 6,000 कोको पेड़ों के फार्म को अपने बच्चों को सौंपने का सोचा था. लेकिन आज यहां एक दर्जन से भी कम पेड़ बचे हैं. छोटे पैमाने के खनन के बाद खनिकों का छोड़ा साइनाइड-युक्त कचरा हर जगह को कीचड़ का सा तालाब बना चुका है. ग्याम्फी ने ‘गैलमसी’ तालाब की ओर इशारा कर रॉयटर्स को बताया, 'ये फार्म ही बस मेरा एक गुजारा था'.

जेनेट ग्याम्फी (दाएं) और उनकी सौतेली बहन नष्ट हो चुके कोको बाग़ान को देखते हुए.
यह देखते ही ग्याम्फी फूट-फूट कर रोने लगी. अपने पति से अलग हो चुकी इस महिला ने कहा, ‘अपने बच्चों को सौंपने का सोचा था.’
कोको बाग़ान में खनन कार्य से निकले सायनाइड युक्त अपशिष्ट जल के बीच से गुजरती हुई एक किसान.
फेलिशिया गैसिकाह अपने कोको फार्म के किनारे खड़ी है जिसपर पश्चिमी घाना में अतिक्रमण करने वाले खनिकों का ख़तरा मंडरा रहा है.
पश्चिमी घाना के साम्ब्रेबोई में गैलमसी से तबाह हुए कोको बाग़ान में खड़ी एक कार. सोने का खनन करने वाले और उन्हें पट्टे पर जमीन देने वाले, तो फौरन मुनाफा कमा लेते हैं, लेकिन भूजल और खुद जमीन के लिए इसके दीर्घकालिक प्रभाव विनाशकारी होते हैं.

कोको सीजनल फसल नहीं, बल्कि कई महीनों तक हो सकती है. प्रसंस्करण के बाद, कोको बीज से कोको और कोको बटर मिलता है. ये विभिन्न प्रकार के पेय और खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल होता है. हालांकि, इस साल फसल बर्बाद रही, किसानों को सोने के बेलगाम अवैध खनन, औद्योगिक कुप्रबंधन, जलवायु परिवर्तन और तेजी से फैल रही पौधों की बीमारियों के गंभीर परिणाम भुगतने पड़े. बड़े पैमाने पर अछूते जंगलों की कटाई करने वाली लॉगिंग कंपनियां अब इलाके से चली गई हैं. कई किसान बताते हैं कि तब से फसल के रखरखाव की लागत काफी बढ़ गई है. कोको के पेड़ से फलियां पकने तक में लगभग पांच साल लगते हैं, इसे सूखा नहीं पसंद और हमेशा कीटनाशकों की ज़रूरत पड़ती है. इससे जमीन को नुक़सान होता है, भूजल दूषित होता है. इससे जैसे-जैसे यह संकट गहराता जा रहा है, दुनिया भर को इसका एहसास हो रहा है, उपभोक्ता जब भी चॉकलेट खरीदते हैं तो कीमत बढ़ हुई ही पाते हैं.

खाने से पहले धूप में सुखाई कोको बीज को मसलता एक पूर्वी घाना के क्वाबेंग में एक गोदाम का कर्मचारी. एक कोको पेड़ को 200 ग्राम चॉकलेट के लिए पर्याप्त कोको पैदा करने में लगभग एक साल लग सकता है.
पश्चिमी घाना में एक नर्सरी में उगाए गए हाइब्रिड् कोको के पौधे.
पूर्वी घाना के ओसिनो में एक खेत में कोको की फलियां फूली हुई शाखाओं की चपेट में आ गई हैं, यह एक वायरस है जो अंततः उन्हें मार देगा. एक बार रोग से संक्रमित होने पर वृक्ष को तोड़ देना चाहिए और कोको को दोबारा लगाने से पहले मिट्टी का उपचार करना चाहिए.
कोको की खेती के लिए पर्याप्त मात्रा में भूमि, पानी, कीटनाशकों और उर्वरकों के निरंतर उपयोग की आवश्यकता होती है. सोने के खनन से निकलने वाला अपशिष्ट जल-भूमि के प्राकृतिक तत्वों में लगातार गिरावट कर रहा है.

1957 में जब अभी घाना को आजादी नहीं मिली थी, तब तक इसके यूरोपीय उपनिवेशवादी इसे गोल्ड कोस्ट के रूप में जानते थे, जहां उन्हें यूरोपीय सामानों के बदले में सोना मिलता और इस क्षेत्र के लोगों को गुलाम बनाते थे. 1870 के दशक में पहली बार यूरोपीय इस क्षेत्र में कोको के पेड़ और फलियां लेकर आए, वृक्षारोपण की शुरुआत की जिससे 1920 के दशक तक दुनिया की आधी से अधिक कोको आपूर्ति यहीं से हो रही थी. आज, अपेक्षाकृत गरीब घानावासी जो सोने की तलाश में घने बागानों में उथले गड्ढे खोदते हैं और फसल की जगह को कीचड़ भरे गड्ढों में बदल देते हैं, उनमें जेनेट ग्याम्फी जैसे किसानों के साथ एक चीज समान है: वे ऐसी जगह पर एक अदद सुकून की जिंदगी तलाशने की कोशिश करते हैं जो आज तक उपनिवेशवाद के किए का बोझ झेल रही है.

क्वाबेंग में धूप में सुखाए कोको बीज का एक गोदाम.
पश्चिमी घाना में कोको के बाग़ान में सोना ढूंढते हुए कुछ युवा लड़के. गैलेमसी में जमीन में उथले छेद खोदना, मिट्टी और पानी में सोना खोजना और फिर अयस्क से सोना निकालने के लिए साइनाइड और पारा का उपयोग करना शामिल है.
बर्बाद हो चुके एक कोको बाग़ान की ड्रोन से ली गई फोटो.
क्वाबेंग में एक कोको फार्म पर काम करते हुए 58 वर्षीय महामा ओस्मानु. 2024 की शुरुआत में घाना के 590,000 हेक्टेयर बाग़ान नष्ट हो गए थे.
क्वाबेंग में एक कंपनी के गोदाम में रखी धूप में सुखाई गई कोकोआ की फलियां. कोको बीन्स की कमी के कारण 2024 की शुरुआत में कोटे डी आइवर और घाना में प्रोसेस करने वाले संयंत्र लगभग बंद हो गए.
एक गोदाम में कोको बीन्स पर आराम करती एक मक्खी.
क्वाबेंग में नष्ट हुए कोको बाग़ान के पास रखे गए गैलेमसी के लिए ईंधन वाले कंटेनर.

Thanks for reading till the end. If you valued this piece, and you're already a subscriber, consider contributing to keep us afloat—so more readers can access work like this. Click to make a contribution: Contribute