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ये पश्चिमी घाना का समरेबोई शहर है. एक कोको फ़ार्म में एक कार लावारिस खड़ी है, जिसके अंदर भरी मिट्टी में घास उग आई है. फ़ार्म सोने के अवैध खनन से बर्बाद हो गया है. और ऐसा घाना और कोटे डी आइवर के कई कोको बाग़ानों के साथ भी हुआ है. ये दोनों पश्चिम अफ्रीकी देश 2022 तक कोको बीज की वैश्विक आपूर्ति में 60 प्रतिशत से अधिक योगदान करते थे. समरेबोई में 52 वर्षीय कोको किसान जेनेट ग्याम्फी ने लगभग 6,000 कोको पेड़ों के फार्म को अपने बच्चों को सौंपने का सोचा था. लेकिन आज यहां एक दर्जन से भी कम पेड़ बचे हैं. छोटे पैमाने के खनन के बाद खनिकों का छोड़ा साइनाइड-युक्त कचरा हर जगह को कीचड़ का सा तालाब बना चुका है. ग्याम्फी ने ‘गैलमसी’ तालाब की ओर इशारा कर रॉयटर्स को बताया, 'ये फार्म ही बस मेरा एक गुजारा था'.
कोको सीजनल फसल नहीं, बल्कि कई महीनों तक हो सकती है. प्रसंस्करण के बाद, कोको बीज से कोको और कोको बटर मिलता है. ये विभिन्न प्रकार के पेय और खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल होता है. हालांकि, इस साल फसल बर्बाद रही, किसानों को सोने के बेलगाम अवैध खनन, औद्योगिक कुप्रबंधन, जलवायु परिवर्तन और तेजी से फैल रही पौधों की बीमारियों के गंभीर परिणाम भुगतने पड़े. बड़े पैमाने पर अछूते जंगलों की कटाई करने वाली लॉगिंग कंपनियां अब इलाके से चली गई हैं. कई किसान बताते हैं कि तब से फसल के रखरखाव की लागत काफी बढ़ गई है. कोको के पेड़ से फलियां पकने तक में लगभग पांच साल लगते हैं, इसे सूखा नहीं पसंद और हमेशा कीटनाशकों की ज़रूरत पड़ती है. इससे जमीन को नुक़सान होता है, भूजल दूषित होता है. इससे जैसे-जैसे यह संकट गहराता जा रहा है, दुनिया भर को इसका एहसास हो रहा है, उपभोक्ता जब भी चॉकलेट खरीदते हैं तो कीमत बढ़ हुई ही पाते हैं.
1957 में जब अभी घाना को आजादी नहीं मिली थी, तब तक इसके यूरोपीय उपनिवेशवादी इसे गोल्ड कोस्ट के रूप में जानते थे, जहां उन्हें यूरोपीय सामानों के बदले में सोना मिलता और इस क्षेत्र के लोगों को गुलाम बनाते थे. 1870 के दशक में पहली बार यूरोपीय इस क्षेत्र में कोको के पेड़ और फलियां लेकर आए, वृक्षारोपण की शुरुआत की जिससे 1920 के दशक तक दुनिया की आधी से अधिक कोको आपूर्ति यहीं से हो रही थी. आज, अपेक्षाकृत गरीब घानावासी जो सोने की तलाश में घने बागानों में उथले गड्ढे खोदते हैं और फसल की जगह को कीचड़ भरे गड्ढों में बदल देते हैं, उनमें जेनेट ग्याम्फी जैसे किसानों के साथ एक चीज समान है: वे ऐसी जगह पर एक अदद सुकून की जिंदगी तलाशने की कोशिश करते हैं जो आज तक उपनिवेशवाद के किए का बोझ झेल रही है.
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