28 जनवरी के टिकैट के भाषण के बाद पश्चिमी यूपी के किसान हुए बीजेपी के खिलाफ

18 फ़रवरी 2021
5 जनवरी को शामली जिले में आयोजित एक महापंचायत में शामिल होने जा रहे लोग.
दानिश सिद्दिकी/रॉयटर्स
5 जनवरी को शामली जिले में आयोजित एक महापंचायत में शामिल होने जा रहे लोग.
दानिश सिद्दिकी/रॉयटर्स

लग रहा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी से, किसान आंदोलन का दमन करने के उसके आक्रमक प्रयासों के चलते, नाराज हो रहे हैं. 28 जनवरी की घटना के बाद, जिसमें भारतीय किसान यूनियन (अराजनीतिक) के नेता राकेश टिकैट रो दिए थे, इस क्षेत्र में किसान आंदोलन तीव्र हो गया है. उस घटना के बाद इलाके में कम से कम तीन महापंचायतें हुईं जिनमें हजारों की संख्या में लोगों ने भाग लिया. इसके अलावा इस क्षेत्र के कई लोग गाजीपुर में जारी किसान आंदोलन में शामिल होने पहुंचे.

गाजियाबाद के किसान भीष्म सिंह ने मुझे बताया कि उनके गांव की दीवारों पर लिख दिया गया है कि “बीजेपी, आरएसएस चोर हैं.”

26 जनवरी की ट्रैक्टर रैली के दौरान दिल्ली में हुई हिंसा के बाद मीडिया आंदोलन को बदनाम करने लगी. दो दिन बाद गाजीपुर प्रशासन ने टिकैत को गाजीपुर आंदोलन स्थल खाली करने का नोटिस दे डाला. राकेश टिकैत और उनके भाई पहले बीजेपी के करीब रहे हैं और मुजफ्फरनगर में 2013 में हुए मुस्लिम विरोधी दंगों के आरोप उन पर हैं. 28 जनवरी को टिकैत ने मीडिया से कहा कि उनके साथ धोखा हुआ है. उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने बीजेपी को वोट दिया था लेकिन पार्टी के लोग किसानों को मारने का षड्यंत्र रच रहे हैं.

बागपत जिले के किसान पोविंद्र राणा ने मुझसे कहा कि जब टिकैत को लोगों ने टीवी में रोते देखा तो “हम लोगों की नींद उड़ गई.” उन्होंने बताया कि उनके गांव के लोगों ने बात की और दूसरे दिन तीन ट्रैक्टरों में दिल्ली पहुंच गए. अगले दिन हजारों की संख्या में लोग गाजीपुर पहुंचे और आंदोलन स्थल को खाली नहीं कराया जा सका. राणा ने बताया कि वह आंदोलन स्थल पर दो रातों तक रुके रहे और इसके बाद 31 जनवरी को बड़ौत में हई एक रैली में शामिल हुए.

सहारनपुर के बीजेपी के नेता वीरेंद्र गुज्जर का मानना है कि यदि यह आंदोलन लंबा खिंचा तो राज्य के चुनावों में पार्टी को नुकसान होगा. उन्होंने बताया कि बीजेपी को देखने के लोगों के नजरिए में बदलाव आया है. उन्होंने कहा, “कुछ समय बाद जब चुनाव होंगे तो इसका असर देखने को मिलेगा. अभी स्वार्थवश पार्टी के अंदर लोग खामोश हैं लेकिन भीतर बड़ी हलचल है. सरकार को किसानों की मांग मान लेनी चाहिए. इतना सख्त नहीं होना चाहिए.”

सुनील कश्यप कारवां में डाइवर्सिटी रिपोर्टिंग फेलो हैं.

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