आगा शाहिद अली : एक कवि का अंतर्द्वंद्व

इलस्ट्रेशन : शा​गनिक चक्रवर्ती
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27 July, 2022

1940 के अपने निबंध "इनसाइड द व्हेल" में जॉर्ज ऑरवेल उस एक चीज के माहिर नजर आते हैं जो हैरतंगेज ढंग से गैर-ऑरवेलियन है. आपको लग सकता है कि एनिमल फार्म और 1984 जैसी बीसवीं सदी की सबसे कठोर नैतिकतावादी रचनाओं का भावी लेखक-- जिसने बखूबी यह ऐलान किया हो कि "कला का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए कहना अपने आप में एक राजनीतिक नजरिया है"-- पेरिस में निठल्ले अमेरिकियों के एक समूह के बारे में हेनरी मिलर की किताब, एक ऑटो-फिक्शनल जनरल, ट्रॉपिक ऑफ कैंसर को खारिज कर देगा. इसके बजाय उपन्यास के "जिंदगी के भद्दे और दामन में दाग” के चित्रण ने ऑरवेल को हक्का-बक्का कर दिया.

सालों पहले दोनों लेखक पेरिस में मिले थे जब ऑरवेल स्पेनिश गृहयुद्ध में शामिल होने के लिए जाते वक्त रास्ते में रुक गए थे. मिलर ने ऑरवेल को कॉरडरॉय जैकेट भेंट की लेकिन उनके राजनीतिक यकीनों से इत्तेफाक नहीं जताया. मिलर के लिए ऑरवेल के "फासीवाद का मुकाबला, लोकतंत्र की रक्षा” आदि के बारे में विचार एकदम बकवास थे. 1930 के दशक के उन दिनों में मिलर का खयाल था कि एक लेखक का स्पेन जाना और लोकतांत्रिक शासन पर जनरल फ्रेंको के कब्जे का मुकाबला करने वाली मिलिशिया में शामिल होना, लेखक की काबीलियत का निहायती घटिया इस्तेमाल था.

मिलर की राजनीतिक उदासीनता में ऑरवेल को कलात्मक भाव की शांत दावेदारी दिखी. उन्होंने लिखा कि क्योंकि "उनका अनुभव पैसिव (प्रत्यक्ष नहीं है) हैं इसलिए मिलर अधिक सोद्देश्य लेखकों की तुलना में सामान्य व्यक्ति के करीब पहुंचने में ज्यादा सक्षम हैं क्योंकि साधारण मनुष्य भी पैसिव है.” अधिक सोद्देश्य लेखक"- और ऑरवेल ने खुद को उनमें ही गिना- कभी-कभी दुनिया में जो हो रहा होता है उसके बारे में अखबारों में आई खबरों की बाढ़ से अभिभूत हो जाते हैं. मिलर और उनकी तरह के हकीकत के मुतमइन, जैसे कि पुराना नियम में योहाना, व्हेल के पेट के भीतर- कलात्मक होने की बेहतर स्थिति में थे, कल्पनाशील रूप से यह चित्रित करने के लिए कि चीजें कैसी थीं. ऑरवेल शायद यह अनुमान लगाते हुए कि दूसरे विश्व युद्ध के अंत तक "प्रमुख साहित्य" का कोई काम नहीं किया गया एक धूमिल बिंदु पर निबंध खत्म कर सकते हैं, लेकिन केवल कोई बेचारा पाठक यह निष्कर्ष निकालेगा कि यह हिस्सा राजनीतिक रूप से प्रतिबद्ध कलाकारों को हेय समझता है. मिलर कुछ हद तक बुनियादी तर्क के लिए मिट्टी के माधव हैं: उपन्यास या कविता में किसी लेखक के इरादे, भले ही वह उदात्त हों या महान, अपने आप में काफी नहीं होते हैं. ऑरवेल ने अपनी बात तब रखी जब वह मिलर को "वास्तव में एक किताब भर का आदमी" कहते हैं.

देर-सबेर मुझे उससे यह उम्मीद कर लेनी चाहिए कि वह नासमझी में या धूर्तता में उतरेगा: उसके बाद के काम में दोनों के संकेत हैं ... कुछ अन्य आत्मकथात्मक उपन्यासकारों की तरह, उसके पास सिर्फ एक काम पूरी तरह से करने के लिए था और उसने ऐसा किया. यह देखते हुए कि 1930 के दशक के फिक्शन कैसे रहे हैं, उसका महत्व है.

युद्ध के बाद, जैसा कि तय था मिलर की शौहरत कमोबेश उसी तरह रही. उनके उपन्यासों के दृश्य केट मिलेट की यौन राजनीति पर लिखी किताब सैक्सुअल पॉलिटिक्स की आंधी में उखड़ गए. केट मिलेट ने पुरुष लेखकों में स्त्री द्वेष का अध्ययन किया. इन दिनों मिलर पॉटी माउथ व्यक्ति के रूप में याद किया जाता है. लेकिन, कम उम्मीदें रखने के अपने तर्क से परे ऑरवेल शायद वह कह पा रहे थे जिसे साहित्यिक आलोचक शायद ही कभी स्वीकार करते हैं. वह यह कि उनकी यह भविष्यवाणी उस समय अवधि के भर के लिए नहीं थी जिसमें वह एक पुस्तक के बारे में बात कर रहे थे. एक लेखक जो पहले प्रेरक प्रतीत होता था, वह बाद में "नासमझी में उतर सकता है." जो आज व्हेल के अंदर दिखते हैं वे कल बाहर दिख सकते हैं.

कवि शाहिद अली आगा के बारे में सोचने पर ऑरवेल की बताई गई खासियतें मौजूं लगती हैं. यहां एक लेखक है जिसने अपनी ज्यादातर जिंदगी पुराना नियम की कथा वाली व्हेल के भीतर बिताई. लेकिन ऐसा लगता है उसकी मौत के बाद के सालों में वह बाहर ला दिया गया है. भारत की नई सहस्राब्दी पीढ़ी ने उनके बारे में अमिताभ घोष के निबंध "द घाट ऑफ द ओनली वर्ल्ड'' के जरिए जाना जिसमें वह एक बुजुर्ग कवि हैं. यह पूरी तरह से 2014 से पहले के भारत के चतुराईपूर्ण लोकाचार के मद्देनजर है जहां स्कूली बच्चों को किसी कश्मीरी कवि की कविता से पहले उस कवि का जीवन परिचय पढ़ाया जाता था. हर उपन्यास जिसने कश्मीर को जरा सा भी छुआ है, अली की उन्हीं पंक्तियों को एपिग्राफ के रूप में उद्धृत करता रहा. जब श्रीनगर में किसी रमते पत्रकार के शब्द चूक जाते, तो वह हमेशा अली की किताब, द कंट्री विदाउट ए पोस्ट ऑफिस के शीर्षक का सहारा लेने लगता है. 

यह क्या मजाक से कम था कि 2016 में हैदराबाद के एक इंजीनियर कनुमुरीक मणिकांत कार्तिक ने कश्मीर में डाकघरों की कुल संख्या के बारे में सूचना के अधिकार के तहत जवाब मांगा, या जब तत्कालीन कैबिनेट मंत्री वेंकैया नायडू को संसद में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर में लगे एक पोस्टर के बारे में बात करनी पड़ी जिस पर लिखा था 'द कंट्री विदाउट ए पोस्ट ऑफिस .' क्या सच में ऐसा है कि हमारे देश में कोई डाकघर नहीं हैं?”, नायडू ने सवाल किया. लेकिन यह खराब रीडिंग- या, बल्कि, बैड​-फेथ रीडिंग- कई मायनों में ऐसी शिक्षा नीति का लाजमी नतीजा था, जो हर कदम पेशे पर सहज बुद्धि से अधिक इल्म को तरजीह देती है, जिसमें एक कवि के बारे में पढ़ने पर ज्यादा जोर दिया जाता है न कि उसकी कविता को. एक ऐसे मुल्क में जहां अली का खासतौर पर अध्ययन उनकी सामाजिक और राजनीतिक प्रासंगिकता के लिए किया जाता है, वहां क्या आप एक इंजीनियर को एक लाइन की शाब्दिक व्याख्या करने के लिए दोषी ठहरा सकते हैं?

अली को पढ़ते हुए, आप पाते हैं कि उनको समझना आसान तो नहीं है. आलोचक रांडेल जेरेल के एक "अच्छे" कवि के विचार के बहुत नजदीक अली हैं. जेरेल के अनुसार कवि वह है "जो ताउम्र तूफानों के बीच डटा रह सके, पांच या छह बार जिस पर गाज गिरे.”

अली का बचपना खराब नहीं था बल्कि बहुत खुशगवार बीता. उसके पिता आगा अशरफ अली दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में पढ़ाते थे. 1952 में शेख अब्दुल्ला सरकार ने कश्मीर में एक स्कूल के निरीक्षक के बतौर उनकी तैनाती की. लेकिन बटवारे के बाद के सालों का मिजाज राजनीतिक तौर पर मकसदी था. आजादी से पहले प्रगतिशील लेखक संघ (प्रोग्रेसिव राईटर्स एसोसिएशन) था जिसकी ​बुनियाद ही इस यकीन पर पड़ी थी कि भारतीय साहित्य को "भूख और गरीबी, सामाजिक पिछड़ेपन, और राजनीतिक मातहती की बुनियादी समस्याओं पर केंद्रित होना चाहिए." इस साहित्यिक आंदोलन की सरपरस्ती मुंशी प्रेमचंद, मुल्क राज आनंद, अहमद अली और इस्मती चुगताई कर रहे थे.

अली अपने माता-पिता की चार संतानों में दूसरे नंबर की संतान थे और वह दिल्ली और श्रीनगर में पले-बढ़े. वह लंदन में भी करीब एक साल रहे क्योंकि वहां उनके माता-पिता अध्यापन में डिप्लोमा करने गए थे. हालांकि अली प्रगतिशील आंदोलन में शामिल होने के लिए बहुत छोटे थे लेकिन अपने पिता का असर उन पर जरूर हुआ जो समाजवादी थे और "फ्रायड और मार्क्स जिनकी जुबान पर होते/ कुछ ऐसी बात की जरूरत को पहचाना चाहिए.” साथ ही साथ उनकी मां, सूफिया आगा, एक कॉन्वेंट-शिक्षित सुन्नी औरत, जिन्होंने "काफी पहले ही परदा करना छोड़ दिया था" और बेगम अख्तर का हवाला देना पसंद करती थीं.

अली के सभी पुरखे जानी-मानी हस्ती थे. उनके परदादा डोगरा शासक प्रताप सिंह के शासनकाल के दौरान एक दरबारी थे. उनकी दादी एक लोकप्रिय कार्यकर्ता और विधायक थीं. उनके पिता के शिक्षक जाकिर हुसैन थे जो बाद में 1967 में भारत के राष्ट्रपति बने. एक शुरूआती कविता, "क्रैक्ड पोर्ट्रेट्स" में, आप एक बेटे से मिलते हैं जो अपने पवित्र पारिवारिक एल्बम को पलटता है और धीरे-धीरे खुद को अलग समझने लगता है.

मैं पन्ने पलटता हूं,

अपने वालिद को टेनिस रैकेट पकड़े हुए देखता हूं,

जो औरतों के साथ खेलने के लिए तैयार हैं,

उनकी शर्ट जगमग है.

लेनिन के बीथोवेन प्रेम का हवाला दे वह मुझे मेरे करीब लाते हैं,

लेकिन गांधी की ओर मुड़ते ही मुझे खो देते हैं.

यह बेशक अली की पहली गाज थी : यह अहसास कि कला ने उनकी कल्पना को किसी भी राजनीतिक नियम से ज्यादा आकर्षित किया. बीथोवेन ने हमेशा उनके लिए गांधी से ज्यादा मायने रखा. जब उन्होंने एक कवि की नजर से अपने परिवार के दिग्गजों को देखा, तो उन्होंने अपने वालिद को "औरतों को पटा लेने वाला" देखा. "द साउंड ऑफ साइलेंस" में, उनकी एक्टिविस्ट दादी को एक परेशान बीबी के तौर पर दर्शाया गया है, जो अपने चरसी पति को घर लाने के लिए सर्द रातों में बाहर निकलने के लिए मजबूर है. "द ढाका गौज" में एक खोई हुई विरासत साड़ी, कुछ ज्यादा दुखद है: "हाथ/ बुनकरों के ... कटे हुए/ बंगाल के करघे खामोश." साम्राज्यवाद के बाद के माहौल में जन-मानसिकता से दूर होना आमूलचूल परिवर्तन था, जहां इतने सारे उपमहाद्वीप के लेखकों ने जानबूझकर राष्ट्र-निर्माण परियोजना में खुद को शामिल कर लिया था. यहां एक कवि था, जो उच्च वर्ग के नेताओं और शिक्षाविदों की एक लंबी कतार से आ रहा था, अपनी सी नजर से, एक वाइल्डियन एस्थेट मुक्त छंद में पारिवारिक रहस्य बिखेर रहा था.

घोष भले ही एक मरहूम दोस्त को इज्जत बक्शते हुए लिखते हैं कि उन्होंने अली को "सबसे करीबी कश्मीरी जो राष्ट्रीय कवि हो सकता है" बताया, लेकिन उनके निबंध ने एक लेखक को एक साहित्यिक मोनोलिथ में प्रभावी रूप से जड़ दिया है. एक पीढ़ी के लिए अभी तक अली के काम से गुजरना ही होता, वह एक ऐसे कवि बन गए जिसे आपको पढ़ना ही चाहिए, जिसने घाटी में नुकसान और पीड़ा के बारे में मसीहाई ढंग से कहा है. लेकिन यह अली के कम से कम बोन स्कल्पचर और द हाफ-इंच हिमालय में पढ़ने के अनुभव को पूरी तरह से पकड़ नहीं पाता है, जो उनके पहले दो प्रमुख कविता संग्रह हैं. अमेरिकी कवि जेम्स मेरिल-बाद में अली के दोस्त और सलाहकार-जिन्हें कभी "सतहों के मनोरंजक" के बतौर जाना जाता था, के लिए एक झुकाव, उत्साही आवाज से आप बह गए : तुकबंदी, संकेत, हास्य; समृद्ध, काल्पनिक रूपकों में एक खुशी; और ऐतिहासिक सार्वजनिक आयोजनों को बेहद निजी शब्दों में पुन: कॉन्फ़िगर करने की इच्छा. शुरुआती कविताओं में, आप लोगों से नहीं मिलते हैं, लेकिन उपस्थिति या, अधिक बार, सुस्त अनुपस्थिति- "एक थका हुआ हिजड़ा / एक गैर मौजूदगी को लेकर सजग है", अली "ए मॉनसून नोट ऑन ओल्ड एज" में खुद के भविष्य के संस्करण की कल्पना करते हैं. "इस युवा कश्मीरी आवाज के लिए इतिहास बोझ नहीं है; यह एक विरासत है, हां, लेकिन साहित्यिक प्रयोग के लिए भी एक अवसर है. उनकी छवियां पतनशील लगती हैं, कभी-कभी जब बड़ा विषय शांत होता है. (ध्यान दें कि कैसे हरे-भरे "बंगाल के करघे" एक उदास विलाप में काम करते हैं.) अली के प्रतिपादन में, अतीत और वर्तमान दोनों, कल्पनाशील संभावनाओं से भरापूरा जान पड़ते हैं. "दिल्ली में कोजिन्त्सेव के किंग लियर को देखने के बाद" से है ”:

चांदनी चौक में कदम रखता हूं, एक सड़क जो कभी

चमेली के फूलों से लदी होती,

महारानी और शाही औरतों के लिए

जिन्होंने इस्फहान से इत्र खरीदा था,

ढाका से कपड़े, काबुल से सार, आगरा से कांच की चूड़ियां.

अनाम रईसों और भूले हुए संतों की कब्रों में रहते हैं,

अब यहां भिखारी

जबकि फेरीवाले सिख मंदिर के बाहर कंघी और आईना बेचते हैं.

सड़क के उस पार ,

एक थिएटर बॉम्बे को शानदार दिखा रहा है.

कहीं और, यह सुझाव है कि बटवारे की विरासत तय नहीं होनी चाहिए.

मैं और मेरे दोस्त काफी सरल हैं :

हमने कभी महाद्वीप को बंटते हुए नहीं देखा.

जब भी मैं इन पंक्तियों को पढ़ता हूं, तो उस बारे में सोचने लगता हूं जो अली ने एक बार एक इंटरव्यू में कहा था. उन्होंने धूमधाम से ऐलान किया, "शाहिद का माहौल है : फंसो और फंसे रहो." नौजवान अली का खास मिजाज, बदले में ऑपरेटिव और बेदाग, एक सतही राजनीतिक कवि के रूप में उनकी लोकप्रिय धारणा के उलट है. पुरानी पारिवारिक तस्वीरों को देखना, या चांदनी चौक की खोई हुई महिमा का सपना देखना, वह भद्दा और चंचल हो सकता है लेकिन मामूली नहीं. शुरुवाती कविताओं में विवाद के लिए वही ताजा तिरस्कार है जिसे ऑरवेल ने ट्रॉपिक आफ कैंसर में जताया था. अली, अपने तरीके से, "जिंदगी के स्याह पक्ष" में व्यस्त थे.

अली के पास व्हेल के बाहर होने की अपनी ही फेंटेसी थीं. उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका में "निर्वासन" में होने का दावा किया, हालांकि वह वहां तब से रह रहे थे जब वह बारह साल के थे और जब उनके पिता ने ग्रेडुएशन में दाखिला लिया और परिवार को चार साल के लिए मुन्सी, इंडियाना में स्थानांतरित कर दिया- "प्रवासी" सुनने में रोमांटिक नहीं लग रहा था, "आप्रवासी" बहुत हद तक अमेरिकी था.

अली 1970 के दशक के मध्य में पेन स्टेट में एक पीएचडी छात्र के रूप में लौटे (उनकी थीसिस टीएस एलियट पर थी), इसके बाद एरिजोना विश्वविद्यालय से ललित कला में मास्टर की उपाधि प्राप्त की,और फिर अपनी बाकी जिंदगी रचनात्मक लेखन सिखाने में बिताई. देश भर में गर्मी की छुट्टियों के दौरान श्रीनगर और दिल्ली में अपने माता-पिता से मिलने जाते. उनका जीवन, कुछ मायनों में, कई उपमहाद्वीप के उपन्यासकारों के इक्कीसवीं सदी के करियर को पूर्वनिर्धारित करता है, जो अब दशकों से विदेश में बसे हुए हैं, जो नई सामग्री की तलाश में या अपनी नई किताब के प्रमोशन में सालाना यात्रा करते हैं, लेकिन ऐसा दिखावा करते हैं कि ​वह इसे छोड़ कर जाना ही नहीं चाहते. साहित्यिक आलोचक जेम्स वुड इस परिघटना को "होम लूजनेस यानी घर छूटने का डर" कहते हैं, वह अधिकार जिसके साथ आज के जेट-सेटिंग एक्सपैट्स "प्रस्थान और वापसी की संरचना जो समाप्त नहीं हो सकती है" में रह सकते हैं. लेकिन यह अली ही थे जिन्होंने "कश्मीर से पोस्टकार्ड" के लिए होम लूजनेस पोस्टर कविता लिखी थी, वह भी वैश्वीकरण और शीत युद्ध की समाप्ति के सालों पहले, जिसने कई सीमाओं को उन लोगों के लिए झरझरा बना दिया था जो उन्हें पार करने का जोखिम उठा सकते थे.

कश्मीर सिकुड़ जाता है मेरे मेलबॉक्स भर में,

ठीक चार गुणा छह इंच का मेरा घर.

मुझे हमेशा साफ-सफाई पसंद थी. अब मैं

आधा इंच हिमालय अपने हाथ में थामता हूं.

यही घर है. जो गर कभी होता मेरा घर

तो करीब-करीब ऐसा ही होता.

जब मैं वापस आऊंगा,

तो रंग इतने शानदार नहीं होंगे,

झेलम का पानी इतना साफ,

इतना नीला. मेरा प्यार

इतना जगजाहिर सा.

एक कवि में घर के बारे में तड़प और सतर्कता का एक साथ होना दुर्लभ नहीं है. लेकिन "साफ-सुथरापन" और "ओवरएक्सपोज्ड (जगजाहिर सा)" भी अतिशयोक्ति के डर की ओर इशारा करते हैं : "मैं जगजाहिर सा / आपकी तस्वीर," जैसा कि "ए मानसून नोट ऑन ओल्ड एज" में बूढ़ा व्यक्ति अपने से जवान खुद को धोखा देता है. अली यहां अटूट पुरानी यादों के बारे में संशय में हैं जिसके बारे में बाद में उत्तर औपनिवेशिक विद्वान उनकी कविता में जोर पाएंगे, जो निर्वासन, नुकसान और लालसा की दुकानों में सजी मैली नुमाइशों के संदर्भ हैं.

कुछ साल पहले, आयोवा विश्वविद्यालय में साहित्य पर एक नए वर्ग को शामिल करते हुए, मैं पाठ्यक्रम पर "पोस्टकार्ड फॉर्म कश्मीर" पाकर हैरान था. मेरे छात्र, उनमें से ज्यादातर मध्यम वर्ग और अमेरिकी, घर छोड़ने के खतरों पर एक चेतावनी के रूप में कविता पढ़ते हैं. "कश्मीर" शब्द ने उन्हें कोई असामान्य राजनीतिक या अनोखा स्वाद नहीं दिया. अली शायद अपने-अपने गृहनगरों के बारे में बात कर रहे होंगे, कहीं मिडवेस्ट में, जहां वे थैंक्सगिविंग के लिए वापस गए थे. वास्तव में, जब उन्होंने अपनी कक्षा की खिड़कियों से बाहर देखा, तो उन्होंने एक ऐसा परिदृश्य देखा जो अली की कश्मीर की छवियों से बहुत अलग नहीं था : बेदाग आयोवा नदी, उपनगरीय घर जिनके मेलबॉक्स बहुत दूर हैं, धूप के धब्बे हर जगह बर्फ बनाते हैं और भी अधिक प्राचीन लगते हैं. सुबह के समय अंग्रेजी-दर्शनशास्त्र भवन से बाहर देखते हुए, यह कल्पना करना आसान था कि परिसर दुनिया के बाकी हिस्सों से कटा हुआ है.

आयोवा से जुड़ी अली की रचनाओं को पढ़ना एक अमेरिकी कवि के रूप में उन्हें देख पाना है. उनका अलगाव उनके "भाषा के खेल" और सतहों के प्यार एक ही सिक्के के दो पहलु दिखाई देते हैं. कश्मीर लौटने की उनकी चिंता अब द्वंद्व की तरह लगती है. "सर्वाइवर" में अली को डर है कि उनके घर में कोई और रह रहा है, कोई और जिसका नाम भी वही है और जो अपनी मां से उसकी आवाज में फोन पर बात करता है. अली लिखते हैं, "मां अपनी दास्तां बताने के लिए बेदम है लेकिन उनमें मेरा अता-पता नहीं है." "द प्रीवियस ऑक्यूपेंट" में, नई मकान मालकिन उन्हें मकान में पहले रहने वाले किरायेदार के बारे में बताती है तो अली को फिर से कोई रूह सताने लगती है.

अब जबकि उसने मुझे पा लिया है,

मेरी देह हर जगह उसकी छाया डालती है.

वह कभी नहीं, कभी यहां से हटेगा नहीं.

अन्य जीवन की दोनों कविताओं में एक ऐसा भाव है जो अली के अपने गंदे, प्रवासी स्व से अधिक वास्तविक लगने लगा है. लेकिन रूपक बहुत साफ-सुथरे हैं : एक डोपेलगैंगर, एक कार्बन कॉपी, एक भूत. वे उस देश में रहने वाले किसी व्यक्ति की कहानी के साथ बिल्कुल फिट नहीं बैठते जहां अली आंशिक रूप से बड़े हुए. अली के आत्म-विन्यास के दावे को स्वीकार करने के लिए किसी को भी उनके पोज में कृत्रिम मेलोड्रामा को स्वीकार करना चाहिए. आखिरकार, एक तस्वीर पोस्टकार्ड केवल एक छपे पन्ने के हाशिए के भीतर ही आपकी याद को पा सकता है. अली की कविताएं आखिरकार उनके आत्म-सचेत साहित्यिक भोग के कारण प्रभावित करती हैं.

जिस तरह मिलर 1930 के दशक के शोरगुल से दूर हो गए और अपने उपन्यास लिखने के लिए मोंटपर्नासे के एक कोने में चले गए, उसी तरह अली ने अमेरिकी विश्वविद्यालय के शहरों में आत्म-निर्वासन का जीवन चुना जो कि व्यापक दुनिया के बजाए उनके विचार से मेल खाता था. ओहियो में रूट 80 के साथ जिप करते हुए उन्होंने कोलंबियाना काउंटी के एक शहर कलकत्ता-से बाहर निकलकर "कविता लिखने के प्रलोभन" की ज्यादा बेचैनी महसूस की. एमिली डिकिंसन कविता में कैशमीर ऊन के संदर्भ में उनको दिखे तो उन्होंने अपने प्रसिद्ध तुकबंदी शब्दकोश में कुछ शब्द जोड़ लिए. जैसे "कशमीर, काश्मीर, कश्मीरी, काश्मीरी ..." ए नॉस्टलजिस्ट्स मैप ऑफ अमेरिका की कई कविताएं एरिजोना में लिखी गई हैं, जहां अली फिर से गैरमौजूदों के साथ जुड़ गए हैं यानी गायब मूल अमेरिकी जनजातियां, मीलों अंतहीन रेगिस्तान. "लिविंग सोनोरा" में, वह लिखते हैं, "रेगिस्तान हमेशा जोर देता है : वफादार रहो / यहां तक ​​​​कि उन लोगों के लिए भी जिनका अब वजूद नहीं है." सालों पहले अली चांदनी चौक में भीड़ को पार करते हुए मुगल भव्यता के विचारों से खुद को विचलित पाते थे लेकिन अब उन्होंने न्यू मैक्सिको के शांत विस्तार में फीकी गूंज सुनी, गूंज जो "पूरे इतिहास को जिंदा कर रही है."

द कंट्री विदाउट ए पोस्ट ऑफिस लिखने आए, तब तक उन्होंने दूर से सुनने की कला में महारत हासिल कर ली थी. हिंदू राष्ट्रवादियों के उन्माद के चलते पुस्तक अब मुख्यधारा की भारतीय फैंटेसी में एक प्रतिबंधित स्थिति रखती है. लेकिन अली के उदारवादी समर्थक भी इस बात से चूक जाते हैं कि कर्फ्यू वाली रातों में इन कविताओं और "आधी रात सैनिकों द्वारा घरों में लगा दी गई आग" की कल्पना प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के रूप में नहीं की गई थी. वे दोस्तों और माता-पिता के उजाड़ पत्रों के साथ अपने बचपन के शांत पहाड़ों को समेटने के अली के प्रयासों से उभरे. पुस्तक के पूर्ववृत्त अत्यधिक साहित्यिक हैं. "ब्लैज्ड वर्ड : ए प्रॉलॉग," उदाहरण के लिए, एक कविता के बारे में एक कविता है. अली रूसी कवि ओसिप मंडेलस्टैम की कुछ पंक्तियों के अनुवादित संस्करण पर से शुरू करते हैं.

वह एक काल्पनिक मातृभूमि पीटर्सबर्ग (मैं, श्रीनगर) को फिर से बुनते हैं, इसे भरते हैं, इसे खत्म करते हैं, इसमें खुद (मैं खुद को) को बंद करते है. क्योंकि वह एक सौभाग्‍यशाली शब्द है जिनका कोई अर्थ नहीं है, ऐसे फूल हैं जो कभी नहीं मरेंगे, ऐसे गुलाब हैं जो कभी नहीं गिरेंगे, एक ऐसी रात जिसमें मैंडेलस्टम डरता नहीं है और निकल पड़ने की जरूरत नहीं है. सौभाग्‍यशाली औरतें अभी भी गा रही हैं.

इसे पढ़ते हुए आधुनिकता के बिंबों में न खो जाना असंभव है. पलायन और सैन्य कार्रवाई की गंभीर खबरों के बीच, अली उस शहर को थामे हुए थे जिसे उन्होंने अपने दिमाग में भरा हुआ था. गीत गाती औरतों की छवि मुझे यह भी याद दिलाती है कि अली ने कभी भी कश्मीर के राजनीतिक भविष्य के बारे में अपनी राय नहीं बनाई थी, जैसा कि एक कलाकार की प्रवृत्ति होती है. घोष अपने निबंध में एक बातचीत के बारे में बताते हैं जिसमें अली ने भारतीय राज्य के भीतर स्वायत्तता की वकालत करके बातचीत शुरू की, लेकिन बाद में वह अपनी बात से पिछे हट गए "क्योंकि कई अन्य जटिलताएं हालात में इस कदर घुस आईं कि समाधान के बारे में सोचना लगभग असंभव था." 1990 के दशक की उथल-पुथल के बाद, अली अब अपने मेलबॉक्स में घर को एक ओवरएक्सपोज्ड तस्वीर के रूप में नहीं सोच सकते थे. उनकी नजर अब उस चीज के करीब थी जिसे कवि डब्ल्यूएस मेरविन ने एक बार अपनी पत्रिका में लिखा था : "घर एक ऐसी जगह है जो मौजूद नहीं है, जिसके बारे में आपकी राय अप्रासंगिक है."

फिलॉसॉफिकल फ्रैगमेंट्स में एक जगह पर सोरेन कीर्केगार्ड का दावा है कि "विरोधाभास के बिना विचारक बिना भावना के प्रेमी की तरह है : एक मामूली औसत दर्जे का." मनन कपूर की ए मैप ऑफ लॉन्गिंग्स, जिसे अली की "पहली प्रमाणिक जीवनी" बताया जाता है, अपने विषय अली को विडंबनाओं के बिना वाला शख्स के बतौर प्रस्तुत करती है जो केवल उन्हीं धाराओं से प्रभावित हुआ जो दृष्टिगोचर थीं. केवल एक सौ पचास पेजों की यह किताब एक नजरिया भी पेश नहीं कर पाती. कपूर की दिलचस्पी अली के जीवन या काम में नहीं, बल्कि काव्य के अस्पष्ट विचार में है. अली जहां भी गए- एरिजोना, इंडियाना, न्यू मैक्सिको- जाहिरा तौर पर उन पर एक "गहरा" असर इन जगहों का रहा. जिस किसी के बारे में उन्होंने कोई कविता या कोई लेख लिखा जैसे कवि फैज अहमद फैज, हिंदू देवता कृष्ण निश्चित रूप से, उनके लिए "महत्वपूर्ण" थे. कपूर की किताब में अली को एक ऐसे कवि के रूप में पेश किया गया है जिसका एक खास स्वाद है और वह एक सुस्त और कृत्रिम इंसान है, वह बिना जुनून का प्रेमी है.

किसी माता-पिता की तरह जो खाने की मेज पर किसी भी तरह की सेक्स की बात को मना करते, कपूर ने परिचय में लिखा है कि उन्हें अली के "निजी जीवन" में कोई दिलचस्पी नहीं है क्योंकि यह "पाठक को उनकी कविता में नहीं ले जाता है." यह महान ज्ञान कपूर को कैसे मिला? यह मान लेना ठीक जान पड़ता है कि कवि के जीवन का हर पहलू किसी न किसी तरह से पन्नों पर दिखाई देगा और अगर अली के प्रेम (क्रश) और बॉयफ्रेंड का कोई सुझाव इतना परे है, तो किताब को जीवनी क्यों कहें? हम 1970 और 1980 के दशक में- भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका दोनों में- समलैंगिक, भूरे और मुस्लिम होने के बारे में बहुत कम जानते हैं- और अली के इस रंग को नजरअंदाज करने का कपूर का फैसला साफ तौर पर जानने के इस अवसर को गंवाना है. अली ने एक बार एक साक्षात्कार में खुलासा किया था कि पेन स्टेट में दाखिला लेने के बाद वह "एक प्रेमी के रूप में" विकसित हुए. कपूर इसका मतलब यह समझते हैं कि समलैंगिक होने के बारे में उन्हें "कोई चिंता नहीं" थी. अगर यह सच था, तो अली ने तीस साल का होने तक अपने परिवार को इस बारे में क्यों नहीं बताया? अली के लिए एक "समलैंगिक कवि" के रूप में देखे जाने के बारे में चिंतित होना एक बात है और एक जीवनी लेखक के लिए यह एकदम गलत होगा कि वह यह न देखे कि अली अपने "प्रेमी" को अपनी गजलों में बार-बार लाते हैं. या "डियर शाहिद" से यह, जिसमें एक दोस्त उन्हें कश्मीर लौटने के बारे में लिखता है :

क्या तुम जल्दी आओगे? तुम्हारा इंतजार करना बसंत के इंतजार जैसा है. हम बादाम के फूल का इंतजार कर रहे हैं. और, अगर भगवान ने चाहा, हे! शांति के वे दिन जब हम सब प्यार में थे और हम जहां भी गए बारिश हमारे हाथ में थी.

अली ने खुलेआम अपनी शुरुआती जिंदगी की एक गुलाबी तस्वीर चित्रित की- मददगार मां-बाप, असंबद्ध किशोरावस्था, कश्मीर में पारिवारिक घर "आत्म-अभिव्यक्ति की संभावनाओं" से भरा हुआ - और कपूर में दरारों की गहराई से जांच करने के लिए तंत्रिका की कमी है. युवा अली जाहिर तौर पर उन विशेषाधिकार प्राप्त उपमहाद्वीप के पहले लड़कों में से थे, जिन्होंने दस साल की उम्र में अपनी पहली कविता-यीशु मसीह पर लिखी, बीस साल की उम्र से पहले जवाहरलाल नेहरू और जाकिर हुसैन के साथ मुलाकात की. कोई पाठक घाव के बारे में हैरान हो सकता है - या यों कहें, यह जरूरी है - जो किसी को कविता में करियर के लिए इतना असामयिक और अच्छी तरह से प्रेरित करता. सीनियर अली ने बेटे की कविताओं को मंजूरी दी, शायद इसलिए कि वे शायद ही कभी जोखिम भरी थीं. कपूर जोर देकर कहते हैं कि अशरफ की "मूल्य व्यवस्था", समानता और स्वतंत्रता में एक उदार विश्वास, "शाहिद की कविताओं में मौजूद है." इसका असर, दूसरी बातों के अलावा, अली को एक नीरस सम्मानजनक व्यक्ति की तरह दिखने का है. कपूर दिल्ली और श्रीनगर में अशरफ के करियर के बारे में समझ में आते हैं , लेकिन जब वह अपने विषय की ओर मुड़ते हैं तो आप यह महसूस नहीं कर सकते कि वह अस्थिर जमीन पर हैं.

अली ने अपने रहस्यों और असुरक्षाओं को काफी अनुग्राह्यतापूर्वक सुरक्षित रखा लेकिन यह एक जीवनी लेखक के लिए कैसे मुमकिन है कि वह इसे न छेड़े? कपूर लिखते हैं कि ट्रंप के कार्यकाल के दौरान उन्हें एक बार अमेरिकी वीजा देने से मना कर दिया गया था, जिसके कारण वह न्यूयॉर्क के हैमिल्टन कॉलेज में अली के निजी कागजात तक नहीं पहुंच सके. क्या वह इंतजार और फिर से कोशिश नहीं कर सकते थे? साहित्यिक विद्वान लैंगडन हैमर 2015 में 800 पन्नों की किताब प्रकाशित करने से पहले कम से कम एक दशक तक जेम्स मेरिल के जीवन में तल्लीन रहे. लेखक रॉबर्ट ए कारो पचास सालों से पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बी जॉनसन की एक बहु-खंडी जीवनी पर शोध कर रहे हैं. क्या अली का जीवन इतने ही धैर्य और मेहनत के लायक नहीं है? ए मैप ऑफ लॉन्गिंग्स जल्दबाजी में एक साथ बटोर ली गई टिप्पणियों का पैचवर्क जान पड़ती है.

कपूर एक कवि के अपने डेस्क पर "लगातार लिखने" या साथी लेखकों और विचारकों के साथ साहित्य पर बातचीत करने के विचार से अभिभूत दिखाई देते हैं. वह ज्यादातर अली के साक्षात्कारों से लेकर साहित्यिक पत्रिकाओं तक के साक्षात्कारों को उद्धृत करते हैं - साक्षात्कार जो, ऐसा न हो कि हम भूल जाएं, कभी-कभी पांडुलिपि में सालों तक संपादित किए जाते हैं - और अली के पिता और भाई-बहनों द्वारा याद में पैराफ्रेज किए गए हैं, जिनसे उम्मीद की जा सकती है कि वे लेखन जीवन के बारे में केवल इतना कुछ जान सकते हैं. जब अन्य लेखकों को उद्धृत किया जाता है, तो यह आमतौर पर एक निबंध होता है जिसे उन्होंने अली की मृत्यु के बाद लिखा या कपूर के साथ सावधानीपूर्वक ईमेल पत्राचार के अंश हैं. कपूर की निष्ठा, आपको जल्द ही पता चलती है, जो उनकी साक्षात्कारकर्ताओं के प्रति है, उनकी शालीन टिप्पणियों को शामिल करने के लिए, और केवल आंशिक रूप से पुस्तक के लिए. विवरण ज्यादा साफगोई नहीं जताते हैं; उन्हें एक सम्मोहक कहानी में पिरोने का काम नहीं किया गया है. व्यापक अर्थों को छोड़कर, अली की चिंताओं, भय, महत्वाकांक्षाओं, पछतावे और यहां तक कि परिस्थितियों को व्यक्त करने का कोई प्रयास नहीं है. कपूर अक्सर अली की कविताओं के कालक्रम पर नज़र रखने में विफल रहते हैं. इस लघु जीवनी की त्रासदी यह है कि यह विकिपीडिया प्रविष्टि के रूप में भी खड़ी नहीं होती है. 

कपूर की कविताओं के बारे में अंतर्दृष्टिपूर्ण होती तो कुटिल शोध क्षम्य हो सकता था. किताब के बीच में उन्होंने सुझाव दिया कि द हाफ-इंच हिमालय ने सलमान रुश्दी के मिडनाइट्स चिल्ड्रन के साथ मिल कर साबित कर दिया कि अंग्रेजी एक दक्षिण एशियाई भाषा है. अली की पृष्ठभूमि "हिंदू, मुस्लिम और पश्चिमी संस्कृतियों" में है- ऐसा कुछ अली ने एक साक्षात्कार में कहा था. माना जाता है कि अंग्रेजी में पूर्ण अभिव्यक्ति मिली. लेकिन अंग्रेजी में उपमहाद्वीपीय लेखन की परंपरा द ट्रेवल्स ऑफ डीन महोमेट में वापस चली जाती है, जो 1794 में प्रकाशित हुई थी, और हिंदू, मुस्लिम और पश्चिमी संस्कृतियों का समवर्ती प्रदर्शन कुछ ऐसा है जो इस क्षेत्र में जड़ों वाले किसी भी व्यक्ति के बारे में कहा जा सकता है. ऐसा लगता है कि अली की टिप्पणी का उद्देश्य अमेरिकी कविता परिदृश्य में खुद को अलग करना था, खुद को घर से थोड़ा अलग करना. भारत में, धार्मिक प्रभाव की घोषणा उन्हें सूक्ष्मतर और अधिक महानगरीय बॉम्बे कवियों से अलग करती है. अली, पुरानी हिंदी फिल्मों और असाधारण ग़ज़लों के प्रति अपने लगाव के साथ, निसिम एज़ेकील या आदिल जुसावाला जैसे किसी व्यक्ति से अलग दुनिया थे, जिन्होंने कला समीक्षक की तरह काम किया या अरुण कोलटकर के रूप में, जिन्होंने एक हिंदू तीर्थ शहर की यात्रा के बारे में कविताओं का एक पूरा क्रम लिखा था, लेकिन "हिंदू संस्कृति" की पृष्ठभूमि का दावा करने से कतराते थे. अली की कविताएं अपनेपन के बारे में एक आशंका को प्रकट करती हैं जो बंबई के कवियों में नदारद है. यहेजकेल की "इन इंडिया" की उन प्रसिद्ध पंक्तियों के बारे में सोचें: "मैं अपने विचार के हाथी की सवारी करता हूं , / मेरे गले में एक सीज़ेन लटका हुआ है." अली को चिंता होती कि बंबई में सीज़ेन के बारे में बात करने का मतलब यह हो सकता है कि वक्ता एक बाहरी व्यक्ति है.

कपूर सोचते हैं कि अली की कविताएं कभी भी "भावनाओं के सहज प्रवाह" को व्यक्त नहीं करती हैं. लेकिन उनकी सबसे अच्छी पंक्तियां, उनके तकनीकी लिबास के बावजूद वास्तव में सभी सहज हैं. तीखी तुकबंदी है, याद की गई चीजों के बारे में ढीठ जागरूकता, कभी-कभी बीच कविता में ही पीछे मुड़ कर यादों का फूट पड़ना एक लंबी कविता को एक शानदार पूर्णता की ओर ले जाता है. उदाहरण के लिए, "स्नो इन द डेजर्ट" कुछ इस तरह शुरू होती है, कि वक्ता अपनी बहन को एक सुबह जल्दी टक्सन हवाई अड्डे पर ले जाता है. वे सड़क के किनारे उगे विशाल कैक्टसों को पार करते हैं, रेगिस्तान को पार करते हैं, जो बर्फ की रात के बाद "कोकेन की तरह सफेद हो गया" दिखता है. ऐसा जान पड़ता है कि सूरज "हर कैक्टस को स्मृति में चोट पहुंचा रहा है" - स्वदेशी पापगोस की यादें "नरसंहार हो जाने जितना कमजोर", समुद्र के नीचे दबी हुई भूमि की प्रागैतिहासिक सूचना. हवाई अड्डे से वापस जाते समय, अपने परिवेश से प्रेरित, अली भी, अपनी यादों में बिजली की तरह आहत है. आप जानते हैं कि मोड़ के आसपास गाड़ी चलाते हुए, अली अपने आप में गहराई से डूब रहे हैं. यह क्षण कविता में एक रहस्योद्घाटन के रूप में आता है :

नई दिल्ली में एक रात

जब बेगम अख्तर गा रही थीं, तो बिजली गुल हो गई.

यह शायद बांग्लादेश युद्ध के दौरान था,

शायद सायरन बज रहे थे,

हवाई हमले की चेतावनी थी.

लेकिन दर्शक बैठे रहे चुपचाप, बिना हलचल

माइक्रोफोन दम तोड़ चुका, लेकिन वह

गाती रही, और उसकी आवाज गोया

दूर से आ रही थी,

मानो वह पहले ही मर चुकी हों.

और इससे पहले कि रोशनी ने उन्हें फिर से रोशन कर दिया,

और उनके हीरे पर जमी

ठंढ को पिघला कर किरणों में बदल दिया,

अंधेरा इस करद था की,

एक ऐसा पल भी आया जब किसी खोए हुए समंदर

को सुना जा सके.

अली ने एक बार एक छात्र की कविता में एक पंक्ति के बारे में कहा था कि इसे "एक दीवार से सटाकर गोली मार दी जानी चाहिए." कोई कल्पना कर सकता है कि अली को अपने प्रिय शायर फैज को "विश्व कद का शायर" या उनकी कविताएं "उनके पिछले अनुभवों की अभिव्यक्ति" हैं, कहने पर कैसा महसूस हुआ होगा. कपूर के पास चीजों को पकड़ पाने वाले कान नहीं हैं और उनको एक ढंग के संपादक की कमी भी खली जो खुद को दोहराकर पैराग्राफ सजाने की उनकी आदत से स्पष्ट है. उदाहरण के लिए, यह कहते हुए हैं कि "अतीत को लेकर प्रेम सभी [अली] में है". कुछ वाक्यों को दोहराने के लिए बाद में, वह लिखते हैं "टक्सन में लिखी गई कविताओं में, शाहिद इतिहास, मिथक और अन्याय की खोज एक अचेतन अतीत मोह के साथ करते हैं." यह जानने के कुछ क्षण बाद कि "कभी-कभी यह केवल हास्य था जिसने अली को प्रेरित किया", आप फिर से सीखते हैं कि "स्वाभाविक रूप से, हास्य ने उनकी कविता में अपना रास्ता खोज लिया." अली ने कथित तौर पर कहीं न कहीं "कबूल" किया कि वह कभी भी अस्वीकृति के बारे में चिंतित नहीं थे. अगर आप अली पर विश्वास भी करते हैं, तो क्या वह स्वीकारोक्ति के रूप में गिना जा सकता है? शब्दाडंबर लगभग हर पेज पर पाठक को हंटर मारता है और बहुत बार कपूर क्या कहना चाहते हैं वह भी समझ नहीं आता. इस पर गौर कीजिए :

उन्होंने भाषा को बहुत गंभीरता से लिया और भाषा के सौंदर्यशास्त्र के प्रति इतने अभ्यस्त थे कि उनकी उपस्थिति में बोले जाने वाले प्रत्येक शब्द के प्रति उनकी भावनात्मक प्रतिक्रिया थी. एक कवि के रूप में, वह प्रत्येक प्रश्न या टिप्पणी के प्रति चौकस रहते थे, जिसे वे अपने शब्दों के खेल से बदल सकते थे.

मुक्त छंद में सालों तक लिखने के बाद अली ने अपने अंतिम दशक में अन्य रूपों के पारखी के रूप में खुद को स्थापित किया. उन्होंने तुकबंदी वाली गजल को अंग्रेजी से परिचित कराया. पहले कई अमेरिकी कवियों ने गजल को गलती से अप्रतिबंधित दोहों की श्रृंखला समझा था. उन्होंने अपनी एलिजी को कैनसोने (मध्ययुगीन इतालवी गाथागीत) का आकार दिया. कैनसोने को लिखना बेहद मुश्किल होता है. जहां अधिकांश कवि अपने पूरे करियर में एक कैनसोने ही लिख सके, अली ने तीन लिखे. उनके करीबी दोस्त क्रिस्टोफर मेरिल के अनुसार, अली ने सलीम सिनाई जैसे कश्मीरी नायक के बारे में एक उपन्यास लिखने की भी योजना बनाई थी जिसका जीवन "अपनी मातृभूमि के इतिहास के साथ निर्णायक क्षणों में प्रतिच्छेद करता." यह वह अली हैं जिसे आप अपने दोस्तों के प्रेममय श्रद्धांजलि में पाते हैं : मिलनसार, भव्य बार्ड रीडिंग के दौरान अपने दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने वाले; डिनर पार्टियों में अपने छात्रों के लिए रोगन जोश पकाने वाले प्रोफेसर; वह बेटा जो अपनी मां की मृत्यु से उबरना नहीं चाहता ("मैं कसम खाता हूं, यहां और अभी, ब्रह्मांड को माफ नहीं करूंगा / उस ब्रह्मांड को जिसने तुम्हारे बिना / मुझे ब्रह्मांड की आदत डाली है."); फिर, कुछ साल बाद, अली को भी उसकी मां के समान मस्तिष्क का कैंसर होने का पता चला, जो चमत्कारिक रूप से दृष्टि और स्मृति को खो चुकने के बावजूद मिल्टन के "लाइसिडास" का पाठ करने में सक्षम था. अंतिम निदान के बाद अली ने घोष से कहा कि वह "कश्मीर में मरना" चाहते हैं. लेकिन अंततः उन्हें मैसाचुसेट्स के नॉर्थम्प्टन में एमिली डिकिंसन के घर से दूर एक कब्रिस्तान में दफनाया गया.

हालांकि उनके जीवन का मध्य भाग अपेक्षाकृत छिपा हुआ है. एक कम सोद्देश्य कवि के रूप में वह कैसा था तब जब वह मुक्त छंद में खुशनुमा भाव का लेखन कर रहे थे, जब वह, जैसा कि ऑरवेल ने मिलर के बारे में कहा, "ऐतिहासिक प्रक्रिया के साथ" नहीं जुड़े थे? 2011 में कवि अखिल कात्याल ने काफिला ब्लॉग पर अली के दिल्ली के सालों के मौखिक इतिहास के रूप में लिखा था. मुझे याद है कि सालों पहले उपन्यासकार रणबीर सिंह सिद्धू के एक लेख से मुझे पता चला था कि अली के पास एक बार टक्सन में एक नौकरी थी जिसके लिए उन्हें शहर की नई सड़कों के नाम सुझाने पड़ते थे. पिछले नवंबर में स्क्रॉल ने पद्मिनी मोंगिया, जो अली को पेन स्टेट में स्नातक छात्र के रूप में जानती थीं, का एक पर्सनल निबंध प्रकाशित किया था. इस निबंध में मोंगिया अली के निजी जीवन की एक दुर्लभ झलक प्रदान करती हैं जो अली की अनिश्चितता के बारे में है जब वह उन लोगों का सामना करने से कतराते हैं जो उनके परिवार वालों को पहचानते हैं. निबंध में एड्स संकट के कगार पर खुद को खोजने वाले समलैंगिक व्यक्ति की खुशी और पीड़ा के बारे में बताया गया है. कपूर की निराशाजनक जीवनी की तुलना में यह निबंध तीन हजार शब्दों में अली की जिंदगी से जुड़े ढेरों पहलुओं से हम-आप को रूबरू करता है.