भारतीय रक्षा हितों पर रिलायंस समूह का साया

अनिल अंबानी को गले लगाते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी. अमित दवे
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25 September, 2018

{एक}

2015 में बतौर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी पहली फ्रांस यात्रा की. फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट एविएशन से राफेल लड़ाकू विमान की खरीद के लिए लंबे समय से चल रही सौदेबाजी के बीच मोदी यह यात्रा कर रहे थे. 2012 में कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने भारतीय वायुसेना के लिए 126 राफेल विमानों की आपूर्ति ठेके में डसॉल्ट एविएशन को सबसे कम बोली लगाने वाल घोषित किया था. मोदी सरकार एक ऐसे समय में बनी जब 10 साल की सतर्क योजना, फील्ड ट्रायल और कठिन मूल्यांकन प्रक्रिया के बाद, भारत अपनी वायुसेना में बहुप्रतीक्षित सात दस्ते शामिल करने के करीब था. मोदी के पास इस सौदे में अपनी छाप छोड़ने का मौका था.

फ्रांस यात्रा के पहले दिन, मोदी के तय कार्यक्रमों में फ्रांस के ढांचागत और रक्षा क्षेत्रों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (सीइओ) के साथ गोलमेज वार्ता और राष्ट्रपति से मुलाकात शामिल था. इसके बाद मोदी ने मीडिया के सामने घोषणा कि उन्होंने, फ्लाई-अवे कंडीशन यानी तैयार हालत में 36 राफेल विमानों की जल्द से जल्द खरीद के लिए, वैश्विक टेंडर की जगह सरकारी स्तर— विदेश से सैन्य खरीदारी के लिए सरकारों के बीच होने वाली प्रत्यक्ष सौदेबाजी करार पर चर्चा की है.

यहां पुरानी खरीद प्रक्रिया को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया था. भारत को आपूर्ति करने वाली अन्य विदेशी रक्षा कंपनियों की तरह ही डसॉल्ट को भी मिलने वाले बड़े करार का एक भाग स्थानीय स्तर पर उत्पादन कर, निवेश और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के जरिए खरीदकर्ता देश में पुन: निवेश करना था. पहले सरकार ने तय किया था कि जिस कंपनी को ठेका मिलेगा उसे सार्वजनिक कंपनी हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को मुख्य साझेदार बनकर काम करना होगा. मोदी की इस घोषणा के बाद एचएएल इस प्रक्रिया से अचानक बाहर हो गया.

बदले हुए घटनाक्रम ने स्वयं मोदी प्रशासन के शीर्ष अधिकारियों को भी स्तब्ध कर दिया. मोदी की फ्रांस यात्रा के दो दिन पहले उनके विदेश सचिव एस. जयशंकर ने दिल्ली में मीडिया को बताया था कि राफेल की खरीद से जुड़ी बातचीत डसॉल्ट, एचएएल और भारतीय वायुसेना के बीच जारी है. जयशंकर से 15 दिन पहले डसॉल्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने सार्वजनिक रूप से इस बात पर गहरा संतोष व्यक्त किया था कि “एचएएल के अध्यक्ष के साथ उनकी बात हुई है और...जिम्मेदारियों के बंटवारे को लेकर दोनों के बीच सहमति है.” उनका यह ठोस विश्वास है कि “अनुबंध को जल्द ही अंतिम रूप देकर पूरा कर लिया जाएगा.”

मोदी की घोषणा के तुरंत बाद तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने एक टीवी साक्षत्कार में बताया कि बातचीत के संबंध में उनके पास विस्तृत जानकारी नहीं है. एक दूसरे साक्षत्कार में उन्होंने कहा कि “यह निर्णय संभवत: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति के बीच हुई बातचीत का नतीजा है.”

कुछ महीनों के भीतर पर्रिकर ने संसद को बताया कि डसॉल्ट से 126 लड़ाकू जेट विमान खरीदने वाले मूल समझौते को आधिकारिक रूप से रद्द कर दिया गया है. 2016 के सितंबर में पर्रिकर और फ्रांस के रक्षा मंत्री ने दोनों सरकारों के बीच डसॉल्ट से 36 विमान खरीदने का करार किया. इन विमानों की आपूर्ति 2019 और 2022 के बीच होनी है. खबरों के अनुसार यह करार सात अरब 87 करोड़ यूरो यानी लगभग 59 हजार करोड़ रुपए यानी 8 अरब 80 करोड़ अमरीकी डॉलर का है. डसॉल्ट को करार रकम का आधा हिस्सा भारत में निवेश करना है.

मोदी की इस घोषणा के 13 दिन पहले उद्योगपति अनिल अंबानी के रिलायंस समूह ने रिलायंस डिफेन्स लिमिटेड नाम से एक नई कंपनी का पंजीकरण कराया. मोदी की फ्रांस यात्रा के वक्त अनिल अंबानी फ्रांस में मौजूद थे. अभी हाल में शिपयार्ड के रखरखाव वाले सैन्य अनुबंधों में बड़ा ठेका लेने के अलावा रक्षा क्षेत्र में रिलायंस के अनुभव का कोई इतिहास नहीं है. इस कंपनी के लिए रक्षा क्षेत्र बिलकुल नया है. राफेल करार में हस्ताक्षर के 10 दिन बाद डसॉल्ट और रिलायंस समूह ने नई कंपनी डसॉल्ट रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड के गठन की घोषणा की. इसमें रिलायंस समूह की रक्षा कंपनियों में से एक रिलायंस एरोस्ट्रक्चर लिमिटेड की अधिकांश हिस्सेदारी होगी. अचानक ही रिलायंस कंपनी को, जिसका एयरोस्पेस सिस्टम से कुछ लेना-देना नहीं था, हजारों करोड़ रुपए का काम सौंप दिया गया.

इस करार की घोषणा के साथ ही इसकी शर्तों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जो अभी तक जारी है. 2017 में, कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनने से कुछ ही दिन पहले राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने एक उद्योगपति को लाभ पहुंचाने के लिए राफेल करार को पूरी तरह से बदला दिया है. जुलाई 2018 में, अविश्वास प्रस्ताव पर बहस से पहले, गांधी ने विमानों की कीमत की गोपनीयता के सवाल पर सरकार को घेरा. कांग्रेस का कहना है कि कीमत को बहुत ज्यादा बढ़ाया गया है. पार्टी का दावा है कि उसकी सरकार ने 136 राफेल विमान 10 अरब 20 करोड़ डॉलर में खरीदने का करार किया था जबकि मोदी सरकार 8 अरब 70 करोड़ डॉलर में महज 36 विमान खरीद रही है. कांग्रेस का आरोप है कि दोनों करारों की तुलना करने पर पता चलता है कि मोदी सरकार प्रत्येक विमान की खरीद पर 1670 करोड़ रुपए यानी पुरानी कीमत से तीन गुना अधिक खर्च कर रही है.

मोदी की पेरिस घोषणा के बाद भारत और फ्रांस के पक्षों ने एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया और कहा कि विमान और उससे संबंधित तंत्र और हथियार, पहले की चयन प्रक्रिया के आधार पर, उसी रूप में सौपे जाएंगे जिसकी जांच और स्वीकृति भारतीय वायुसेना ने दी है. इस समझौते पर सवाल उठाए जाने वाले दिन से ही सरकार यह दावा कर रही है कि नए करार की शर्तें पुराने समझौते से बहुत अलग हैं और विमान में कई नए तंत्र जोड़े गए हैं और भारतीय विशेषताओं के अनुरूप विमानों में सुधार किया गया है, इसलिए दोनों मूल्यों की तुलना नहीं की जा सकती. अपने दावे को साबित करने के लिए सरकार ने कोई जानकारी नहीं दी है और इससे यह करार और अधिक संदिग्ध बन गया है.

पिछले साल 2017 में कांग्रेस ने जब राफेल समझौते पर सवाल उठाए तो निर्मला सीतारमण ने, जिन्हें हाल में रक्षा मंत्री बनाया गया है, वादा किया था कि वह कीमत की जानकरी मीडिया को देंगी और यह भी दावा किया कि ''वह सटीक आंकड़ा देने से बचने की कोशिश नहीं कर रही हैं.'' लेकिन उनके मंत्रालय ने भारत और फ्रांस सरकार के बीच गोपनीयता की शर्तों का हवाला देकर जानकारी देने से इनकार कर दिया.

इस साल जुलाई में सीतारमण ने इसी शर्त का हवाला देकर मूल्य को लेकर सरकार की खामोशी का बचाव किया. लेकिन इसी साल मार्च में रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे ने संसद को बताया कि नए समझौते के अंतर्गत प्रत्येक राफेल विमान की कीमत अनुमानित 670 करोड़ रुपए है और इसमें एडऑन को नहीं जोड़ा गया है.

कीमत के खुलासे को लेकर चल रही बहस पेचीदा हो गई है. जुलाई में संसद में बहस के बाद  बाद फ्रांस के विदेश मंत्री ने पुष्टि की कि 2008 के राफेल समझौते में गोपनीयता का प्रावधान है जो दोनों देशों को साझेदार मुल्क द्वारा दी गई गोपनीय जानकारी को सार्वजनिक करने से कानूनन रोकता है.

रक्षा जानकार डी. रघुनंदन ने ऑनलाइन मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि राहुल गांधी ने सरकार पर यह आरोप लगाकर कि गोपनीयता का कोई प्रावधान करार में नहीं है राजनीतिक गलती की है जिसका खंडन सरकार कर पाई. इस सब में यह बात गायब हो गई कि गोपनीयता की शर्त सिर्फ उन पक्षों से सम्बंधित है जिनसे राष्ट्रीय सुरक्षा या विमान की कार्य क्षमता पर असर पड़ सकता है. इस पर कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि यह शर्त कीमत के खुलासे को रोकती है. जब मैंने कीमत की जानकारी के लिए सूचना के अधिकार के तहत आवेदन किया तो मुझे जवाब मिला कि मांगी गई जानकारी गोपनीय प्रकृति की है और इस से जुड़े खुलासे का सीधा असर सुरक्षा और सामरिक हितों पर होगा. मार्च में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने एक साक्षत्कार में बताया कि यदि भारत सरकार विपक्ष के साथ ऐसी जानकारी साझा करती है जो बताई जा सकती है तो उन्हे कोई आपत्ती नहीं है. मार्च में ही, एक प्रकार के दैवीय हस्तक्षेप के चलते, डसॉल्ट ने 2017 की अपनी वित्तीय रिपोर्ट में खुद ही राफेल करार की कीमत का खुलासा कर दिया: 36 विमानों की कीमत है 55 हजार करोड़ रुपए याने 7 अरब 40 करोड़ डॉलर.

अगस्त में भारतीय जनता पार्टी के दो पूर्व मंत्री अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा और प्रख्यात अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने एक प्रेस कॉन्फ्रेन्स में इस समझौते को बड़ा घोटाला, विशेषाधिकारों का भयानक दुरुपयोग और भीषण आपराधिक कृत करार दिया और इसकी जांच की मांग की थी. उनका कहना था कि दुरुपयोग की जबरदस्त प्रकृति को देखते हुए यह देश की सुरक्षा को दावं पर लगाने जैसा है.

दोनों समझौतों में कीमतों और शर्तों पर पूरी तरह से स्पष्टता न होने के बावजूद राफेल मामले में अब तक जो कुछ भी सामने आया है वह इस समझौते की गंभीर जांच के लिए पर्याप्त आधार देता है. असल समझौते के रद्द किए जाने से पहले इस बात की सहमति थी कि 126 जेट विमानों में 18 की खरीद सीधे डसॉल्ट से होगी और शेष 108 विमानों का निर्माण डसॉल्ट की देखरेख में एचएएल करेगा. इसका फायदा यह होता कि ये बेशकीमती तकनीक भारत को हासिल हो जाती. अब नए करार में पुनर्निवेश की शर्त के बावजूद, डसॉल्ट सभी 36 विमान फ्रांस में बनाएगा. नए करार में प्रोद्योगिकी हस्तांतरण का कोई उल्लेख नहीं है.

हैरान करने वाली बात है कि भारत ने एक ऐसा बड़ा मौका हाथ से जाने दिया जिससे घरेलू रक्षा निर्माण को फायदा मिलता. इससे अजीब क्या होगा कि ऐसा खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देखरेख में हुआ. वर्तमान सरकार ने मेक इन इंडिया अभियान के स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देने के प्रयासों के तहत, विशेष रूप से विदेशी निवेश और साझेदारी के जरिए, रक्षा निर्माण को बहुत महत्व दिया है. लेकिन मोदी ने अपनी ही पहल पर, उनके अधिकारियों की हैरान प्रतिक्रियाओं को यदि सही माने तो, सार्वजनिक रक्षा निर्माण कंपनी के हाथों से शायद इतिहास के सबसे बड़े रक्षा सौदे को छीन लिया और उसके बदले ऐसा करार किया जिससे आगे चलकर निजी कंपनी को ही फायदा होगा.

इस करार में सरकार ने जिस कंपनी को चुना है उसका इतिहास हमें सोचने पर मजबूर करता है. सवाल है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से मोदी के कार्यकाल को हम किस रूप में याद करेंगे?

पिता धीरूभाई अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्री लिमिटेड के बंटवारे के बाद अनिल अंबानी रिलांयस समूह के मालिक बने. इस कंपनी के गठन के दो साल बाद 2008 में, अंबानी की दौलत 42 अरब डॉलर थी: उस साल के भारतीय रक्षा बजट का देढ़ गुना. दुनिया भर के दौलतमंदों की फोर्ब्स सूची में अनिल छठे स्थान पर थे. लेकिन 2018 आते आते अंबानी की दौलत 2 अरब 40 करोड़ डॉलर रह गई है जो राफेल करार की कीमत का एक तिहाई से कम है. यह अनिल अंबानी के नेतृत्व में रिलायंस की गिरावट को दिखाता है. रिलायंस समूह की चार मुख्य सूचीबद्ध कंपनियों- रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड, रिलायंस कैपिटल लिमिटेड, रिलायंस कम्यूनिकेशन लिमिटेड, और रिलांयस पावर लिमिटेड- के ताजा वित्तीय आंकड़े पर नजर दौड़ाने से पता चलता है कि रिलायंस के ऊपर एक लाख करोड़ रुपए मतलब लगभग 15 अरब डॉलर का कर्ज है.

रक्षा कंपनी में बड़े पूंजी निवेश के कारण राफेल करार रिलायंस के लिए जीवनदान है. इस करार का लगभग 30 हजार करोड़ रुपया भारतीय उद्योग में प्रवेश करेगा. डसॉल्ट ने निवेश संकल्प को पूरा करने के लिए रिलायंस इंफ्रास्ट्रचर की सहायक कंपनी रिलायंस एरोस्ट्रक्चर लिमिटेड को भारत में अपना प्राथमिक साझेदार बनाया है. खबरों के अनुसार पिछले साल फ्रांस की इस कंपनी ने रिलायंस को 21 हजार करोड़ रुपए के बराबर का व्यापार दिया था. पुनर्निवेश की आवश्यकता के तहत डसॉल्ट ने रिलायंस के साथ अपने संयुक्त उपक्रम में इस साल जुलाई में 10 करोड़ यूरो निवेश करने की घोषणा की है. उन कंपनियों ने भी, जो डसॉल्ट को उपकरण और यंत्रों की बिक्री करती हैं, रिलायंस की रक्षा कंपनियों के साथ साझा उपक्रम स्थापित किए हैं या सूझबूझ पत्रों में हस्ताक्षर किए हैं क्योंकि उन्हें भी भारत के साथ अपने करार का आधा यहां निवेश करना होगा.

भारतीय रक्षा खर्च में रिलायंस समूह की बड़ी दावेदारी का यह केवल एक हिस्सा है. अंबानी की कंपनी ने सैन्य पोत निर्माण और अन्य रक्षा निर्माण क्षेत्रों में आक्रमक रूप से प्रवेश किया है. अंबानी ने घोषणा की है कि अगले डेढ़ दशक में वह ''निजी क्षेत्र के लिए इस क्षेत्र में 15 लाख करोड़ रुपए यानी 200 अरब डॉलर के निवेश का अवसर'' देखते हैं.

रिलायंस समूह के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि इसने बड़े वादों का बहुत कम मान रखा है. उदाहरण के लिए: इस कंपनी ने तीन बड़े उर्जा संयंत्र लगाने का वादा किया था लेकिन कंपनी सिर्फ एक ही संयंत्र लगा पाई है. यह कंपनी दिल्ली मेट्रो को संचालित करने के समझौते से बाहर हो गई. इन असफलताओं का प्रभाव जनता के हित और करदातओं पर पड़ा लेकिन अधिक से अधिक इसका असर क्षेत्रीय ही रहा. अब जबकि रिलायंस ने रक्षा क्षेत्र में प्रवेश किया है तो उसकी क्षमता का आंकलन उच्च स्तरीय राष्ट्रीय महत्व की बात है. इस कंपनी का पुराना रिकॉर्ड और वित्तीय हालत पर भरोसा करना भारत की प्रतिरक्षा क्षमता के साथ जुआ खेलने जैसा है.

यह एक गंभीर सवाल है कि किसने रिलायंस को राफेल करार में दाखिल होने दिया? सरकार का कहना है कि उसका इससे कोई लेनादेना नहीं है. सरकार कहती है कि समझौता होने के बाद अपने निवेश संकल्प को पूरा करने के लिए डसॉल्ट अपना साझेदार- जिसे प्रशासनिक भाषा में ऑफसेट कहा जाता है- चुनने के लिए स्वतंत्र है. इस साल फरवरी में जारी रक्षा मंत्रालय की एक विज्ञप्ति के अनुसार डसॉल्ट भारत की किस कंपनी के साथ काम कर रही है इसकी जानकारी उसके पास तकनीकी रूप से नहीं है क्योंकि समझौते के तहत डसॉल्ट को आने वाले दिनों में अपने चुनाव की जानकारी देनी है: ऑफसेट क्रेडिट की मांग के समय या ऑफसेट संकल्प को पूर्णतः देने के एक साल पहले. मंत्रालय ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि बाद ऑफसेट की जानकारी बाद में देने वाले इस प्रावधान को हाल में ही रक्षा खरीद प्रक्रिया में संशोधन करके जोड़ा गया है. इससे पहले विदेशी विक्रेता को अपनी पसंद के ऑफसेट साझेदार की जानकारी प्रस्तावित सामझौते के मूल्यांकन के वक्त (समझौते में हस्ताक्षर होने से पहले, मंजूरी प्रक्रिया और परीक्षण के समय) सरकार को देनी होती थी. अगस्त 2015 में पुराने समझौते को रद्द करने के पांच दिन पहले खरीद प्रक्रिया में यह संशोधन किया गया था.

मोदी सरकार की पहलकदमी और अंबनी समूह के हितों के मेल का यह एक दिलचस्प संयोग है. अंबानी के रक्षा क्षेत्र में प्रवेश के बाद से ऐसे और भी कई संयोग देखने को मिलते हैं.

{दो}

आजादी के वक्त भारत के पास अंग्रेजों द्वारा छोड़े गए ​हथियार थे. नई सरकार रक्षा संसाधनों के साथ-साथ सम्पूर्ण अर्थतंत्र के विकास के लिए राज्य के नेतृत्व में होने वाले औद्योगीकरण पर निर्भर थी. घरेलू उत्पादन में बढ़ोतरी के बावजूद पुरानी हो चुकी प्राद्योगिकी से पार पाना मुश्किल हो रहा था. मजबूरन, देश को अत्याधुनिक हथियारों के लिए मंहगे निर्यात पर निर्भर होना पड़ा. ऐसे लेनदेन भ्रष्ट दलालों के प्रभावों से अछूते नहीं रह सकते थे. जैसा कुख्यात बोफोर्स घोटाले में देखने को मिला. इस घोटाले के कारण 1980 के दशक में राजीव गांधी सरकार गिर गई थी.

यह एक ऐसा कुचक्र है जिससे भारत अब तक निकल नहीं पाया है. 2001 में भारत ने रक्षा निर्माण में निजी क्षेत्र की भागीदारी को मंजूरी दे दी. आज भारत के पास रक्षा उद्योग का बड़ा आधार है. इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के नौ उद्यम शामिल हैं. ये उद्यम रक्षा मंत्रालय के अधीन आते हैं. लेकिन अधिकाशं उद्यम देरी, बजट से अधिक खर्च और स्तरहीन निर्माण के लिए बदनाम हैं. भारत में बहुत कम ऐसे निजी उद्यम हैं जिनके पास बाहरी कंपनियों से मुकाबला कर सकने के लिए उच्च स्तरीय परियोजना का अनुभव और निर्माण सुविधाएं हैं. दलालों की अभी भी चांदी है. दशकों से भारत दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य आयातकर्ता है. दुनियाभर में रक्षा आयात का लगभग 12 प्रतिशत भारत में होता है. ताजा बजट में रक्षा के लिए दो लाख 95 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान है. हथियारों के वैश्विक बाजार में भारत प्रमुख हिस्सेदार तो है लेकिन यह भारत के अपनी रक्षा निर्माण क्षमता को सामरिक दृष्टि से कमजोर बनाता जा रहा है.

भारी आयात के बावजूद देश की रक्षा जरूरत बहुत ज्यादा है. भारतीय सैन्य बलों के पास हथियारों का बहुत आभाव है और देश के पास जो हथियार हैं भी वे या तो पुराने हो रहे हैं या हो चुके हैं. फिलहाल जो खरीद प्रक्रिया अपनाई जाती है वह कड़ी होते हुए भी सुस्ती के लिए बदनाम है. खरीद संबंधि निर्णय बहुत देरी से होते हैं. इस बीच भारत का कट्टर क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी माना जाने वाला चीन अपनी सेना का तीव्र गति से अधुनिकीकरण कर रहा है, उसे मजबूत बना रहा है. चीन लड़ाकू विमानों का निर्माण करने लगा है और पाकिस्तान को बेच रहा है.

मोदी ने सत्ता संभालते ही भारतीय सेना के आधुनिकीकरण की महत्वकांक्षी योजनाओं की घोषणा की. बहुतों को यकीन था कि यह स्वदेश में रक्षा प्रोद्योगिकी को विकसित करने का बहुत बड़ा अवसर होगा. साथ ही मोदी सरकार की बहुप्रचारित मेक इन इंडिया पहल ने आशा जगाई कि यह सरकार अव्यवस्था की स्थिति का अंत कर भारतीय रक्षा निमार्ण के सभी पक्षों को गति प्रदान करेगी. कार्यक्रम का लक्ष्य लायसेंस नियमों को आसान बनाना, खरीद प्रक्रिया को सहज करना और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ाकर सार्वजनिक और निजी क्षमता का दोहन करना था.

ऐसा लग रहा था कि सरकार अपना वादा निभाने को तैयार है. 2016 में खरीद नियमों में नई श्रेणी को जोड़ा गया. स्वदेशी डिजाइन, विकास और निर्माण नामक इस श्रेणी को इसलिए जोड़ा गया था कि खरीद स्वीकृतियों में घरेलू रक्षा उत्पादों को उच्च प्राथमिकता में रखा जा सके. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ाने जैसे नीतिगत उपायों के साथ सरकार ने भारतीय कंपनियों का 90 प्रतिशत पूंजी खर्च उठाने का भी वादा किया. इनमें वे लघु उद्यम भी थे जो देश में रक्षा उपकरण के विकास के लिए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त कर चुके थे. निर्माताओं के लिए लाइसेंस की अवधि को तीन साल से बढ़ाकर 15 साल कर दिया गया. ऑफसेट नीति में ‘‘सेवा’’ श्रेणी को ऑफसेट संकल्प की परिपूर्ति के विकल्प के रूप में दोबारा शामिल किया.

ढेरों नीतिगत उपायों के बावजूद, मैंने जिन भी रक्षा निर्माताओं, सुरक्षा विशेषज्ञों और सैन्य बलों के पूर्व अधिकारियो से बात की उनका कहना है कि धरातल पर बहुत कम बदलाव देखने को मिला है और आज भी देश सैन्य औजारों की आपूर्ति के लिए निर्यात को ही प्राथमिकता दे रहा है. हवाई जहाज के लिए एंटीना बनाने वाली बेंगलुरु की कंपनी के निदेशक रवी नायडू कहते हैं, ‘‘सारा टेक्नालजी बाहर से आ रहा है. हम लोग वर्कशॉप बन गए हैं.’’ नायडू बताते हैं कि विदेशी कंपनियों को दिए जाने वाले व्यापक प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल ये कंपनियां अपने उत्पादों को असेंबल करने के लिए कर रही हैं. स्वदेशी निमार्ण लक्ष्य को हासिल करने में इन कंपनियों का कोई योगदान नहीं है. प्रशासनिक प्रक्रिया इतनी उलझी हुई है कि व्यापार हासिल करने की खातिर नायडू जैसी छोटी कंपनियों के लिए सरकार तक सीधी पहुंच लगभग असंभव है. इसके अलावा खरीद प्रक्रिया में ‘‘न लागत, न प्रतिबद्धता’’ जैसे प्रवधानों का मतलब है कि निमार्ताओं को उत्पाद का निमार्ण और उनका प्रदर्शन अपने खर्च पर करना पड़ता है और इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि बाजार में खरीदार मिलेंगे. नायडू कहते हैं, ''चलिए आप निवेश मत कीजिए लेकिन कम से कम इस बात का वचन तो दीजिए कि यदि मैं निर्माण में अपना पैसा लगाता हूं तो आप इसे खरीद लेंगे.’’

आज नायडू हताश हैं. दशकों से जटिल रक्षा प्रौद्योगिकी के विकास में लगी नायडू जैसी निजी कंपनियों को इस पहल ने बहुत हिम्मत दी थी. लेकिन उम्मीद के विपरीत इस पहल से मुख्य लाभ निमार्ण का सीमित अनुभव रखने वाली बड़ी कंपनियों को हुआ. पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के बजाए मोदी सरकार के काम ने भाई-भतिजावाद और अपारदर्शिता के पुराने संदेह को एक बार फिर बढ़ा दिया है. राफेल मामल इसका उदाहरण है. भारत ने जिस मूल प्रक्रिया से राफेल करार किया था वह कमजोर होने के बावजूद भी उम्मीद दिलाती थी कि देश की रक्षा खरीद में जो फसान है उसका कुछ हद तक निबटारा हो गया है.

1990 के दशक में ही यह स्पष्ट हो चुका था कि भारत को नए लड़ाकू विमानों की जरूरत है. टाइट रक्षा बजटों के चलते बूढ़े विमानों को बदलने और उन्नत करने के मामले में भारत पिछड़ गया था. 2000 में पाकिस्तान से कारगिल युद्ध के समय रक्षा मामलों के लिए संसद की स्थाई समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि भारतीय वायुसेना के 40 प्रतिशत लड़ाकू और मालवाहक विमानों की जल्द छुट्टी हो जाएगी. कारगिल युद्ध भारतीय रक्षा उद्योग और सैन्य वाहनों और उपकरणों की खरीद प्रक्रिया के लिए निर्णायक मोड़ साबित हुआ. रक्षा निर्माण में निजी क्षेत्र को अनुमति देने, 26 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूर करने और साथ ही खरीद प्रक्रिया को नियंत्रित करने के लिए एक ढांचे का निर्माण किया गया. 2002 में खरीद प्रक्रियाओं का विस्तार कर इसे बाध्यकारी दस्तावेज की शक्ल दे दी गई.

देश में लड़ाकू विमानों के विकास में हो रही देरी भी इस समस्या का हिस्सा थी. लड़ाकू विमान तेजस पर लगभग एक दशक से काम चल रहा था और इस पर बजट से अधिक खर्च हो चुका था लेकिन इसके पूरा होने के आसार नजर नहीं आ रहे थे. तेजस का इंतजार में बैठी वायुसेना, इन विमानों के बेड़े में शामिल होने तक, पुराने विमान, खासकर सोवियतकालीन मिग-21, को प्रयोग में ला रही थी.

संसद की स्थाई समिति ने चालू लड़ाकू बेड़े को उन्नत बनाने की सिफारिश की जिसे सरकार ने स्वीकार कर लिया. समिति ने दीर्घकालीन समाधान के रूप में, नए लड़ाकू विमानों की फास्ट ट्रैक खरीद की सिफारिश भी की. वायुसेना ने अपने अनुमान के आधार पर बताया कि उसे 126 बहुभूमिका वाले विमान- ऐसे विमान जो लड़ाकू और बमवषर्क दोनों हों- की तत्काल आवश्यकता है.

डसॉल्ट कंपनी के मिराज 2000 वायुसेना की पहली पसंद थे जो कारगिल में करामात दिखा चुके थे. 2000 में भाजपा के नेतृत्व वाली तत्कालीन सरकार ने कारगिल युद्ध में नष्ट हुए विमानों की परिपूर्ति के लिए 10 नए मिराज विमानों की खरीद को मंजूरी दी. लेकिन बड़े ऑडर के कयास लगाए ही जा रहे थे कि खरीद फरोख्त में दलालों की भूमिका को लेकर डसॉल्ट विवादों में फंस गया.

पनामा की कंपनी कायसर इन्कॉर्परैटेड ने फ्रांस की अदालत में डसॉल्ट पर मुकदमा कर दिया. भारत को मिराज की बिक्री के लिए यह कंपनी डसॉल्ट से कमीशन की मांग कर रही थी. क्योंकि बोफोर्स घोटाले के बाद पारित कानून में दलालों का इस्तेमाल करने वाली कंपनी को काली सूची में डालने को प्रावधान है इसलिए डसॉल्ट पर इस मुकदमें का बड़ असर पड़ने वाला था. भारत में मिराज की बिक्री पर कायसर की किसी भी प्रकार की भूमिका को डसॉल्ट ने अस्वीकार कर दिया और अदालत ने फैसला सुनाया कि कायसर और डसॉल्ट के बीच जो अनुबंध था वह 1998 में ही समाप्त हो गया था. डसॉल्ट को किसी भी तरह के प्रतिबंध का सामना नहीं करना पड़ा.

इसके बाद सरकार ने 126 लड़ाकू विमानों को बोली लगाकर खरीदने का निर्णय किया. 2004 में बनी कांग्रेस सरकार ने इच्छुक निर्माताओं को अनुकूल विमानों की जानकारी देने के लिए आमंत्रित किया. सरकार ने इस खरीद के लिए 42 हजार करोड़ रुपए आवंटित किए. भारत अब तक की सबसे बड़ी रक्षा खरीद करने जा रहा था और डसॉल्ट ने इस बोली में मिराज-2000 को दांव पर लगाया.

2005 में सरकार ने संशोधित रक्षा खरीद प्रक्रिया जारी की. इसमें पहली बार किसी भी बड़ी विदेशी खरीद में ऑफसेट खर्च की आवश्यकता का प्रावधान था. 2016 में स्वीकृत ताजा संशोधन में समझौता मूल्य का कम से कम 30 प्रतिशत भारत में पुनः निवेश किए जाने का प्रावधान है. सरकार को इससे अधिक की मांग करने का भी अधिकार है.

2006 में जब भारत 126 जेट विमानों की खरीद की दिशा में आगे बढ़ रहा था तो डसॉल्ट ने अपने मिराज- 2000 का नाम वापस ले लिया. कंपनी की शिकायत थी कि खरीद प्रक्रिया में हो रही देरी के कारण वह इस मॉडल के विमान बनाने वाली अपनी प्रोडक्शन लाइन को जारी नहीं रख सकती क्योंकि इस विमान का और कोई खरीदार नहीं है. इसके बदले में डसॉल्ट ने नए लड़ाकू विमान राफेल की पेशकश की और डसॉल्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के शब्दों में, तत्काल ‘‘सिंगल-सोर्स डील’’ के तहत 40 विमानों की आपूर्ति का प्रस्ताव दिया. यह ऐसी डील है जिसमें कोई प्रतिस्पर्धा नहीं करनी पड़ती. सरकार ने इस पेशकश को ठुकरा दिया.

2007 में भारतीय वायुसेना के पास लड़ाकू विमानों के 32 दस्ते थे. स्वीकृत क्षमता से तकरीबन 7 कम. उस साल अगस्त में सरकार ने 126 विमानों की खरीद के लिए औपचारिक रूप से प्रस्ताव आमंत्रित किए. सरकार के पास जिन छह मॉडल के प्रस्ताव आए वे थे: राफेल, यूरोफाइटर, टाइफून, मिग-35, ग्रिपेन, एफ-16 और एफ/ए-18. रक्षा मंत्रालय ने खरीद प्रक्रिया का विवरण जारी किया. दस्तावेज में कहा गया कि विशेषज्ञों की टीम सबसे पहले भारतीय वायुसेना की सामरिक जरूरतों और अन्य शर्तों के ‘‘अनुपालन का आंकलन करने लिए संभावित विक्रेताओं के प्रस्तावों की तकनीकी स्तर पर जांच करेगी.’’ कार्यक्षमता का आंकलन करने के लिए विस्तृत फील्ड ट्रायल किए जाएंगे और अंत में तकनीकी और फील्ड मूल्यांकन के बाद चयन किए गए प्रस्तावों की जांच और तुलना की जाएगी.’’ इस दस्तावेज में दिशानिर्देश सिद्धांतों को भी निर्धारित किया गया जिसके तहत चयन प्रक्रिया प्रतिस्पर्धात्मक, पारदर्शी और कीमत की सबसे उत्तम वसूली वाली होनी चाहिए. साथ ही, भारती रक्षा उद्योगों को वैश्विक स्तर पर विकास के अवसर मिलने चाहिए.’’

मंत्रालय ने अच्छी तरह से स्पष्ट किया कि जिस भी बिक्रेता को विमान आपूर्ति का ठेका मिलेगा उसे करार के मूल्य का आधा हिस्सा भारत में निवेश करना होगा. उपरोक्त छह मॉडल के विक्रेताओं ने एक दूसरे को पछाड़ने के लिए एक से बढ़कर एक वादे किए. एफ/ए-18 की निर्माता कंपनी बोइंग ने दर्जन से अधिक भारतीय एयरोस्पेस और रक्षा कंपनियों के साथ सहकार्य और कई अन्य के साथ साझेदारी का प्रस्ताव किया. एफ-16 की निर्माता लॉकहीड मार्टिन ने दावा किया कि अमेरिका के बाहर कई देशों में एफ-16 विमानों की असेंबली लाइने हैं. यूरोफाईटर टायफून को बनाने वाले यूरोपियन यूनियन संघ ने भविष्य में इस लड़ाकू विमान में किए जाने वाले विकास में भारत को साझेदार बनाने का वादा किया. इस बीच डसॉल्ट ने बताया कि फ्रांस सरकार ने उसे संवेदनशील प्रोद्योगिकी भारत के साथ साझा करने की अनुमति दे दी है. अपने साक्षत्कार में डसॉल्ट के अधिकारी के कहा, ‘‘जब हम प्रोद्योगिकी हस्तांतरण की बात करते हैं तो उसका अर्थ है सम्पूर्ण हस्तांतरण. हम छिटपुट हस्तांतरण की बात नहीं कर रहे.’’

2009 के अप्रैल में भारत के कई समाचार पत्रों ने लिखा कि प्रोद्योगिकी हस्तांतरण संबंधि आवश्यकताओं पूरा न कर पाने के कारण से डसॉल्ट दौड़ से बाहर हो गया है. आगामी फील्ड ट्रायल में राफेल को शामिल नहीं किया जाएगा. लेकिन एक महीने बाद डसॉल्ट दौड़ में फिर शामिल हो गया. खबरों के अनुसार फ्रांस सरकार की पर्दे के पीछे की कूटनीति ने डसॉल्ट को बचा लिया. रक्षा मंत्रालय के अनाम अधिकारी के हवाले से बताया गया कि रक्षा मंत्रालय के अधीन रक्षा खरीद बोर्ड ने डसॉल्ट की अयोग्यता को यह कह कर खरिज कर दिया है कि ऐसा ‘‘दस्तावेजों के मूल्यांकन के आधार पर किया गया था और फ्रांस की कंपनी डसॉल्ट एविएशन ने छूटे सवालों के जवाब दे दिए हैं.’’

सभी विमानों की जांच राजस्थान के रेगिस्तान और लद्दाख की उचांई में की गई. दोनों ही भारतीय वायुसेना के लिए सबसे महत्वपूर्ण रणस्थल हैं. जब भारत सरकार खरीद पर विचार कर रही थी और बिक्रेता और उनकी सरकारें भीषण लॉबिंग और प्रचार में लगे थे तभी भारत में डसॉल्ट के मैनेजर पी.वी. राव और वायुसेना के संबंधों में तल्खी आ गई. राव ने, जो डसॉल्ट के भारत में स्थानीय डीलर हैं, आरोप लगाया कि रक्षा मंत्रालय द्वारा सालाना आयोजित की जाने वाली रक्षा प्रदर्शनी में राफेल को पार्किंग की जगह देने के लिए वायुसेना का एक विंग कमांडर उनसे रिश्वत मांग रहा है. वायुसेना इस बात से नाराज थी कि राव ने इस घटना की जानकारी प्रशासनिक अधिकारी को देने से पहले उसे क्यों नहीं दी. उसने भविष्य में राव के साथ किसी भी किस्म के लेन देन पर रोक लगा दी. कोर्टमार्शल के बाद उस विंग कमाण्डर को वायुसेना से निकाल दिया गया. फिलहाल राव डसॉल्ट एयरक्राफ्ट सर्विस इण्डिया लिमिटेड के निदेशक हैं. यह भारत में डसॉल्ट की सहायक कंपनी है. इस सूचीबद्ध कंपनी का कार्यालय दक्षिण दिल्ली में है.

2011 की अप्रैल में भारत सरकार ने राफेल और टाइफून को शॉर्टलिस्ट किया. डसॉल्ट और यूरोफाइटर संघ को व्यावसायिक बोली तैयार करने को कहा गया. इस घोषणा के बाद हलचल सी मच गई. राफेल का पक्ष रखने के लिए फ्रांसीसी अधिकारी और यूरोफाइटर संघ का सदस्य होने के नाते ब्रिटिश अधिकारी टायफून की पैरवी के लिए भारत आने-जाने लगे.

उसी साल की गर्मियों में भारत सरकार ने 52 मिराज-2000 के अपने बेड़े के उन्नतीकरण के लिए डसॉल्ट के साथ लगभग 11 हजार करोड़ रुपए का समझौता किया. अगले वर्ष की शुरूआत में ही सरकार ने डसॉल्ट को विमान आपूर्ति की सबसे कम बोली लगाने वाला घोषित कर दिया. अब इस प्रक्रिया को व्यावसायिक सौदेबाजी के चरण में आगे जाना था.

करार की दौड़ में अब तक पीछे चल रहे डसॉल्ट के लिए यह बहुत बड़ी जीत थी. इतनी बड़ी कि फ्रांस के राष्ट्रपति ने खुद घोषणा की, ‘‘हम लोग इस दिन का इंतजार 30 सालों से कर रहे थे.’’ द गार्डियन की पत्रकार एन्जेलिक क्रिसाफिस ने लिखा कि यह चयन फ्रांस की कमजोर अर्थव्यवस्था और आर्थिक स्वाभिमान को बल प्रदान करेगा.’’ मिराज-2000 की प्रोडक्शन लाइन बंद होने के बाद से ही डसॉल्ट के लिए राफेल का निर्माण करना भी मुश्किल हो रहा था. इस लड़ाकू विमान को भारी कीमत पर विकसित किया गया था और आशा की जा रही थी कि फ्रांस और विदेशी कंपनियों से ऑर्डर मिलेंगे लेकिन विदेश से कोई ऑर्डर नहीं मिला. दक्षिण कोरिया, मोरक्को और ब्राजील ने राफेल को खारिज कर दिया था. डसॉल्ट अपने पहले विदेशी ऑर्डर के लिए बेचैन था. यह एक बात थी जिसने संभवतः भारत में उसकी स्थिति को प्रभावित किया.

भरतीय खरीद प्रक्रिया में सबसे कम बोली लगाने वाला बनने के बाद भी ऑर्डर मिलने में अभी देर थी.

पहले तो डसॉल्ट को विमान आपूर्ति के लिए चयन करने की जो प्रक्रिया अपनाई गई थी उसे विपक्ष के दो सांसदों ने चुनौती दी. तेलगू देशम पार्टी के एक सांसद ने मूल्यांकन प्रक्रिया में अनियमितता का आरोप लगाया. भारतीय जनता पार्टी के सांसद यशवंत सिन्हा ने करार में जीवन चक्र खर्च के प्रावधान को शामिल करने पर सवाल उठाया. जीवन चक्र खर्च सेवाकाल में वायुयान  के संचालन और रखरखाव के खर्च से संबंधित है. इस खर्च से जुड़ा प्रावधान सापेक्षिक रूप से नया है इसलिए सरकार और विपक्ष के बहुत कम लोगों को ही इसकी जानकारी थी.

उस वक्त के रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने समाचारपत्र को दिए अपने एक साक्षत्कार में इन चुनौतियों को ऐसे परिभाषित किया है. उन्होने बताया, ‘‘सुरक्षा मामलों की केबिनेट कमिटि के सामने इस समझौते को पेश करने से पहले मैंने, जैसा कि चलन है, वित्तीय मंजूरी के लिए वित्त मंत्रालय से बात की थी. वित्त मंत्रालय ने मुझे बताया कि जीवन चक्र खर्च का प्रावधान उसके लिए नई बात है इसलिए वह इसे स्वीकार नहीं कर सकता. साथ ही मैंने तत्कालीन विपक्ष के जिम्मेदार नेताओं और अन्य लोगों से भी बात की जो जीवन चक्र खर्च प्रावधान का विरोध कर रहे थे.’’ एंटनी का कहना था कि इस प्रावधान को वायुसेना के कहने पर शामिल किया गया था. एंटनी ने फाइलों को वापस मंगाने का फैसला किया और स्पष्ट टिप्पणी दी कि जीवन चक्र खर्च वाले प्रावधन पर जारी बहस का निर्णय हो जाने के बाद ही सुरक्षा मामलों की स्थाई समिति को यह फाइल दोबारा भेजी जाए.

इस विवाद को संबोधन करने का मतलब था कई महीनों की देरी. जुलाई 2012 में रक्षा मंत्रालय ने मूल्यांकन प्रक्रिया को अंतिम रूप दे दिया. यहां से डसॉल्ट और भारत सरकार के बीच सौदेबाजी आरंभ हो गई. फ्रांस सरकार के उच्च स्तरीय कूटनीतिक दखल के बाद भी कई अवरोध समाने आते रहे. फ्रांस की इस कंपनी ने अपनी मूल ऑफसेट योजना में एचएएल को मुख्य निर्माण साझेदार बताया था. डील हासिल करने के बाद डसॉल्ट ने रिलायंस इंडस्ट्री के साथ समझदारी पत्र में हस्ताक्षर किया. हाल में यह कंपनी अनिल अंबानी के बड़े भई मुकेश अंबानी के अधीनस्थ हैं. बाद में डसाल्ट ने कंपनी द्वारा निमार्ण किए जाने वाले 18 लड़ाकू विमान और उसके निरीक्षण में एचएएल में बनने वाले 108 विमानों के लिए अलग से विभाजन अनुबंध की मांग की. सरकार ने इस मांग का फिर विरोध किया.

फरवरी 2014 में ए.के. एन्टनी ने पत्रकारों को बताया कि अंतिम समझौता हो गया है लेकिन उनके मंत्रालय के लिए आवंटित बजट लगभग खत्म हो चुका है. यह समझौते अब आने वाले वित्त वर्ष में ही आगे बढ़ सकता था. लेकिन आम चुनाव आने को थे इसलिए समझौता आगे नहीं बढ़ सका. मई में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार सत्ता से बाहर हो गई और मोदी की अगुवाई में भाजपा नेतृत्व की सरकार ने दिल्ली में सत्ता की डोर थाम ली.

सत्ता में आने से लेकर मोदी की पेरिस घोषणा तक, सरकार ने कभी भी वर्षों के कड़े श्रम से तैयार शर्तों के आधार पर डसॉल्ट से जारी सौदेबाजी से पीछे हटने की बात नहीं की. 2014 के नवंबर में रक्षा मंत्री की हैसियत से जेटली ने संसद की दोनों सदनों को यही कहा था.

दौड़ से बाहर हो चुके विक्रेताओं की नजर सौदे पर लगी हुई थी और बहुत से अपने पक्ष पर पुनर्विचार करवाने के लिए लॉबिंग कर रहे थे. यूरोफाइटर संघ ने विमानों की कीमत कम करने और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के अलावा भारत में विमानों के निमार्ण पर अपनी शर्तों को उदार करने का प्रस्ताव दिया. सरकार बोली कि वो प्रक्रिया के परिणाम पर अडिग है.

मई में सत्ता परिवर्तन होन से पहले ही भारतीय समाचापत्रों में इस आशय के समाचार आने लगे थे कि डसॉल्ट ने व्यावसायिक सौदेबाजी के दौरान ही अपनी पुरानी कीमतों में संशोधन कर बहुत बढ़ा दिया है. इस संबंध में दूसरी बार टकराव के बाद 2015 की फरवरी में डसॉल्ट के सीइओ एरिक ट्रैपियर ने कहा, ‘‘हमने अपनी कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है और शुरू से ही अपरिवर्तित है.’’ समझौते के भविष्य को लेकर पूछे गए सवाल को ट्रैपियर टाल गए और मोदी की पेरिस यात्रा तक वह यही कहते रहे कि अंतिम समझौता हो चुका है.

मोदी की पेरिस घोषणा के बाद रक्षा मंत्री पर्रिकर ने रंग बदलना शुरू कर दिया. अब समझौते को लेकर टालमटोल करने की बजाए वह पूर्ववर्ती सरकार का यह कह कर मजाक उड़ाने लगे थे कि उसने राफेल सौदेबाजी में देर लगा दी. टीवी से अपनी बातचीत में पर्रिकर ने ए.के. एंटनी के उस निर्णय पर सवाल उठाए जिसमें एंटनी ने जीवन चक्र खर्च मामले के समाधान तक सौदेबाजी को रोक दिया था. पर्रिकर का ध्यान इस बात पर नहीं गया कि उनकी ही पार्टी के सांसद ने जीवन चक्र खर्च के प्रावधान पर सवाल उठाया था. उस साल के आरंभ में जब एन्टनी से उनके इस निर्णय के बारे में पूछा गया तो उन्होंने उल्टा सवाल दागा, ‘‘क्या इस सरकार ने 36 विमानों की खरीद पर सहमति जताते हुए जीवन चक्र खर्च के प्रावधान को हटाया दिया है?’’ वर्तमान सरकार से संसद में दो बार सवाल किया गया कि यदि राफेल की खरीद में जीवन चक्र खर्च भी शामिल है तो वह कितना है? दोनों दफा सरकार ने जवाव देने यह कह कर कन्नी काट ली कि पुरानी और नई शर्तों की तुलना नहीं की जा सकती.

मूल सौदे को रद्द करने के बाद मोदी सरकार ने रक्षा निर्माण क्षेत्र में निजी क्षेत्र पर लगे प्रतिबंधों को ढीला करना आरंभ किया. सरकार की मंजूरी के बिना ही विदेशी कंपनियों को भारतीय रक्षा कंपनियों 49 प्रतिशत तक पूंजी निवेश का अधिकार दिया गया. इस निर्णय से  डसॉल्ट के लिए रिलायंस में निवेश करने का रास्ता खुला गया. इसी वर्ष संशोधित रक्षा खरीद प्रकियाओं में इंजीनियरिंग, डिजाइन, कोडिंग और प्रशिक्षण खर्च को विक्रेता के अपने ऑफसेट संकल्प खर्च में शमिल करने को मंजूरी दे दी गई. इससे पहले ऑफसेट खर्च की परिभाषा को रक्षा निर्माण और रखरखाव तक सीमित रखा गया था. वीवीआईपी आगस्ता वेस्टलैण्ड हेलिकॉप्टर की खरीद प्रक्रिया में भ्रष्टाचार के खुलासे के बाद पिछली सरकार ने उपरोक्त सेवाओं को ऑफसेट खर्च की सूची से बाहर कर दिया था.

2016 में प्रकाशित खरीद प्रक्रिया में ‘‘सामरिक साझेदार और साझेदारियों की सूचना अलग से देने’’ की नीति का विकल्प था. यह मोदी प्रशासन काम था जिसकी घोषणा 2017 में की गई. इस नीति के तहत सरकार के पास विदेशी विक्रेता और भारतीय कंपनियों को एक साथ चुनने का अधिकार था ताकि बाद में दोनों मिल कर रक्षा ठेकों में बोली लगा सकें. सरकार ने सामरिक साझेदारी मॉडल पर काम रही कंपनियों के लिए लड़ाकू विमान, पनडुब्बी, हेलीकॉप्टर और बख्तरबंद वाहन क्षेत्र के ठेकों को सुरक्षित कर दिया.

जुलाई में ऐसी रिपोर्ट्स आईं कि नौसेना, वायुसेना और रक्षा मंत्रालय के वित्त विभाग ने, खासकर एकाधिकार के खतरे का हवाल देते हुए, सामरिक साझेदारी की नीति पर अपनी अपनी चिंताएं जताई हैं. जुलाई में ही रक्षा मंत्रालय ने इस नीति पर औपचारिक मुहर लगा दी.

नई नीति के तहत निजी क्षेत्र के लिए सुरिक्षित इन चार क्षेत्रों से सार्वजनिक रक्षा निर्माता कंपनियों को बाहर कर दिया है. इन क्षेत्रों में भारी खरीद हाने वाली है या खरीद प्रक्रिया चल रही है. हाल तक विदेशी कंपनियों के साथ भारत के सभी रक्षा विमानन साझेदारी करने वाला एचएएल पर भविष्य की लड़ाकू विमान परियोजनाओं के लिए विचार तक नहीं किया जाएगा.

2018 की फरवरी में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद को बताया कि 2016 के राफेल समझौते में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण अथवा लायसेंस के तहत भारत में वायुयान के निर्माण के लिए जोर नहीं दिया गया है. रक्षा मंत्री ने दावा किया कि इन शर्तों पर जोर इसलिए नहीं दिया क्योंकि इतने बड़े ऑर्डर के लिए यह लागत कुशल नहीं है.’’ ये दोनों ही बात पुराने समझौते के केन्द्र में थीं. (1996 में इतने ही जेट विमानों की खरीद के लिए रूस से हुए समझौते में एचएएल में विमानों का निर्माण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की शर्त शामिल थी.)

इस बात को झुठला पाना कठिन है कि मूल खरीद प्रक्रिया को रद्द कर मोदी सरकार ने एक बड़े फायदे को भारत के हाथों से जाने दिया. पहले जब डसॉल्ट बोली लगा रहा था तब नए ऑर्डर को पूरा करने और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राफेल को साबित करने का उस पर दवाब था. उसे प्रतिद्वंदी यूरोफाइटर को बोली में पछाड़ना था और एचएएल के साथ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और निर्माण कार्य को बांटना था. भारत सरकार की तय शर्तों के आधार पर सौदेबाजी हो रही थी. मोदी सरकार ने अपने गोलपोस्ट में गोल कर दिया. फ्रांस सरकार के साथ सरकारी स्तर की भारतीय प्रतिबद्धता के बाद डसॉल्ट ने जान लिया था कि समझौता रद्द नहीं हो सकता और वह प्रतिद्वंदियों के दवाब के बिना ही शर्त और कीमत तय कर सकता है. उस वक्त तक कंपनी को मिस्र और कतर से राफेल के ऑर्डर मिल गए थे और उस पर राफेल विमानों को बेचने के लिए पड़ रहा दवाब कम हो गया था. यहां तक कि अब भारत में विमानों के निर्माण के प्रावधान को, जिसका विरोध डसॉल्ट कर रहा था लेकिन भारत अड़ा हुआ था, भी हटा दिया गया.

बताया जाता है कि 2016 में जब सरकारी स्तर पर बातचीत चल रही थी तब भारत के हितों की कीमत पर फ्रांस को फायदा पहुंचाने वाले जवावदेहिता के कमजोर प्रावधान का विरोध भारतीय कानून मंत्रालय के अधिकारियों तक ने किया था. खबर यह भी है कि समझौते पर वित्तीय गारंटी को लेकर फ्रांस आनाकानी करता रहा और उसका जोर इस बात पर था कि अनुबंध के उल्लंघन के लिए फ्रांस की कंपनियों को कानूनी रूप से जिम्मेदार बनाया जाए न कि फ्रांस की सरकार को. यह अभी स्पष्ट नहीं है कि यह प्रावधान अंतिम समझौते में है या नहीं.

यह भी स्पष्ट नहीं है कि राफेल समझौते में रिलायंस समूह की संलिप्तता के बारे सरकार कब जागी और उसे इसकी कितनी जानकारी थी. 2015 में किए गए संशोधन ने डसॉल्ट को अपने ऑफसेट साझेदार की आधिकारिक घोषणा करने में विलंब का मौका दिया. संशोधन की टाइमिंग पर गौर करें तो कह सकते हैं कि सरकार इस सवाल से पल्ला झाड़ना चाहती थी. 2018 की फरवरी में रक्षा मंत्रालय बता रहा था कि 36 राफेल विमान की खरीद से संबंधित 2016 के समझौते के लिए बिक्रेता कंपनी ने भारतीय ऑफसेट साझेदार का चयन नहीं किया है.’’

12 दिसंबर 2017 को अनिल अंबानी ने राहुल गांधी को पत्र लिख कर संसद में उनके दावों का खंडन किया. पत्र में अंबानी ने लिखा कि ''डसॉल्ट और रिलायंस के बीच की साझेदारी निजी क्षेत्र की दो कंपनियों के मध्य हुआ एक स्वतंत्र समझौता है और इस मामले में सरकार की कोई भूमिका नहीं है.’’ ऐसा कहना गलत होगा कि रक्षा निमार्ण में सक्रिय दो कंपनियों के समझौते में सरकार की कोई भूमिका नहीं है. खरीद प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले जटिल प्रशासनिक नियामक के मद्देनजर यह संभव ही नहीं है. 2015 में ऑफसेट साझेदार की औपचारिक घोषणा को विलंबित करने वाले संशोधन के चलते अंबानी बच गए. इस संशोधन ने ही सरकार को अनभिज्ञ दिखाई देने का अवसर दिया था.

लेकिन जब मैंने इस साल वायुसेना के मुख्यालय में सूचना के अधिकार के तहत आवेदन कर जवाब मांगा तो मुझे पता चला कि 2016 के सितंबर माह में राफेल समझौते में हस्ताक्षर होने के दिन ही ऑफसेट समझौता हो चुका था.

डसॉल्ट और रिलायंस समूह ने 2017 के अक्टूबर में नागपुर के विशेष आर्थिक जोन में निर्माण इकाई का शिलान्यास किया. एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि इस इकाई का संचालन डसॉल्ट रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड (डसॉल्ट और रिलायंस का संयुक्त उपक्रम) करेगा और यहां लीगेसी फैल्कन की 2000 सीरीज और डसॉल्ट एविएशन के नागरिक जेट विमानों का निर्माण किया जाएगा. इससे डसॉल्ट के ऑफसेट संकल्प की परिपूर्ति तो हो जाएगी लेकिन रक्षा निर्माण के स्वदेशीकरण के लक्ष्य को इससे बहुत सीमित लाभ मिलेगा. डसॉल्ट ने एक ही स्थान में 10 करोड़ यूरो के प्रत्येक्ष विदेशी निवेश की भी घोषणा की. इस संयुक्त उमक्रम में रिलायंस ने अपने निवेश की कोई घोषणा नहीं की है जबकि वह नियंत्रक की भूमिका में है और उसकी उमक्रम में अधिकांश भागीदारी है. साथ ही डसॉल्ट ने रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की सहायक कंपनी रिलायंस एयरपोर्ट डेवलपर में 80 लाख यूरो लगाए हैं और उसकी भागीदारी अब 35 प्रतिशत है. महाराष्ट्र सरकार ने इस कंपनी को अपने 5 एयरपोर्ट के संचालन का ठेका दिया है. उस प्रेस विज्ञप्ति में भविष्य के वर्षों में (कितने?) राफेल और फैल्कन विमानों के लिए अंतिम असेंबली लाइन की स्थापना की घोषणा है. रक्षा जानकारों की शिकायत है कि ऐसी साझेदारियों में स्थानीय कंपनियां नट टाइट करने तक सीमित रह जाती हैं. इस काम में नवीन प्रौद्योगिकी की बहुत कम जरूरत होती है. उन्हे उन्नत निर्माण का मौका नहीं मिलता. (मैंने रिलायंस और डसॉल्ट को सवालों की विस्तृत सूची भेजी थी जिसका जवाब अभी तक नहीं मिला.)

अंबानी के नजदीकी रहे पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने रिलायंस समूह के साथ अपने काम के अनुभव को साझा करते हुए कहा, ''रक्षा उद्योग उनके डीएनए में नहीं है और इसलिए उनके बस का भी नहीं है.'' पूर्व अधिकारी के अनुसार रिलायंस समूह मुख्य रूप से ट्रेडिंग और उपभोक्ता उद्योग में संलग्न है. ''देख कर लगता है यहां बड़ा खेल हो रहा है. कंपनी के पास न प्रौद्योगिकी क्षमता है न रणनीतिक रोडमैप तैयार कर सकने की इच्छाशक्ति. ये लोग तुरंत ऑर्डर और ऑर्डर के आधार पर ऑफसेट में लगने वाले पैसों को हथियाना चाहते हैं. इन ऑफसेटों से क्षमता निर्माण कैसे हो यह चिंता नहीं है.’’

यह वरिष्ठ अधिकारी सुझाव देते हुए कहते हैं कि ऐसा कहना कि रिलायंस के शामिल होने से रक्षा उद्योग को बल मिलेगा गलत होगा. ‘‘सब कुछ डसॉल्ट के हाथ में रहेगा. डसॉल्ट ही सारा काम कर रहा है. हां, ये लोग व्यापार भारत लाएंगे, लोगों को नौकरियां मिलेगी, रोजगार का निर्माण होगा और शायद कुछ निर्माण भी हो...लेकिन रिलायंस के नियंत्रण में कुछ नहीं होगा क्योंकि ये लोग सिर्फ अपना फायदा देख रहे हैं, उन्हे प्रोद्योगिकी विकास की फिक्र नहीं है. इस देश के रक्षा उद्योग का यही अंतिम सार है.''

इस पूर्व अधिकारी ने मुझे यह भी बताया की एक तरह से यह उपक्रम जमीन को कब्जाने का खेल भी है. नागपुर में निर्माण इकाई की स्थापना का निर्णय डसॉल्ट और रिलायंस ने अपने पसंददीदा बेंगलुरु और हैदराबाद में जमीन न मिलने के बाद किया. ‘‘ये सब पहले जमीन पर कब्जा करना फिर चुपचाप चीजों के होने का इंतजार करना है.’’ अधिकारी ने बताया, ''रिलांयस का प्रयास बेंगलुरु में विफल हो गया. चंद्रबाबू (आंध्र प्रदेश) के आगे भी रिलायंस की दाल नहीं गली. वे लोग काफी सतर्क हैं.’’ वह बताते हैं कि इन लोगों ने साफ कह दिया कि जमीन पर तब तक कोई कब्जा नहीं मिलेगा जब तक निवेश करने के लिए गंभीर नहीं बनोगे.’’

डसॉल्ट और रिलायंस के शिलान्यास समारोह में अन्य लोगों के अलावा फ्रांस के रक्षा मंत्री और भारत में फ्रांस के राजदूत, भाजपा के नेता नितिन गडकरी और देवेन्द्र फडणवीस पहुंचे थे. सड़क एवं जहाजरानी मंत्री गडकरी का घर नागपुर में है और यह उनका लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र भी है. महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री देवेन्द्र फडणवीस नागपुर से ही आते हैं. उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए अंबानी ने बताया कि कैसे महाराष्ट्र सरकार ने नई इकाई निर्माण के लिए रिलायंस को जमीन दी.

अंबानी ने कहा, ‘‘शुरू में हमारे फ्रांसीसी पार्टनर को लगा था कि हम बेंगलुरु या हैदराबाद में इस इकाई की स्थापना करेंगे जहां एविएशन क्षेत्र पहले से ही स्थापित है. लेकिन जब जगह नहीं मिली तो फिर जाहिर कारणों से गुजरात में संयंत्र की स्थापना करने की सोच थी. लेकिन मैंने कहा कि इकाई तो नागपुर में ही बनेगी. मुझे यह बताने में कोई एतराज नहीं है कि नागपुर में स्थापना करने का विचार नितिन गडकरी ने दिया था. उन्होंने मुझसे कहा कि अगर मैं नागपुर छोड़ कर कहीं और गया तो वह मुझे देश निकाला दे देंगे. गडकरी साहब की जिद, उनकी प्रतिबद्धता और दृष्टिकोण और मेरे दिवंगत पिता के साथ श्री गडकरी के ताल्लुकात को देखते हुए उन्हें ना कहना मेरे बूते में न था. लेकिन मैंने बहाना बनाया कि आप एक बार मुझे मुख्यमंत्री से बात करने दें...जब मैंने मुख्यमंत्री से मुलाकात की तो उन्होने पूछा, “तो तुमने नागपुर आने का मन बना लिया है.” उन्होंने मुझे यह पूछने का मौका तक नहीं दिया कि क्या हम लोग नागपुर आ सकते हैं. उन्होंने वादा किया कि हमें जो चाहिए वह दिया जाएगा.’’

समारोह की धूमधाम में यह बात रह गई कि जमीन की कीमत अदायगी में देरी के लिए रिलायंस पर जुर्माना लगा था. देरी के कारण राज्य सरकार का उस पर दवाब था. हालांकि रिलायंस को यह जमीन 2015 में राज्य के अधीन महाराष्ट्र एयरपोर्ट विकास कंपनी ने दी थी लेकिन रिलायंस समूह 2017 में हिसाब किताब पूरा करने के बाद ही इसका कब्जा ले पाया था. पता चला है कि कंपनी ने आवंटित 289 हेक्टेयर जमीन को कम कर 104 हेक्टेयर करने की मांग की ताकि उसे 63 करोड़ रुपए की घटी हुई कीमत चुकानी पड़े. उस वक्त रिलायंस के साथ काम कर रहे इस वरिष्ठ अधिकारी ने मुझे बताया कि रिलायंस कंपनी 38 करोड़ रुपए की दूसरी किस्त का भुगतान नहीं कर पा रही थी. अधिकारी को यह बात हैरान करती है कि कमजोर वित्तीय स्थिति के बावजूद महाराष्ट्र सरकार इस समूह पर मेहरबान थी. जाहिर है कि अन्य राज्य सरकारों ने रिलायंस समूह के लिए इतना धैर्य नहीं दिखाया.

2016 को जिस वर्ष रिलायंस समूह महाराष्ट्र सरकार को भुगतान करने में चूका था उसी वर्ष उसने आंध्र प्रदेश में जहाज निर्माण इकाई के निर्माण के लिए 5 हजार करोड़ रुपए के निवेश का प्रस्ताव दिया था. इसे राज्य सरकार को प्राप्त हाने वाला तब तक का सबसे बड़ा निवेश कहा गया. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार प्रस्ताव के दो साल बाद भी रिलायंस ने राज्य के साथ क्रियांवयन योजना साझा नहीं की और न भूमि अधिग्रहण के लिए आवश्यक अग्रिम भुगतान किया. कंपनी के वित्तीय निवेशकों से अक्रांत चंद्राबाबू नायडू ने मीडिया को बताया कि वह राज्य के निवेश बोर्ड के समक्ष कंपनी को भेजने पर विचार कर रहे हैं.

2018 की जुलाई में ट्रैपियर ने समाचारपत्र को बताया कि प्रतिस्पर्धात्मक मूल्य पर प्रोद्योगिकी और निर्माण का हस्तातंरण भारत में करने के लिए डसॉल्ट को 200 राफेल विमान के बड़े ऑर्डर हासिल करने होंगे. साफ है कि यहां तक आते आते भूमिकाएं बदल चुकी थीं और अब मूल सौदेबाजी के विपरीत डसॉल्ट भारत सरकार को अपनी शर्तें गिनवा रहा था. ट्रैपियर के अनुसार कंपनी एचएएल की जगह रिलायंस के साथ काम कर रही है क्योंकि ‘‘हमे बताया गया है कि एचएएल लंबे समय तक के लिए व्यस्त है. हमने रिलायंस से बात की और वह भारत में ऐसी सुविधा के निर्माण का इच्छुक है. उनका ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा है और उसके पास वित्तीय क्षमता भी है.’’

लेकिन असलियत यह है कि एचएएल के पास ऑर्डर की कमी थी. 2017 में एचएएल के अध्यक्ष ने एक समाचार चैनल को बताया कि हाल में जो ऑर्डर उनके पास है वह नाकाफी हैं.’’ एचएएल को 2019 के वित्तीय वर्ष के अंत तक भारत सरकार को लायसेंस में निर्मित 36 सु-30 देने हैं. इसके अतिरिक्त उसके पास वायुयान का कोई अन्य ऑर्डर नहीं है. अध्यक्ष का अनुमान था कि कंपनी के पास ढाई साल तक का ही ऑर्डर शेष है.

कहा जा सकता है कि जो विश्वास ट्रैपियर ने रिलायंस समूह के ट्रैक रिकॉर्ड और वित्तीय क्षमता पर दिखया था वह यर्थाथ पर आधारित नहीं था.

{तीन}

2002 में उद्योगपति धीरूभाई अंबानी के बाद उनके दो बेटों मुकेश और अनिल के बीच चार साल तक रिलायंस इंडस्ट्री के भविष्य को लेकर भयानक विवाद चला. 2006 में औपचारिक रूप से कंपनी का विभाजन हो गया और अनिल के हिस्से में दूरसंचार, उर्जा, प्रकृतिक संसाधन और वित्त सेवा के व्यवसाय आए. अनिल अंबानी के रिलायंस समूह के ये चार व्यवासाय मुख्य हिस्से हैं.

अनिल की छवि पहले से ही भड़कीले और तड़क-भड़क के शौकीन आदमी की है जिसे पूर्व बॉलिवुड अभिनेत्री से उनके विवाह ने और पुख्ता किया. इस विवाह को बहुत सालों तक उनके पिता ने स्वीकार नहीं किया था. व्यवसाय की बागडोर हाथ में आने से अनिल के पास खुद को साबित करने मौका था.

अनिल ने अपनी पारी की शानदार शुरुआत की. 2008 में जब अनिल ने रिलायंस पावर के शेयरों को सार्वजनिक किया तो मिनटों में ही तीन अरब डॉलर के शेयर बिक गए. लेकिन वित्तीय वर्ष 2014 के खत्म होते होते रिलायंस समूह कर्ज में डूब गया था. अंबानी ने अपनी संपत्ति की बिक्री शुरू कर दी और बाद में पूरा का पूरा व्यवसाय ही बेचने लगे.

2016 में रिलायंस समूह की सीमेंट कंपनी को प्रतिद्वंदी समूह ने खरीद लिया. 2017 के अंत तक रिलायंस पावर का मोल कुल 21 हजार करोड़ रुपए का रह गया था जो एक दशक पहले तीन अरब डॉलर था. 2017 के अंत में कंपनी ने देश के पश्चिम से पावर ट्रांसमिशन और मुंबई में उर्जा उत्पादन और वितरण जैसे दो मुख्य कामों को बंद कर दिया. हाल में रिलायंस पावर ने अदालत में अर्जी लगाई है कि मध्य प्रदेश के शासन में उसके उर्जा संयंत्र के लिए कोयला उत्खनन के निर्धारित कोटे को बढ़ा दिया जाए. (जिन तीन संयंत्र के निमार्ण का ठेका इस कंपनी को मिला था उसमें से सिर्फ इस संयंत्र का निर्माण कंपनी ने किया है). कंपनी ने अदालत को दलील दी कि यदि अधिक कोयला उत्खनन की अनुमति नहीं दी गई तो उसे बड़ा घाटा होगा और उसे यह संयंत्र भी बंद करना पड़ सकता है.

2017 की जून में रिलायंस कम्यूनिकेशन के ऊपर 45 हजार करोड़ रुपए का कर्ज था जिसके कारण वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेन्सियों को कंपनी के कर्ज लेने की क्षमता को कम करना पड़ा. कंपनी ने अपने व्यापार बंद करना शुरू कर दिए. कंपनी के एक विदेशी लेनदार चाइना विकास बैंक ने राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण से मांग की कि रिलायंस कम्यूनिकेशन को दिवालिया घोषित कर दिया जाए. पेइचिंग में संकटकालीन वार्ता के बाद अनिल अंबानी ने घोषणा की कि रिलायंस कम्यूनिकेशन अपनी संपत्ती मुकेश अंबानी के मोबाइल नेटवर्क जियो को बेचेंगे. इस प्रस्ताव का रिलायंस के अन्य लेनदारों ने विरोध किया और रिलायंस के खिलाफ दिवाला कार्यवाही को आगे बढ़ाने लगे जिससे संपत्ती की बिक्री में देरी हुई लेकिन अंत में अदालत ने 2018 के अगस्त में जियो को सम्पत्ति का कुछ हिस्सा बेचने की अनुमति अनिल को दे दी. बिक्री के बाद भी कंपनी के ऊपर जो कर्ज था उसका आधा ही प्राप्त हो सका. लेनदार कंपनियां रिलायंस के पीछे लगी रहीं.

पूर्व वरिष्ठ अधिकारी का मानना है कि मुकेश अंबानी प्रत्यक्ष रूप से अनिल की मदद कर रहे हैं. यह परिवार की बड़ी रणनीति का हिस्सा है. 2012 में 126 जेटों की प्रतिस्पर्धा में सबसे कम बोली लगाने वाला बनने के बाद डसॉल्ट ने सबसे पहले मुकेश की रिलायंस इंडस्ट्री को अपना सामरिक साझेदार बनने का प्रस्ताव दिया था. रक्षा मंत्रालय ने डसॉल्ट से विमानों की खरीद का फैसला लिया और दो सप्ताह बाद मुकेश ने इस कंपनी के साथ समझौता कर लिया. लेकिन किन्हीं अस्पष्ट कारणों से वह आगे नहीं बढ़े. 2016 में उनके भाई ने डसॉल्ट के साथ संयुक्त उपक्रम का समझौता किया और ऑफसेट साझेदार बन गए.

‘‘डसॉल्ट अंबानी परिवार के साथ ही लगा हुआ था. 126 लड़ाकू विमानों की खरीद से संबंधित मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) मामले में मुकेश अंबानी ने डसॉल्ट का साथ देते हैं, फिर अचानक वह इस समझौते से बाहर हो जाते हैं और भाई अनिल प्रवेश कराते हैं. तो बुनियादी रूप यह राफेल के खेल में रिलायंस की निरंतरता ही है.’’

अंबानी के करीब रहे इस अधिकारी का कहना है कि दोनों भाई एक दूसरे का विरोध करने का नाटक कर रहे थे जबकि हकीकत में इस प्रक्रिया में एकसाथ लगे थे.

2015 से पहले तक रक्षा निर्माण क्षेत्र में रिलायंस समूह का कोई खास निवेश नहीं था. मोदी की पेरिस घोषणा के बाद रिलायंस रक्षा ठेकों में अपनी डूबती नैया का सहारा खोजने लगा. सार्वजनिक मंच से अनिल ने घोषणा की कि भविष्य में रिलायंस समूह की प्रगति में रक्षा निर्माण की मुख्य भूमिका होगी. रिलायंस इंफ्रास्ट्रचर (यह रिलायंस समूह की मुख्य कंपनी है) के चेयरमैन की हैसियत से अलिन अंबानी ने 2016 में शेयरधारकों के सामने घोषणा की कि वह अगले 15 वर्षों तक रक्षा क्षेत्र में 1 लाख करोड़ रुपए प्रति वर्ष का अवसर देखते हैं.

कंपनी ने स्वयं को विश्वसनीय दिखाने के लिए जानेमाने रक्षा विशेषज्ञों की एक टीम तैयार की. लेकिन टीम के सदस्यों को जल्द समझ आ गया कि कंपनी के पास एक स्पष्ट दीर्घकालीन दृष्टिकोण का आभाव है. टीम के एक विशेषज्ञ ने मुझे बताया, ‘‘रिलायंस के पास प्रोद्योगिकी दक्षता नहीं थी इसलिए यह जरूरी था कि वह पहले एक परियोजना हाथ में लेता और प्रोद्योगिकी और रक्षा निर्माण से संबंधित चीजों को समझता. कौशल विकास के लिए बहुत सारा निवेश आना था.’’ लेकिन रिलायंस का ध्यान ऑफसेट पार्टनर बनाने में था जिससे उसके व्यवसाय को लाभ मिले सके. उसने प्रोद्योगिकी विकास की दृष्टि से ऑर्डरों पर विचार नहीं किया. एक अधिकारी के शब्दों में, जैसे ही लगा कि उनके लिए ‘‘खजाना खुल गया है’’ वे लोग निकल लिए.

राफेल समझौते से मिलने वाली ऑफसेट पूंजी भी रिलायंस के लिए पर्याप्त नहीं है. रिलायंस के रक्षा व्यवसाय के अन्य समझौते भी कंपनी की वित्तीय स्थिति को सुधारने के लिए कम पड़ेंगे. इन सभी समझौतों में और राफेल की कथा में एक बात समान है. वह यह कि सरकार के कामों ने अंबानी को फायदा पहुंचाया है. भारत सरकार के रक्षा खर्च का कितना हिस्सा अंबानी के खाते में जाएगा यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन सवाल यह भी है कि क्या अंबानी समूह होने वाले धन वर्षा के दिनों तक टिका रह सकेगा?

रिलायंस डिफेंस लिमिटेड की मातृ कंपनी रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर ने अपनी ताजा वित्तीय फाइलिंग में 18 हजार करोड़ रुपए का कर्ज दिखाया है. कंपनी का कुल मोल 24 हजार करोड़ रुपए है. अंबानी की सभी चार सूचीबद्ध कंपनियों में यही एक कंपनी है जिसका कर्ज कुल मोल से कम है. रिलायंस एयरोस्पेस (डसॉल्ट रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड में इसकी अधिकांश हिस्सेदारी है) सहित रिलायंस डिफेंस की 13 सहायक कंपनियां हैं. ये कंपनियां पब्लिक लिस्टेड नहीं हैं और अपने वित्तीय आंकड़ों की रिपोर्ट नहीं देती हैं. रिलायंस नेवल और इंजिनीयरिंग विशेष कामों के लिए बनी रिलायंस डिफेंस सिस्टम के जरिए रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर के नियंत्रण में हैं. यह रिलायंस की पोत निर्माण कंपनी है जो भारतीय नौसेना के प्रमुख निर्माण परियोजना का ठेका लेने में लगी है. खबरों के अनुसार एक लाख करोड़ रुपए की लागत वाले ठेकों के लिए इसे शॉर्टलिस्ट किया गया है. रिलायंस समूह के रक्षा कंपनियों में यही एक ऐसी है जो सार्वजनिक तौर पर सूचीबद्ध है. इसलिए अपने कामकाज और वित्त से संबंधित आकड़े देने को बाध्य है. इस कारण रिलायंस समूह के रक्षा व्यापार को समझने के लिए यही सबसे उम्दा जगह है.

23 दिसंबर 2014 को रक्षा मंत्रालय की रक्षा खरीद परिषद ने 80 हजार करोड़ की अनुमानित लागत से भारत में निर्मित छह पनडुब्बी खरीद प्रस्ताव को मंजूरी दी. प्रतिस्पर्धी बोली लगाकर सटीक लागत को बाद में तय किया जाना है. उपयुक्त भारतीय शिपयार्ड की पहचान करने के लिए परिषद ने एक समिति का गठन किया. तत्कालीन रक्षा मंत्री ने तीन महिने के भीतर संभावित कंपनियों और शिपयार्ड की रिपोर्ट देने को कहा. इस प्रक्रिया के तहत किन कंपनियों का चयन किया गया और क्या बोली लगाई गई इसकी जानकारी अभी नहीं है. 2018 की फरवरी में मैंने रक्षा मंत्रालय में आरटीआई आवेदन डाल कर पूछा कि किन शिपयार्डों का चयन किया गया है और इस प्रक्रिया में किन मानदंडो को अपनाया गया है. मुझे जवाब नहीं मिला.

पनडुब्बी का प्रस्ताव पारित होने के तीन दिन पहले रिलायंस डिफेंस सिस्टम प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना हुई. और तीन महिन बाद राष्ट्रीय शेयर बाजार सूचकांक में लिस्टेड सबसे बड़ी पोत निर्माण कंपनियों में से एक पिपावाव शिपयार्ड में बड़ा हिस्सा खरीद लिया. पिपावाव के साथ एक खतरा यह था कि वह दिवालिया होने के कगार पर थी. खबरों के अनुसार कई निवेशकों ने पिपावाव से बड़ा हिस्सा खरीदने का प्रस्ताव किया लेकिन फरवरी 2015 तक इस कंपनी के प्रमोटरों ने तत्काल कोई इच्छा व्यक्त नहीं की. लेकिन मार्च के आरंभ में उन्होंने घोषणा की कि अगले छह महीनों में रिलायंस समूह पिपावाव के प्रबंधन को नियंत्रण में लेने का लक्ष्य बना रहा है.

पिपावाव पर 6 हजार करोड़ का कर्ज था और पिछले दो सालों में कंपनी अपने कर्ज का ब्याज नहीं चुकाया था. इसके बावजूद जो एक बात संभावित निवेशकों को पिपावाव के प्रति आकर्षित करती थी वह यह थी कि इस कंपनी के संबंध फ्रांस सरकार के अधिनस्थ डीसीएनएस और रूस सरकार की जेएससी जीयोजडोका से हैं. ये दोनों कंपनियां पोतनिर्माता कंपनी हैं जिनके पास भारतीय नौसेना के जहाजों की मरम्मत और निर्माण का अनुभव है. पिपावाव के पास इस वक्त कुछ ऑर्डर थे और 2013 में उसने दो एम्फिबीअस युद्धपोतों (पृथ्वी और जल पर चलने में सक्षम)- जिसे आधिकारिक भाषा में अवतरण स्थल या डॉक कहते हैं- के निर्माण का टेंडर भरा था. वह इस दौड़ में था.

रिलायंस द्वारा संभावित अधिग्रहण की प्रक्रिया में पिपावाव ने अपने कर्ज का पुनर्गठन आरंभ कर दिया. यह एक प्रक्रिया है जिसके तहत कर्ज को शेयर में बदल कर (कंपनी की हिस्सेदारी कर्जदारों को सौंप कर) और अतिरिक्त निवेशकों से धन लेकर लेनदारों का निबटान किया जाता है. किसी भी कंपनी के उसके कर्ज का पुनर्गठन जबरदस्त आर्थिक संकट का संकेत है और जब तक कंपनी सफलता के साथ खुद को वित्तीय रूप से मजबूत नहीं कर लेती बहुत सतर्क रहने की जरूरत होती है. लेकिन पिपावाव के इस प्रक्रिया को आरंभ करते ही उसके यहां ताजा व्यापार की बाहर आ गई. इस कंपनी के ताजा व्यापार अवसरों का संयोग मोदी की रूस यात्राओं से मिलता है.

2015 की जुलाई में जब कूटनयिक शिखर सम्मेलन के लिए मोदी रूस पहुंचे हुए थे तभी खबरें आईं कि रूसी कंपनी जेएससी जीयोजडोका ने भारतीय नौसेना के लिए युद्धपोत निर्माण के अपने काम में पिपावाव को साझेदार बनाया है. जब राष्ट्रीय शेयर बाजार सूचकांक (एनएसई) ने पिपावाव को समझौते की जानकारी देने को कहा तो उसका जवाब था कि संबंधित पत्राचार भारत और रूस सरकार के बीच हुआ है इसलिए गोपनीय है. इसके तुरंत बाद पिपावाव ने एनएसई को बताया कि जेएससी जीयोजडोका के साथ उसने भारतीय पनडुब्बियों की मरम्मत के लिए साझेदारी की है.

दिसंबर के आखिर में जब मोदी ने फिर एक बार रूस का कूटनयिक दौरा किया तो भारतीय मीडिया में खबरें आईं कि युद्धपोत परियोजना का ठेका हासिल करने के लिए रिलायंस डिफेंस एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड ने रूस की यूनाइटेड शिपबिल्डिंग कॉर्पोरेशन के साथ अपनी साझेदारी की जल्द घोषणा करने वाला है. जब इस समझौते में देरी के बारे में एनएसई ने पूछा तो पिपावाव का जवाब था कि यह सौदेबाजी भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग को लेकर सामरिक वार्ता का हिस्सा है.

दिसंबर के आखिर में रिलायंस समूह ने पिपावाव को पूरी तरह से खरीदने की घोषणा की. इस कंपनी का नाम बदल कर पहले रिलायंस डिफेंस एंड इंजिनियरिंग और फिर रिलायंस नेवल एंड इंजिनियरिंग कर दिया गया. ये राष्ट्रीय शेयर बाजार में आरनेवल के नाम से ट्रेडिंग करती है.

यह वक्त था जब सरकार ने 2016 में संशोधित रक्षा खरीद प्रक्रिया जारी की थी जिसके सामरिक साझेदारी नीति के अध्याय में रक्षा मंत्रालय द्वारा चयनीत निजी कंपनी को विदेशी कंपनी के साथ सहकार्य करने की अनुमति दी गई थी. अगले साल इस नीति को जब सार्वजनिक किया गया, इसके साथ यह भी वादा किया गया कि पनडुब्बी ऑर्डर को निजी कंपनियों के लिए सुरक्षित किया जाएगा. अंबानी पहले से ही आरनेवल के शेयरधारकों को बताने लगे थे कि वह सामरिक साझेदारी मॉडल का समर्थन करते हैं और उनकी कंपनी उन दो कंपनियों में से एक है जो पनडुब्बी निर्माण के लिए पात्र हैं. मीडिया रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि हुई और दूसरी कंपनी लार्सन एंड टुब्रो है. नौसेना के लिए पहले से ही पनडुब्बी बना रही सरकारी पोत निर्माता मझगांव डॉक लिमिटेड इस सूची में शामिल नहीं था. संसद में चुनौती मिलने के बावजूद सरकार ने कभी यह स्पष्ट नहीं किया कि कैसे उसने सिर्फ इन दो कंपनियों को शॉर्टलिस्ट किया है.

अंततः फरवरी 2017 में आरनेवल ने अपने कर्ज के पुनर्गठन और शिपयार्ड के पुनर्वित्तीयन की योजना सामने रखी. एकाध महिने बाद शिपयार्ड के शेयरधारकों ने पुनर्वित्तीयन योजना को मंजूरी दे दी जिसके तहत कुछ लेनदारों को 163 करोड़ रुपए की एक मुश्त रकम दी गई और अन्यों को शेयरों से क्षतिपूर्ति करने का वादा किया गया. सार्वजनिक बैंक आईडीबीआई ने, जो आरनेवल के लेनदारों के संघ की अगुवाई करता है, इस कंपनी को कर्ज पुनर्गठन प्रक्रिया से बाहर आने की अनुमति दे दी. आरनेवल को कर्ज देने वाले सभी बैंक सरकारी हैं. भारी कर्ज में डूबे होने के बावजूद आरनेवल की वित्तीय छवि में यह एक सुधार माना जाएगा. रिलायंस समूह के अधिग्रहण के बाद भी इसने लगातार घाटा दिखाया है. इसका कुल कर्ज लगातार बढ़ा है. 2017 में कंपनी के ऊपर तकरीबन 8 हजार करोड़ रुपए का कर्ज था.

यहां से स्थिति और अजीब होने लगी. जून में रक्षा मंत्रालय ने दूसरी निजी पोत निर्माता कंपनी एबीजी शिपयार्ड से पोत आपूर्ति समझौता रद्द कर दिया. रक्षा मंत्रालय ने ऐसा करने के लिए कंपनी की बिगड़ी हुई वित्तीय स्थिति का हवाला दिया. लेकिन आरनेवल ने उसी जनवरी को तट रक्षक बल को तीव्र गश्ती नौका आपूर्ति का बड़ा ठेका हासिल किया. जबकि यह कंपनी अभी पुनर्गठन की प्रक्रिया में थी. खराब आर्थिक हालत के कारण एक कंपनी को फायदेमंद डील से बाहर कर दिया गया जबकि ऐसी ही हालत वाली दूसरी कंपनी पर ठेकों की बौछार होती रही.

जिस माह नौसेना ने एबीजी शिपयार्ड का ऑर्डर रद्द कर दिया था, खबर आई कि आरनेवल और लार्सन एंड टुब्रो को ऐम्फिबीअस युद्धपोत निर्माण के लिए ताजी बोली लगाने को आमंत्रित किया गया है. 2013 में जब सरकार ने इन युद्धपोतों के लिए बोली आमंत्रित की थी तो दो अलग अलग शिपयार्ड में चार पोत निर्माण की बात की गई थी. टेंडर के जरिए सरकार निजी या सरकारी शिपयार्ड का चयन करने वाली थी और दूसरे दो पोत बनाने के लिए सरकारी शिपयार्ड कंपनी को मूल शिपयार्ड से क्षमता का हस्तांतरण करवा कर नामांकित किया जाना था. (रक्षा खरीद प्रक्रिया में नौसेना परियोजनाओं के लिए नामांकन के आधार पर निर्माण की अनुमति है). पहले सरकार ने हिन्दुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड को दो पोत बनाने के लिए नामांकित किया था और पिपावाव शिपयार्ड और अन्य को बाकी के लिए बोली लगाने को कहा गया. लेकिन 2017 के आरंभ में सरकार ने नए टेंडर के जरिए चयन की गई किसी एक शिपयार्ड कंपनी से सभी चार पोत निर्माण करवाने का निर्णय लिया. खबरों के अनुसार रिलायंस डिफेंस (बाद में आरनेवल) और लार्सन एंड टुब्रो को बोली लगाने के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया था.

जब तक आरनेवल पुनर्गठन की प्रक्रिया में रहता उस पर विचार नहीं हो सकता था. ताज्जुब है कि आरनेवल के पुनर्गठन की योजना का प्रकाशन सरकार के उस निर्णय के तीन दिन बाद हुआ जिसमें सरकार ने हिन्दुस्तान शिपयार्ड का नामांकन रद्द कर दिया था. ऐम्फिबीअस पोत निर्माण के लिए ताजा टेंडर जमा करने का आमंत्रण कंपनी के पुनर्गठन के तुरंत बाद आया.

सरकार ने इस बात का कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं दिया कि क्यों उसने हिन्दुस्तान शिपयार्ड से दो पोत निर्माण का ऑर्डर वापस ले लिया है और उसे ऐम्फिबीअस के लिए ताजी बोली से भी बाहर कर दिया है. भारी उद्योग मंत्रालय द्वारा प्रकाशित शिपयार्ड कंपनी के गत तीन साल के वार्षिक परफॉर्मेन्स रिपोर्ट बताती है कि यह कंपनी आजकल अपनी क्षमता का मात्र आधा इस्तेमाल कर रही है.

आरनेवल के कर्ज पुनर्गठन की प्रक्रिया को पूरा कर लेने के थोड़े समय बाद सामरिक साझेदारी नीति का प्रकाशन हुआ. खबरों के अनुसार इसके कुछ दिनों बाद रक्षा मंत्रालय ने रिलायंस डिफेंस और लार्सन एंड टुब्रो को छह अत्याधुनिक गैर-नाभकीय पनडुब्बी के निर्माण प्रयासों में सक्षम साझेदार की अपनी सूची में शामिल किया. खबरों ने अनुसार इस परियोजना के लिए रक्षा मंत्रालय ने चार विदेशी संभावित निर्माताओं की सूची भी तैयार की.

विदेशी कंपनियों में फ्रांस की डीसीएनएस का भारत से सबसे अधिक जुड़ाव था. यह मझगांव डॉक लिमिटेड के जारी पनडुब्बी निर्माण परियोजना की विदेशी साझेदार कंपनी थी. इस कंपनी ने इस ऑर्डर की दो पनडुब्बियों का निर्माण कर लिया था. डीसीएनएस की दूसरी साझेदारी आरनेवल के साथ उस वक्त से थी जब वह पिपावाव शिपयार्ड था.

2008 के आरंभ में रिलायंस नेवल ने शेयरधारकों द्वारा मंजूर उस वित्तीय पुनर्गठन प्रस्ताव में संशोधन का प्रस्ताव दिया जिसकी वजह से उसे पिछले साल ऋण पुनर्गठन से बाहर आने की स्वीकृति मिली थी. पिछली योजना में कर्ज को शेयर में रूपांतरण करने का प्रस्ताव था और यदि अधिक हिस्सेदारी कर्जदारों को चली जाती तो हो सकता था कि वह प्रबंधन का नियंत्रण भी खो देता. यह पुराना प्रस्ताव संशोधित प्रस्ताव में नहीं था. बहुत से लेनदारों ने कंपनी की उस योजना को अभी तक मंजूर नहीं किया था जिसके तहत वह अपने कर्ज का निबटारा करना चाहती थी.

2017-18 का आरनेवल का वित्तीय वक्तव्य मायूस करने वाला था. कंपनी का कुल बाजार भाव पिछले साल के 1447 करोड़ रुपए से घट कर 443 करोड़ रुपए हो गया था. वित्तीय रिपोर्ट के रूप में कंपनी ने जो स्वतंत्र ऑडिट रिपोर्ट जमा की थी उसका निष्कर्ष यह था कि कंपनी को नगद घाटा हो रहा है और 31 मार्च 2018 को कंपनी के कुल मोल में बहुत कमी हो गई थी. कंपनी के सुरक्षित लेनदारों ने दिया हुआ कर्ज वापस ले लिया था और कंपनी का वर्तमान दायित्व उसकी संपत्ति से बहुत अधिक है. यह परिस्थितियां दर्शती हैं कि कंपनी स्थिर नहीं है और इससे कंपनी की चलते रहने की क्षमता पर शक पैदा होता है.’’

आरनेवल की समस्या तब और बढ़ गई जब पिपावाव शिपर्याड और आरनेवल के पूर्व प्रमोटर यह कहते हुए एक दूसरे को कानूनी नोटिस भेजने लगे कि खरीद समझौते का उल्लंघन हुआ है जिससे क्रमशः 8 हजार करोड़ रुपए और 5 हजार करोड़ रुपए का घाटा हुआ है.

मई 2018 के आते आते आरनेवल के कई लेनदारों ने राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (दिवालिया अदालत) की इलाहबाद शाखा में अर्जी दी कि आरनेवल के खिलाफ दिवालिया कार्रवाई को आगे बढ़ाया जाए. कार्रवाई के आगे बढ़ने से कंपनी को अपनी संपत्ति को बेच कर कर्ज चुकाने के लिए बाध्य होना पड़ता. यह केस पिछले साल के दिवालिया मामलों में जोड़ था. कंपनी ने बार बार ऐसा न करने के कारणों को दोहराया. अधिकरण ने कंपनी के दोहराए जाने वाले कारणों को ‘‘मामले को लंबा खीचने का बहाना बताया.’’ ये सारे मामले अदालत में लंबित हैं.

सरी आशा इस बात पर टिकी थी कि एलपीडी और अत्याधुनिक पनडुब्बियों वाली परियोजनाएं जो एक करोड़ रुपए या 14 अरब डॉलर की थी वह कंपनी को मिल सकती हैं. लेकिन अब आठ अरब डॉलर के प्रोजेक्ट- 751 को हासिल करने का मौका कंपनी के हाथ से निकलता दिख रहा था. हाल की मीडिया रिपोर्ट में संकेत मिलता है कि सामरिक साझेदारी नीति के तहत परियोजनाओं की योजना से सरकार पीछे हट गई है. आरनेवल अपने जारी ऑर्डर को पूरा करने में देर कर रहा था और उसकी वित्तीय स्थिति भी खराब थी. केवल लार्सन एंड टुब्रो ही संभावित नीति साझेदार के विकल्प के रूप में बचा था. इस स्थिति में एकल बिक्रेता स्थिति का निर्माण होना सामरिक साझेदारी नीति के उद्देश्य के उलट बात होती. मझगांव डॉक लिमिटेड को प्रोजेक्ट 751 की प्रतिस्पर्धा से बाहर रखने के सभी प्रयासों के बाद अब खबर है कि सरकार अपने विकल्पों पर पुनः विचार कर रही है और सभी छह पनडुब्बियों का ऑर्डर मझगांव डॉक को दे दिया है.

इसका असर एलपीडी ऑर्डर पर भी होगा. क्योंकि आरनेवल की अनु​पस्थिति में इस ऑर्डर में भी सरकार के पास एकल बिक्रेता स्थिति का विकल्प होगा. यह मामला तब और फंस गया जब जून 2018 में आरनेवल ने आरोप लगाया कि एक वरिष्ठ नौसेना अधिकारी, जिनका पुत्र प्रतिद्वंदी कंपनी लार्सन एंड टुब्रो में कार्यरत्त है, लार्सन का पक्ष ले रहे हैं. जुलाई में नौसेना ने दोनों कंपनियों के अधिकारियों को बोली लगाने के लिए आमंत्रित किया. पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए अपनाए जाने वाली यह मानक प्रक्रिया है. ऐसा उस वक्त हुआ जब संसद का नया सत्र आरंभ होने वाला था और सरकार को आशंका थी कि राफेल में रिलायंस समूह का पक्ष लेने के बाद उस पर और आरोप लगेंगे. अधिकारियों को इंतजार करने को कहा गया और फिर बिना कोई कारण बताए कह दिया गया कि बोली खोलने की प्रक्रिया को स्थगित कर दिया गया है.

रूस के साथ मिल कर नौसेना पोत बनाने की आरनेवल की योजना भी धराशायी हो गई. अंत में सरकार ने रूसी शिपयार्ड से सीधे दो पोत खरीदने का निर्णय किया और अतिरिक्त दो पोतों का निमार्ण रूस की सहायता से सार्वजनिक गोवा शिपयार्ड में करने का निर्णय किया.

2018 के मार्च में आरनेवल के साथ काम कर रहे एक सौ से अधिक स्थानीय ठेकेदारों और बिक्रेताओं ने गुजरात के राजूला में कंपनी के प्रशासनिक कार्यालय के बाहर धरना दिया. वे लोग कई सालों के अपने बकाया बिलों के भुगतान की मांग कर रहे थे. जब मैंने इन प्रदर्शनकारियों से बात की तो पता चला शिपयार्ड में काम पूरी तरह से ठप्प पड़ा है और इनके प्रदर्शन का भी कोई असर नहीं हुआ. भावेश लखानी एक ठेकेदार हैं. उनका कहना है कि पिछले ऑर्डर से संबंधित कई जहाज, जिसमें तट रक्षक बल के लिए तीव्र गश्ती नौकाएं और कई नौसेना पोत भी शामिल हैं, अपूर्ण हालत में पड़े हुए हैं. प्रदर्शनकारियों ने मुझे 191 नाम दिए जिसमें 80 हजार रुपए से लेकर 3 करोड़ 25 लाख रुपए के बिक्रेता लेनदार हैं. इनमें ऐसे लोग हैं जो बिजली के सामान की आपूर्तिकर्ता हैं और मजदूरों के ठेकेदार हैं.

{चार}

प्रोजेक्ट 751 भारतीय रक्षा निर्माण से जुड़ी पुरानी बीमारी का इलाज करने में मोदी सरकारी की विफलता का सबूत है. यह बीमारी है: शुरुआत में सार्वजनिक निर्माण कंपनियों को बेदखल करना और फिर कर्ज के बोझ तले दबी निजी कंपनियों को जबरदस्ती काम देना और फिर दोबारा उन्हीं ठेकों को सार्वजनिक कंपनियों के हवाले कर देना. इस पूरी प्रक्रिया में तत्काल आवश्यक रक्षा ऑर्डर में विलंब हुआ. इसके चलते सामरिक साझेदारी नीति विफल हो गई.

राफेल समझौता एक और कड़ी परीक्षा है. सरकार ने उस सहमति जो डसाल्ट और सरकार के बीच पहले से थी, उसे दोबारा किया. उस निजी कंपनी के साथ किया जो संकटग्रस्त और रक्षा क्षेत्र का कोई अनुभव नहीं रखती है. सरकार ने सार्वजनिक निकाय एचएएल को समझौते से बेदखल कर ऐसा किया है. यह देखना अभी बाकी है कि इससे भारतीय रक्षा उद्योग को कितना लाभ मिलेगा.

प्रशासनिक उठापटक और राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप के एक सिलसिले के बाद मोदी सरकार ने देश को वहीं लाकर खड़ा कर दिया है जहां से सब कुछ शुरू हुआ था यानी देश अभी भी कमजोर सरकारी कंपनियों पर अपने रक्षा निर्माण के लिए निर्भर है और निजी रक्षा उत्पादन उदासीन हालत में है. पहले की ही भांति प्रोद्योगिकी संतुलन विदेशी कंपनियों के पक्ष में है और ऐसा लगता नहीं कि सरकार के पास इस फासले को दूर करने का कोई उपाए है.

रक्षा एयरोस्पेस में दशकों का अनुभव रखने वाले एक व्यक्ति ने मुझे बताया कि रक्षा बाजार में भारतीय कंपनियां जल्द से जल्द पैसा बनाने के लिए आ रही हैं.’’ रिलायंस समूह को वह ऐसी ही एक कंपनी मानते हैं. ‘‘उनका उद्देश्य क्षमता निर्माण में बिना कुछ लगाए रक्षा जैसे नए अवसरों को तलाशना है और ज्यादा से ज्यादा बटोर लेना है....” ये लोग चार्टेड अकाउंटेंट हैं. इसलिए ये यहां पैसा बनाने के लिए हैं. ट्रेडिंग जैसे व्यवसाय के लिए तो ऐसा करना ठीक है लेकिन रक्षा में दीर्घकालीन रणनीति की जरूरत है. ऐसे लोगों के साथ यही एक समस्या है.''

लेकिन उपरोक्त बात निजी रक्षा निर्माताओं की भूमिका को खारिज नहीं करती. यदि लघु और मझोले उद्यमों को साथ लेकर काम किया जाए तो भारत अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करने में अधिक सक्षम हो सकता है. रक्षा संयंत्र और उपकरण बनाने वाली एक ऐसे ही कंपनी के प्रमुख ने मुझे बताया कि समस्या यह है कि इन उद्यमों को कभी मौका ही नहीं दिया गया. उनका कहना है, ‘‘जो लोग कमजारे हैं उन्हें कोई कुछ नहीं देता.’’

वह कहते हैं, ‘‘बडे रक्षा खर्च और स्वदेशी उत्पादन के बड़े वादों के बीच सच्चाई यही है कि मैं निर्यात के दम पर टिका हुआ हूं. भारत के अधिकारियों से कुछ भी हासिल कर पाना जान देने जैसा है. आप उनकी जरूरत का ख्याल रखते हैं. लेकिन उसके बाद भी धक्के खाते हैं. उनसे पूछीए, ‘सर, सर, सर हो गया? साइन कर दो.’ वह बोलेगा कि नहीं मेरा मूड नहीं है.’’ घरेलू कंपनियों से बड़ी छूट की आशा की जाती है. इतनी बड़ी कि देना संभव नहीं होता. ऐसा किस लिए? ‘‘क्योंकि हम लोग भारतीय हैं. एक ऊंचे पद के अफसर ने मुझसे कहा था, ‘बॉस, साबित करो कि देश को तुमसे फायदा हुआ है.’’

इस निजी कंपनी के मालिक ने उन देशों के बारे में मुझे बताया जिन्होंने रक्षा उद्योगों का सफलता के साथ स्वदेशीकरण किया है. ‘‘अमेरिका जाकर उसके रक्षा विभाग को कुछ बेच कर दिखाओ? असंभव काम है. बेचने वाले को स्थानीय होना होगा.’’ इजरायल में तो ‘‘उनके पास लिस्ट है कि कौन सा बिक्रेता इजरायली है. और जो भी इजरायल में उपलब्ध है उसे वहां प्राथमिकता दी जाती है. भारत सरकार भी कह सकती है कि यह पुर्जा यहां उपलब्ध है यह बाहर से नहीं आएगा. समझौते में यह बात होनी चाहिए.’’

रक्षा एयरोस्पेस के जानकार मानते हैं कि लघु और मझोले उद्यमों को विस्तार देने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है. ये उद्यम एयरोस्पेस व्यवसाय के लिए बेहद जरूरी हैं. इन उद्यमों की सप्लाई चेन से आने वाले इंजन, रेडार, शस्त्र प्रणाली और अन्य विशेष प्रकार के उपकरणों के बिना कोई भी देश अपने रक्षा निर्माण के स्वदेशीकरण की आशा नहीं कर सकता.

‘‘सप्लाई चेन के आभाव में सामरिक साझेदारी की नीति बेअसर है.’’ वह रक्षा जानकार बताते हैं, ‘‘यह बेकार की नीति है. भारत की कोई कंपनी सामरिक साझेदार बनने के लायक नहीं है. किसी के पास भी एयरोस्पेस व्यवसाय का अनुभव नहीं है.’’

दूसरी ओर जिस आसानी से रिलायंस ने खुद को इस जटिल उद्योग में घुसेड़ा है वह पुराने समय में उसे मिल रहे राजनीतिक संरक्षण का सबूत है. अनिल अंबानी के साथ रहे पूर्व अधिकारी ने बताया, ‘‘वह राजनीतिक खेल में शामिल थे.’’ प्रधानमंत्री कार्यलय में अक्सर होने वाली चर्चाओं का हिस्सा होने की बात उन्होंने बताई. ‘‘अंबानी अपने आस-पास के लोगों पर रौब झाड़ते हैं कि वह प्रधानमंत्री के बहुत करीब हैं.’’ अंबानी के आस-पास के लोगों को लगता है कि ‘‘कुछ भी खरीदा जा सकता है, हासिल किया जा सकता है और व्यापार बनाया जा सकता है.’’

हाल में सरकार ने विदेशी सहयोग से भारत में 110 लड़ाकू जेटों के निर्माण की बोली आरंभ की. क्योंकि लड़ाकू जेट सामरिक साझेदारी नीति में आता है इसलिए इस परियोजना में भारतीय साझेदार निश्चित रूप से निजी कंपनी ही होगी. मोदी के सबसे पुराने व्यवसायी सहयोगी अडानी समूह स्वीडेन की कंपनी साब के साथ साझेदारी में इस प्रोजेक्ट पर नजर गड़ाए है.

एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘‘ये बहुत बेवकूफाना होगा कि अडानी पैसों की खातिर इस क्षेत्र में प्रवेश करते हैं और अनुभहीन होते हुए भी विमान निर्माता बन जाते है.’’ उन्होंने कहा ‘‘विदेशी साझेदार के चयन के बाद एचएएल को अन्य निजी कंपनियों के साथ सामरिक साझेदार बनाना चाहिए. लेकिन इसमें एचएएल की भूमिका प्रमुख होनी चाहिए. उसकी अगुवाई में असेंबली होनी चाहिए और लड़ाकू विमानों की अंतिम जांच भी उसी को करनी चाहिए. दूसरी कंपनियों को सप्लाई चेन निर्माण में सहयोग करना चाहिए.’’

लेकिन वह सर्तक करते हुए बताते हैं कि राज्य के अधीन कंपनियों को स्वयं के कामकाज को सुधारने की जरूरत है. ये कंपनियां अनंतकाल तक सरकार पर निर्भर नहीं रह सकतीं. इन कंपनियों को ऐसे काम करना चाहिए कि उपकरणों के निर्यात से वह अपने कर्मियों को वेतन दे सकें न कि सरकार की जेब में वेतन आए.’’

एचएएल का भविष्य अनिश्चित है. राफेल करार से बाहर होने के बाद और संभवताः 110 लड़ाकू विमानों की आपूर्ति की दौड़ से भी बाहर होने के बाद बहुत कम आशा है कि उसे नया ऑर्डर या विशेषज्ञता मिलने वाली है. लंबे समय से प्रतीक्षित तेजस, जिसे एचएएल को बनाना है, आंशिकत रूप से सेवा में शामिल हो गया और तय समय सीमा को लगतार बढ़ाता जा रहा है. तेजस का पूर्ण उत्पादन शुरू होना अभी बाकी है. इन कमियों के बावजूद भी यही वह भारतीय निर्माण कंपनी है जिसके पास रक्षा एयरोनॉटिक्स का अर्थपूर्ण अनुभव है. जब तक की कोई विकल्प दिखाई न दे एचएएल को नजरअंदाज करना देश हित में नहीं होगा.

इसके विपरीत रिलायंस समूह का एयरोस्पेस उपक्रम अधिक व्यापार प्राप्त करने की स्थिति में है. वायुसेना के दस्तों में कमी, तेजस निर्माण की धीमी गति और बूढ़े मिग-21 विमान जो आकाश से टपकने लगे हैं, ऐसे कारण हैं कि भारतीय वायुसेना लड़ाकू विमान के लिए बेचैन है. 126 विमानों की असली कमी को पूरा करने के लिए 36 राफेल विमान, जिनका ऑर्डर दे दिया गया है, बहुत कम हैं. डसाल्ट और सरकार दोनों ने आगे के ऑर्डर का इशारा किया है. नौसेना के लिए भी राफेल लेने की बात चल रही है. नौसेना को मालवाहक लड़ाकू विमान की आवश्यकता है. तेजस के मालवाहक स्वरूप की जांच के बाद नौसेना ने इसे असक्षम करार दिया है. इस बीच यदि रिलायंस समूह अपने एयरोस्पेस हितों को बचने में नकाम रहता है तो भी, जैसा कि पूर्व वरिष्ठ अधिकरी ने बताया है, उसके पास मुकेश अंबानी के रूप में एक गुप्त समर्थक है.

यह अधिकारी बताते हैं कि बहुत सी विदेशी कंपनियों ने रिलायंस के साथ सोचा समझ कर व्यवहार किया है. व्यापार विस्तार के उद्देश्य से रिलायंस ने रूस और यूक्रेन में अपने प्रतिनिधियों को भेजा था. लेकिन इन देशों की कंपनियां ऐसी किसी भी कंपनी के साथ अपने काम के फायदे को देखेंगी जिसके पास दिखाने को कुछ नहीं है. परिणाम स्वरूप बहुत सी कंपनियों ने रिलायंस के साथ काम करने की कोई इच्छा नहीं दिखाई. वह आश्चर्य भरे स्वर में पूछते हैं, ‘‘डसाल्ट ने कर्ज में डूबी और अनुभवहीन इस कंपनी को क्यों चुना?’’ फिर कहते हैं, ‘‘यह एक ऐसी बात है जिसका पता किसी को तो लगाना ही चाहिए.’’


सागर कारवां के स्‍टाफ राइटर हैं.