कड़वी जुबान

हिंदी भाषा में नहीं मिलता सामाजिक न्याय और बराबरी का विमर्श

मेरी पैदाइश और परवरिश हिंदी में हुई. मेरे मां-बाप, भाई-बहन और सगे संबंधियों की भाषा हिंदी है. बिहार की जिस दलित बस्ती में मेरा बचपन गुजरा, उस बस्ती की भाषा भी हिंदी थी. आज भी मैं इसी भाषा में अपने पड़ोसियों से बतियाता हूं. मैंने 10 साल बिहार शिक्षा बोर्ड के हिंदी मीडियम स्कूल में पढ़ाई की. पटना से टेन प्लस टू करने के बाद मैं पत्रकारिता पढ़ने कर्नाटक के एक कॉलेज में चला आया. यहां अंग्रेजी में पढ़ाई होती थी और इसी भाषा में छात्र आपस में बातें करते थे. कैंपस के बाहर लोग कन्नड या तुलू भाषा बोलते थे. मैं दोनों में ही अच्छा नहीं था. मजबूरन, मैं मेहनत से अपनी अंग्रेजी सुधारने लगा.

28 साल की उम्र में मैंने अंग्रेजी भाषा में बी. आर. अंबेडकर की जाति का नाश किताब पढ़ी. यह अंबेडकर के काम से मेरा पहला परिचय था. इस किताब में उस जातीय अपमान को, जिसे मैंने भोगा था और जो पत्रकारिता करते हुए मैंने देश भर के दलितों को भोगते पाया था, बड़ी बेबाकी से बताया और समझाया गया था. मैंने अंबेडकर को जितना पढ़ा, अंग्रेजी में पढ़ा- अंबेडकर ने इसी भाषा में लिखा है. अंग्रेजी भाषा में ही मैंने ज्योतिराव फुले, पेरियार और मैलकम एक्स को पढ़ा. इन्हें और इनके जैसों को पढ़ने के बाद मैं जाति विरोधी विचार, प्रगतिशील राजनीति और गैरबराबरी के खिलाफ संघर्षों को जान पाया.

जब भी हिंदी को लादने को लेकर विवाद होता है तो मैं हिसाब लगाने लगता हूं कि मैंने किस भाषा में क्या सीखा. फिलहाल राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे को लेकर घमासान मचा है. इस नीति में सभी के लिए हिंदी, अंग्रेजी और एक क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा का प्रस्ताव है. गैर हिंदी राज्यों में जब इस नीति का विरोध हुआ तो सरकार ने प्रस्ताव वापस ले लिया. इस ताजी मुठभेड़ के विजेता, हिंदी की घुसपैठ को रोकने की अपनी सफलता का जश्न मना सकते हैं लेकिन मैं इस जश्न में शामिल नहीं हूं. मैं उन लोगों को लेकर चिंतित हूं जो हिंदी को जी और भोग रहे हैं.

शुरुआती समय में जो साहित्य मैंने पढ़ा उससे मेरे भीतर कोई फर्क नहीं पड़ा. हिंदी भाषा के बड़े साहित्यकार एक हद तक ऊंची जाति के मर्द होते हैं.

सवाल है कि हिंदी मेरा प्रबोधन क्यों न कर सकी? लेकिन मैं इस भाषा के बारे में जितना जानता जाता हूं मुझे उतना लगता है कि इस भाषा में प्रबोधन संभव ही नहीं था. मुझे अब लगता है कि हिंदी की मेरी परवरिश अंबेडकर तक देर से मेरे पहुंचने का कारण थी. इस भाषा के चलते इंसाफ और बराबरी के विचार को समझने में मैंने देर कर दी. ऐसा नहीं है कि इन चीजों को हिंदी में जानना नामुमकिन है. अंबेडकर के लेखन का हिंदी में अनुवाद किया गया है और हिंदी में सामाजिक न्याय की बात करने वाले विचारक और लेखक भी हैं लेकिन एक हिंदी भाषी घर में लालन-पालन और हिंदी पट्टी में मिली हिंदी शिक्षा के कारण मेरे लिए ऐसे लोगों को ढूंढ पाना असंभव जैसा था. यह कोई आकस्मिक बात नहीं है. इसके पीछे इस भाषा को बनाने, इसका विकास करने वाले और इसका प्रसार करने वाले लोगों की बड़ी छाप है.

सागर कारवां के स्‍टाफ राइटर हैं.

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