बोलने की आजादी और मीडिया का गला घोंटने के लिए कानूनी ढांचे का इस्तेमाल

16 दिसंबर 2023
इलस्ट्रेशन : सिद्धेश गौतम
इलस्ट्रेशन : सिद्धेश गौतम

10 नवंबर 2023 को सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने प्रसारण सेवा (विनियमन) विधेयक का मसौदा जारी किया. यह पांचवां कानून था जिसे नरेन्द्र मोदी सरकार ने पिछले दो सालों में तेजी से बदलते मीडिया परिदृश्य के लिए एक नियामक ढांचा बनाने के घोषित उद्देश्य के साथ पेश किया था. ये विधेयक राज्य को विरोधी स्वरों और अभिव्यक्ति की आजादी को नियंत्रण और उन पर अंकुश लगाने के लिए खतरनाक उपकरणों और प्रावधानों से लैस करते हैं.

इसकी शुरुआत सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 से हुई. इसके बाद भारतीय दूरसंचार विधेयक, 2022 का मसौदा तैयार किया गया. फिर डिजिटल निजी डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 आया. इसे अगस्त में पारित किया गया था. लगभग उसी समय, राज्यसभा ने प्रेस और आवधिक पंजीकरण विधेयक भी पारित कर दिया. अभी बहुचर्चित डिजिटल इंडिया विधेयक भी है, जो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की जगह लेगा.

इन कानूनों के जरिए एक ऑरवेलियन ढांचा तैयार होगा जो मीडिया को नियंत्रित करने, सामग्री को सेंसर करने और जरूरी आवाजों को निशाना बनाने की शक्तियां सरकार को देगा. इस ढांचे की खतरनाक सुंदरता यह है कि सरसरी तौर पर ये प्रत्येक बिल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए महत्वपूर्ण कुछ प्रमुख पहलुओं को छूते हैं लेकिन, एकसाथ वे एक विशाल जाल का निर्माण करता है जिससे बचना मुश्किल है. इस महीन जाल में ऐसे तंत्र और प्रावधान शामिल हैं जो मीडिया आउटलेट्स की निगरानी की सरकार की शक्तियों का विस्तार करते हैं. इससे सरकार को अपने लिए समस्याग्रस्त सामग्री को प्रतिबंधित करने या हटाने की ताकत मिलती है. साथ ही लोगों को प्रिंट प्रकाशन चलाने के अधिकार से वंचित किया जा सकता है. सरकार ने बिना किसी न्यायिक निरीक्षण के और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध जा कर खुद को ये व्यापक शक्तियां दे दी हैं.

मिसाल के लिए आईटी नियमों को लें, जिन्हें मार्च 2021 में अधिसूचित किया गया था. इनमें कई प्रावधान हैं जो डिजिटल समाचार मीडिया पर विवादास्पद प्रतिबंध लगाते हैं और वास्तव में केंद्र सरकार को देश में कहीं भी प्रकाशित समाचारों को ब्लॉक करने, हटाने या संशोधित करने का अधिकार देते हैं. नियम त्रि-स्तरीय शिकायत निवारण प्रणाली के निर्माण को कहता है. इसका अंतिम स्तर एक अंतर-मंत्रालय समूह है जो बिना किसी न्यायिक निरीक्षण के काम करेगा. इस साल की शुरुआत में व्यापक शक्तियों के साथ सरकार द्वारा नियुक्त तथ्य-जांच इकाई की स्थापना को अधिकृत करने के लिए इन नियमों में संशोधन किया गया था. इकाई के पास इंटरनेट सेवा प्रदाताओं सहित "मध्यस्थों" को नकली या भ्रामक समझी जाने वाली सामग्री को हटाने का निर्देश देने की शक्ति होगी.

दूरसंचार विधेयक क्षेत्र के स्वतंत्र नियामक, भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण की कीमत पर सेवा प्रदाताओं को लाइसेंस देने की सरकार की शक्तियों का विस्तार करेगा. यह विधेयक सरकार को कुछ परिस्थितियों, जैसे "किसी सार्वजनिक आपातकाल की घटना" या "सार्वजनिक सुरक्षा के हित में", व्यक्तियों या समूहों के बीच संदेशों को ब्लॉक करने, रोकने या निगरानी करने का अधिकार देता है.

अनंत नाथ कारवां के संपादक हैं.

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