भारत के अदृश्य लोग

कोरोना विमर्श से गायब भारत का घुमंतू समाज, लॉकडाउन के बाद भी जारी रहेगा आजीविका का संकट 

पुष्कर में रायका घुमंतू समुदाय की महिला अपनी बेटी के साथ. इस समाज के लोग ऊंटों के कारवां के साथ चलते हैं.
फोटा : अश्वनी शर्मा
पुष्कर में रायका घुमंतू समुदाय की महिला अपनी बेटी के साथ. इस समाज के लोग ऊंटों के कारवां के साथ चलते हैं.
फोटा : अश्वनी शर्मा

होटल में कठपुतली का खेल बंद हो जाने से राजस्थान के जैसलमेर के 37 साल के ज्ञानी भाट हताश हैं. भारत की ढेरों घुमंतू जातियों में से एक भाट समाज के ज्ञानी की 70 साल की मां शांति देवी पिछले छह महीनों से बीमार हैं. बेहतर इलाज की उम्मीद में वह अपनी मां को जैसलमेर से जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल में ले आए थे और यहीं शहर में रोजी-रोटी के लिए एक होटल में शाम को कठपुतली का खेल दिखाने लगे थे. लेकिन लॉकडाउन की वजह से खेल बंद हो गया. ज्ञानी ने मुझे बताया, “मुझे यह कठपुतली अपने पुरखों से मिली है. हम गांव-गांव जाकर कठपुतली के खेल के जरिए मौखिक इतिहास बताते हैं. हमारी कला मजमों पर टिकी है. जब गांव में हम भीड़ लगा ही नहीं पाएंगे तो हमारा घर कैसे चलेगा?” ज्ञानी ने आगे कहा, “मेरे परिवार में मेरे मां-बाप के अलावा पत्नी, दो छोटी लड़कियां और एक लड़का हैं. माता-पिता बूढ़े हैं. हमें कोई सरकारी सहायता नहीं मिलती. हम पढ़े-लिखे नहीं हैं. बस कठपुतली नचाते हैं.”

भाट ने मुझे कहा, “कला केंद्रों पर से तो हम जैसे लोक कलाकारों को पहले ही बाहर निकाल दिया गया था. अब गांवों से भी बाहर निकाल दिया.” उन्होंने बताया कि पिछले साल 2 अक्टूबर को जयपुर के जवाहर कला केंद्र में कठपुतली नचाने का ठेका निजी कंपनी को दिया गया था जिससे वह बेदखल हो गए.

यही हालत प्रदेश के अजमेर जिले के घासीराम भोपा का है जो पाबूजी की फड़ बाचते हैं. (फड़ एक कपड़ा होता है जिस पर बहुत सारी आकृतियां बनी होती हैं. भोपा उन चित्रों को देखकर अपने लोक वाद्य यंत्र रावण हत्थे की धुन पर कहानी सुनाते हैं. ये कहानियां राजपूत राजाओं के इतिहास और यहां के लोक देवी-देवताओं से जुड़ी होती हैं. घासीराम ने बताया, “हमारे टोले में 140 लोग हैं जिसमें 84 बच्चे हैं. एक भी बच्चा स्कूल नहीं जाता. हमारे पास ना बीपीएल कार्ड हैं, ना कोई जमीन का पट्टा. गांवों में घूमकर रावण हत्था बजाकर अपना घर चला रहे थे. उस पर भी सरकार ने रोक लगा दी. हम खाएंगे क्या? हमने लॉकडाउन में एक समय खाना खाकर टाइम निकाला है.”

हिंदुस्तान में 1200 से भी अधिक घुमंतू समुदाय रहते हैं. इनकी आबादी देश की आबादी का कुल 10 फीसदी है. इन समुदायों के पास खास तरह के हुनर हैं और प्रत्येक के पास विशिष्ट प्रकार का ज्ञान है. ये जीवन जीने के अलग-अलग नजरिए हैं. समाज को देखने के अलग-अलग चश्मे हैं. पारंपरिक रूप से घूमंतु समाज के लोग जड़ी-बूटियों और पर्यावरण प्रबंधन के ज्ञान, संगीत एवं मनोरंज और शिल्प कला के पेशे से जुड़े हैं. ये लोग अपने कामों का प्रदर्शन लोगों के बीच करते हैं. लॉकडाउन में सरकार ने ऐसे सभी स्थानों को बंद कर दिया जहां ज्यादा लोग एकत्र हो सकते थे. साथ ही सरकार ने सभी धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर रोक लगा दी या वहां पर लोगों की संख्या निश्चित कर दी. सरकार के इन फैसलों से लोक कलाकारों का काम रुक गया है.

अप्रैल और मई में शोध के दौरान इन समुदाय के लोगों ने मुझे बताया कि लॉकडाउन को तो वे जैसे-तैसे निकाल लेंगे लेकिन उन्हें डर है कि लॉकडाउन के बाद हालात बदतर होंगे. उनका कहना था कि कोरोनावायरस के समाप्त होने के अगले 6-7 महीने तक ना शहर में जाने की अनुमति होगी और ना ही गांवों में घुसने दिया जाएगा. यदि अनुमति मिल भी गई तो लोग उनको स्वीकार नहीं करेंगे. अगले एक साल तक उनको जिंदा रहने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ेगी.

अश्वनी शर्मा स्कॉलर एवं एक्टिविस्ट हैं और घुमंतू समुदायों के साथ काम करने वाली सामाजिक संस्था नई दिशाएं के संयोजक हैं और हाइडलबर्ग विश्वविद्यालय में पीएचडी हेतु रामचंद्र गुहा और शेखर पाठक के रेफरल स्टूडेंट हैं.

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