मंदी और लॉकडाउन से टूटे बनारस के बुनकरों पर तबलीगी प्रॉपेगैंडा का कहर, पेशा बदलने को हो रहे मजबूर

16 अप्रैल 2020
बनारस के बुनकरों की बड़ी आबादी दिहाड़ी मजदूरी करती है. नोटबंदी से पहले इन बुनकरों की दिहाड़ी 500 से 600 रुपए थी जो नोटबंदी के बाद घट कर 300 रुपए रह गई है.
धीरज सिंह / ब्लूमबर्ग / गैटी इमेजिस
बनारस के बुनकरों की बड़ी आबादी दिहाड़ी मजदूरी करती है. नोटबंदी से पहले इन बुनकरों की दिहाड़ी 500 से 600 रुपए थी जो नोटबंदी के बाद घट कर 300 रुपए रह गई है.
धीरज सिंह / ब्लूमबर्ग / गैटी इमेजिस

“8 अप्रैल को रात 10 बजे मेरी भाभी के दर्द शुरू हुआ,” अंबर मुझे उस रात के बारे में फोन पर बता रही थीं जब उनकी भाभी फौजिया शाहीन को प्रसव पीड़ा शुरू हुई थी. फौजिया और अंबर बनारस के मदनपुरा की रहने वाली हैं जो एक मुस्लिम बहुल इलाका है. पीढ़ियों से उनका परिवार बिनकारी पेशे से जुड़ा है जो बनारस को एक अलग पहचान देता है. यहां के बुनकरों की बुनी बनारसी साड़ियां पूरे भारत में मशहूर हैं.

अंबर ने बताया, “हमने यहां से लगभग 2 किलोमीटर गुरुधाम में स्थित डॉ. कविता दीक्षित के क्लीनिक में फोन पर भाभी की हालत की जानकारी दी तो वह डॉक्टर ने कहा, ‘आप उन्हें ले आइए’. वहां पहुंच कर मैंने दरवाजे की घंटी बजाई तो एक सिस्टर (नर्स) ने दरवाजा खोला और हमें अंदर आने से रोकने लगी. मैंने कहा ‘अभी-अभी कुछ समय पहले डॉक्टर से हमारी बात हुई है, आप उनसे बात कर लीजिए.’ वह बोली, ‘तुम लोग कोरोना लेकर आई हो. हमसे बहस मत करो और जाओ इनको बीएचयू (सर सुंदरलाल अस्पताल) ले जाओ.’ उन्होंने हमारी नहीं सुनी और जब हमने डॉक्टर को फोन लगाया तो उन्होंने रिसीव नहीं किया. हमने 108 नंबर (एम्बुलैंस सेवा का नंबर) पर फोन किया. जब एम्बुलैंस आई तो पुलिस ने हम चार लोगों में से सिर्फ तीन- भाभी, भैया और मुझे- उसमें जाने दिया. हमारे एक रिश्तेदार को लौटना पड़ा.”

अंबर अपने भाई के साथ भाभी फौजिया को लेकर वहां से 4 किलोमीटर दूर स्थित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सर सुंदरलाल अस्पताल आईं और इमरजेंसी वार्ड से पर्ची कटा कर डॉक्टर से मिलीं. अंबर ने बताया कि फौजिया को देखने से पहले ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर ने पूछा कि वे लोग कहां से आए हैं और मदनपुरा सुनते ही गुस्से में आ गया. उसने उन लोगों को वहां से कम से कम 6 किलोमीटर दूर कबीर नगर चौराहा में स्थित शिव प्रसाद गुप्त मंडलीय जिला अस्पताल चले जाने को कहा. अंबर ने मुझे बताया, “मेरी भाभी का दर्द बढ़ता ही जा रहा था. वहां खड़ा गार्ड हम लोगों पर चिल्लाने लगा और हमें वहां से भगाने लगा. हम दोनों भाई-बहन ने सुंदरलाल के डॉक्टरों से मिन्नतें कीं लेकिन उन्होंने हमारी बिल्कुल नहीं सुनी. हमलोग एम्बुलैंस वाले के पास गए और उससे बोले कि ‘भाई, कबीर नगर चौराहा चलो’, तो वह बोला, ‘रैफर वाला पर्चा लाओ’. हम फिर डॉक्टर के पास गए. हमनें उनसे कहा कि वह हमें रैफर का पर्चा बना दें ताकि एम्बुलैंस वाला हमें वहां छोड़ सके लेकिन डॉक्टर ने मना कर दिया. उसने कहा, ‘हमनें आपकी भाभी को देखा ही नहीं तो रेफर कैसे बना दें?’”

फौजिया ने रात 2.30 बजे खुले आसमान के नीचे बच्चे को जन्म दिया. इस बीच फौजिया चीखती-चिल्लाती रही मगर “हमारी किसी ने नहीं सुनी. गार्ड हम लोगों को बार-बार डांट कर वहां से चले जाने को कह रहे थे. मैंने ही 3 बजे किसी तरह बच्चे की नाल काटी.”

अंबर ने बताया कि फिर उनके भाई का फोन डॉक्टर मुमताज को लग गया. मुमतात ने किसी को फोन किया जिसके बाद अस्पताल की एक नर्स आ कर फौजिया को जनरल वार्ड में ले गई. अंबर ने बताया, “उसने बच्चे को साफ किया और भाभी को एक टांका भी लगाया. भाभी जब दर्द से चिल्ला रही थी, तो वह नर्स बोली, ‘कुछ काम तो है नहीं सिवाए बच्चा पैदा करने के और यहां ले आई हो कोरोना फैलाने को.’ फिर वह बोली, ‘अब ले जाइए यहां से इनको’.”

सुनील कश्यप कारवां में डाइवर्सिटी रिपोर्टिंग फेलो हैं.

Keywords: coronavirus lockdown coronavirus COVID-19 rural health Health Muslims in India
कमेंट