भारत के सौतेले बेटे

विद्रोहियों और सुरक्षाबलों की लड़ाई में क्यों मरते हैं सिर्फ हाशिए के लोग

14 फ़रवरी 2020
14 फरवरी 2019 को पुलवामा हमले के बाद मलबे की जांच करते सुरक्षा कर्मी.
युनुस खालिक/रॉयटर्स
14 फरवरी 2019 को पुलवामा हमले के बाद मलबे की जांच करते सुरक्षा कर्मी.
युनुस खालिक/रॉयटर्स

आज से ठीक एक साल पहले, एक आत्मघाती हमलावर ने पुलवामा में जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग पर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के एक काफिले में विस्फोटकों से भरी एक कार भिड़ा दी. इस हमले में 49 सुरक्षा कर्मी मारे गए. यह कश्मीर में हुआ अब तक का सबसे घातक आतंकवादी हमला था. इस घटना ने प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी भारतीय जनता पार्टी के चुनाव अभियान में जान फूंक दी. उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनाव का प्राथमिक मुद्दा बना लिया. पार्टी समर्थकों ने राष्ट्रवादी और पाकिस्तान विरोधी बयानबाजी का अपना सुर बढ़ा दिया.

उस साल मार्च में, कारवां ने "पुलवामा हमले में मारे गए जवानों की जाति भी पूछिए," शीर्षक से पत्रकार एजाज अशरफ का एक लेख प्रकाशित किया. लेख में अशरफ ने शहीद जवानों की सामाजिक पृष्ठभूमि का विश्लेषण किया था. अशरफ ने दिखाया कि सोशल मीडिया पर बढ़-चढ़कर राष्ट्रवाद का प्रचार करने वाले लोग अक्सर उच्च जाति और उच्च वर्ग के होते हैं और जिन सैनिकों ने मुख्य रूप से हमले में अपनी जान गंवाई वे दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़ा वर्ग जैसे हाशिए के समुदायों से आते हैं. उन्होंने तर्क दिया कि सामाजिक-आर्थिक रूप से हाशिए पर खड़े समुदायों को अक्सर सत्ताधारी कुलीन वर्ग की देशभक्ति की कीमत चुकानी पड़ती है.

रिपब्लिक टीवी और टाइम्स नाउ जैसे दक्षिणपंथी मीडिया संस्थानों और अन्य कई लोगों ने इस लेख की आलोचना की और लेख को "देशद्रोही", "जातिवादी" और "शहीदों का अपमान" बताया. टाइम्स नाउ पर एक घंटे के कार्यक्रम में एंकर राहुल शिवशंकर ने शिकायत की कि जवानों के बलिदान की गरिमा को छलनी किया जा रहा है. शहादतों को जाति, धर्म और पंथ का रंग दिया जा रहा है." उन्होंने कहा कि "कुछ ऐसे संस्थान हैं जहां हम अपनी पहचान से ऊपर उठते हैं क्योंकि हम भारत की सेवा में हैं ... सेना के जवान भारतीय के रूप में सेवा करते हैं और शहादत देते हैं, न कि दलित, ब्राह्मण, ओबीसी, मुस्लिम के रूप में." अर्नब गोस्वामी ने रिपब्लिक टीवी पर एक घंटे के अपने कार्यक्रम में, लेख को "राष्ट्र-विरोधी" कहा और एक बेतुका दावा किया कि पाकिस्तान की सेना भारत पर हमला करने के लिए कारवां का इस्तेमाल कर रही है. उच्च जाति के इन दो एंकरों का, जो उच्च जातियों के लोगों से भरा न्यूजरूम चलाते हैं, इस कदर लेख पर भड़कना और वह भी बिना उस मुद्दे पर बात किए जिसे लेख में उठाने की कोशिश की गई थी, शायद ही चौंकाने वाली बात थी. 

सितंबर 2007 में एक दिन स्कूल से लौटने पर मुझे पता चला कि मेरे भाई हेमंत मरावी, जो सुकमा में नगर निरीक्षक के रूप में तैनात थे, लापता हो गए हैं. वह मरावी कबीले के थे - जिसे मंडावी भी कहा जाता है. यह गोंड समाज के 750 कबीलों में से एक है और बस्तर में इसकी अच्छी खासी आबादी है.

लेकिन नाराजगी बढ़ती ही गई. सीआरपीएफ के तत्कालीन उपमहानिरीक्षक मोसेस दिनाकरण ने लेख के जवाब में ट्वीट किया, “सीआरपीएफ में हमारी पहचान एक भारतीय के रूप में होती है. न इससे ज्यादा, न कम. जाति, रंग और धर्म का यह दयनीय बंटवारा हमारे खून में नहीं है. आपको शहीदों का अपमान करने से बचना चाहिए. वे आपके नीच और निरर्थक लेखन के लिए आंकड़े नहीं हैं.” यह देखते हुए कि सशस्त्र बलों में जाति और जातीयता आधारित रेजिमेंटों का एक लंबा इतिहास रहा है, जो कुछ जातियों को गौरवान्वित करता है, दिनाकरण का उपरोक्त दावा एक विचित्र तर्क था. कारवां कार्यालय में दिन और रात स्वयंभू राष्ट्रवादियों के फोन आते रहे. राष्ट्रवादी पूछते कि पत्रिका ने इस तरह का लेख प्रकाशित करने की हिम्मत कैसे की.

आकाश पोयाम कारवां के कॉपी एडिटर हैं.

Keywords: CRPF Adivasis Pulwama armed forces Bastar
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