नागालैंड में सेना द्वारा 13 नागरिकों की हत्या के बाद राजनीतिक समझौते की मांग तेज

13 दिसंबर 2021
नागालैंड के स्वास्थ्य मंत्री एस पांगन्यू फोम ने अन्य गणमान्य व्यक्तियों के साथ 6 दिसंबर को मोन जिले में सेना के हमले के दौरान मारे गए नागरिकों के नश्वर अवशेषों पर माल्यार्पण किया. हमले के बाद सशस्त्र नागा संगठनों साथ ही छात्र संघों, शिक्षाविदों और एक मानवाधिकार संगठन आफस्पा को वापस लेने की अपनी मांग पर एकमत थे.
एएनआई/हिंदुस्तान टाइम्स
नागालैंड के स्वास्थ्य मंत्री एस पांगन्यू फोम ने अन्य गणमान्य व्यक्तियों के साथ 6 दिसंबर को मोन जिले में सेना के हमले के दौरान मारे गए नागरिकों के नश्वर अवशेषों पर माल्यार्पण किया. हमले के बाद सशस्त्र नागा संगठनों साथ ही छात्र संघों, शिक्षाविदों और एक मानवाधिकार संगठन आफस्पा को वापस लेने की अपनी मांग पर एकमत थे.
एएनआई/हिंदुस्तान टाइम्स

6 दिसंबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नागालैंड के मोन जिले में भारतीय सेना द्वारा हाल ही में 13 नागरिकों पर घात लगाकर किए गए हमले को संसद के पटल पर “गलत पहचान” का मामला बताया. शाह ने कहा कि उन्हें हुई मौतों का खेद है और यह निर्णय लिया गया है कि “सभी एजेंसियां ​​यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विद्रोहियों के खिलाफ अभियान चलाते समय भविष्य में ऐसी कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना की पुनरावृत्ति न हो.” शाह ने संसद को बताया कि राज्य ने एक विशेष जांच दल का गठन किया है जो एक महीने के भीतर अपनी जांच पूरी कर लेगा. उन्होंने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के उत्तर पूर्व डिवीजन के एक अतिरिक्त सचिव को भी राज्य में “स्थिति की समीक्षा करने” के लिए भेजा गया है.

लेकिन नगा शांति प्रक्रिया पर हस्ताक्षर करने वाले कई लोगों का कहना है कि उन्हें एसआईटी के कामकाज पर भरोसा नहीं है. ऐसा इस वजह से भी है कि एसआईटी के पास सीमित शक्तियां हैं और अर्धसैनिक बलों पर मुकदमा चलाना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है. इसके अलावा इन हत्याओं ने सरकार की मंशा पर शक पैदा किया है. यह ऐसे समय में हुई है जब नागा सशस्त्र और राजनीतिक संगठन भारत सरकार से लंबे समय से चले आ रहे भारत-नागा संघर्ष के स्थायी समाधान की उम्मीद कर रहे थे. शांति प्रक्रिया में कई हितधारकों ने कहा कि उन्होंने महसूस किया कि नरसंहार के लिए केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया अंतिम समझौते तक पहुंचने के लिए समय निकालने का एक कमजोर प्रयास है. इसके अलावा, हितधारकों के अनुसार, हत्याओं ने उन समझौतों का भी उल्लंघन किया जो उनके और सरकार के बीच पहले ही हो चुके थे. नागरिकों की हत्या की रोशनी में दो विद्रोही गुटों के आधिकारिक बयान- जिनके साथ केंद्र सरकार ने वार्ता की शर्तों पर क्रमशः 2015 और 2017 में अलग-अलग लिखित समझौतों पर हस्ताक्षर किए- ने संकेत दिया है कि राज्य में सैन्य अभियानों ने चल रही शांति प्रक्रिया में सरकार को कमजोर किया है. मैंने जिन सशस्त्र नागा संगठनों, छात्र यूनियनों, शिक्षाविदों और मानवाधिकार संगठन से बात की, वे सभी सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम, 1958 को वापस लेने की मांग पर एकमत थे. आफस्पा भारतीय सेना को केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित "अशांत क्षेत्रों" में बल प्रयोग करने के लिए असाधारण शक्तियां - यहां तक हत्या करने तक की— देने के साथ मामलों में कानून दर्ज होने से भी बचाता है.

पूर्व भारतीय वार्ताकार आरएन रवि ने फरवरी में राज्य विधानसभा को सूचित किया था कि विद्रोही समूहों के साथ राजनीतिक वार्ता समाप्त हो गई है और केवल अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने हैं. शांति प्रक्रिया पर हस्ताक्षर करने वालों में से एक ने नाम न छापने की शर्त पर मुझे बताया कि शांति वार्ता में वर्तमान सरकार के वार्ताकार एके शर्मा विभिन्न विद्रोही समूहों के बीच एक समझौता करने में सक्षम थे और उन्होंने हाल ही में समाधान के एक "कॉमन ड्राफ्ट" पर काम किया था. शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने वालों ने मुझे बताया कि इस पृष्ठभूमि में स्थानीय भावनाएं इस घटना पर सरकार की पैंतरेबाजी को भाव नहीं देंगी और लोग स्थायी शांति समझौते से कम कुछ नहीं चाहेंगे.

राज्य के पुलिस महानिदेशक टी. जॉन लोंगकुमेर और नागालैंड सरकार के एक आयुक्त रोविलातुओ मोर ने 5 दिसंबर को घटना स्थल का दौरा किया. घटना पर अपनी रिपोर्ट में, जिसकी एक प्रति कारवां के पास है , उन्होंने लिखा, "4 दिसंबर की शाम को लगभग 16:10 बजे जब 8 ग्रामीण तिरु में कोयला खदान से एक पिकअप ट्रक में घर लौट रहे थे, उन पर सुरक्षा बलों (कथित तौर पर, असम में स्थित 21 पैरा स्पेशल फोर्स) द्वारा अंधाधुंध ढंग से घात लगाकर हमला किया गया और उन्हें मार डाला गया, जाहिर तौर पर बिना किसी पहचान के प्रयास के. वे सभी निहत्थे नागरिक थे जो तिरु घाटी में कोयला खदानों में काम कर रहे थे और उनके पास कोई हथियार नहीं था.” रिपोर्ट में उल्लेख है कि मोन जिले के तिरु घाटी के ओटिंग गांव में छह नागा नागरिकों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दो गंभीर रूप से घायल हो गए और उन्हें असम के डिब्रूगढ़ मेडिकल अस्पताल में भर्ती कराया गया.

लोंगकुमेर और मोर ने आगे लिखा, "गोलीबारी की आवाज सुनकर ग्रामीण इस आशंका के साथ मौके पर आ गए कि लोग काम से घर नहीं लौटे हैं. मौके पर पहुंचने पर उन्होंने पिकअप ट्रक और विशेष टास्क फोर्स के जवानों को छह ग्रामीणों के शवों को लपेटकर दूसरे पिकअप ट्रक (टाटा मोबाइल) में लोड करके छिपाने की कोशिश करते हुए पाया. जाहिर तौर पर इस इरादे से कि शवों को बेस कैंप ले जाया जाएगा. टाटा मोबाइल में तिरपाल के नीचे शव पाए जाने पर ग्रामीणों और सुरक्षाकर्मियों के बीच हिंसक झड़प हो गई. इससे आक्रोशित ग्रामीणों ने विशेष बल के जवानों के तीन वाहनों को जला दिया. हाथापाई में सुरक्षाकर्मियों ने फिर से ग्रामीणों पर गोलियां चला दीं, जिसमें सात और ग्रामीणों और प्रत्यक्षदर्शियों की मौत हो गई.

सागर कारवां के स्टाफ राइटर हैं.

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