आघात और आक्रोश में तपता कश्मीर

अनुच्छेद 370 को खत्म कर दिए जाने का विरोध कर रहीं कश्मीरी महिलाएं. दानिश सिद्दीकी / रॉयटर्स

रास्ता रोके कांटेदार तारों वाले बैरिकेडों और भारी भरकम हथियारों से लैस सुरक्षा बलों के दिखाई पड़ने से बहुत पहले, आकाश में ही घेराबंदी के अहसास ने दबोच लिया था. हवाई जहाज के श्रीनगर की धरती को छूने से पंद्रह मिनट पहले, विमान की खिड़कियां बंद कर लेने की घोषणा हुई. जहाज के कर्मचारी घूम-घूम कर यह सुनिश्चित कर रहे थे कि सारी खि​ड़कियां बन्द है. एक फ्लाइट अटेंडेंट ने नागरिक उड्डयन महानिदेशालय का हवाला देकर कहा, "डीजीसीए का आदेश है, सर." पहले हल्का अविश्वास हुआ, फिर इसका मजाक उड़ाया गया. मेरे बगल में एक कश्मीरी यात्री ने हंसते हुए कहा, "यह नजरबंदी है." दूसरों ने इस शब्द को दोहराया जैसे कि वह इसे अपनी शब्दावली में शामिल कर लेना चाहते हों. उनमें से कुछ, उत्सुक यात्रियों ने बाहर झांकने के लिए खिड़कियां आधी खोल दीं लेकिन जल्द ही उन्हें बंद कर लिया. सुबह के 7.30 बजे थे और मैंने भूरे मानसून की धुंध में लिपटी सब्ज हरी घाटी की झलक देखी. एक व्यक्ति ने कहा, "शायद वे नहीं चाहते कि हम यह देखें कि घाटी में वे कितने (सुरक्षा) बलों को ले आए हैं." वह यात्री अगले दिन, 12 अगस्त को ईद के लिए घर लौट रहा था.

कुछ ने इसे लेकर हंसने की कोशिश की जबकि बाकी चिंतित दिखे. जल्द ही, उन्हें यह मालूम करना था कि जहां उन्हें जाना है वहां तक कैसे पहुंचें. जैसे ही जहाज रनवे पर उतरा, बहुत से यात्रियों ने अपने सेलफोन को स्विच ऑन किया और उसे घूरते रहे, शायद आदतन या शायद किसी उम्मीद से. जल्द ही वे हकीकत से रूबरू हो गए. 5 अगस्त को जब केन्द्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 को प्रभावी ढंग से निरस्त कर दिया था, उसके बाद से घाटी में सख्त तालाबंदी की जा रही है और संचार सेवा को बंद कर दिया गया है. बैगेज बेल्ट के बगल में स्थित पर्यटन विभाग के काउंटर पर हरे रंग की पट्टी पर एक संदेश उभरा हुआ था: "धरती के स्वर्ग में आपका स्वागत है."

मैं दिल्ली के कुछ अन्य पत्रकारों के साथ कश्मीर के डिवीजनल कमिश्नर के कार्यालय में "कर्फ्यू पास" लेने गया. यह पास शहर के कुछ हिस्सों में आने-जाने के लिए मददगार होता है. तकनीकी रूप से, यह केवल "144 सीआरपीसी प्रतिबंधों के तहत आने-जाने के लिए मान्य" है, और कर्फ्यू के दौरान इसका कोई उपयोग नहीं है. एक हल और तीन खड़ी पट्टियों वाला लाल कश्मीरी झंडा, डिवीजनल कमिश्नर कार्यालय की इमारत पर भारत के तिरंगे झंडे के बगल में लहरा रहा था. कार्यालय परिसर घाटी से बाहर अपने परिवार के सदस्यों को कॉल करने की प्रतीक्षा कर रहे गुस्साए लोगों से भरा था. बहुत से लोग जो कॉल नहीं कर सके थे वे कश्मीरी में चिल्ला रहे थे और अपना दुख-क्षोभ जाहिर कर रहे थे और संकट से उपजे भाईचारे के चलते किसी भी अजनबी से जिसने उनकी बात सुनी, शिकायत कर रहे थे.

दोपहर से पहले, अब क्रम संख्या 32 की बारी थी, और 420 लोग अभी भी इंतजार में खड़े थे. हालांकि, दिल्ली के टीवी पत्रकार टेलीफोन सुविधा के बारे में बड़ा-चढ़ा कर दिखा रहे हैं. एक युवक ने एनडीटीवी के नजीर मसूदी पर आरोप लगाया कि इतना दमन होने पर भी वह स्थिति सामान्य होने की रिपोर्ट कर रहे हैं. अन्य लोग उसके साथ शामिल हो गए और मसूद को घेर लिया और तब तक उसके साथ बहस की जब तक कि अन्य पत्रकार इस तनाव को कम करने के लिए नहीं आ गए.

आरिफ नाम के 25 वर्षीय नौजवान छात्र ने बाद में मुझे बताया कि वह अपने भाई से संपर्क नहीं कर पाने से इतना नाराज नहीं है जितना इस बात से कि भारतीय मीडिया स्थिति के सामान्य होने की रिपोर्ट कर रहा है. जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्रियों, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती का हवाला देते हुए, इन दोनों को गिरफ्तार कर लिए गया है, आरिफ ने कहा, "अगर भारत अनुच्छेद 370 को खत्म करने के लिए इतना अडिग था, तो वह कम से कम उमर और महबूबा जैसे नेताओं को विश्वास में ले सकता था. इन्हीं लोगों ने तो घाटी में भारत के विचार को स्वीकार्य बनाया और इसके लिए संघर्ष किया... आज, यह स्पष्ट है कि कश्मीर का विचार भारत के साथ पूरी तरह से असुरक्षित है."

उसने कहा, "भारत को ऐसा लगता है कि हमारे पास शक्ति और बहुमत है और हम कुछ भी कर सकते हैं." “लब्बोलुआब यह है कि वे इसे स्वीकार नहीं कर सकते और न ही पचा सकते हैं कि भारत में कोई मुस्लिम बहुल राज्य है. इसलिए, वे राज्य की जनसांख्यिकी को बदलना चाहते हैं.” आरिफ ने कहा कि यह 1990 के दशक की तरह राज्य में उग्रवाद को फिर से पैदा कर सकता है. "जब सद्र-ए-रियासत को हटा दिया गया था, तो कश्मीर को विरोध करना चाहिए था और इसके खिलाफ लड़ाई लड़नी चाहिए थी." जम्मू और कश्मीर का संविधान 1965 तक एक अलग प्रधानमंत्री और सद्र-ए-रियासत-या राष्ट्रपति होने का प्रावधान था. इसे संवैधानिक संशोधन द्वारा क्रमशः एक मुख्यमंत्री और राज्यपाल कर दिया गया. उसने कहा, “हम उस पीढ़ी की आलोचना करते हैं कि उन्होंने ऐसा नहीं किया. इसलिए, इस बार लड़ाई होगी.''

ईद से पहले अभूतपूर्व प्रतिबंधों पर व्यापक आक्रोश था और कई लोग मानते थे कि यह एक हिंदुत्व परियोजना के तहत जानबूझकर किया गया था, ताकि उनके धार्मिक कर्तव्यों का पालन करने में बाधा डाली जा सके. जम्मू राजमार्ग के साथ अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में, बकरवालों-एक घुमंतू-चरवाहा समुदाय-को अपने मवेशियों के साथ आने-जाने की अनुमति दी गई थी, लेकिन प्रतिबंधों के कारण खरीदारों को उन तक पहुंचने और ईद के लिए कुर्बानी देने वाले पशु खरीदने में मुश्किल हुई. यहां तक कि उन पत्रकारों को भी जिनके पास कर्फ्यू-पास था, आना-जाना सुरक्षा बलों की कृपा पर निर्भर था और बैरीकेड-दर-बैरीकेड उनकी प्रतिक्रिया भिन्न थी. जिन्होंने इस मुश्किल हालात का बहादुरी से सामना करना तय किया, वे लोग कभी भाग्यशाली रहे और कभी उनकी पिटाई हुई. पैसे इकट्ठा करना और रिश्तेदारों के बीच मांस बांटने की परंपरा नहीं हो सकी क्योंकि रिश्तेदार शहर भर में फैले हुए थे. यहां तक कि जो लोग कुर्बानी कर सके वे भी अपने इलाके से दूर रहने वाले परिजनों और दोस्तों को मांस नहीं बांट सके.

शहर को छोटे प्रबंधनीय ब्लॉकों में बदल दिया गया था, जो चारों तरफ से बंद था. विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने मुझे बताया, "हमने कभी ऐसा कुछ नहीं देखा." “यह स्मार्ट और परिष्कृत रहा है. उन्होंने श्रीनगर के निवासियों के लिए एक रोडमैप को फिर से तैयार किया है, जो किसी मनोवैज्ञानिक कवायद की तरह लगता है.” सुरक्षा सलाहकार विश्लेषक समुदाय की एक अनौपचारिक जानकारी के अनुसार यह रणनीति अमेरिकी सलाहकार या इजराइली सेना के ठेकेदारों द्वारा तैयार की गई थी. राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन के अधिकारियों की एक विशाल टीम, जो श्रीनगर के गुप्कर रोड और चर्च लेन में तैनात थी, ने ड्रोन सहित बड़े पैमाने पर निगरानी तंत्र स्थापित किया था.

सभी को उम्मीद थी कि बड़े पैमाने पर हिंसा होगी लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हुआ है. हालांकि, घेराबंदी के तहत हिंसा का मनोवैज्ञानिक आघात हर जगह स्पष्ट है. चलने-फिरने पर प्रतिबंध के साथ, संचार नेटवर्क की बंदी और सूचनाओं को ब्लैकआउट करने से उपजे निर्वात को भरने के लिए अफवाहें शुरू हो गई थीं. मैंने सुना है कि एक लड़के के पैलेट गन का शिकार होने के बाद जम्मू और कश्मीर पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के बीच नवा बाजार इलाके में झड़पें हुई थीं. जम्मू और कश्मीर पुलिस अपने ​हथियार छीन लिए जाने से नाराज हैं. लेकिन इस घटना की पुष्टि करने का कोई तरीका नहीं था.

इस तरह की व्यवस्था के प्रति जिन पत्रकारों का रवैया दोस्ताना था उन्हें हेलीकॉप्टरों में इधर-उधर घुमाया गया. अन्य लोगों ने समूहों में घूमना शुरू कर दिया क्योंकि सुरक्षा बलों के साथ बातचीत करना अधिक सुरक्षित और आसान लगा. मैंने, दिल्ली के तीन पत्रकारों के साथ, सोरा के शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज अस्पताल तक कैब में जाने का फैसला किया, ताकि यह देखा जा सके कि विरोध प्रदर्शन के दौरान कोई हताहत हुआ था या नहीं. यह एकमात्र क्षेत्र है जहां से मीडिया विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्ट करने में सक्षम हुआ था.

12 अगस्त 2019 को श्रीनगर की एक मस्जिद में ईद उल अजहा की नमाज के बाद कश्मीरियों ने विरोध प्रदर्शन किया. दानिश सिद्दीकी / रॉयटर्स

बीबीसी ने बताया कि भारत सरकार द्वारा कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त करने के विरोध में 9 अगस्त को, सौरा में हजारों लोग सड़कों पर उतरे. जबकि सरकार ने पहले कहा था कि कोई विरोध प्रदर्शन नहीं हुआ है और सब कुछ शांतिपूर्ण है, गृह मंत्रालय ने बाद में 13 अगस्त को स्वीकार किया कि उस दिन "उपद्रवियों" द्वारा ''सुरक्षा बलों पर अकारण पत्थरबाजी'' किए जाने के बाद इलाके में "व्यापक अशांति" थी.

कश्मीर में हिंसा इतनी सामान्य हो गई है कि बड़े पैमाने पर हिंसा न होने और हिंसा की जानकारी की कमी- सरकार को बेशर्मी से यह घोषणा करने की छूट दे देती है कि सब कुछ शांत है. वास्तव में, सरकार और उसकी कई एजेंसियां ऐसी कहानियों के नियंत्रण में रखने के लिए बहुत हद तक आगे बढ़ चुकी हैं. स्थानीय पत्रकार अस्पतालों में पहुंचेंगे और घायलों के संबंध में जानकारी जुटा लेंगे इसलिए अस्पतालों पर जल्द से जल्द मरीजों को छुट्टी कर देने का दबाव बनाया गया है.

जम्मू और कश्मीर सरकार में योजना, विकास और निगरानी के प्रमुख सचिव, रोहित कंसल एक होटल में स्थापित किए गए मीडिया सेंटर में हर शाम प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं लेकिन केवल इसलिए कि हर तरह के सवालों को दरकिनार कर प्रचलित शांति की कथा का प्रचार किया जा सके. हालांकि, 14 अगस्त को जब उन्होंने कहा कि स्थिति में "सुधार" हुआ है तो एक वरिष्ठ कश्मीरी पत्रकार ने तुरंत इसे पकड़ लिया. पत्रकार ने कंसल से इस “सुधार” को परिभाषित करने के लिए कहा क्योंकि पिछली सभी कॉन्फ्रेंसों में वह दावा कर रहे थे कि सब कुछ सामान्य है. कंसल थोड़ा झुंझलाहट में दिखे, लेकिन उन्होंने कहा कि उन्हें शब्दों की बाजीगरी नहीं करनी चाहिए. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्रियों के ठिकाने के बारे में किसी भी सवाल का जवाब इस तरह दिया जाता है कि किसी भी व्यक्ति के बारे में कोई ब्यौरा नहीं दिया जाएगा.

हमने श्रीनगर शहर के मुख्य संवेदनशील स्थानों जैसे कि खानयार और रैनावारी से गुजरते हुए सड़कों को खाली देखा. कभी-कभी, हर सौ मीटर या उससे कम दूरी पर, हमें गलियां बदलनी पड़ती थीं और मूल सड़क पर वापस आना पड़ता था और अगर आगे झड़पें हो रही होती थीं, तो हमें आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी जाती थी और दूर ले जाया जाता था. गैर-कश्मीरियों को यात्रा करते देख सुरक्षा बल के जवान काफी हैरान दिखे. वे पूछते थे कि हम कहां और क्यों जा रहे हैं. जब हमने दिल्ली के मीडिया कर्मी के रूप में अपना परिचय दिया, तो वे हमें जाने देते. उनमें से एक ने आजतक की एक पत्रकार का जिक्र करते हुए हमसे पूछा, "श्वेता सिंह अंदर है क्या?” अगली बार उन्हें भेजने के लिए हमसे कहा. 14 किलोमीटर की दूरी तय करने में हमें एक घंटे से अधिक का समय लगा.

एसकेआईएमएस में, मरीज धीमी चाल में प्रवेश करते हैं. कभी-कभार किसी मरीज के साथ एक अजीब सी एम्बुलेंस दिखाई देती. अंदर, हमने यह पता लगाने की कोशिश की कि क्या घेराबंदी के बाद से कोई हताहत हुआ है. हमने किसी के सेल फोन पर विरोध प्रदर्शन के दौरान गोलियों से घायल हुए युवकों की तस्वीरें देखीं. यहां तक कि जब हम जानकारी इकट्ठा करने की कोशिश कर रहे थे, तो आपराधिक जांच विभाग के सादे कपड़े वाले पुलिस अधिकारी, जो अस्पताल में तैनात थे, को इसकी भनक लग गई और वह हमारी तलाश में आ गए.

इस बीच, एक जवान ने हमसे कुछ महत्वपूर्ण जानकारी के लिए अपने साथ आने को कहा. अस्पताल के एक कर्मचारी ने हमें चेतावनी दी कि वह एक पुलिस मुखबिर हो सकता है लेकिन हमने उसके साथ चलने का फैसला किया. वह हमें अस्पताल के पीछे वाले हिस्से से सौरा एंकर इलाके की तंग गलियों में ले गया, जहां बीबीसी द्वारा रिपोर्ट किया गया विरोध प्रदर्शन हुआ था. पंद्रह मिनट चलने के बाद, अचानक हम लोकप्रिय जेनाब साहब मस्जिद के सामने थे. यह एक विशाल मस्जिद है जिसमें खूबसूरत सफेद दीवारें, मीनारें और हरे रंग के गुंबद हैं. सामने का आंगन किसी फुटबॉल के मैदान के आकार का है. वहां लगभग तीन सौ से चार सौ लोग-पुरुष, महिलाएं और बच्चे अलग-अलग कोनों में बैठे गहन विचार-विमर्श में लगे थे. वे नारे लगा रहे थे, और उनकी आवाज बुलंद हो गई क्योंकि उन्होंने हम पत्रकारों को देख लिया था.

सौरा एंचर में जेनब साहब मस्जिद के सामने लगभग तीन सौ से चार सौ लोग - पुरुष, महिलाएं और बच्चे - अलग-अलग कोनों में बैठे चर्चा कर रहे थे. कारवां के लिए प्रवीण दोंती

हमें पुरुषों के समूहों ने घेर लिया. आवाजों की ऐसी कशमकश थी कि कुछ मिनटों तक तो मैं उन्हें समझा ही नहीं पाया. पहले आधे घंटे तक मैंने उन्हें भारतीय मीडिया को गाली देते सुना. मेरे पास सवाल पूछने का कोई मौका नहीं था, और हर किसी को सुनते हुए हर तरफ घूमता रहा. नए लोग समूह में शामिल होंते और हर कोई जोर-जोर से भावुक बातें बताने लगता, जिसका अंत, जिसे वे गलत समझते उसके बारे में, दस-पंद्रह मिनट बात करने से होता. उन सभी के पास कमोबेश यही बातें थीं: “भारतीय मीडिया अपराधी है. वह असली आतंकवादी हैं. वे हमें आतंकवादी बनने के लिए मजबूर कर रहे हैं”, “भारत के साथ यह संबंध अनुच्छेद 370 पर कायम किया गया था. अब जब यह खत्म हो गया है, तो हम आजाद हैं. अब, यह एक खुला खेल है”, “पाकिस्तान और हिंदुत्व के बारे में भूल जाओ, मानवता कहां है? हमें अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन करने की अनुमति नहीं दी जा रही है”, “कश्मीर फिलिस्तीन बन जाएगा. हम सब कुछ खो देंगे”, “कश्मीर की आबादी पहले से ही अधिक है और भूमि कम है. अगर बाहरी लोग अंदर आ गए तो क्या होगा. हमारी आने वाली पीढ़ियों का क्या होगा?”, "हमारे पास बंदूक उठने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा है."

जैसे ही एक युवक ने बंदूकों का जिक्र किया, सभी अन्य चिल्लाने लगे, "एक ही रास्ता, बंदूक का रास्ता, बंदूक का रास्ता." एक घंटे के बाद, जब हम जाने के लिए तैयार थे, उनमें से कुछ ने हमें अगले दिन सुबह ईद की नमाज के दौरान वापस आने के लिए कहा. एक आदमी ने कहा, ''हम नमाज के बाद जल्द ही पचास-साठ हजार लोगों का जुलूस निकालेंगे.'' जब हम बाहर निकले, तो महिलाओं और बच्चों और कुछ पुरुषों की एक छोटी रैली “अजादी” के नारे लगा रही थी.

जैसे ही मैंने रैली के साथ और एसकेआईएमएस की ओर चलना शुरू किया, एक युवा मेरे पास आया और एक पत्रकार के रूप में अपना परिचय दिया. उसने कहा कि "अब, हम हुर्रियत या किसी और के लिए इंतजार नहीं करेंगे." “हम खुद पहल करेंगे. कुछ स्थानों पर, मोहल्ला समिति बनाने और मृत्यु तक लड़ने का निर्णय लिया गया है. नहीं तो यह कश्मीर का अंत होगा. हमारा लक्ष्य जनमत संग्रह होगा.” उसके अनुसार, इस नए घटनाक्रम के सामने पहले के विभाजन गायब हो गए हैं. “अमीर और गरीब के बीच की रेखाएं अब मौजूद नहीं हैं. इससे पहले, गरीब इलाकों के लोगों ने भारत के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों और पथराव में अधिक भाग लिया था. लेकिन अब पुराना और अभिजात वर्ग भी रैलियां निकाल रहा है. सुन्नी, शिया, वहाबी, जमात, नेकां, पीडीपी के बीच के मतभेद अब अप्रासंगिक हो गए हैं और सभी खुद को एक मान रहे हैं,” उसने कहा.

युवा पत्रकार के अनुसार, विकास का लॉलीपॉप कश्मीरियों को फुसलाने वाला नहीं है. “वे कहते हैं कि अब बाहरी लोग आएंगे और निवेश करेंगे और रोजगार और विकास करेंगे. उसके लिए पहले से ही प्रावधान है. इतने सारे प्रतिष्ठानों को देखें जैसे टायंडेल बिस्को स्कूल और श्रीनगर में ताज विवांता. ये सभी लंबी अवधि के लिए पट्टे पर दिए गए हैं, 99 साल के लिए, 100 रुपए प्रति वर्ष या ऐसी ही कुछ लीज दरों पर,” उसने बताया. “वे बहुत पैसा कमाते हैं. कश्मीरियों को इससे क्या मिलता है? बहुत ज्यादा नहीं. सरकार निश्चित रूप से उन लोगों को अनुमति देती है जो राज्य में आना और निवेश करना चाहते हैं. इसके लिए धारा 370 को हटाने की क्या जरूरत?” कुछ अन्य लोगों ने बताया कि भारतीय सेना और भारतीय रेलवे ने राज्य सरकार के माध्यम से राज्य में स्थाई रूप से बहुत सारी जमीनें खरीदी हैं. "हमारी लड़ाई जमीन के बारे में होगी," युवा पत्रकार ने मुझे बताया. “कश्मीरियों को उनकी ही जमीन से निकाला जाएगा या उन्हें हाशिए पर धकेल दिया जाएगा. वे हमसे हमारे अधिकारों और राजनीतिक आकांक्षाओं के बारे में चुपचाप जीने की उम्मीद करेंगे.”

कश्मीर में, इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष के साथ तुलना रोजमर्रा की बात का हिस्सा बन गई है. इजरायल के प्रति बीजेपी और आरएसएस के अनुराग को देखते हुए, ये तुलनाएं गलत नहीं जान पड़ती. 2003 में रामल्ला के एक प्रेषण में उपन्यासकार जॉन बर्जर ने जो वर्णन किया है, घेराबंदी की मौजूदा स्थिति और लोगों की प्रतिक्रिया को देखते हुए वह बहुत करीब की जान पड़ती है:

इजरायल सरकार का दावा है कि आतंकवाद से निपटने के लिए वह ये सब उपाय करने के लिए बाध्य है. यह दावा दिखावटी है. इस कब्जेदारी का असली उद्देश्य स्वदेशी आबादी की अस्थाई और स्थानिक निरंतरता की भावना को नष्ट करना है ताकि वे या तो छोड़ कर चले जाएं या अप्रवासी नौकर बन जाएं. यहां मृत व्यक्ति प्रतिरोध में जीवितों की मदद करते हैं. यहां पुरुष और महिलाएं शहीद होने का निर्णय लेते हैं. कब्जेदारी आतंकवाद को प्रेरित करती है जिससे लड़ने की उनकी मुराद है.

शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस सेंटर और सेंटर लेक व्यू होटल डल झील के किनारे स्थित है. सभी महत्वपूर्ण सरकारी कार्य और सम्मेलन वहां हुआ करते थे. इसे 5 अगस्त से जेल में बदल दिया गया है. केन्द्र का निदेशक अब प्रभावी रूप से जेलर है. हम वहां राजनीतिक कैदियों की स्थिति की जांच करने गए और एक परिवार मिला- दो महिलाएं और दो लड़के-जो गेट के बाहर इंतजार कर रहे थे. वे पहले किसी भी जानकारी का खुलासा करने के लिए अनिच्छुक थे. उनमें से एक शेख इश्फाक जब्बार की पत्नी थी, जो गांदरबल निर्वाचन क्षेत्र से नेशनल कॉन्फ्रेंस के पूर्व विधानसभा सदस्य थे, और दूसरी उनकी बहन शाहीन जब्बार थी. लड़के उनके बेटे थे. जब्बार को पहले 5 अगस्त को नजरबंद कर दिया गया और फिर दो दिन बाद एसकेआईसीसी में ले जाया गया.

जब्बार के ससुर, सैयद अखून, जो पूर्व विधायक और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अंतरिम अध्यक्ष, को भी गिरफ्तार किया गया और एसकेआईसीसी में लाया गया. स्थानीय स्टेशन हाउस अधिकारी ने उनके परिवार को बताया कि वह कहां थे और उनका परिवार ईद से एक दिन पहले वहां पहुंचा. "किस बुनियाद पे गिरफ्तार किया पता नहीं" शाहीन जब्बार ने हमें बताया, और कहा, "मेरे पिता को 90 के दशक में आतंकवादियों ने मार डाला था क्योंकि वह एक भारतीय थे." यह सुनने के बाद कि जम्मू और कश्मीर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम, 1978 को कड़ा बना दिया जाएगा, परिवार बहुत चिंतित है. यह कानून किसी व्यक्ति को बिना किसी आरोप या मुकदमे के दो साल के लिए निवारक हिरासत में लेने की अनुमति देता है.

दक्षिण कश्मीर के कुलगाम से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के एकमात्र विधायक मोहम्मद यूसुफ तारिगामी को नजरबंद कर दिया गया है. जम्मू-कश्मीर की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के एक युवा नेता वाहिद उर रहमान पारा को भी कथित तौर पर पीएसए के तहत हिरासत में लिया गया है. दोनों को ही घाटी में सुरक्षा बलों का करीबी माना जाता है. राजनीति में आने से पहले जब्बार खुद पुलिस के सब-इंस्पेक्टर थे. उनके दोस्त और पड़ोसी ने कहा, “पहले वे लोग पाकिस्तान समर्थक लोगों को गिरफ्तार करते थे, अब भारत समर्थक लोगों को भी ले जा रहे हैं. कश्मीर में दो लोग ऐसे हैं जिन्होंने कभी झूठ नहीं बोला. गिलानी, जो एक शुद्ध पाकिस्तानी हैं, और फारूक अब्दुल्ला, जो शुद्ध भारतीय हैं.” सैयद अली शाह गिलानी एक शक्तिशाली अलगाववादी नेता हैं और फारूक अब्दुल्ला नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष हैं. "लेकिन आज, फारूक भी रो रहे हैं क्योंकि वे घर में नजरबंद है." मित्र के अनुसार, एसकेआईसीसी के अंदर 200 से अधिक राजनीतिक नेता और कार्यकर्ता जब्बार के साथ हैं. उन्होंने गांदरबल के चार अन्य राजनेताओं को सूचीबद्ध किया जिन्हें गिरफ्तार किया गया है.

गेट पर दो घंटे इंतजार करने के बाद, सड़क के किनारे, जब्बार की पत्नी और बेटों को उनसे मिलने के लिए अंदर जाने की अनुमति दी गई. वह चालीस मिनट के बाद वापस आईं और कहा कि उन्हें कॉन्फ्रेंस हॉल में दो मिनट के लिए उन्हें दूर से देखने की अनुमति दी गई थी. “कल ईद है और हम उनसे मिलने आए. लेकिन इसे शायद ही मिलना कहें. हमें कम से कम उन्हें ईद का खाना देने की अनुमति दी जानी चाहिए. वह आतंकवादी नहीं हैं,” उनकी पत्नी ने हमें बताया. उन्होंने कहा, "हिंदुस्तानी होने की वजह से उन्हें सजा मिल रही है." उसने कहा कि अंदर इतनी सुरक्षा थी कि वह केन्द्रीय कारावास की तरह दिखती थी. उन्हें अपने पिता से मिलने की अनुमति नहीं थी, जो वहां नजरबंद है. जब्बार के दोस्त एक सरकारी कर्मचारी ने कहा, "आज तक, केवल कुछ ही लोग भारत के खिलाफ लड़ रहे थे. लेकिन अब पूरी कौम लड़ेगी. ”

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10 अगस्त 2019 को श्रीनगर में घेराबंदी के दौरान सुरक्षाकर्मी गश्त करते हुए. तौसीफ मुस्तफा / एएफपी / गेैटी इमेजिस

कई लोगों के अनुसार ढाई दिनों तक मनाई जाने वाली ईद को सुगम बनाने के लिए, श्रीनगर में वातावरण अपेक्षाकृत शांत रहा. उच्च-स्तरीय सुरक्षा एक अन्य कारण था. ईद की दोपहर को नमाज और दिन के खाने के बाद विरोध प्रदर्शन की संभावना थी. लेकिन विरोध उग्र या व्यापक नहीं थे जैसा कि उम्मीद थी. एक आधिकारिक अनुमान के मुताबिक, श्रीनगर में 22 स्थानों पर ईद की नमाज नहीं पढ़ी गई, वास्तविक संख्या बहुत अधिक हो सकती है. मौलवियों को पहले से चेतावनी दी गई थी कि वे अपने ईद के खुतबे में राजनीतिक स्थिति के बारे में बात न करें. एक मौलवी के अनुसार पुलिस ने उन्हें चेतावनी दी थी "यदि आप राजनीतिक खुतबे देते हैं, तो पुलिस स्टेशन में आकर और स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर दें."

पहले दिन, 12 अगस्त को मैं लाल चौक गया. इसे बंद कर दिया गया था. आवारा कुत्ते भी नहीं दिखाई दे रहे थे. वहां सुरक्षा-बलों की कुछ बख्तरबंद गाड़ियां खड़ी थी. पत्रकारों के एक छोटे समूह ने, जिसमें मैं भी था, पैदल ही सौरा जाने का फैसला किया, यह देखने के लिए कि क्या कोई विरोध रैली होगी, जैसा कि वहां के लोगों ने हमें बताया था. रास्ते में, मैंने देखा कि कुछ लोग ईद के कपड़े पहने अपनी ही कॉलोनियों में घूम रहे हैं. खानयार में, जहां से शहर का इलाका शुरू होता है, जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के सलाहकार के. विजय कुमार के साथ एक काफिला हमारे पास पहुंचा, उन्होंने जमीनी हालात का जायजा लिया. इसके तुरंत बाद, हम एक झड़प में लगभग फंस गए.

सुरक्षाकर्मी सड़क पर आने वाले ​हर किसी को वापस चले जाने के लिए सीटी बजा रहे थे. नए कपड़े पहने सड़क के किनारे पचास मीटर आगे खड़े युवकों ने हाथ से इशारा किया और जाने से मना कर दिया. सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें गाली देना शुरू कर दिया, अपनी गुलेल का इस्तेमाल किया और उन पर पत्थर मारे. जवान भाग गए और सैनिक अपने स्थानों पर लौट आए. हम तंग गलियों में इंतजार कर रहे थे जब तक कि हंगामा खत्म नहीं हो गया. उसके बाद हमने मुख्य सड़क का उपयोग करने के बजाय संकरी गलियों से जाने का फैसला किया.

मैंने कश्मीरियों के ऐसे कई लोगों के उदाहरण सुने, जो भारत के प्रति वफादार थे लेकिन अब भारत के खिलाफ हो रहे हैं. एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे बताया, "हिंसा की वैधता अब अपने चरम पर है. नागरिक और सेना के बीच की रेखाएं धुंधली हो रही हैं. हर भारतीय यहां एक वैध लक्ष्य बन जाता है." आत्मघाती हमलावरों को अब और अधिक स्वीकृति कैसे मिल सकती है, मध्य और उच्च-मध्यम वर्ग के घरों में भी अब इसकी चर्चा है. श्रीनगर में स्थित एक व्यवसायी ने मुझे अपने परिवार के सदस्य के बारे में बताया, जो पाकिस्तान के निर्माण और दो-राष्ट्र सिद्धांत के विचार के विरोधी थे लेकिन अब इसका समर्थन कर रहे हैं.

कातिदरवाजा को पार करने के बाद, लोगों के एक समूह ने भारतीय मीडिया को गाली देना शुरू कर दिया. एक पत्रकार किसी विदेशी प्रकाशन के लिए काम कर रहा था, इसलिए वे शांत हो गए. उनमें से एक ने कहा, "इधर लुल्ल है" (यहां शांति है.) "तूफान आने से पहले की शांति." जब हम वहां से जाने लगे, दूसरे ने कहा, "मोदी को मेरा नमस्कार बोलना." और सभी लोग हंसने लगे. एक वृद्ध व्यक्ति, जो कोलकाता में एक व्यापारी हैं, ने मेरे साथ पैदल चलते हुए कहा, "यह शेख अब्दुल्ला की गलती है." अब्दुल्ला नेशनल कॉन्फ्रेंस के संस्थापक और जम्मू-कश्मीर के पूर्व प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने 1974 में इंदिरा गांधी के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए थे जिसे अलगाववादी एक संधिपत्र मानते थे. उस व्यापारी ने कहा, "उन्होंने भारत पर भरोसा किया और आज जो कुछ भी हो रहा है उसके लिए दरवाजे खोले." वहां बहुत से लोग शेख अब्दुल्ला को असली गुनाहगार बता रहे थे.

अलीपोरा नामक स्थान पर, जब हम आराम करने के लिए बैठे तो लोगों का एक समूह हमसे बात करने आया. 20 साल के एक युवा ने मुझसे कहा, “पहले, भारतीय हमारे मेहमान थे. हम उनका बहुत सत्कार करते थे. अब ऐसा नहीं होगा. मिलिटेंसी 10 प्रतिशत से बढ़कर 60-70 प्रतिशत हो जाएगी. बीजेपी ने गुंडागर्दी शुरू किया है.” उसने कहा, “उन्हें पासपोर्ट के साथ आना होगा. नहीं तो हम उन्हें जला देंगे.” एक बूढ़े व्यक्ति ने कहा,“ इन्होंने शुरू किया है, लेकिन इसको हम खत्म करेंगे.” उन्होंने कहा कि उनके दो बेटे खुद को बलिदान करने के लिए तैयार हैं. "मोदी से कहो, वे तैयार हैं." दूसरे ने कहा, "मोदी हमें आजादी देगा, इंशाअल्लाह."

हमने कर्मचारियों को लाने-ले जाने वाली एसकेआईएमएस अस्पताल की बस में लिफ्ट ली. बस में केवल एक बूढ़ी औरत और उसका पति था. ड्राइवर ने उन्हें मनीगम नामक स्थान से उठाया क्योंकि वह बहुत बीमार थीं और चल नहीं सकती थीं. उसने हमें बताया कि सुरक्षा बल चाहते थे कि वह उसे उतार दे. उन्होंने मुझे बताया कि ''परसों 40 घायलों को इस बस में अस्पताल ले गया था. लेकिन भारतीय मीडिया का कहना है कि सब कुछ नियंत्रण में है.” उन्होंने कहा कि 2016 के विरोध प्रदर्शनों के दौरान भी, आतंकवादी कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद प्रतिबंध उतना बुरा नहीं था. “कभी-कभी, ऑपरेशन थियेटर के कर्मचारियों को भी आने की अनुमति नहीं होती है. वे जानबूझकर हमें देर करा रहे हैं. ”

दो घंटे चलने और लिफ्ट लेने के बाद, हम एसकेआईएमएस पहुंचे. जब हमने एसकेआईएमएस के पीछे के गेट से सौरा एंकर इलाके में प्रवेश किया, तो हमने देखा कि संकरी सड़क पत्थरों और लकड़ी के टुकडों से अवरुद्ध है. एक अलाव था जो जल चुका था. जेनब साहब मस्जिद से ठीक पहले, पिछले दिन हमने जिन लोगों से बात की थी, उनमें से कुछ ने हमें पहचान लिया और हमें दिखाना शुरू कर दिया कि क्या हुआ. सड़क पर चार से पांच आंसूगैस के गोले थे. पूरी गली टूटी हुई ईंटों के टुकड़ों से भरी थी. सड़क के बीच में लोहे की एक विशाल टंकी थी जो सेना को आगे बढ़ने से रोकने के लिए इस्तेमाल की जाती थी. इसने हमें पिछली रात हुई झड़प की एक झलक दिखलाई.

बंद दुकानों के लकड़ी के दरवाजों पर बुरहान वानी और अन्य उग्रवादियों के पोस्टर लगे हुए थे. कारवां के लिए प्रवीण दोंती

एक युवा ने कहा "हम सभी खाने और बतियाने के बाद यहां बैठे थे.अचानक, लगभग 11 बजे, हमने देखा कि इस सड़क पर सेनाएं दिखाई दीं. उन्होंने तुरंत गोलाबारी शुरू कर दी. हम पीछे हट गए. मस्जिद से बाहर आने और उन बलों का विरोध करने के लिए एक घोषणा की गई थी. वे सुबह हमारी ईद नमाज की पेशकश को रोकने के लिए आए थे. हर कोई बाहर आया और चौकस रहा तथा बलों के साथ भिड़ गया." उन्होंने कहा कि वे लगभग 6 बजे सोए थे, और उनमें से कई अभी भी सो रहे थे. "उन्होंने दो-तीन बार हम पर हमला करने और अंदर जाने की कोशिश की. अगर हम सो चुके होते, तो वे आज सुबह हमें नमाज अता करने की इजाजत नहीं देते."

बंद दुकानों के लकड़ी के दरवाजों पर बुरहान वानी और अन्य आतंकवादियों के पोस्टर लगे हुए थे. “मोदी अंगूठा छाप है. उसे क्या पता कि पीएचडी वाले क्यों बंदूक उठाते हैं'' एक बूढ़े व्यक्ति ने कहा. "सुबह से, छह से सात हेलिकॉप्टर हमारे ऊपर चक्कर लगा रहे हैं." सींक की टोकरी पकड़े हुए एक और आदमी ने मुझसे कहा, "वे हमें क़ुर्बानी का मांस बांटने की भी इजाजत नहीं दे रहे हैं." चूंकि वे सभी निकास और प्रवेश द्वारों को बंद कर देते हैं, इसलिए अन्य स्थानीय लोग पहले से ही तय की गई विरोध रैली के लिए नहीं आ सके. जब हम एसकेआइएमएस में वापस जा रहे थे, एक व्यक्ति ने हमें चाय पीने की पेशकश की. जब हमने विनम्रता से मना कर दिया, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "ये मोदी की चाय नहीं है, अपनी चाय है."

रास्ते में, हमें पथराव के कारण एक-दो स्थानों पर रोका गया. शाम तक प्रतिबंधों को थोड़ा ढील दिया गया था. श्रीनगर के एक निवासी जो ईद के लिए अक्सर उत्तरी कश्मीर के पट्टन आते हैं, उन्होंने कहा कि वहां उदासी थी. "पिछली ईद, मौलवी ने अपने खुतबे में युवाओं से ईद पर पटाखे न फोड़ने के लिए कहा था," उन्होंने कहा. “लेकिन जैसे ही नमाजें खत्म हुईं, उन्होंने पटाखे फोड़ना शुरू कर दिया और रात तक नहीं रुके. इस बार, उन्होंने इसका जिक्र त​क नहीं किया लेकिन इतनी शांत थी, मानो हवा भी थम गई हो. हर कोई सदमे में है.” हिंसा की कोई खबर नहीं थी और राहत की सामूहिक आहट थी. लेकिन हर कोई जानता था कि उनके पास निश्चित होने के लिए सभी जानकारी नहीं थी.

अगले दिन शाम 6 बजे के आसपास, श्रीनगर के श्री महाराजा हरि सिंह अस्पताल में वार्ड नंबर 11 में लगभग 35 लोग थे जिनकी आंखें पैलेट गन का शिकार हुई थीं. दो वरिष्ठ कश्मीरी पत्रकार और मैं इसका पता लगाने के लिए अस्पताल पहुंचे. लेकिन वहां कोई नहीं था. अस्पताल लगभग खाली था. उनकी तलाश करते हुए, हमें एक छोटी सी पांच साल की बच्ची मुनीफा नजीर मिली, जिसकी दाईं आंख पर पट्टी बंधी थी. वह बिस्तर पर सो रही थी और उसके हाथों पर ईद की मेहंदी लगी थी. उसके आसपास बदहाल अवस्था में परिवार के दस से अधिक सदस्य जमा थे. उसे बीते कल की शाम 6.30 बजे सफाकदल से लाया गया था. सीआरपीएफ के एक जवान ने अपनी गुलेल के एक पत्थर से मुनीफा को मारा था जब वह अपने चाचा की मोटरसाइकिल पर बैठी थी.

"हम क़ुर्बानी करने जा रहे थे," चाचा अहमद वानी ने मुझे बताया कि क्या हुआ था. “वह बाइक की टंकी पर बैठी थी. दो लोग मेरे पीछे बैठ गए. जैसे ही मैंने सड़क पार करने की कोशिश की, सीआरपीएफ के एक जवान ने मुझे दूसरे रास्ते से जाने के लिए कहा. जब वह मुझसे बात कर ही रहा था कि तभी सीआरपीएफ के एक अन्य जवान ने हमें पत्थर से मारा. मुनीफा घायल हो गई और बहुत खून बहने लगा. जब मैंने उनका सामना करने की कोशिश की और पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया, तो उसने अपनी बंदूक लहराई और कहा कि अगर हम यहां से नहीं गए तो वह हमें गोली मार देगा जो मेरा समर्थन करने के लिए इकट्ठे हुए, वे भी उसके बाद भाग गए.”

जब वे मुनीफा को अस्पताल लाए तो वहां एक ही डॉक्टर मौजूद था. डॉक्टर तारिक कुरैशी ने परिवार को बताया कि दाहिनी आंख खराब हो गई है और वे दस दिनों के बाद इसकी जांच करेंगे और सर्जरी करेंगे. मुनीफा लोअर किंडरगार्टन में पढ़ रही है. वह एशिया न्यूज नेटवर्क के कैमरामैन नजीर अहमद वानी की सबसे छोटी बेटी है. “अस्पताल के कर्मचारियों ने मुझे बताया कि पुलिस बेटी की अस्पताल से छुट्टी कर देने का दबाव उन पर डाल रही है क्योंकि वे नहीं चाहते कि मीडिया इसकी रिपोर्ट करे. आज, अगर डॉक्टर आते, तो उसे छुट्टी दे देते, लेकिन वे अस्पताल नहीं आए.'' उन्होंने मुझे बताया. हालांकि वह एक पत्रकार है, लेकिन वह किसी को सूचित करने में सक्षम नहीं हैं क्योंकि संचार का कोई तरीका नहीं है. “उसने आज दोपहर 2 बजे तक कुछ भी नहीं खाया. बस यही कहती रही कि 'मुझे घर ले चलो, मुझे घर ले चलो.’”

​ईद के दिन सीआरपीएफ के एक जवान ने अपने चाचा की बाइक पर बैठी पांच साल की मुनीफा को अपनी गुलेल से पत्थर मारा जिससे उसकी एक आंख खराब हो गई. कारवां के लिए प्रवीण दोंती

चार दिनों तक लोगों से बात करने के बाद, अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बारे में जो एकमात्र संयमित स्वर सुना, वह बडगाम के 33 वर्षीय स्कूल शिक्षक जान मोहम्मद का था, जो 15 अगस्त को श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में स्वतंत्रता दिवस परेड में भाग लेने आए थे, "हर जगह असुरक्षा का माहौल है, यहां तक कि शिक्षित युवाओं के बीच भी जो सरकारी सेवाओं में आना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें अब राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करनी पड़ेगी," उन्होंने मुझे बताया. "भूमि पर अधिकार और नौकरियों की सुरक्षा देने के लिए एक संशोधन लाया जाना चाहिए." और फिर उन्होंने कहा, "लेकिन केन्द्र सरकार अब कुछ भी करती है, उनके लिए अब घाटी के लोगों का विश्वास जीतना असंभव होगा.”

कश्मीर, आखिरी बार इस तरह 2016 में जल उठा था जब बुरहान वानी मारा गया था और घाटी गुस्से से फूट पड़ी थी. बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए जिसमें, खासकर दक्षिण कश्मीर में क्रूर हिंसा भी हुई थी. भारतीय राज्य को इसी तरह की प्रतिक्रिया की उम्मीद थी इसलिए,उसने उग्रवाद के पहले प्रकोप के बाद से संभवतः सबसे अधिक संख्या में बलों को तैनात किया है. लेकिन धारा 370 को प्रभावी रूप से हटाए जाने ने कश्मीर को एक गहरे अस्तित्व के संकट में डाल दिया है क्योंकि इसके लोग इसे अपनी भूमि, धर्म और संस्कृति के अस्तित्व का मामला मानते हैं.

उनकी प्रतिक्रिया सुचिंतित और रणनीतिक होगी. ऐसा लगता है कि उन्हें लगता है कि राज्य से मुकाबला करना अभी समझदारी की बात नहीं है. श्रीनगर के एक निवासी जो हाल ही में दक्षिण कश्मीर के शोपियां गए थे, ने मुझे बताया कि पिछले सप्ताह बाइक पर पिंजुरा गांव और जैनपुरा में आतंकवादियों का एक दल आया था. उन्होंने लोगों से कहा कि वे शांत रहें और सुरक्षा बलों से न टकराएं क्योंकि यह एक लंबी लड़ाई होने वाली है. एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे बताया, "इस बार, यह पता लगाने में कुछ समय लगेगा कि सार्थक प्रतिरोध क्या होगा. लेकिन विरोध होगा."

घाटी के फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे भारत समर्थक राजनेताओं को हाशिए पर फेंक दिया जाना और उनको मिटा दिए जाने पर खूब बहस हो रही है. इन नेताओं और पार्टियों के कारण पिछले तमाम वर्षों में पाकिस्तान समर्थक और आजादी समर्थक लॉबी सफल नहीं हो सकी. एक पत्रकार ने मुझे बताया, "अलगाववादियों ने जो 70 से अधिक वर्षों में हासिल नहीं किया, बीजेपी सरकार ने एक झटके में उसे दिला दिया. ये भारत समर्थक नेता, आजादी और पाकिस्तान की भावना के खिलाफ दी​वार बनकर खड़े थे."

घाटी में एक आम धारणा यह है कि अनुच्छेद 370 को खत्म करने से उन लोगों को चिंता नहीं होगी जो आजादी के लिए लड़ रहे हैं क्योंकि उन्होंने भारतीय संविधान को पहले भी कभी नहीं माना था. यह भारत समर्थक उन नेताओं की जिम्मेदारी थी,​ जिन्हें इससे लाभ हुआ था. पत्रकार ने बताया, "कुछ कश्मीरी मजाक कर रहे हैं कि भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल आईएसआई एजेंट हैं जो यहां के भारत समर्थक नेतृत्व को खत्म कर पाकिस्तान पर एहसान कर रहे हैं." डोभाल घाटी में स्थिति की बारीकी से निगरानी करने के लिए यहां आए थे. पत्रकार ने बताया, “बीच का रास्ता खत्म हो गया है. यथास्थिति का अंत कश्मीर के लिए एक अच्छा संकेत है. अब कोई समाधान होगा, इस पार या उस पार.”

हालांकि, कश्मीरियों का मानना है कि बीजेपी सरकार नेताओं की नई फसल तैयार करेगी. एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे बताया, "मीर जुनैद और उन जैसे अन्य रईसों के फोन अब काम कर रहे हैं. यह उच्चतम स्तर पर किया जा रहा है. पहले से ही नेताओं की एक छोटी सी फसल तैयार कर ली गई है जो अगले चुनाव होने पर भारत के लिए रैली करेंगे. मुझे लगता है कि एक नया नेतृत्व तैयार कर लिया गया है अनुच्छेद 370 पर मोदी का भाषण इसकी पुष्टि करता है. उन्होंने कहा था कि परिवारवाद खत्म हो गया है और नए लोग आ रहे हैं.''

पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी और नेता शाह फैसल के नाम का उल्लेख विभिन्न लोगों ने संभावित भारतीय उम्मीदवार के रूप में किया है. सौरा में एक युवक ने कहा, "वह अगला फारूक अब्दुल्ला होगा." एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार ने सहमति व्यक्त करते हुए कहा, “अनुच्छेद 370 और 35A को हटा दिया गया है. मौजूदा राजनीतिज्ञों में से कोई भी उन्हें वापस नहीं ला सकता है. अब वे जो उम्मीद कर सकते हैं और जिसके लिए लड़ सकते हैं वह है राज्य का दर्जा. उसके लिए एक दरवाजा बिल के 38 पन्नों के दस्तावेज में खुला छोड़ दिया गया है. यदि आप जांचते हैं कि शाह फैसल क्या बात कर रहे हैं, तो ऐसा लगता है कि इस तरह की स्थिति और संदर्भ में वह एक भूमिका निभाने की तैयारी कर रहे हैं.” हालांकि शाह फैसल को कथित रूप से सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के तहत हिरासत में लिया गया है, लेकिन कई लोग मानते हैं कि भारतीय प्रतिष्ठान द्वारा उन्हें इस राजनीतिक शून्यता में नायक के रूप में स्थापित करने की यह एक पूर्व नियोजित साजिश है. लेकिन कुछ और लोग भी हैं जो सोचते हैं कि जम्मू में सीटें बढ़ा कर बीजेपी सरकार परिसीमन के बाद एक हिंदू मुख्यमंत्री लाएगी.

एक और परिप्रेक्ष्य यह है कि प्रतिरोध एक या दूसरे तरीके से तीव्र होगा, लेकिन इसका बहुत कुछ इस पर निर्भर है कि पाकिस्तान क्या करेगा. लोग सुराग के लिए पाकिस्तानी टीवी चैनल देख रहे हैं. एक सुरक्षा विश्लेषक ने मुझे बताया, "कश्मीर मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण विभिन्न तरीकों से किया गया है. अमेरिका और पाकिस्तान को शायद इस बात की जानकारी थी कि ऐसा होने वाला है. जब इमरान खान ने बयान दिया कि उन्हें 40 हजार आतंकवादियों से डील करना है, यह उस समय मूर्खतापूर्ण लग रहा था. लेकिन अब ऐसा लगता है कि वह इस बारे में जानते थे और भारतीय प्रतिष्ठान के लिए एक खतरे की घंटी बजा रहे थे.” हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर रियाज नाइक ने एक ऑडियो क्लिप में अनुच्छेद 370 के तहत कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म करने से दो दिन पहले एक संदेश दिया था. जिसमें भारत द्वारा हताश उपायों के बारे में बात थी. उन्होंने कश्मीर पुलिस से अपील की कि वे उनका समर्थन करें क्योंकि उनका उपयोग भारत समर्थक नेताओं की तरह किया जाएगा और फिर उन्हें फेंक दिया जाएगा.

कश्मीर पुलिस के जवान, विशेष रूप से निचली और मध्य स्तर के, सरकार द्वारा निरस्त्र कर दिए जाने के अपमान से गुस्सा हैं. वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे बताया, "इसमें एक निश्चित परस्पर सामंजस्य है. मैंने कभी किसी एसएचओ को लोगों को उठा लेने से इनकार करते नहीं सुना. मुझे दो एसएचओ के बारे में पता है जिन्होंने आदेशों का पालन करने से इनकार कर दिया है और सवाल किया है कि उन्हें क्यों उठाया जाना चाहिए, जबकि पास के एसएचओ ने 50 लोगों को उठाया और उन पर पीएसए लगा दिया था. कश्मीरी नौकरशाही भी नाराज है लेकिन भीगी बिल्ली बनी हुई है. अभी आप नौकरी छोड़ भी नहीं सकते क्योंकि इसे बगावत माना जाएगा. उनमें यह भावना घर किए है कि यदि ढंग से नहीं रहेंगे तो अमित शाह और मोदी से उन्हें कोई नहीं बचाएगा.” इससे दबाव बिंदुओं का एक नया समुच्चय बन गया है जो भविष्य में एक निश्चित बिंदु पर विस्फोटक हो सकता है. लेकिन कब क्या हो जाए कोई नहीं जानता. हालांकि, ज्यादातर लोगों का मानना है कि कश्मीरी लंबी दौड़ के लिए अपनी एड़ी गड़ा रहे हैं. वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे बताया, "इस गुस्से की स्परूप और मसाला बहुत अलग है."

अनुवादः पारिजात