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अगर अमृतसर के शवगृह में वह ख़ून से सना बिस्तर न होता जिस पर जसविंदर सिंह का शव पड़ा था, तो उनकी मौत एक और अनदेखी, अनसुलझी हिरासत मृत्यु बन कर रह जाती. या शायद उनकी मौत को दिल का दौरा बता कर फ़ाइल बंद कर दी जाती.
सिंह की मां आख़िरी बार अपने बेटे को देख पाने की बेचैनी लिए सुबह-सुबह शवगृह पहुंची थीं. उन्होंने देखा कि उनके शरीर पर निर्मम यातना के साफ़ निशान, पीठ और पैरों के पिछले हिस्से पर गहरे काले चोटों के दाग़ और शरीर के कई अंगों से रिसता हुआ ख़ून था. परिवार के सदस्यों ने बताया, 'वहां पहुंच कर हम सिर्फ़ उन्हें देख सके, लेकिन उनको बचाने के लिए बहुत देर हो चुकी थी.' मौत के बाद परिवार ने उनके शरीर की हालत की तस्वीरें और वीडियो बना लिए.
35 वर्षीय जसविंदर सिंह एक मज़बूत कद-काठी के व्यक्ति थे, जिनकी लंबाई छह फ़ीट से अधिक थी. वह सीमा सुरक्षा बल की 42वीं बटालियन में थे और उस समय त्रिपुरा में तैनात थे. 3 मार्च को वह छुट्टी पर अपने घर, जम्मू से लगभग 40 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित सीमावर्ती गांव दीवानगढ़ में आए हुए थे, तभी केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आने वाले नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने उन्हें हिरासत में ले लिया. इसके बाद शुरू हुई 17 दिनों की भयावह यातना, जिसका अंत उनकी मृत्यु के साथ हुआ.
इस दौरान जसविंदर के परिवार को उनसे मिलने या बात करने की कोई अनुमति नहीं दी गई. केवल एक बार, हिरासत में लिए जाने के 10 दिन बाद, जसविंदर जम्मू स्थित एनसीबी कार्यालय से चार मिनट की एक फ़ोन कॉल कर सके. उनकी पत्नी लवजीत कौर ने बताया कि उस कॉल में जसविंदर मदद की गुहार लगा रहे थे. उन्होंने कहा कि एनसीबी अधिकारियों द्वारा उन्हें असहनीय यातनाएं दी जा रही थीं. 'मुझे हमेशा यही डर लगा रहता था कि त्रिपुरा की सीमा पर, घर से इतनी दूर, उनकी सुरक्षा को कोई ख़तरा न हो. मुझे डर था कि कहीं वह सीमा पर शहीद न हो जाएं,' उन्होंने कहा. 'लेकिन कभी नहीं सोचा था कि छुट्टी पर घर आए एक व्यक्ति को अचानक उठा लिया जाएगा और एनसीबी की हिरासत में यातनाएं देकर मार डाला जाएगा.'
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