दिल्ली पुलिस का खूनी रिकॉर्ड

दो साल पहले भारतीय जनता पार्टी के नेता कपिल मिश्रा ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में प्रदर्शनकारियों को लेकर भड़काऊ भाषण दिया और इसके बाद तीन दिनों तक दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा हुई थी. अब यति नरसिंहानंद ने राष्ट्रीय राजधानी में एक और आग लगाने वाला भाषण दिया है. 3 अप्रैल 2022 को तीन सौ लोगों की मौजूदगी वाले एक हिंदू महापंचायत में गाजियाबाद में डासना देवी मंदिर के प्रमुख नरसिंहानंद ने दावा किया, "एक बार एक मुसलमान भारत का प्रधानमंत्री बन जाए तो बीस वर्षों में आप में से पचास प्रतिशत अपना धर्म बदल लेंगे. चालीस प्रतिशत हिंदुओं की हत्या कर दी जाएगी."

नरसिंहानंद को उत्तराखंड पुलिस ने तीन महीने पहले हरिद्वार में इसी तरह की एक जनसभा में मुसलमानों के नरसंहार का आह्वान करने के आरोप में गिरफ्तार किया था. अंतरराष्ट्रीय आक्रोश के बीच उन्हें एक महीने के भीतर जमानत पर रिहा कर दिया गया. उनकी गिरफ्तारी ने उनके अहंकार को कम नहीं किया. दिल्ली में हिंदू महापंचायत में उन्होंने कहा, "यदि आप इस भविष्य को बदलना चाहते हैं, तो मर्द बनें. जो सशस्त्र है, वही मर्द है."

फरवरी 2020 में मिश्रा ने अपना भड़काऊ भाषण दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी की उपस्थिति में दिया था. और अब जहां नरसिंहानंद ने बयान दिया उस महापंचायत में कम से कम 30 पुलिसकर्मी मौजूद थे. यहां तक कि यह पंचायत आवश्यक अनुमति के बिना आयोजित की गई थी. घटना के लाइव मीडिया कवरेज के बावजूद, दिल्ली पुलिस ने उसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया. हालांकि पुलिस ने बाद में एफआईआर दर्ज की. यह पिछले दो वर्षों के ऐसे कई प्रकरणों में से एक है, जिसने यह स्पष्ट कर दिया है कि दिल्ली पुलिस राजधानी में सांप्रदायिक तनाव को बढ़ने से रोकने के लिए बहुत कम प्रयास कर रही है.

महापंचायत के दो सप्ताह बाद 16 अप्रैल को उत्तरी दिल्ली के जहांगीरपुरी में हिंदू त्योहार हनुमान जयंती के अवसर पर आयोजित एक रैली के दौरान हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक झड़पें हुईं. दिल्ली पुलिस ने हिंसा के मामले में नाबालिगों समेत 23 लोगों को गैरकानूनी रूप से जमा होने और दंगा करने के आरोप में गिरफ्तार किया. गिरफ्तार लोगों में ज्यादातर मुसलमान हैं. बिना पूर्व अनुमति के जुलूस निकालने के लिए उग्र हिंदुत्व संगठन विश्व हिंदू परिषद और उसकी युवा शाखा बजरंग दल के दो लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई. झड़पों के चार दिन बाद बीजेपी के नेतृत्व वाली उत्तरी दिल्ली नगर निगम ने जहांगीरपुरी में मुस्लिम बहुल इलाके में अतिक्रमण विरोधी अभियान शुरू किया, जिसमें बुलडोजर ने एक मस्जिद के बाहरी फाटक सहित कई घरों को तोड़ दिया. सुबह करीब 10.15 बजे शुरू हुआ विध्वंस अभियान दो घंटे तक चला, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने सुबह 11 बजे ही यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दे दिए थे.

राष्ट्रीय राजधानी के बहुत से निवासियों के लिए दिल्ली में 2020 के बाद से सांप्रदायिक घटनाएं सदमे के रूप में आई हैं. ऐसा लगता है कि शहर इस विश्वास पर कायम था कि इसका महानगरीय परिदृश्य और राष्ट्रीय राजधानी के रूप में इसकी स्थिति के अलावा कड़ी सुरक्षा और राजनीतिक शक्ति का केंद्र होने के चलते 2014 में बीजेपी के राष्ट्रीय सत्ता में आने के बाद शुरू हुए व्यापक सांप्रदायिकरण से इसकी रक्षा हो सकेगी. लेकिन यह विश्वास गलत साबित हुआ है. फरवरी 2020 के दंगे और केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक बल के रूप में दिल्ली पुलिस के इतिहास को समझने के लिए  पीछे मुड़कर देखना होगा.

दिल्ली पुलिस के पूर्व संयुक्त आयुक्त शुभाशीष चौधरी अपनी 2021 की किताब कैपिटल कॉप्स में लिखते हैं, "आज हम जिस आधुनिक पुलिस बल को जानते हैं, वह 1861 के पुलिस अधिनियम के तहत स्थापित किया गया था. "बल के अस्तित्व के पहले कुछ दशकों तक यह पंजाब पुलिस का हिस्सा था. दिल्ली पुलिस के लिए महानिरीक्षक को पहली बार 1948 में नियुक्त किया गया था. दिल्ली पुलिस अधिनियम 1978 ने आयुक्त प्रणाली की शुरुआत की और इस कानून के तहत ही इस बल ने अपना जनादेश और शक्ति प्राप्त किया.

चौधरी लिखते हैं, "आज इसमें विभिन्न रैंकों के लगभग 87000 पुलिस अधिकारियों के साथ 163 क्षेत्रीय पुलिस स्टेशन शामिल हैं. हालांकि, शहर की बढ़ती आबादी के लिए यह संख्या अभी भी अपर्याप्त है, लेकिन पुलिस के अधीन 1500 वर्ग किमी क्षेत्र के हिसाब से इसकी उपस्थिति प्रभावी है." दिल्ली पुलिस की वेबसाइट बताती है कि यह अब "संभवतः दुनिया की सबसे बड़ी महानगरीय पुलिस है." और फिर भी पुलिस बल फरवरी 2020 के दंगे में पचास से अधिक लोगों की जान बचाने में नाकाम रहा.

पिछले सालों में दिल्ली पुलिस का विस्तार हुआ है और इसकी संरचना विकसित हुई है. लेकिन 1984 में सिख विरोधी हिंसा और 2001 में संसद हमले से संबंधित मामलों की अध्यक्षता करने वाले सेवानिवृत्त न्यायाधीश एसएन ढींगरा ने मुझे बताया कि पुलिस हमेशा ऐसी ही रही है. उन्होंने कहा, "अंग्रेजों के शासन के दौरान हमारे पास जो पुलिस थी, वह अंग्रेजों का समर्थन करती थी, आज जो भी सत्ता में है, वह उसका समर्थन करती है."

सेव इंडिया फाउंडेशन के सदस्य 3 अप्रैल 2022 को दिल्ली के बुरारी ग्राउंड में आयोजित एक हिंदू महापंचायत के दौरान एक अनुष्ठान करते हुए. यह कार्यक्रम आवश्यक अनुमति के बिना आयोजित किया गया था. कारवां के लिए शाहिद तांत्रे

दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के मातहत है जिसके मंत्री अमित शाह  हैं. सरकार ने भारतीय पुलिस सेवा के गुजरात कैडर के राकेश अस्थाना को 28 जुलाई 2021 को दिल्ली के पुलिस आयुक्त के रूप में नियुक्त किया. इससे पहले भी अरुणाचल प्रदेश, गोवा, मिजोरम और केंद्र शासित प्रदेशों के आईपीएस कैडर से अधिकारियों को राजधानी का पुलिस प्रमुख नियुक्त किया गया है. कई समाचार रिपोर्टों ने बताया कि अस्थाना शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आंखों के तारे हैं. अपने विवादास्पद करियर में अस्थाना ने कई हाई-प्रोफाइल और संवेदनशील मामलों को संभाला है जिसमें एक मामला सांप्रदायिक हिंसा से संबंधित है, जो 2002 में मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए गुजरात में हुई थी.

अस्थाना ने साक्षात्कार या दिल्ली हिंसा के बारे में मेरे अनुरोधों का जवाब नहीं दिया. अपराध विभाग, विशेष प्रकोष्ठ और उत्तर-पूर्व दिल्ली के विभिन्न पुलिस थानों के अधिकारियों को भेजे गए ईमेल का भी कोई जवाब नहीं मिला.

2020 में कपिल मिश्रा के भाषण के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली के पुलिस उपायुक्त वेद प्रकाश सूर्य की मौजूदगी ने उस समय आक्रोश पैदा कर दिया था. मिश्रा का भाषण जाफराबाद मेट्रो स्टेशन पर नागरिकता (संशोधन) अधिनियम का विरोध कर रहे मुसलमानों के खिलाफ था. यह प्रदर्शन, उन प्रदर्शनों की लहर का हिस्सा था, जिसने दिसंबर 2019 में सीएए के पारित होने के बाद दिल्ली और देश को झकझोर दिया था. बीजेपी और अन्य हिंदुत्ववादी समूहों ने विरोध प्रदर्शनों की निंदा की. इन प्रदर्शनों का नेतृत्व मुसलमानों ने किया, जो इस अधिनियम और नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर से संभावित खतरे को समझते थे. प्रदर्शनकारियों को कई जगहों पर, खासकर बीजेपी शासित राज्यों में धमकियों और यहां तक कि हिंसा का भी सामना करना पड़ा. मिश्रा ने अपनी पार्टी के रुख के अनुरूप घोषणा की कि अगर दिल्ली पुलिस ने जाफराबाद और बगल में चांद बाग से विरोध प्रदर्शनों को नहीं हटाया तो "हमें हटाएंगे." आगामी दंगे में मारे गए 53 लोगों में से 40 मुसलमान थे.

दंगे में अपनी स्पष्ट निष्क्रियता के चलते पुलिस का भारी विरोध हुआ. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मदन लोकुर ने मुझे बताया, “ऐसा लगता है कि जब उनकी मौजूदगी में हिंसा की घटनाएं हुईं, वे केवल मूकदर्शक बने रहे. लोकुर ने बताया कि दिल्ली पुलिस केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, रैपिड एक्शन फोर्स और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की सेवाएं ले सकती है और कई मौके पर उसने ऐसा किया है. उन्होंने कहा लेकिन, "यह स्पष्ट नहीं है कि वह इन जैसी सामूहिक हिंसा की स्थितियों में इन बलों की सहायता क्यों नहीं लेती है, जैसा कि 2020 में हुए दंगों के मामले में हुआ." उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह ने कहा, "दंगाइयों को खुली छूट थी और कोई निर्देशात्मक कार्रवाई नहीं हुई." उन्होंने कहा, पुलिस "एक बैंडऐड से कैंसर का इलाज कर रही थी."

20 अप्रैल 2022 को दिल्ली के जहांगीरपुर में मुस्लिम बहुल इलाके में उत्तरी दिल्ली नगर निगम द्वारा अतिक्रमण विरोधी अभियान के दौरान तंबू में आराम करते पुलिस और सुरक्षाकर्मी. चार दिन पहले हनुमान जयंती मनाने के लिए आयोजित एक रैली के दौरान जहांगीरपुर में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक झड़पें हुई थीं. कारवां के लिए शाहिद तांत्रे

पुलिस पर दंगे में प्रत्यक्ष भागीदारी का भी आरोप लगाया गया है. ऐसी खबरें आती रही हैं कि पुलिस या तो हिंदू भीड़ द्वारा मुस्लिम इलाकों पर हमलों को चुपचाप देखती रही या “जय श्रीराम” के नारे लगाती हुई इसमें शामिल हो गई. उस समय सामने आए एक वीडियो में पुलिसकर्मियों को पांच मुस्लिम आदमियों को राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर करते हुए देखा गया. ये आदमीगंभीर रूप से घायल थे और जमीन पर पड़े थे. पुलिस को पांचों आदमियों को गाली देते हुए, "आजादी " का ताना मारते हुए सुना जा सकता था.  उनमें से एक जल्द ही अपने जख्मों के कारण मर गया. 2021 की शुरुआत में तीन चश्मदीदों ने कारवां को बताया कि उन्होंने ओखला पुलिस स्टेशन के सब-इंस्पेक्टर हरवीर सिंह भाटी को 24 फरवरी 2020 को एक मुस्लिम व्यक्ति की गोली मारकर हत्या करते देखा था.

हालांकि, पुलिस ने जल्द ही घटनाओं का एक बहुत अलग संस्करण प्रस्तुत किया. दंगे से संबंधित सबसे सनसनीखेज मामले में इसकी कहानी सबसे स्पष्ट है : 2020 की एफआईआर 59, जिसे साजिश के मामले के रूप में जाना जाता है. इसे दिल्ली पुलिस की विशेष प्रकोष्ठ संभाल रही है.

1985 में एक स्वतंत्र आतंकवाद विरोधी बल के रूप में स्थापित विशेष प्रकोष्ठ को अक्सर झूठी कहानियां गढ़ने के आरोपों का सामना करना पड़ा है. जामिया टीचर्स सॉलिडेरिटी एसोसिएशन की 2011 की रिपोर्ट फ्रेम्ड, डैम्न्ड, अक्विंटेड, विशेष सेल द्वारा जांच किए गए 16 मामलों का विश्लेषण करती है. (बाद में यह रिपोर्ट एक किताब के रूप में भी प्रकाशित हुई.) इन मामलों में विशेष प्रकोष्ठ ने कई व्यक्तियों पर - जिनमें लगभग सभी मुसलमान थे - आतंकवादी संगठनों से जुड़े होने का आरोप लगाया और उन पर राजद्रोह, आपराधिक साजिश और राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने जैसे आरोप लगाए. कई आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया. पुलिस ने सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन आयोजित करने वाले जिन व्यक्तियों को साजिश के मामले में गिरफ्तार किया, उनमें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र शारजील इमाम, जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद, नारीवादी समूह पिंजरा तोड़ की देवांगना कलिता और नताशा नरवाल और यूनाइटेड अगेंस्ट हेट के संस्थापक खालिद सैफी जैसे कुछ प्रमुख कार्यकर्ता शामिल थे. पुलिस ने इन लोगों को हिंसा के प्रमुख साजिशकर्ता के रूप में चित्रित किया और उन पर भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के साथ-साथ आयुध अधिनियम, सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की रोकथाम अधिनियम और कठोर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत आरोप लगाया.

इस मामले में 17000 पृष्ठों से अधिक लंबे आरोप पत्र में संदेशों, फोन रिकॉर्ड, भाषणों, बैठकों और गवाहों की गवाही हैं. लेकिन जैसे ही इसे सितंबर 2020 में दायर किया गया, कई पत्रकारों और टिप्पणीकारों ने जांच में कमियां निकाली और यह तर्क देते हुए इसकी आलोचना की कि अभियुक्तों के खिलाफ एकमात्र सिद्ध आरोप यह था कि उन्होंने सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन आयोजित करने में मदद की.

इस बीच विशेष प्रकोष्ठ ने दक्षिणपंथी नेताओं के खिलाफ कई आरोपों को नजरअंदाज किया, जो पहले ही सार्वजनिक किए जा चुके थे. मैंने जून 2020 में रिपोर्ट किया कि पुलिस ने कई पुलिस शिकायतों के आधार पर एफआईआर दर्ज करने से इनकार किया, जिसमें कहा गया था कि उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगा बीजेपी नेताओं द्वारा या उनके इशारे पर हुआ था. इन शिकायतों में जिन नेताओं के नाम हैं, उनमें मिश्रा, सांसद सत्यपाल सिंह, विधायक नंद किशोर गुर्जर और मोहन सिंह बिष्ट और पूर्व विधायक जगदीश प्रधान शामिल हैं. एक शिकायतकर्ता ने लिखा कि पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों पर हमला शुरू करने से ठीक पहले उसने एक सहायक पुलिस आयुक्त को मिश्रा को फोन पर आश्वासन देते हुए सुना, “चिंता मत करो, हम सड़कों पर उनके शवों को इस तरह बिखेर देंगे कि इसे पीढ़ियों तक याद किया जाएगा.” फिर भी विशेष प्रकोष्ठ ने मिश्रा पर साजिश का आरोप नहीं लगाया है.

20 अप्रैल 2022 को दिल्ली के जहांगीरपुरी में मुस्लिम बहुल इलाके में एक क्षतिग्रस्त भवन. उस दिन अतिक्रमण विरोधी अभियान में बुलडोजरों ने एक मस्जिद के बाहरी गेट सहित कई भवनों के कुछ हिस्सों को तोड़ दिया. सुबह करीब 10.15 बजे शुरू हुआ विध्वंस अभियान दो घंटे तक चला, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने सुबह 11 बजे यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए थे.  कारवां के लिए सीके विजयकुमार

ऐसा नहीं है कि दिल्ली पुलिस पर पहली बार सांप्रदायिक दंगे को बढ़ावा देने और अल्पसंख्यक समुदाय पर हमला करने के लिए केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के साथ मिलीभगत के आरोपों का सामना करना पड़ा है. 1984 में दिल्ली पुलिस पर राजधानी में 3000 सिखों के कत्लेआम में संगठित हिंदू भीड़ का साथ देने का आरोप लगा था. उस वक्त केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. गवाहों की गवाहियों और अन्य सबूतों ने उस समय पुलिस के खिलाफ कई आरोपों की पुष्टि की थी, जिसमें यह भी शामिल है कि भीड़ द्वारा हमला करने से पहले दिल्ली पुलिस ने सिखों को निहत्था किया था. पुलिस ने यह अफवाह भी फैलाई थी कि सिखों ने शहर प्रशासन द्वारा आपूर्ति किए जाने वाले पाइप के पानी में जहर घोल दिया है.

1996 के एक फैसले में एसएन ढींगरा ने पुलिस को बेनकाब कर दिया था :

अगर यह माना जाए कि 3.11.84 तक, जब वास्तव में दंगे हो रहे थे, तब स्थिति ऐसी थी कि यह पुलिस के नियंत्रण से बाहर थी और पुलिस की कोई भागीदारी नहीं थी, तो यह केवल पुलिस की लाचारी को दर्शाता है. इन अपराधों की बाद की जांच पुलिस द्वारा ईमानदारी से की जाती और अपराधियों और दंगाइयों पर कार्रवाई की जाती. लेकिन बाद में पुलिस का रवैया दंगाइयों को बचाना और सबूतों को नष्ट करना, किसी भी अदालत को पुलिस और जांच एजेंसी के खिलाफ दंगाइयों के साथ हाथ मिलाने और उन अदृश्य शक्तिशाली व्यक्तियों, जिनका इन सब के पीछे हाथ था, के निर्देशों के तहत काम करना प्रतिकूल निष्कर्ष निकालने के लिए मजबूर करेगा.

दंगे की जांच के लिए पहला आयोग इस घटना के तुरंत बाद स्थापित किया गया था, और इसका नेतृत्व दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी वेद मारवाह ने किया था. लेकिन जैसे ही यह अपना काम पूरा करने वाला था, केंद्र सरकार ने इसे भंग कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा के नेतृत्व में 1985 में गठित एक आयोग ने कहा है कि "अधिकांश पुलिसकर्मियों का व्यवहार इस अर्थ में न्यायहीन था कि उन्होंने अपनी उपस्थिति में लोगों को मारने, घरों को जलाने, संपत्ति को लूटने, महिलाओं को घसीटने और उनके साथ दुर्व्यवहार करने की अनुमति दी." मिश्रा आयोग ने कहा कि “हमलों के दौरान पुलिस हेल्पलाइन और पुलिस थानों को किए गए सभी कॉल अनुत्तरित रहे. अगर कोई प्रतिक्रिया मिली भी, तो वह इस तरह की थी कि पुलिस सहायता करने में असमर्थ है."

मिश्रा आयोग ने कहा कि उस समय के मौजूदा माहौल में पीड़ितों का पुलिस के पास जाना मुश्किल था. इसके अलावा, पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया "जिन लोगों ने पुलिस या अधिकारियों पर आरोप लगाया उन्हें आरोपित अधिकारियों का नाम रिपोर्ट से हटाने के लिए पुलिस ने मजबूर किया.”

भीड़ के खिलाफ कार्रवाई करने वाले चंद पुलिस स्टेशनों में से एक सब्जी मंडी थाना था, जहां सहायक आयुक्त केवल सिंह और निरीक्षक गुरमेल सिंह ने दंगे की पहली रात लगभग नब्बे दंगाइयों को गिरफ्तार किया था. हालांकि, केंद्र सरकार की सेवानिवृत्त सचिव कुसुमलता मित्तल ने 1990 की एक रिपोर्ट में लिखा है, "इन सिख अधिकारियों को ड्यूटी से हटा दिया गया.  ऐसा  लगता है कि उन्हें बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी करने की सजा के बतौर हटा दिया गया था." मित्तल ने 72 पुलिस अधिकारियों पर आरोप लगाया और सिफारिश की कि दिल्ली पुलिस के बदले किसी अन्य एजेंसी को उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए. इस सिफारिश का कभी पालन नहीं किया गया.

ऐसा लगता है कि पुलिस का अपराधियों को गिरफ्तार करने या उनके खिलाफ सबूत इकट्ठा करने का कोई इरादा नहीं है. उदाहरण के लिए, पत्रकार मनोज मिट्टा और वकील एचएस फुल्का अपनी पुस्तक व्हेन ए ट्री शुक देल्ही : द 1984 कार्नेज एंड इट्स आफ्टरमाथ में लिखा है कि पुलिस ने पूर्वी दिल्ली सिर्फ चार आगजनी करने वालों को गिरफ्तार किया है. पुलिस ने वहीं से अपना बचाव करने की कोशिश करने वाले 26 सिखों को गिरफ्तार किया. जब वर्षों बाद जांच आयोगों का गठन किया गया, तब सरकारी रिकॉर्ड में नरसंहार के बारे में सच्चाई दर्ज की जाने लगी. तब भी शायद ही कभी न्याय मिलता था.

पूर्वी दिल्ली के मानसरोवर पार्क की रहने वाली हरमिंदर कौर ने 1 नवंबर 1984 को दिल्ली पुलिस में हेड कांस्टेबल पति को खो दिया. अगले दिन उनके 17 वर्षीय बेटे और 23 वर्षीय दामाद की भी लिंचिंग कर दी गई. आयोग के समक्ष अपने हलफनामे में कई गवाहों ने पूर्वी दिल्ली के कांग्रेस सांसद एचकेएल भगत को इलाके में भीड़ का नेतृत्व करने के लिए नामित किया था. हालांकि, 1996 में भगत के खिलाफ दर्ज एकमात्र एफआईआर कौर के हलफनामे पर आधारित थी. 'व्हेन ए ट्री शुक देल्ही' में मिट्टा और फूलका ने लिखा है कि बाद में क्या हुआ था :

हरमिंदर कौर के मामले में पुलिस ने भगत के खिलाफ आरोपों के बारे में बार-बार पूछताछ करते हुए हरमिंदर का छह बार बयान दर्ज किया. उसे प्रताड़ित किया गया और उस स्थिति में पहुंचा दिया गया, जहां उन्हें अपने पति, बेटे और दामाद की हत्याओं पर हलफनामा देने का पछतावा होने लगा. इसके विपरीत पुलिस को भगत से एक बार भी पूछताछ करने की जरूरत महसूस नहीं हुई. आश्चर्य नहीं कि पुलिस ने साल 2000 में मामले को बंद कर दिया. हमने उपराज्यपाल विजय कपूर को भगत के खिलाफ मामले को फिर से खोलने और जांच सीबीआई को देने के लिए एक अभ्यावेदन दिया. कपूर ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केके सूद से राय मांगी. जांच में खामियों की ओर इशारा करते हुए एक विस्तृत राय में सूद ने भगत को बचाने के लिए पुलिस को फटकार लगाई. इसके बाद कपूर ने हरमिंदर कौर का केस सीबीआई को भेजा. जब तक मामले में आरोप दाखिल करने की बारी आई, तब तक भगत किसी भी अपराध के लिए मुकदमा चलाए जाने के लिए मानसिक रूप से अयोग्य हो चुके थे.

बाद में अपर्याप्त सबूतों के कारण भगत को मामले में बरी कर दिया गया था. उन्हें एक अन्य मामले में मुश्किल से चार दिनों के लिए गिरफ्तार किया गया था और स्वास्थ्य संबंधी शिकायत के बाद जमानत पर रिहा कर दिया गया था. 2005 में उनकी मृत्यु हो गई. कौर के आरोपों के आधार पर तीन लोगों को दोषी ठहराए जाने में दो साल और लग गए.

दंगे की मार झेल रहे त्रिलोकपुरी में कई प्रत्यक्षदर्शियों ने कल्याणपुरी थाने के प्रभारी सूर वीर सिंह त्यागी पर दंगों को अंजाम देने का आरोप लगाया. मित्तल की रिपोर्ट ने त्यागी के कामों को "आपराधिक दुराचार" बताया. उन्होंने यह भी कहा कि त्यागी के प्रयास "काफी हद तक सफल रहे. गवाहों को धमकाकर अपने पक्ष में हलफनामा हासिल करने से संकेत मिलता है कि बहुत कम संभावना है कि किसी भी गवाह में सामने आने और उसके खिलाफ गवाही देने का साहस होगा."

फुल्का ने अपनी किताब में लिखा है कि त्यागी ने उन्हें बताया था कि "मुझे बलि का बकरा बनाया गया था." वह लिखते हैं कि त्यागी ने दावा किया कि दंगों की पूर्व संध्या पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भगत के घर पर एकत्र हुए थे. फुल्का लिखते हैं, "अधिकारियों को यह बताया गया कि हत्याओं को होने दिया जाए और फिर अपराध के सभी निशान मिटा दिए जाएं." उन्होंने मुझे बताया कि आज तक न तो त्यागी और न ही किसी अन्य पुलिस अधिकारी को दंगे में उनकी भूमिका के लिए दोषी ठहराया गया है.

31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मौत के बाद दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के बाहर उपस्थित भीड़. बीसीसीएल

फरवरी 2020 के दंगे के कुछ दिनों बाद न्यूयॉर्क टाइम्स ने "क्यों दिल्ली पुलिस ने मुसलमानों पर हमले रोकने के लिए कुछ नहीं किया" शीर्षक से एक राय प्रकाशित की. इसमें कारवां के राजनीतिक संपादक हरतोष सिंह ने लिखा, “पिछले हफ्ते दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर हिंदू भीड़ के साथ हमला करने वाले कई पुलिसकर्मियों और अधिकारियों ने या तो उन्हीं अधिकारियों के अधीन काम किया होगा या प्रशिक्षण लिया होगा, जो 1984 के दंगों में शामिल होने के बावजूद किसी भी तरह की ‌सजा से बच गए."

दंगों के बाद दिल्ली पुलिस पर कोई कार्रवाई का मतलब है कि पिछले चार दशकों में इस मामले में बहुत कम बदलाव आया है. 2020 की मुस्लिम विरोधी हिंसा से यही संकेत मिलता है. हत्या के कई मामलों का मैंने अध्ययन किया, मैंने पाया कि इस घटना के दो साल बाद और भारीभरकम आरोप पत्र दाखिल करने के बावजूद दिल्ली पुलिस यह निर्धारित नहीं कर पाई है कि हमलावर कौन थे. इन मामलों में दिल्ली पुलिस ने जो आरोप पत्र दायर किए हैं, उनमें हिंदुओं से ज्यादा मुसलमानों पर आरोप हैं- कई मामलों में मुसलमानों पर अपने ही समुदाय के लोगों को मारने का आरोप लगाया गया है. जांच स्पष्ट खामियों से भरी हुई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि मुसलमानों को न केवल हिंसा बल्कि उसके बाद पुलिस कार्रवाई का भी खामियाजा भुगतना पड़ा.

ढींगरा ने मुझे बताया, “1984 और 2020 में पुलिस की भूमिका एक जैसी रही है. न तो पुलिस का रवैया बदला है, न ही पुलिस और न ही पुलिस को संभालने वाले बदले हैं."

शुरुआती हताहतों में से एक दिल्ली पुलिस का अपना आदमी 43 वर्षीय हेड कांस्टेबल रतन लाल था, जिसे 24 फरवरी को उत्तर-पूर्वी दिल्ली के वजीराबाद रोड पर तैनात किया गया था, ताकि सीएए प्रदर्शन स्थल पर शांति बनाए रखी जा सके. अगले दिन उसके लिए आयोजित श्रद्धांजलि समारोह में सैकड़ों पुलिस अधिकारियों ने भाग लिया. उस समय के पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक ने मीडिया से कहा, "यह हमारे लिए एक बड़ी क्षति है. और हम आने वाले समय में उनके बलिदान को हमेशा याद रखेंगे." रतन लाल का पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया और मरणोपरांत वीरता के लिए पुलिस पदक से सम्मानित किया गया. लेकिन दो साल बाद भी पुलिस यह पता नहीं लगा पाई है कि उसे गोली किसने मारी थी.

रतन लाल के मामले में आरोप पत्र कई सवाल उठाते हैं कि पुलिस ने उसकी मौत से कैसे निपटा. मैंने दिसंबर 2021 तक मामले के जांच अधिकारी गुरमीत सिंह से पूछताछ की कि चार्जशीट में क्या विसंगतियां और विषमताएं हैं. उन्होंने दंगों की अराजकता को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने मुझे बताया, "एक ही समय पर कहीं पीड़ित हैं, हम आरोपी को पकड़ रहे हैं, हम सबूत एकत्र कर रहे हैं- इसलिए तकनीकी चीजें इधर-उधर हो जाती हैं."

रतन लाल को 24 फरवरी को दोपहर 2.12 बजे गुरु तेग बहादुर अस्पताल में मृत अवस्था में लाया गया था. पुलिस को एफआईआर दर्ज करने में एक दिन का समय लगा, जिसमें चार घंटे पहले हुई पोस्टमार्टम जांच के बावजूद गोली लगने का जिक्र नहीं था. एफआईआर में यह नहीं कहा गया है कि वजीराबाद में प्रदर्शनकारी बंदूक ले जा रहे थे, यहां तक कि घटना स्थल पर किसी गोलीबारी का भी उल्लेख नहीं किया है. इसमें केवल इतना कहा गया था कि रतन लाल की मौत प्रदर्शनकारियों के हमले के बाद हुई थी.

एफआईआर दर्ज करने में देरी के बारे में पूछे जाने पर गुरमीत ने कहा कि उस समय प्राथमिकता कानून और व्यवस्था थी. जिन्होंने अब तक इस मामले में सभी पांच आरोप पत्र दायर किए हैं, उन्होंने पहले जोर देकर कहा कि एफआईआर में बंदूक की गोली का उल्लेख किया गया था और जब मैंने बताया कि ऐसा नहीं है, तो उन्होंने कहा कि वह फिर से जांच करेंगे.

एक कांस्टेबल की शिकायत के आधार पर दर्ज एफआईआर में कहा गया है कि 24 फरवरी की दोपहर को वजीराबाद में सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों ने सर्विस रोड से मुख्य सड़क तक बढ़ना शुरू कर दिया. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, जिसने कथित तौर पर प्रदर्शनकारियों को "उग्र" बना दिया. शिकायतकर्ता ने प्रदर्शनकारियों पर पुलिस पर लाठी, लोहे की छड़ और पत्थरों से हमला करने और आंसू गैस के गोले और डंडों को छीनने का आरोप लगाया. नतीजतन एफआईआर में जोड़ा गया कि रतन लाल और उनके दो वरिष्ठ- गोकुलपुरी के सहायक आयुक्त अनुज कुमार और शाहदरा के उपायुक्त अमित कुमार शर्मा- जमीन पर गिर गए. कहा जाता है कि रतन लाल को आगे पथराव का शिकार होना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें सिर में चोट लग गई. जब "अतिरिक्त बल" पहुंची, भीड़ को नियंत्रित किया और घायल पुलिस को अस्पतालों में भेजा, तब शिकायतकर्ता ने पाया कि रतन लाल की मृत्यु हो गई थी. गुरमीत ने कहा, "दरअसल, जब गोली लगी तो उन्हें पता ही नहीं चला कि ऐसा हुआ है. जख्म उनके द्वारा पहने हुए दंगा रोधी गियर के नीचे दब गया था, इसलिए उस समय किसी को पता नहीं चला."

रतन लाल के मेडिको-लीगल सर्टिफिकेट और जांच रिपोर्ट दोनों ही गोली लगने से घायल होने काजिक्र नहीं करते. मेडिको-लीगल सर्टिफिकेट ने उल्लेख किया कि वह एक शारीरिक हमले के दौरान घायल हो गया था, जबकि जांच रिपोर्ट ने कहा कि वह पथराव के दौरान घायल हो गए थे. लेकिन पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने अपनी सामान्य टिप्पणियों में उल्लेख किया कि "[रतन लाल की] शर्ट की बाईं आस्तीन और भीतरी हिस्से में एक गोलाकार छेद मौजूद था, जिसे घेर दिया गया था." यह विवरण जांच के कागजात में बंदूक की गोली के घाव की अनुपस्थिति को और अधिक स्पष्ट बनाता है, क्योंकि यह पोस्टमार्टम से पहले एक पुलिस अधिकारी द्वारा मौत के स्पष्ट कारण के बारे में उनकी टिप्पणियों के आधार पर तैयार किया जाता है.

चिकित्सा दस्तावेजों में सवाल पैदा करने वाले विवरण हैं. जांच अधिकारी ने जांच रिपोर्ट में महत्वपूर्ण उपशीर्षकों के तहत विवरण नहीं भरा, जैसे रतन लाल की चोटों का विवरण और कोई हथियार जिससे चोट लगी हो. इसके अलावा रतन लाल के मेडिको-लीगल सर्टिफिकेट और आपातकालीन पंजीकरण कार्ड में कहा गया है कि एक कांस्टेबल उन्हें चांद बाग में "पीर दरगाह" से अस्पताल ले आया था. गुरमीत ने स्वीकार किया कि घटना स्थल से "पीर दरगाह वास्तव में काफी पीछे है, लगभग ढाई सौ मीटर दूर". उन्होंने कहा कि पूरे क्षेत्र को कभी-कभी चांद बाग पीर दरगाह के रूप में जाना जाता है. उन्होंने कहा, "उस समय वास्तव में जो हुआ उसे पूरी व्यवस्था का पतन कहा जाता है. उस समय जिसने भी अपनी क्षमता के हिसाब से जो भी अच्छा समझा, [उन्होंने उसे भर दिया.]"

उस दिन दंगे में मारे गए कम से कम पांच अन्य लोगों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट  मेडिकल बोर्ड द्वारा तैयार की गई थी. आरोपपत्र में संलग्न रतन लाल की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर केवल जीटीबी अस्पताल में फोरेंसिक मेडिसिन के सहायक प्रोफेसर और एक अज्ञात व्यक्ति के हस्ताक्षर थे, न कि पूर्ण मेडिकल बोर्ड के. इसके अलावा, हिंसा से संबंधित अन्य सभी आरोपपत्रों का मैंने अध्ययन किया था, जिसमें उल्लेख किया गया था कि संबंधित पोस्टमार्टम परीक्षणों की वीडियोग्राफी की गई थी, रतन लाल के मामले में ऐसी कोई टिप्पणी नहीं है. इन बातों के बारे में पूछे जाने पर गुरमीत ने कहा, “जो कुछ भी है, वह कागजों पर ही है. बोर्ड ने पोस्टमॉर्टम किया था.”

अभी यह पता नहीं चल पाया है कि रतन लाल को किसने गोली मारी. चार्जशीट में उद्धृत लगभग बीस पुलिसकर्मियों के बयान एक जैसी कहानी कहते हैं. उनमें से कई पुलिसकर्मियों ने बताया कि कुछ लोग पास की इमारतों की छतों पर खड़े होकर उन पर फायरिंग कर रहे थे. उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर हथियार रखने का भी आरोप लगाया. इनमें से कुछ बयानों के हिस्से एक जैसे हैं. हालांकि, किसी भी बयान में इस बात का जिक्र नहीं है कि घटनास्थल पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने आत्मरक्षा में या हवा में गोली चलाई, जबकि वे कथित तौर पर हमले की चपेट में आ गए थे. गुरमीत ने कहा कि पुलिस ने गोली नहीं चलाई.

रतन लाल के साथ जो दो वरिष्ठ अधिकारी थे, उन्हें भी नहीं पता था कि उन्हें किसने गोली मारी. उन दोनों ने अपने बयानों में एक ही पंक्ति दोहराई: "मुझे बाद में पता चला कि दंगाइयों ने हेड कांस्टेबल रतन लाल की गोली मारकर हत्या कर दी थी और कई अन्य पुलिस कर्मी भी गंभीर रूप से घायल हो गए थे."

दिल्ली पुलिस ने 28 जनवरी 2022 को एक हलफनामे में कहा कि मामले में पूरक जांच लंबित है. बैलिस्टिक रिपोर्ट में रतन लाल को गोली मारने के लिए इस्तेमाल किए गए हथियार के बारे में विवरण दीया जाना चाहिए, जो अब तक किसी भी आरोप पत्र में दायर नहीं किया गया है.

पुलिस ने मामले में 22 मुस्लिम आदमियों के खिलाफ हत्या और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने सहित गंभीर आरोप दर्ज किए हैं. गुरमीत ने मुझे बताया कि सोलह आरोपियों को जमानत मिल गई है. आरोप पत्र के मुताबिक किसी भी आरोपी के पास से कोई तमंचा बरामद नहीं हुआ है. एक कार्यकर्ता अतहर खान के बारे में कहा जाता है कि उसने एक हस्तलिखित बयान में स्वीकार किया था कि उसने उस दिन दंगे में भाग लिया था जिस पर साजिश के मामले में आरोप लगाया गया है. हालांकि, एक आरोप पत्र कहता है कि इस आरोपपत्र में संलग्न अपने बयान के नीचे "आरोपी ने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया."

दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल (बाएं), गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय (बीच में), और दिल्ली पुलिस के पूर्व आयुक्त अमूल्य पटनायक (दाएं), 25 फरवरी 2020 को दिल्ली के शहीद स्मारक स्थल पर हेड कांस्टेबल रतन लाल को श्रद्धांजलि देते हुए. दो साल बाद भी पुलिस यह पता नहीं लगा पाई है कि उत्तर-पूर्वी दिल्ली में तैनात रतन लाल को गोली किसने मारी थी, जो सीएए विरोध स्थल पर शांति बनाए रखने के लिए तैनात किए गए थे. कमल किशोर/पीटीआई

स्क्रॉल ने बताया कि सात आरोपियों के लगभग एक जैसे बयान हैं, जिनमें से सभी को 11 मार्च 2020 को गिरफ्तार किया गया था. इस बारे में पूछे जाने पर गुरमीत ने जवाब दिया, "कोई विरोधाभास नहीं है, नहीं? पुलिसकर्मियों की अपनी भाषा, एक निर्धारित भाषा होती है. पुलिसवाला एक व्यक्ति से प्रश्न पूछेगा और फिर अपनी भाषा में लिखेगा. इसमें क्या दिक्कत है?"

घटना के पांच दिन बाद मीडिया दरबार नामक एक स्थानीय मीडिया प्लेटफॉर्म ने एक वीडियो रिपोर्ट अपलोड की, जिसमें बताया गया कि रतन लाल को कैसे गोली मारी गई. एंकर ने कहा, "जीटीबी अस्पताल के मुर्दाघर में मौजूद उनके रिश्तेदारों ने हमें बताया कि जब भीड़ ने उन पर हमला किया, तो डीसीपी अमित शर्मा के सिर में चोट लग गई और वह गिर गए. रतन लाल उन्हें उठाने के लिए नीचे झुके और डीसीपी की तरफ से चलाई गई एक गोली उन्हें लगी." इस बारे में एक सवाल के जवाब में गुरमीत रुके और फिर हंस पड़े. उन्होंने इस तरह की कोई गोलीबारी होने से इनकार किया.

मैं रतन लाल की पत्नी पूनम से 2021 के अंत में मिला और उन्हें मीडिया दरबार  की क्लिप दिखाई. उसने कहा कि वह इसके बारे में कुछ नहीं जानती, लेकिन वह हैरान नहीं दिखी. मामले की जांच के बारे में पूछे जाने पर उनके भाई दीपक ने कहा, "हमें कुछ नहीं पता."

दंगे के दौरान एक और हताहत 36 वर्षीय अविवाहित बस कंडक्टर सिकंदर खान था. उसके भाई दर्जी मोहम्मद अशफाक ने मुझे बताया कि सिकंदर को लगातार पंद्रह दिनों तक नहीं देखा जाना परिवार के लिए सामान्य बात थी. चांद बाग में एक छोटे से घर में रहने वाले अशफाक ने कहा कि सिकंदर बस में रहता था. सिकंदर के पास खुद का मोबाइल फोन नहीं था, अगर वह अपने घर आने से पहले अपने परिवार से संपर्क करता है तो दोस्त से फोन उधार लेता था.

अशफाक ने मुझे बताया कि सिकंदर आखिरी बार 23 फरवरी 2020 को अपने घर आया था. मिश्रा ने करीब चार किलोमीटर दूर जाफराबाद मेट्रो स्टेशन पर भाषण दिया. अगले दिन अशफाक ने सुना कि कुछ झगड़े हो रहे हैं. उसने मकतूब मीडिया को नौ महीने बाद बताया, "मैंने शुरू में सोचा था कि यह कोई छोटा-मोटा झगड़ा है. दिल्ली में एक बड़ी झड़प नहीं हो सकती. दिल्ली पुलिस इन चीजों को बहुत जल्दी कंट्रोल कर लेती है.” उसने कहा कि उस शाम उसकी दुकान को लूट लिया गया था. अपने नुकसान की चिंता के साथ कुछ दिनों के लिए वह अपने परिवार के साथ अपने घर में दुबका रहा.

अशफाक ने बताया कि दंगा खत्म होने के करीब दस दिन बाद वह अपने भाई के बारे में पूछताछ करने लगा. उसने कहीं से सुना कि सिकंदर की मृत्यु हो गई है. उसने मुझे इस साल की शुरुआत में बताया था, "हमारी पूरी दुनिया तबाह हो गई." अशफाक को खजूरी खास पुलिस स्टेशन ले जाया गया, जहां पुलिस ने सिकंदर के पहचान चिह्न और अन्य विवरण मांगे. "उन्होंने बताया कि ऐसा कोई नहीं आया है," उसने मुझसे बताया. लेकिन, कुछ दिनों बाद जब उसने थाना प्रभारी से संपर्क किया तो उसे जीटीबी अस्पताल के मुर्दाघर भेज दिया गया, जहां उसे उसका भाई मिला. आखिरकार 19 मार्च को शव परिवार को सौंप दिया गया.

सिकंदर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट उसकी मौत के बारे में बताती है और यह भी सवाल उठाती है कि पुलिस ने इसे कैसे निपटाया. जांच पत्रों के अनुसार, रिपोर्ट में कहा गया है कि एक अज्ञात व्यक्ति "27 फरवरी 2020 को लगभग 11.20 बजे खजूरी चौक फ्लाईओवर के नीचे अचेत अवस्था में पाया गया था." करीब चार घंटे बाद जब वह अस्पताल पहुंचा, तब तक उसकी मौत हो चुकी थी.

खजूरी खास स्टेशन के एक अधिकारी द्वारा शव को "लाया और पहचाना गया", जहां से अशफाक को शुरुआत में वापस भेज दिया गया था. भले ही सिकंदर का शव 27 फरवरी को बरामद कर लिया गया हो, लेकिन दो हफ्ते बाद 11 मार्च को उसके शव का परीक्षण किया गया. चंडीगढ़ के पंजाब विश्वविद्यालय में चिकित्सा विज्ञान के संकाय में डीन रहे सर्जरी के एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. प्यारा लाल गर्ग ने कहा कि इस तरह की देरी असामान्य है. "आम तौर पर एक अज्ञात शव को निपटान से पहले 72 घंटे के लिए रखा जाता है और पुलिस द्वारा उक्त अवधि के दौरान पहचान के लिए सभी संभव उपाय किए जाते हैं."

सिकंदर की मौत का शायद सबसे रोचक पहलू यह है कि बहुत सारे संकेत होने के बावजूद दिल्ली पुलिस ने उसे सांप्रदायिक हिंसा के शिकार के रूप में मान्यता नहीं दी. उसका शव दंगे के तीसरे दिन बरामद किया गया था. दिल्ली पुलिस द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2020 से खजूरी खास सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक था, जहां स्थानीय पुलिस स्टेशन ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के सभी पुलिस स्टेशनों में दंगे से संबंधित सबसे अधिक मामले दर्ज किए थे. सिकंदर के सिर पर एक जख्म सहित शरीर पर छह बाहरी जख्म थे. गर्ग ने मुझे बताया कि जख्मों की गंभीरता के बारे में अंतिम राय बनाने के लिए हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट की जरूरत है. लेकिन अशफाक का मानना था कि उसके भाई को बहुत पीटा गया है. उसने मुझे बताया, "उसके शरीर पर सिर से पांव तक निशान थे."

सिकंदर की मौत के संबंध में पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया. अशफाक ने कहा कि वह खजूरी खास पुलिस स्टेशन के एक अधिकारी से एफआईआर दर्ज करने के लिए कह रहा था, लेकिन उसे प्रतिक्रिया मिली कि, "उसकी एफआईआर दर्ज की जाएगी, लेकिन ऐसा करने वाला मैं नहीं रहूॅंगा."

अक्टूबर 2020 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की नेता वृंदा करात ने सिकंदर को सांप्रदायिक हिंसा के शिकार के रूप में चिह्नित करते हुए पुलिस आयुक्त को एक पत्र लिखा. हिंदुस्तान टाइम्स ने दिल्ली पुलिस के एक प्रवक्ता के हवाले से कहा कि 27 फरवरी को खजूरी खास के एक सार्वजनिक शौचालय में एक अज्ञात शव मिला था. प्रवक्ता ने दावा किया, "शरीर पर कोई ताजा चोट के निशान नहीं हैं. जांच की कार्यवाही की गई. हम अभी अंतिम पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं लेकिन अभी तक उस मौत का दंगों से कोई संबंध नहीं मिला है.” यह स्पष्ट नहीं है कि प्रवक्ता ने यह क्यों कहा कि मामले में अंतिम पोस्टमार्टम होना है या पुलिस ने कैसे निष्कर्ष निकाला कि सिकंदर की मृत्यु दंगे में नहीं हुई थी.

अशफाक ने मुझे जनवरी में बताया कि वह एफआईआर दर्ज कराने के लिए दर-दर भटक रहा है. 16 सितंबर 2020 को उसके परिवार ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के तहत आवेदन किया था. यह धारा किसी व्यक्ति को एफआईआर दर्ज करने के लिए मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन करने का अधिकार देती है. दो महीने बाद दिल्ली पुलिस ने मजिस्ट्रेट से कहा कि उसे हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट मिल गई है, लेकिन वह मौत के कारण पर अंतिम राय देने के लिए अस्पताल की प्रतीक्षा कर रही है. लेकिन अशफाक को एक साल बाद भी पता नहीं था कि पुलिस ने क्या निष्कर्ष निकाला है और एफआईआर दर्ज की जाएगी या नहीं. मैंने जिन आरोप पत्रों का अध्ययन किया, इस बात के पर्याप्त सबूत होने के बावजूद कि विरोध काफी हद तक शांतिपूर्ण थे, उनमें से अधिकांश सीएए विरोधी प्रदर्शनों के पुलिस के वर्णन से शुरू होते हैं, जो हमेशा प्रदर्शनकारियों पर नकारात्मक प्रकाश डालते हैं- पुलिस की कहानी की एक और भी चौंकाने वाली विशेषता यह थी कि मुसलमानों ने सांप्रदायिक दंगे में अपने ही समुदाय के लोगों को मार डाला.

उदाहरण के लिए, जाफराबाद में हुए दंगे को लें, जिसमें 18 वर्षीय अमान इकबाल की मौत हो गई थी. 22 फरवरी की रात जाफराबाद के 66 फुटा रोड पर क्रिसेंट मोड पब्लिक स्कूल के पास एक मेट्रो पुल के नीचे करीब एक हजार लोगों ने धरना शुरू कर दिया. यह सड़क दिल्ली को उत्तर प्रदेश से जोड़ती है, जिसके एक तरफ मौजपुर और दूसरी तरफ सीलमपुर है. हिंसा के बारे में दर्ज मामले के आरोपपत्र में कहा गया है, “कई लोग ऐसे स्थानों पर पहुंच गए थे, प्रदर्शनकारियों को भड़काने और अपने देश विरोधी विचारों को फैलाने के लिए राष्ट्र विरोधी टिप्पणी की थी.” जाफराबाद में नाकेबंदी ने "अन्य समुदाय" (हिंदुओं) को परेशान किया.

फरवरी 2020 के दंगे के दौरान मौजपुर में पुलिस कर्मी. ईशान तन्खा

अगले दो दिनों में धरने पर स्थिति गर्म हो गई. 23 फरवरी की दोपहर को मिश्रा ने जाफराबाद में अपना भाषण दिया- यह एक ऐसी घटना है जिसका आरोप पत्र में उल्लेख नहीं है. मौजपुर में धरना स्थल से करीब आठ सौ मीटर की दूरी पर ''दूसरा समुदाय'' जमा हो गया और सड़क को साफ कराने की मांग की. पुलिस के अनुसार, सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों ने पथराव करना शुरू कर दिया, लेकिन पुलिस बल ने स्थिति को नियंत्रित किया. पुलिस की कहानी बताती है कि अगले दिन जैसे ही क्षेत्र के अन्य हिस्सों में दंगा शुरू हुआ, जाफराबाद प्रदर्शनकारियों ने विरोध कर रहे सीएए समर्थक प्रदर्शनकारियों की ओर अपना रास्ता बनाने की कोशिश की और उन्हें रोकने की कोशिश करने पर पुलिस पर पथराव किया गया. इसी बीच मौजपुर में शाहरुख पठान नाम के शख्स ने एक हेड कांस्टेबल पर बंदूक तान दी और गोलियां चला दीं. घटना के दौरान कोई घायल नहीं हुआ.

आरोप पत्र में कहा गया है कि अगले दिन दोपहर 1 बजे सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों ने फिर से मौजपुर की ओर बढ़ने की कोशिश की और इस बार लाठी और बंदूकों के साथ फिर से पुलिस पर हमला किया. पुलिस ने केवल "आत्मरक्षा" में 108 गोलियां चलाईं और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आठ आंसू गैस के गोले छोड़े. आरोप पत्र में उल्लेख किया गया है कि पुलिस ने 5.56-मिलीमीटर इंसास राइफलों का इस्तेमाल किया, लेकिन अन्य कैलिबर की गोलियां भी घटनास्थल से बरामद की गईं.

उस दोपहर के हंगामे में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के दस जवान, नौ पुलिसकर्मी और दस दंगाई घायल हो गए, जिनमें से कई बंदूक की गोली से घायल हुए और इकबाल की मौत हो गई. पुलिस ने मौत की कोई जिम्मेदारी नहीं ली. आरोप पत्र में कहा गया है, "दंगाइयों की गोली से ही दंगाइयों की मौत हो गई." इसमें कहा गया है कि प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दंगाइयों ने पुलिसकर्मियों को निशाना बना कर गोली चलाई थी लेकिन "उनकी गोलियां मेट्रो के खंभों से टकराकर अमान सहित हिंसक अवैध भीड़ को जा लगीं."

जब मैंने गर्ग से इस बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि "पुलिस कुछ भी कह सकती है, लेकिन एक प्रक्षेप्य के मेट्रो के खंभे से टकराने, विक्षेपित होने और फिर इतनी बड़ी चोट लगने की संभावना …ऐसा आम तौर पर नहीं देखा गया है क्योंकि एक विक्षेपित प्रक्षेप्य बल और वेग खो देता है." इकबाल की पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पुष्टि की कि "एक बंदूक का प्रक्षेप्य" उसके चेहरे के दाहिने हिस्से में घुस गया. एक पूरी गोली के बजाय लाश से "प्रक्षेप्य के तीन टुकड़े" बरामद किए गए.

मामले की बैलिस्टिक रिपोर्ट कहती है कि "विशेषताओं के मापदंडों की कमी" के कारण बुलेट के कैलिबर की पहचान नहीं की जा सकी. मामले से संबंधित दस्तावेजों की जांच करने वाले उत्तर प्रदेश के एक बैलिस्टिक विशेषज्ञ ने नाम न छापने की शर्त पर मुझे बताया कि उपलब्ध जानकारी के साथ हथियार के बोर के बारे में अधिक जानकारी देना संभव होगा.

पुलिस ने दंगा और हत्या से संबंधित धाराओं सहित भारतीय दंड संहिता के तहत 13 लोगों के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं, जिनमें से 11 मुस्लिम हैं. लोगों को सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान की रोकथाम अधिनियम और आयुध अधिनियम की धाराओं के तहत भी आरोपित किया गया था. मामले में दायर किसी भी आरोप पत्र में यह उल्लेख नहीं है कि इनमें से किसी व्यक्ति के पास से बन्दूक बरामद हुई है या नहीं.

जिन मामलों में पुलिस मुसलमानों पर दूसरे मुसलमानों की हत्या करने का आरोप लगाती है, उन मामलों में केवल मीडिया संगठनों ने ही कमियों को इंगित नहीं किया था. यहां तक कि कुछ जिला अदालतों के न्यायाधीशों ने भी इन मामलों में पुलिस की खिंचाई की.

35 वर्षीय आरिफ का मामला बताता है कि आरिफ 25 फरवरी 2020 को बृजपुरी में 24 वर्षीय जाकिर, 22 वर्षीय मेहताब खान और 24 वर्षीय अशफाक की हत्या के आरोपितों में शामिल है. उसे उसी साल 16 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया था. इन हत्या के मामलों में दायर तीन आरोप पत्रों में कहा गया है कि आरिफ मुस्लिम भीड़ का नेतृत्व कर रहा था और हिंदुओं की संपत्तियों में तोड़फोड़ कर रहा था. अशफाक और जाकिर के मामलों में आरोप पत्र में आरिफ के एक जैसे बयान हैं- और मेहताब के मामले में दायर एक आरोप पत्र में केवल कुछ वाक्य हैं जो अन्य दो से भिन्न हैं. अशफाक और जाकिर के मामलों में संलग्न बयान 16 अप्रैल को दर्ज किए गए थे, जबकि मेहताब के मामले में संलग्न बयान अगले दिन दर्ज किए गए थे.

इन बयानों में आरिफ ने कथित तौर पर स्वीकार किया कि वह बृजपुरी में तीन लोगों को मारने के लिए "हिंदू भीड़" में शामिल हुआ था. उसने कहा कि मुसलमानों ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में "आगजनी" की. आरिफ ने बताया कि उस जगह पर हिंदू भीड़ भी थी. " हिंदुओं की पथराव करने वाली भीड़ अचानक हमारे पास आ गई और हम में से कई मुस्लिम लड़के फंस गए. भीड़ तीन मुस्लिम लड़कों की बुरी तरह पिटाई कर रही थी. मैंने डर के मारे हौले से अपने चेहरे को ढक लिया और जान बचाने के लिए मैंने वे साम्प्रदायिक नारे लगाने शुरू कर दिये, जो हिंदू भीड़ लगा रही थी और दंगाइयों में शामिल हो गया और उन तीन मुस्लिम लड़कों को भी पीटना शुरू कर दिया. कुछ ही देर में तीनों मुस्लिम लड़के नीचे गिर पड़े और मैं भागने में सफल रहा. मुझसे गलती हो गई, मुझे माफ कर दो."

हत्या के एक मामले में 11 दिसंबर 2020 को आरिफ को जमानत देते हुए जिला जज विनोद यादव ने बताया कि यह कहानी कितनी अजीब है. यादव ने कहा, "यह बहुत अस्पष्ट है कि एक मुस्लिम लड़का एक 'गैरकानूनी भीड़' का हिस्सा बन जाए, जिसमें ज्यादातर हिंदू समुदाय के लोग शामिल थे, जिसका सामान्य उद्देश्य दूसरे समुदाय की संपत्ति, जीवन और समुदाय के हिस्से को अधिकतम नुकसान पहुंचाना था." उन्होंने बताया कि आरिफ इलाके के किसी भी वीडियो फुटेज में दिखाई नहीं दिया. इसके अलावा, मामले के तीन चश्मदीद दंगे में आरिफ की सही भूमिका नहीं बता सके. यादव ने कहा, "आवेदक के खिलाफ प्राथमिक सामग्री उसका बयान है, जिसका कोई मतलब नहीं है." अदालत में साक्ष्य के रूप में एक बयान स्वीकार्य नहीं है.

अभियोजन पक्ष के इस तर्क का हवाला देते हुए कि अदालत ने एक अन्य आरोपी व्यक्ति - हिंदू जितेंद्र के लिए जमानत खारिज कर दी थी - यादव ने कहा कि आरिफ का मामला अलग था. "दिमाग यह स्वीकार नहीं करता है कि एक मुस्लिम होने के नाते आवेदक 'गैरकानूनी भीड़' के सदस्यों के साथ इस तरह के गंभीर माहौल में कंधे से कंधा मिलाकर चलेगा, जिसमें मुख्य रूप से हिंदू समुदाय के लोग शामिल थे और एक मुस्लिम लड़के को पीट-पीट कर मार रहे थे."

बाद में आरिफ को अन्य मामलों में भी जमानत मिल गई. अक्टूबर 2021 में यादव को राउज़ एवेन्यू कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां वे विशेष रूप से केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा दायर मामलों की सुनवाई करते हैं, जिन्होंने दंगे में पुलिस को दोषी ठहराते हुए कई फैसले दिए थे.

मैं इस साल जनवरी में आरिफ के घर बृजपुरी गया था. उसकी अधेड़ उम्र की मां ने अपनी पहचान न बताते हुए मुझे बताया कि आरिफ मीडिया से बात नहीं करना चाहता. उन्होंने बताया कि उसे लगा कि पुलिस ने उसे निशाना बनाया है. उसने मुझे बताया, “देखो, पुलिस उसे पहले से ही छोटे-मोटे अपराधों में फंसा रही थी.” उन्होंने बताया कि अशफाक आरिफ का रिश्तेदार था, जिस पर आरिफ की हत्या का आरोप लगाया गया था. (अशफाक के परिवार ने अक्टूबर 2020 में न्यूजलॉन्ड्री को इसकी पुष्टि की थी.) उसने बताया कि अस्पताल से अशफाक का शव लेने जाने वालों में आरिफ के पिता भी थे. "लेकिन हमें नहीं पता था कि आरिफ को बाद में उसी मामले में गिरफ्तार किया जाएगा, अगर आप इस बात को नज़रअंदाज़ भी करते हैं तो खुद सोचिए कि क्या कोई मुसलमान सांप्रदायिक दंगे में अपने ही धर्म के किसी व्यक्ति की हत्या कर सकता है?"

एक अन्य मामले में अदालत ने जांच के लिए दिल्ली पुलिस की खिंचाई की, यह 22 वर्षीय शाहिद आलम का मामला है. 24 फरवरी 2020 को रतन लाल की मौत के कुछ घंटे बाद वजीराबाद में एक सीएए विरोधी प्रदर्शनकारी की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई. कई रिपोर्टों के अनुसार, इलाके में हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे पर पथराव कर रहे थे- हिंदू मोहन नर्सिंग होम की छत पर थे और मुसलमान सड़क के दूसरी तरफ सप्तऋषि भवन की छत पर थे. फोटो जर्नलिस्टों ने सबूत दर्ज किए हैं कि मोहन नर्सिंग होम के लोग दूसरी तरफ गोली चला रहे थे.

मामले के सभी छ: आरोपी मुस्लिम हैं और उन्हें अगले दो महीनों में गिरफ्तार कर लिया गया. तीन आरोपियों के लिए जमानत आदेश में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत ने कहा कि आरोपी ने तीन हिंदू पुरुषों और उनके परिवारों को अपराध स्थल से बाहर जाने के लिए कहा था. कैत ने फैसला सुनाया, "अगर वे वास्तव में इस सांप्रदायिक दंगे में शामिल थे और हिंदू समुदाय के सदस्यों को नुकसान पहुंचाना चाहते थे, तो उन्होंने ... हिंदू समुदाय के सदस्यों की जान बचाने की कोशिश नहीं की होती." आरोपी के पास से तमंचा या हथियार बरामद किया गया है.

अदालत ने दिल्ली पुलिस के मामले में अन्य कमियां भी निकालीं. अदालत ने पुलिस के इस दावे को खारिज कर दिया कि "गोलीबारी संभवतः निकट से हुई थी" - यह एक ऐसा दावा था जो इंगित करता कि मुस्लिम पथराव करने वालों ने खुद शाहिद को गोली मार दी थी. जमानत के आदेश में कहा गया है, "एंटेमॉर्टम की चोट में घाव के आकार और ट्रैक के शुरुआती हिस्से के रंग का उल्लेख नहीं है जो गोली चलने की सीमा तय करने के लिए आवश्यक हैं. क्लोज़-रेंज शॉट का सिद्धांत केवल जांच एजेंसी का अनुमान है और वैज्ञानिक तथ्य पर आधारित नहीं है."

 

मोहम्मद नासिर खान ने आरोप लगाया है कि 24 फरवरी 2020 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे के दौरान नरेश त्यागी ने उसकी आंख में गोली मार दी थी. नासिर ने त्यागी के खिलाफ एफाईआर दर्ज कराने की कोशिश की लेकिन भजनपुरा थाने ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. कारवां के लिए शाहिद तांत्रे

8 जुलाई 2020 को विशेष पुलिस आयुक्त (अपराध) प्रवीर रंजन ने दिल्ली दंगे की जांच कर रहे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को एक पत्र जारी किया:

एक खुफिया जानकारी के अनुसार, हाल ही में दिल्ली दंगों के सिलसिले में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के चांद बाग और खजूरी खास इलाकों से कुछ हिंदू युवकों की गिरफ्तारी से वहां के हिंदू समुदाय में काफी नाराजगी है. समुदाय के प्रतिनिधि आरोप लगा रहे हैं कि ये गिरफ्तारियां बिना किसी सबूत के की गई हैं और यहां तक कि इस बात पर भी जोर दे रहे हैं कि इस तरह की गिरफ्तारियां कुछ निजी कारणों से की जा रही हैं...किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय सावधानी और सतर्कता बरती जाए.

दंगे में अपने पिता को खोने वाले 25 वर्षीय साहिल परवेज ने रंजन के आदेश को चुनौती देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की. अगले महीने अदालत ने आदेश दिया कि जांच अधिकारियों को मामलों की जांच करते समय रंजन के आदेश को ध्यान में नहीं रखना चाहिए, लेकिन दिल्ली पुलिस पर इस तरह के निर्देश जारी करने के लिए कोई जुर्माना नहीं लगाया.

जिन मामलों में मुख्य आरोपी हिंदू हैं, उनसे निपटने के दौरान पुलिस का रवैया भी देखने लायक है. शाहदरा के पड़ोस के उत्तरी घोंडा के त्यागी परिवार के सदस्य साहिल के पिता की हत्या सहित कम से कम तीन मामलों में आरोपी हैं.

भजनपुरा पुलिस स्टेशन में 18 मार्च 2020 को दर्ज एक शिकायत में साहिल ने दावा किया कि उसने 25 फरवरी को सुशील नामक एक व्यक्ति को अपने पिता परवेज को गोली मारते देखा था. साहिल ने आरोप लगाया कि सुशील के साथ चार-पांच लोग थे, जिन्हें उसने पहचान लिया था. उसने लिखा कि वह अपने पिता को जीटीबी अस्पताल ले गया, और अस्पताल में पुलिसकर्मियों ने डॉक्टर की मौजूदगी में उससे विवरण मांगा. जब उसने अपने पिता को गोली मारने वाले सुशील का उल्लेख किया, तो वहां एक "पुलिसकर्मी ने मुझे धमकी दी." अगले दिन एफआईआर दर्ज की गई, लेकिन इसमें किसी आरोपी का नाम नहीं था.

इसके तुरंत बाद परवेज की मौत हो गई. साहिल अपने पिता के शव को अंतिम संस्कार के लिए उनके गृहनगर ले गया. जब वह वापस आया, तो उसने लिखा कि उसके पिता के हमलावरों ने उसे यह कहते हुए धमकाना शुरू कर दिया कि, "अगर तुम अपना मुंह खोलोगे, तो हम तुम्हारे पूरे परिवार को गोलियों से भून देंगे." उन्होंने कथित तौर पर आगे कहा कि, "अगर तुम पुलिस के पास गए, तो हम एक मिनट में पता लगा लेंगे ... पूरा पुलिस विभाग हमारे साथ है." साहिल ने लिखा कि इस अर्जी को जमा करने के लिए बड़ी हिम्मत की जरूरत थी.

16 मार्च के बाद विशेष जांच दल के एक सदस्य ने इस मामले को अपने हाथ में लिया. साहिल का पहला बयान 3 अप्रैल को दर्ज किया गया था. छ: दिन बाद क्राइम ब्रांच ने इस मामले में 16 आरोपियों को गिरफ्तार किया था. (द क्विंट ने बाद में बताया कि वे सभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए थे.) अगले दिन पुलिस ने सुशील की एक दिन की पुलिस हिरासत की अनुमति ली, ताकि वे उससे स्वतंत्र रूप से पूछताछ कर सकें और बाकी 15 लोगों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया. पुलिस ने मूल आरोप पत्र में कहा कि वह सुशील के खिलाफ आयुध अधिनियम के तहत लगे आरोप को हटा रही है, क्योंकि "गंभीर प्रयासों के बावजूद, अब तक अपराध का हथियार (बंदूक) बरामद नहीं हुआ है."

मामले के आरोपियों में नरेश और उत्तम त्यागी दोनों भाई भी थे. तीन शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से दोनों भाइयों को आपराधिक गतिविधियों में लिप्त देखा. उदाहरण के लिए, साहिल ने अपने आवेदन में लिखा था कि 24 फरवरी को उसने नरेश, उत्तम और उनके भाई सुभाष को अन्य लोगों के साथ "कपिल मिश्रा जिंदाबाद!" जैसे नारे लगाने वाली भीड़ का नेतृत्व करते हुए देखा. साहिल ने लिखा कि वे लोग बंदूकों और लोहे की छड़ों से लैस थे और उन्होंने पेट्रोल बम भी फेंके.

साहिल ने अपनी शिकायत में यह भी लिखा था कि उसने 24 फरवरी को नरेश को मोहम्मद नासिर खान की आंख में गोली मारते देखा था. गोली लगने से बाल-बाल बचे नासिर खुद कई बार आरोप दोहरा चुके हैं. नासिर ने 17 जुलाई 2020 को कड़कड़डूमा अदालत में एफआईआर दर्ज करने की मांग करते हुए एक आवेदन में लिखा कि जहां वह रहते हैं, उस गली में उन्होंने उस रात सौ से अधिक दंगाइयों को लोहे की छड़, पिस्तौल, तलवार, पेट्रोल बम और देसी बम ले जाते हुए देखा. नासिर ने लिखा है कि "भीड़ का नेतृत्व त्यागी स्टोर के मालिकों ने किया था" - नरेश, उत्तम और सुभाष - साथ ही सुशील और नरेश ने उसकी बाईं आंख में गोली मार दी थी. नासिर ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि उनके परिवार के सदस्यों ने पुलिस हेल्पलाइन नंबरों पर फोन किया था, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. उसका ऑटोरिक्शा चालक पड़ोसी उसे जीटीबी अस्पताल ले गया. उन्होंने अपनी बाईं आंख खो दी और उन्हें रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी करानी पड़ी.

नासिर ने बताया कि वह नरेश के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की कोशिश कर रहा था, लेकिन भजनपुरा थाने ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. जुलाई 2020 में उसने कारवां को बताया कि त्यागियों ने उन्हें धमकी दी थी. "उन्होंने कहा कि उनके राजनीतिक संबंध हैं और उन्होंने हमें शिकायत करने की चुनौती दी. उन सभी ने अपने रिश्तेदारों को डीसीपी, एसएचओ और कुछ न कुछ के रूप में गिनाया." धमकियों के बावजूद उसने मुस्तफाबाद के एक सरकारी राहत शिविर में पुलिस हेल्प डेस्क पर एक और शिकायत करने से पहले मार्च के अंत में पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई थी. वह यह पता लगाने के लिए अधिकारियों के पीछे लगा रहा कि क्या पुलिस मामले की जांच कर रही है, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

नासिर ने कहा कि उस जुलाई में पुलिस ने उसे सूचित किया कि उसके मामले में आरोप पत्र पहले ही दायर किया जा चुका है. उन्होंने मामले की पहचान भजनपुरा में दर्ज 2020 के एफआईआर 64 के रूप में की. नासिर ने कहा कि यह उनके लिए आश्चर्य की बात है. "उन्होंने मुझसे एक बार भी संपर्क किए बिना मेरे मामले की जांच कैसे की?"

पुलिस की गवाही के आधार पर दर्ज किए गए एफआईआर में 24 फरवरी को मौजपुर चौक पर दंगाइयों के दो समूहों के बीच हुए दंगे का जिक्र है. हिंसा के बारे में सूचना मिलने के बाद एक अधिकारी ने जीटीबी अस्पताल का दौरा किया और नासिर सहित बंदूक की गोली से घायल सात लोगों के मेडिको-लीगल सर्टिफिकेट लिए और उनसे संबंधित मामला दर्ज किया. यह स्पष्ट नहीं है कि पुलिस ने उन सभी सातों के लिए एक ही मामला क्यों दर्ज किया, खासकर जब नासिर उत्तरी घोंडा में घायल हो गया था जो मौजपुर से कम से कम एक किलोमीटर दूर है. मामले के सभी पांच आरोपी मुस्लिम थे. आरोप पत्र में कहा गया है कि इन लोगों की पहचान सोशल मीडिया पर फैले दंगे के वीडियो से हुई है.

नासिर के आवेदन के जवाब में 21 अक्टूबर 2020 को एक मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने भजनपुरा पुलिस स्टेशन को 24 घंटे के भीतर आदेश पालन करने और एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया. लेकिन थाने ने इसका विरोध किया और आदेश में संशोधन की मांग की. 13 जुलाई 2021 को विनोद यादव ने पुलिस के अनुरोध को खारिज कर दिया और कहा कि पुलिस ने "घोस अनौपचारिक, कठोर और हास्यास्पद तरीके से" मामले की जांच की है."

यादव ने कहा कि जांच एजेंसी को पता था कि सात पीड़ित लोगों को गोलियां लगी थीं, लेकिन "जिन कारणों से वे सबसे अच्छी तरह से वाकिफ थे," उन्होंने एफआईआर दर्ज करते समय आयुध अधिनियम या हत्या के प्रयास के तहत एक भी प्रासंगिक आरोप नहीं लगाया था. उन्होंने बताया कि केस डायरी को ठीक से नहीं भरा गया था. नासिर के मामले ने एक "काउंटर वर्जन" प्रस्तुत किया और दोनों मामलों को एक साथ जोड़ने का कोई कारण नहीं था. उन्होंने आगे 25,000 रुपये का हर्जाना लगाया, जो "याचिकाकर्ता और उसके पर्यवेक्षण आधिकारियों से वसूल की जाएगी, जो इस संबंध में उचित जांच करने के बाद इस मामले में अपने वैधानिक कर्तव्यों में बुरी तरह विफल रहे हैं." राज्य ने इस आदेश को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी और मामला लंबित है. अप्रैल 2022 के मध्य तक नासिर के मामले में कोई एफआईआर दर्ज नहीं किया गया था.

त्यागियों के खिलाफ तीसरा आरोप मोहम्मद सलीम द्वारा लगाया गया था, जो दिल्ली हिंसा से संबंधित कई मामलों में आरोपी हैं. 18 मार्च 2020 को मजिस्ट्रेट के पास एफआईआर दर्ज करने के लिए दिए गए आवेदन में सलीम ने त्यागी बंधुओं पर 24 फरवरी की रात को जबरन उनके घर में घुसने का आरोप लगाया. उन्होंने आरोप लगाया कि सुभाष और एक अन्य व्यक्ति ने उनके घर पर गोलियां चलाईं.

जब मैं सलीम से मिलने गया, तो उसने मुझे अपने घर की दीवार पर छेद दिखाया. उन्होंने अपनी अर्जी में लिखा है कि हमलावरों ने उनकी छत से फायरिंग भी की और गाली-गलौज और धमकी दी. उसने कई बार पुलिस हेल्पलाइन नंबर पर फोन किया था. उन्होंने लिखा, 'लेकिन कई बार फोन करने के बाद भी कोई पुलिसकर्मी नहीं पहुंचा. सलीम ने कहा कि उन्होंने जाफराबाद पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करने की असफल कोशिश की और दिल्ली के उत्तर-पूर्वी जिले के उपायुक्त को अपनी शिकायत ईमेल भी की.

सलीम की अर्जी पर 19 मार्च 2020 को दोपहर 2 बजे मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के सामने सुनवाई होनी थी, लेकिन वह उपस्थित नहीं हो सके. उनके वकीलों ने उस शाम कमिश्नर और अन्य सरकारी अधिकारियों को एक ईमेल भेजा. ईमेल में बताया गया कि उस दोपहर करीब 1 बजे सलीम के घर पर करीब तीस लोग आए थे और उसे अपना आवेदन वापस लेने के लिए कहा था. उन्होंने उससे कहा कि अगर उसने ऐसा नहीं किया तो "उसे और उसके परिवार को झूठे मामलों में फंसाया जाएगा और उनके द्वारा गंभीर परिणाम भुगतने होंगे." ईमेल में बताया गया है कि सलीम को फिर भजनपुरा थाने ले जाया गया. बाद में उसे गिरफ्तार कर लिया गया और जनवरी में जमानत पर रिहा कर दिया गया.

 

जामिया मिलिया इस्लामिया के एक छात्र को गोली मार कर घायल करने के एक साल बाद राम गोपाल शर्मा ने हरियाणा के गुरुग्राम जिले के पटौदी में एक महापंचायत में अभद्र भाषण दिया, वहां उसने कहा, " जब मुल्ले काटे जाएंगे, राम नाम चिल्लाएंगे."

नरेश और उत्तम को पिछले दिसंबर में रिहा किया गया था, जबकि सुशील ने मुझे बताया कि उन्हें पिछले मार्च में रिहा किया गया था. तीनों ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया. सुभाष से संपर्क नहीं हो सका.

21 दिसंबर 2021 को कलीम अहमद दिल्ली दंगे के लिए दोषी ठहराए जाने वाले पहले व्यक्ति थे. अहमद ने शाहरुख पठान को शरण दी थी, जो 24 फरवरी को वायरल वीडियो में मौजपुर में एक हेड कांस्टेबल पर बंदूक लहराते हुए देखा गया था. पुलिस ने 3 मार्च को पठान को गिरफ्तार किया था और उस पर एक अन्य मामले में भी मामला दर्ज किया था. पठान जेल में है.

इस बीच सीएए विरोध प्रदर्शन के दौरान अकारण गोलीबारी करने का आरोपी एक अन्य व्यक्ति जमानत पर बाहर है. 30 जनवरी 2020 को जब जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र विश्वविद्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, तब 17 वर्षीय राम गोपाल शर्मा ने गोली चला दी, जिससे उनमें से एक घायल हो गया. कई लोगों ने बताया कि गोली चलने के एक वायरल वीडियो में पुलिसकर्मियों को शर्मा को बंदूक से लैस छात्रों की ओर जाते देखते हुए और कोई कार्रवाई नहीं करते हुए देखा जा सकता है. शर्मा को नाबालिग के रूप में दर्ज किया गया था और कुछ महीनों के भीतर रिहा कर दिया गया था. जुलाई 2021 में उन्होंने हरियाणा के गुरुग्राम जिले के पटौदी में एक महापंचायत में अभद्र भाषण दिया, जहाँ उन्होंने कहा, “ जब मुल्ले काटे जाएंगे, राम नाम चिलेंगे जब मुसलमानों का कत्ल किया जाएगा, तो वे राम नाम का जयकार करेंगे. आरोपित भीड़ ने उनके साथ नारा लगाया. उन्हें फिर से गिरफ्तार किया गया और अगले महीने रिहा कर दिया गया.

जामिया गोली कांड के लिए शर्मा के खिलाफ जांच की स्थिति ज्ञात नहीं है. शर्मा की गोली से घायल हुए शादाब फारूक ने मुझे बताया, “मेरी जानकारी में एफआईआर दर्ज होने के बाद मामले में कुछ नहीं हुआ. मुझे जांच के लिए पुलिस से बुलावा आना था, लेकिन मुझे अब तक उनसे कोई संदेश नहीं मिला है."

जामिया टीचर्स सॉलिडेरिटी एसोसिएशन द्वारा फ्रेम्ड, डैम्न्ड, अक्विंटेड में ऐसे कई मामलों का उल्लेख है, जिनमें विशेष प्रकोष्ठ के एक मामले की प्रारंभिक कहानी अलग बाद में अलग निकली. उनमें से पुलिस बनाम खोंगबंटबम ब्रोजेन सिंह मामला है. अभियोजन पक्ष के अनुसार, विशेष प्रकोष्ठ के सहायक आयुक्त राजबीर सिंह को मार्च 2002 में "एक केंद्रीय खुफिया एजेंसी" से सूचना मिली थी कि मणिपुर की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी से संबद्ध "ज्ञात आतंकवादी" ब्रोजेन सिंह एक साथी के साथ दिल्ली में छिपा हुआ है. दोनों को विवादास्पद आतंकवाद निरोधक अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया और उन पर आरोप लगाया गया. (पोटा को 2004 में निरस्त कर दिया गया था.)

रिपोर्ट में बताया गया है कि ब्रोजेन सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम के खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों में भाग लिया करते थे और उनके खिलाफ मणिपुर में दो मामले दर्ज थे. उन्होंने पहले एक अवसर पर गलत तरीके से हिरासत में लिए जाने के खिलाफ याचिका दायर की थी और गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने उन्हें मुआवजे के रूप में 60000 रुपए दिए थे.

उसकी गिरफ्तारी के सात साल बाद, 12 मई 2009 को एक जिला न्यायाधीश ने ब्रोजेन को बरी कर दिया. न्यायाधीश ने बताया कि ब्रोजेन की गिरफ्तारी के समय पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज किया गया बयान और एक महीने बाद एक अन्य अधिकारी द्वारा दर्ज किया गया उनका कबूलनामा एक जैसा था. न्यायाधीश ने कहा, "[अल्पविराम] और पूर्ण विराम सहित पूरा बयान शब्द-दर-शब्द बिल्कुल एक जैसा है. ऐसी स्वीकारोक्ति करने वाले व्यक्ति या इसे दर्ज करने वाले व्यक्ति दोनों के लिए यह मानवीय रूप से असंभव लगता है कि संपूर्ण इकबालिया बयान शब्द दर शब्द बिल्कुल एक जैसा हो." जेटीएसए लिखता है कि अदालत ने इस स्पष्टीकरण से सहमति व्यक्त की कि, चूंकि ब्रोजेन को "राज्य के अधिकारियों द्वारा एक आतंकवादी के रूप में चिन्हित किया गया था और वह पहले से ही अदालत की अवमानना में उनकी सजा पाने के लिए अधिकारियों के क्रोध को झेल चुका था, पुलिस ने उसे इस अपराध का शिकार बनाने के लिए लक्षित किया."

राजबीर सिंह विशेष प्रकोष्ठ के सबसे प्रसिद्ध और विवादास्पद अधिकारियों में से एक थे, जिन्हें कथित तौर पर ब्रोजेन मामले में प्रारंभिक टिप मिली थी. 1982 में दिल्ली पुलिस में एक सब-इंस्पेक्टर के रूप में आने के बाद वह लगातार ऊपर उठे और एक "एनकाउंटर स्पेशलिस्ट" के रूप में ख्याति प्राप्त की, जिनके नाम पर चालीस से अधिक हत्याएं हैं. सत्ता में बैठे लोगों से उन्हें लगातार प्रोत्साहन मिला. उन्हें बारी-बारी से पदोन्नत किया गया, उस समय के गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी से विशेष प्रशंसा के लिए चुना गया और राष्ट्रपति से वीरता पुरस्कार भी प्राप्त किया.

हालांकि बाद में राजबीर विशेष प्रकोष्ठ के काले इतिहास का पर्याय बन गए. इससे पहले कि आरोपी वर्षों तक सलाखों के पीछे रहे और कथित तौर पर हिरासत में यातना का सामना करे, अदालत में उन्होंने एक साथ कई मामले नत्थी कर दिए थे. 2007 में संपत्ति हथियाने और ड्रग माफिया से कथित संबंधों के आरोपों के बाद राजबीर को अपराध शाखा से हटा दिया गया था. हालांकि, सतर्कता विभाग आरोपों की पुष्टि करने में विफल रहा, तब वह एक विशेष आतंकवाद विरोधी सेल के प्रमुख बन गए. जी न्यूज के अनुसार, मार्च 2008 में जब वह प्रदान की गई सेवाओं के लिए 60 लाख रुपए लेने गए थे तो एक प्रॉपर्टी डीलर ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी.

दिसंबर 2001 में राजबीर ने संसद हमले की जांच अपने हाथ में ले ली. हमले को अंजाम देने वाले सभी पांच लोगों की मौके पर ही गोली मारकर हत्या कर दी गई, लेकिन दो दिन बाद पुलिस ने पांच आरोपियों को नामजद किया और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एसएआर गिलानी को इसके पीछे का मास्टरमाइंड बताया. अक्टूबर 2019 में कारवां द्वारा प्रकाशित गिलानी के स्मृतिलेख में बताया गया है कि जब उन्हें हिरासत में लिया गया था, तब क्या हुआ था.

विशेष प्रकोष्ठ के लोगों ने उन्हें उल्टा लटका दिया और लगातार गाली-गलौज करते हुए उनके पैरों के तलवों पर मारा. फिर उन्हें नीचे उतारा गया और एक बर्फ की सिल्ली पर रख दिया गया, जहां उन्हें तब तक पीटा गया जब तक कि वह लगभग बेहोश नहीं हो गए. उन्हें हथकड़ी में थाने के ठंडे फर्श पर उनके पैरों को जंजीरों से मेज पर बांध कर लिटा दिया. उनके बच्चों को अपने पिता को इस अवस्था में दिखाया गया और पुलिसकर्मियों ने उनकी पत्नी को झूठा कबूलनामा नहीं देने पर बलात्कार करने की धमकी दी.

गिलानी ने कबूल करने से इनकार कर दिया. उन पर पोटा के तहत आरोप लगाया गया था, जो उस समय एक अध्यादेश था. निचली अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया और उन्हें मौत की सजा सुनाई.

दिल्ली उच्च न्यायालय ने बाद में गिलानी और उनके एक सह-आरोपी अफसान गुरु को बरी करते हुए फैसले को पलट दिया. अदालत ने फैसला सुनाया, "अभियोजन पक्ष सबूत लाने में विफल रहा है” कि गिलानी साजिश में शामिल थे. दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की. लेकिन वहां भी उसके खिलाफ फैसला गया. पुलिस ने गिलानी पर आरोप क्यों और कैसे लगाया, इसकी कोई जांच नहीं हुई है.

मामले के एक अन्य आरोपी अफजल गुरु को मौत की सजा सुनाई गई. सजा के खिलाफ बहस करते हुए 2006 के एक लेख में पत्रकार सोनिया जब्बार ने जोर देकर कहा कि पुलिस अभी भी हमले के बारे में कई सवालों के जवाब नहीं दे पाई है. उन्होंने लिखा कि "हमले की प्रचंडता और इस तथ्य को देखते हुए कि हम पाकिस्तान के साथ लगभग युद्ध की स्थिति में चले गए थे” जांच एजेंसी के रूप में विशेष प्रकोष्ठ और जांच अधिकारी के रूप में राजबीर का चयन किया जाना, पूर्व में अपनाई गई प्रक्रिया से अलग था. उन्होंने बताया कि जांच "रिकॉर्ड 17 दिनों में पूरी हो गई" और अफजल के कबूलनामे को, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अविश्वसनीय माना था, सही माना गया. जांचकर्ताओं ने अफजल के बाद के बयानों से सामने आए पहलुओं पर कार्रवाई करने से इनकार कर दिया था, जैसे कि विवादास्पद पुलिसकर्मी दविंदर सिंह की कथित संलिप्तता- जिसे जनवरी 2020 में हिजबुल मुजाहिदीन के दो आतंकवादियों के साथ यात्रा करते समय गिरफ्तार किया गया. जब्बार ने लिखा, “नतीजतन इसके अलावा और कुछ भी नहीं है जो मास्टरमाइंड को अफजल के साथ जोड़ने के लिए घटनाओं के क्रम या साजिश के सिद्धांत की पुष्टि करता हो. हमलावर कौन थे? मास्टरमाइंड कौन थे? साजिश क्या थी? संसद पर हमले के पांच साल बाद भी भारतीय जनता सच्चाई नहीं जानती है और एक आदमी को फांसी पर लटकाने, मामले को बंद करने और बाकी चीजों को ढक देने से संतुष्ट लगती है.

 

16 फरवरी 2003 को तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी से वीरता के लिए पुलिस पदक प्राप्त करने वाले सहायक पुलिस आयुक्त राजबीर सिंह. राजबीर विशेष प्रकोष्ठ के काले इतिहास का पर्याय थे और अपने नाम पर 40 से अधिक हत्याओं के साथ एक "एनकाउंटर स्पेशलिस्ट" के रूप में ख्याति पायी थी. ज़ी न्यूज़ के अनुसार, मार्च 2008 में जब वे प्रदान की गई सेवाओं के लिए 60 लाख रुपये लेने गए थे, तो एक प्रॉपर्टी डीलर ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी. बीसीसीएल

नवंबर 2005 में कश्मीर के एक शॉल बुनकर मोहम्मद हुसैन फाजिली को दिल्ली में सिलसिलेवार धमाकों के संबंध में गिरफ्तार किया गया था, जिसमें एक महीने पहले 67 लोग मारे गए थे और 200 से अधिक घायल हुए थे. फाजिली को आंखों पर पट्टी बांधकर दिल्ली लाया गया, जहां उसे लोधी रोड स्थित विशेष प्रकोष्ठ के कार्यालय भेज दिया गया. उसे 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया, जैसा कि कानूनन अनिवार्य है. बारह साल बाद उसे दिल्ली की एक अदालत ने बरी कर दिया. बरी होने के बाद उसने विशेष प्रकोष्ठ के हाथों शारीरिक और मानसिक यातनाओं का विस्तार से वर्णन किया- जिसमें कई बार मार-पीट और खुद का मल खाने के लिए मजबूर किया जाना शामिल है. यह ज्ञात नहीं है कि इन आरोपों की कभी जांच की गई थी या नहीं.

आज विशेष प्रकोष्ठ ज्यादातर 2020 के दिल्ली दंगे में साजिश के मामले में अपने बयान के लिए चर्चा में है. आरोप पत्र इस तरह शुरू होता है : 6 मार्च की दोपहर को एक मुखबिर ने क्राइम ब्रांच में एक सब-इंस्पेक्टर को बताया कि दिल्ली दंगा “उमर खालिद और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के साथी छात्रों और कुछ संगठनों के सदस्यों द्वारा रची गई साजिश का परिणाम था." क्राइम ब्रांच ने उसी दिन एफआईआर दर्ज की और बाद में जांच को विशेष प्रकोष्ठ को सौंप दिया.

कई पत्रकारों और टिप्पणीकारों ने इस मामले की आलोचना की है कि विशेष प्रकोष्ठ ने जिन मामलों को एकसाथ नत्थी किया है उनमें दम नहीं है. मार्च 2022 में कड़कड़डूमा कोर्ट द्वारा खालिद की जमानत अर्जी खारिज होने के तुरंत बाद कारवां के एक लेख में शुद्धब्रत सेनगुप्ता लिखते हैं कि सुनवाई के विभिन्न बिंदुओं पर, "अभियोजन पक्ष ने शब्दों के अर्थों को तोड़-मरोड़ कर, अतिरेक करके या अभियुक्तों की कार्रवाइयों को उनके स्पष्ट संदर्भों से अलग करके मामला तैयार किया." इस मामले में अजीबोगरीब तथ्य यह है कि जब दंगा भड़का था तो एक आरोपी शरजील इमाम लगभग एक महीने से गिरफ्तार था.

एक और उल्लेखनीय पहलू यह है कि पुलिस बीजेपी नेताओं पर लगे आरोपों की अनदेखी करती नजर आई. मसलन, आरोप पत्र के मुताबिक साजिश के मामले में पुलिस ने कपिल मिश्रा को सिर्फ एक बार तलब किया. मिश्रा से पूछा गया कि क्या उन्होंने दंगों से पहले उत्तर-पूर्वी दिल्ली का दौरा किया था, जिस पर उन्होंने जवाब दिया कि वह वहां रहते हैं. उन्होंने कहा कि 23 फरवरी 2020 को उन्होंने फेसबुक पोस्ट देखने के बाद अपनी व्यक्तिगत क्षमता में मौजपुर का दौरा किया था क्योंकि लोगों को सीएए के विरोध के परिणामस्वरूप अपने कार्यालयों और स्कूलों में आने-जाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था. उन्होंने पुलिस को बताया, “मैं लोगों की इस समस्या को सुलझाने के लिए वहां पहुंचा था और मैंने वहां जाने से पहले फोन पर डीसीपी को सूचना भी दी थी. यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने उस दिन उत्तर-पूर्वी दिल्ली में कोई भाषण दिया था (भले ही उनके भाषण को वीडियो में कैद कर लिया गया था) मिश्रा ने जवाब दिया, "मैंने कभी कोई भाषण नहीं दिया. मैंने पुलिस से सिर्फ तीन दिन में सड़क खाली कराने को कहा. और मैंने यह भी कहा कि अगर सड़क साफ नहीं हुई तो हम भी धरना देंगे." उन्होंने जोर देकर कहा कि यह भाषण नहीं था.

दिलचस्प बात यह है कि मिश्रा से उनके "क्षेत्र के व्यक्तिगत अवलोकन" के बारे में भी पूछा गया. मिश्रा ने सीएए के विरोध प्रदर्शन के दृश्य का वर्णन करते हुए कहा, "मुस्लिम लोगों ने वहां भय और आतंक का माहौल बनाया था." चूंकि पुलिस ने उन शिकायतों के संबंध में एफआईआर दर्ज नहीं की थी जिनमें मिश्रा पर दंगे में शामिल होने का आरोप लगाया गया था, उनसे इस बारे में कोई सवाल नहीं पूछा गया था.

अक्टूबर 2020 में स्क्रॉल ने उन व्यक्तियों पर एक श्रृंखला प्रकाशित की, जिन्हें साजिश के मामले में पूछताछ के लिए बुलाया गया था. स्क्रॉल ने आरोप पत्र में पेश किए गए सबूतों की सत्यता पर भी सवाल उठाया. कई लोगों ने बताया कि कैसे पुलिस ने पूछताछ के दौरान उन पर दबाव बनाने की कोशिश की. इन व्यक्तियों में से एक ने स्क्रॉल को बताया कि एक वरिष्ठ अधिकारी ने "कहा कि उन्हें उन धाराओं के तहत [परेशान] करने का अधिकार था जिसके तहत वे मुझसे पूछताछ कर रहे थे." एक अन्य व्यक्ति ने पुलिस के दबाव में झूठा बयान देने की बात स्वीकार की.

साजिश के मामले में एक आरोपी आसिफ इकबाल तन्हा को मई 2020 में गिरफ्तार किया गया था. जामिया मिल्लिया इस्लामिया में फारसी भाषा के छात्र तन्हा ने सीएए के विरोध प्रदर्शन में भाग लिया था. उन्हें शुरुआत में दिसंबर 2019 में कैंपस में हुए दंगे के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन जल्द ही उन पर अपने अधिकांश सह-आरोपियों की तरह गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत आरोप लगाया गया. तन्हा ने मुझे बताया कि अप्रैल 2020 में उन्हें पूछताछ के लिए एक रात के लिए विशेष प्रकोष्ठ के लोधी रोड कार्यालय में ले जाया गया. वहां नशे में धुत चार या पांच अधिकारियों ने उन्हें पीटा और गालियां दीं. उसने बताया, "कोई मुझे लात मार रहा था, कोई मुझे घूंसे मार रहा था."

डॉक्टर मोहम्मद एहतेशाम अनवर ने भी विशेष प्रकोष्ठ के हाथों उत्पीड़न की शिकायत की है. अनवर के आरोप विशेष रूप से परेशान करने वाले हैं क्योंकि उन्हें दंगे के दौरान कई लोगों की जान बचाने के लिए जाना जाता है. उन तीन दिनों में जब बमुश्किल कोई एम्बुलेंस उत्तर-पूर्वी दिल्ली तक पहुंच रही थी, मुस्तफाबाद में अनवर का 15-बेड वाला अल हिंद अस्पताल घायलों के लिए एकमात्र चिकित्सीय सुविधा थी. यहां सैकड़ों निवासी पहुंच रहे थे. कई गंभीर रूप से घायल और बंदूक की गोली के घाव लिए अस्पताल पहुंचे थे. उन्हें दूसरे बड़े अस्पतालों में रेफर करने की जरूरत थी, लेकिन क्षेत्र की स्थिति को देखते हुए दंगे के पहले दो दिनों में ऐसा करना असंभव था. अनवर ने मुझे बताया, "यहां कुछ लोगों ने तो दम तोड़ दिया था और उन्होंने एम्बुलेंस से मृतकों को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल ले जाने की भी अनुमति नहीं दी."

अनवर ने कहा कि उन्होंने और अस्पताल में मौजूद परिवारों ने आपातकालीन हेल्पलाइन नंबरों पर कॉल करने की कोशिश की, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. फिर 25 और 26 फरवरी की दरमियानी रात को दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक आपातकालीन सुनवाई की, जिसमें एस मुरलीधर और अनूप जयराम भंभानी की पीठ ने अल हिंद की स्थिति का आकलन करने के लिए अनवर से बात की. पीठ ने तब दिल्ली पुलिस को घायल पीड़ितों के लिए "तत्काल आपातकालीन उपचार" मुहैया कराने के लिए "सुरक्षित मार्ग" सुनिश्चित करने का निर्देश दिया. मुरलीधर ने घंटों बाद हिंसा से संबंधित एक और सुनवाई की अध्यक्षता की, जिसमें उन्होंने कहा, "मैं दिल्ली पुलिस की स्थिति से स्तब्ध हूं." कानून मंत्रालय द्वारा उनके स्थानांतरण के लिए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की दो सप्ताह पुरानी सिफारिश को स्वीकार करने के बाद मुरलीधर को उस रात पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया था.

अनवर ने मुझे बताया कि उन्हें कई बार विशेष प्रकोष्ठ के दफ्तर में बुलाया गया और पूरे दिन वहीं बैठने के लिए कहा गया. जुलाई 2020 में विशेष प्रकोष्ठ और अपराध शाखा के उपायुक्तों को दिए आवेदन में अनवर ने लिखा है कि उनसे "प्रदर्शनकारियों को किसने आर्थिक सहायता दी?", "बिरयानी किसने परोसी?" और "किसने चाय पिलाई?" जैसे सवाल पूछे गए. पूछताछकर्ताओं ने कथित तौर पर उनसे कहा, "तुम हमको कोई नाम दो बदले में हम तुम्हें छोड़ देंगे.” अनवर ने लिखा कि वह उन लोगों से कहते थे कि वह एक डॉक्टर हैं और उन्हें अपने क्लिनिक और काम के बारे में जानकारी दे सकते हैं. अनवर आवेदन में लिखते हैं, “इस पर वे कहते थे, ‘तेरी सारी डॉक्टरी निकल देंगे साले’ "जज के साथ तुम्हारी बातचीत ने सारा प्लान चौपट कर दिया है."

अनवर ने आरोप लगाया कि पूछताछकर्ताओं ने उनसे कहा कि, "सही समय पर हम आपको एक काम देंगे और आपको वह करना होगा." जब उन्होंने पूछा कि वह काम क्या होगा, तो उन लोगों ने अनवर से कहा, "वह कुछ भी हो सकता है, सही या गलत, लेकिन आपको वह करना होगा, नहीं तो हम आप पर यूएपीए का मामला दर्ज कर देंगे." उन लोगों ने अनवर को बीस साल जेल की धमकी दी, "तुम्हारा घर, परिवार, क्लिनिक, सब कुछ बर्बाद हो जाएगा."

30 मार्च 2022 को अनवर ने मुझे बताया कि विशेष प्रकोष्ठ ने उनका मोबाइल फोन ले लिया है और अभी तक वापस नहीं किया है. उन्होंने बताया, "मैं मानसिक प्रताड़ना के उन दिनों में टूट गया था."

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के मुस्तफाबाद में अल हिंद अस्पताल का बाहरी दृश्य. फरवरी 2020 के दंगे के दौरान जब उत्तर-पूर्वी दिल्ली में बमुश्किल कोई एम्बुलेंस पहुंच रही थी, अस्पताल ही एकमात्र चिकित्सा की सुविधा थी, जहां सैकड़ों निवासी पहुंच सकते थे. दंगे के बाद अस्पताल चलाने वाले डॉक्टर अनवर ने दिल्ली पुलिस के हाथों उत्पीड़न की शिकायत की.  ईशान तन्खा

1984 के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों को न्याय देने में नाकामी पर कारवां के 2014 के एक लेख में हरतोष सिंह बल ने लिखा है, "अगर 1984 के पीड़ितों के लिए न्याय असंभव है, जबकि हिंसा राष्ट्रीय राजधानी में हुई थी और जहां इससे जुड़े पर्याप्त सबूत मौजूद हैं, तो ऐसा लगता है कि देश में कहीं भी ऐसी हिंसाओं के पीड़ितों के साथ अन्याय होता रहेगा.” 2020 के पीड़ितों के लिए सच्चाई और सुलह सुनिश्चित कराने की बजाय पुलिस द्वारा और पीड़ित किया जा रहा है.

ऐसा लगता है कि दिल्ली पुलिस खुद को क्लीन चिट देने में उस्ताद है. इसके अलाव ऐसी कोई एजेंसी भी नहीं है जो उसकी जवादेही तय कर सके. मदन लोकुर ने मुझे बताया, "मुझे लगता है कि न केवल सामूहिक हिंसा के मामलों में बल्कि अन्य मामलों में भी दिल्ली पुलिस को जवाबदेही बनाए जाने की आवश्यकता है." लोकुर कहते हैं, “हाल की घटनाओं ने दिखा दिया है कि यह बिल्कुल अनिवार्य है. हालांकि, उन्होंने कहा, "फिर भी यह बता पाना कि कौन सी एजेंसियां दिल्ली पुलिस की अयोग्यता की जांच कर सकती हैं, मुश्किल है. सिर्फ नागरिक समाज ही इस बात का एक स्वतंत्र मूल्यांकन कर सकता है.”