मुजफ्फरपुर आश्रय गृह मामला : सीबीआई के “कोई हत्या नहीं होने” के दावे पर सवाल

14 जनवरी 2020

8 जनवरी को केंद्रीय जांच ब्यूरो ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि मुजफ्फरपुर आश्रय गृह मामले में किसी भी बच्चे की हत्या नहीं हुई है. एजेंसी की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने अदालत को सूचित किया कि सभी “35 लड़कियां जीवित हैं.” सीबीआई ने आश्रय गृह मामले में अपनी जांच के बारे में अदालत को अपडेट करते हुए यह दावा किया था. इस मामले को अदालत देख रही है. भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने बिना किसी टिप्पणी के वेणुगोपाल के तर्क को स्वीकार कर लिया. बिहार के मुजफ्फरपुर में परित्यक्त या भागे हुए बच्चों के पुनर्वास के लिए बने और सरकार द्वारा अनुदान प्राप्त आश्रय गृह में तीस से अधिक नाबालिग लड़कियों के साथ मानसिक, शारीरिक और यौन शोषण किया गया था. सभी लड़कियों की उम्र 18 वर्ष से कम थी. अगस्त 2018 से सुप्रीम कोर्ट मुजफ्फरपुर मामले को देख रही थी और सीबीआई को नियमित रूप से उसे अपडेट करना था. फरवरी 2019 में, शीर्ष अदालत ने मामले को बिहार से दिल्ली की एक विशेष अदालत में स्थानांतरित कर दिया, जो यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण कानून (2012) के तहत अपराधों से संबंधित अदालत है. ट्रायल कोर्ट को 14 जनवरी को मामले पर अपना फैसला देना था, जिसे 20 जनवरी तक के लिए टाल दिया गया है.

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष सीबीआई का दावा कि सभी “35 लड़कियां जीवित हैं.” उसके पहले के रुख का खंडन करता है. मई 2019 में सीबीआई ने अदालत से खुद कहा था कि संभवत: आश्रय गृह में रहने वाली कम से कम ग्यारह लड़कियों की हत्या हुई है और सीबीआई मामले की आगे की जांच करेगी. लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि एजेंसी ने सितंबर 2018 में दर्ज किए गए गवाहों के बयान को खारिज कर दिया. गवाहों ने स्पष्ट रूप से सीबीआई निरीक्षकों को बताया था कि आश्रय गृह में रहने के दौरान, उन्होंने अपने मालिक ब्रजेश ठाकुर और कर्मचारियों को वहां रहने वालों की हत्या करते देखा है. मुजफ्फरपुर के आश्रय गृह में शारीरिक और यौन उत्पीड़न का शिकार हुए 33 बच्चों के बयान कारवां को प्राप्त हुए. इन बयानों में मौजूद भयावह विवरण- जिनमें बलात्कार, गैंगरेप, यौन शोषण, अत्याचार, तस्करी और अप्राकृतिक यौन संबंध शामिल हैं- न केवल सीधे सीबीआई के रुख का खंडन करते हैं, वे सीबीआई की जांच की कमियों को भी उजागर करते हैं.

इस मामले का मुख्य आरोपी ठाकुर, एक प्रिंटिंग प्रेस का मालिक था, जिसके तीन प्रकाशन थे. वह 10 एनजीओ चलाता था और प्रेस सूचना ब्यूरो द्वारा मान्यता प्राप्त पत्रकार भी था. वह राज्य सरकार की उस समिति का भी सदस्य था जो उन पत्रकारों का चयन करती है जिन्हें मान्यता दी जानी है. प्रत्येक वर्ष, उसे आश्रय गृह सहित विभिन्न परियोजनाओं को चलाने के लिए 3 करोड़ रुपए का सरकारी अनुदान प्राप्त होता था. उसे जून 2018 की शुरुआत में गिरफ्तार किया गया था. बाद में, उसी साल, ठाकुर को बिहार की जेल से पंजाब की एक जेल में स्थानांतरित करने का आदेश देते हुए, शीर्ष अदालत ने कहा था, “यह उसकी शक्ति और प्रभाव ही है जिसके चलते इलाके के निवासियों ने भी उसके घर से आने वाली लड़कियों की चीखों को सुनने के बाद भी इस बारे में किसी को नहीं बताया.”

आरोपियों में बिहार कैबिनेट में पूर्व सामाजिक कल्याण मंत्री मंजू वर्मा, जिला बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष दिलीप वर्मा, सीडब्ल्यूसी के सदस्य विकास कुमार, बाल-संरक्षण अधिकारी रवि कुमार रौशन और ​​बाल-संरक्षण इकाई की एक सहायक निदेशक रोजी रानी भी शामिल हैं. सीडब्ल्यूसी एक वैधानिक निकाय है और इसके पास प्रथम न्यायिक मजिस्ट्रेट की शक्ति है. यह राज्य सरकार के समाज-कल्याण विभाग के अंतर्गत आता है.

सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने वाले याचिकाकर्ता के वकील फौजिया शकील ने कहा कि तस्करी, अप्राकृतिक अपराध और लड़कियों के गर्भपात की "सीबीआई द्वारा अब भी जांच नहीं की गई है."

सागर कारवां के स्‍टाफ राइटर हैं.

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