2017 के लिंचिंग मामलों की सरकारी जांच पर सांप्रदायिक पूर्वाग्रह हावी

04 अक्टूबर 2019
भारत में पिछले पांच सालों में लिंचिंग की घटनाओं में वृद्धि हुई है. ऐसे मामलों की बढ़ती संख्या से पता चलता है कि स्थानीय प्रशासन के मौन समर्थन से अक्सर हिंसा सांप्रदायिक रंग ले लेती है.
अल्ताफ कादरी / एपी
भारत में पिछले पांच सालों में लिंचिंग की घटनाओं में वृद्धि हुई है. ऐसे मामलों की बढ़ती संख्या से पता चलता है कि स्थानीय प्रशासन के मौन समर्थन से अक्सर हिंसा सांप्रदायिक रंग ले लेती है.
अल्ताफ कादरी / एपी

17 जून 2019 की रात तबरेज अंसारी अपनी चाची के घर उनकी दुआएं लेने गया था. नव-विवाहित अंसारी अगले ​दिन अपनी नई जिंदगी शुरू करने के​ लिए शहर छोड़कर जाने वाला था. जब 24 साल का तबरेज घर लौटा, तो भीड़ ने उस पर चोरी का आरोप लगाते हुए एक खंबे से बांधकर "जय श्री राम" का नारा लगाने के लिए मजबूर किया और रात भर पीटा. यह घटना झारखंड राज्य के सेरीकेला खरसावां जिले में घटी थी. कई फोन कॉलों के बावजूद, झारखंड पुलिस घटना स्थल पर अगली सुबह तक नहीं पहुंची. अंसारी पर लूटपाट का मुकदमा दर्ज कर उसे अदालत ले जाया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. मारपीट के चार दिन बाद, उसकी मौत हो गई. अंसारी की मौत के बाद ही पुलिस ने हमला करने वाली भीड़ के खिलाफ मामला दर्ज किया है. मूल चार्जशीट में भीड़ पर हत्या का आरोप नहीं लगाया गया था लेकिन जब मीडिया रिपोर्टों ने इस चूक को उजागर किया तो बाद में एक पूरक चार्जशीट में हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया.

अंसारी की लिंचिंग जैसी घटना झारखंड में कोई नई बात नहीं है मई 2015 से दिसंबर 2018 के बीच, पूरे देश में लिंचिंग की कुल 44 में 17 घटनाएं इसी राज्य में हुई थीं. इनमें 18 मई 2017 को हुई दो अलग-अलग घटनाओं में झारखंड के कोल्हान संभाग में, जमशेदपुर शहर के 40 किलोमीटर के दायरे में सात लोग मारे गए. उनमें से चार उसी जिले में मारे गए जहां अंसारी को मौत के घाट उतारा गया था. फिर भी, अंसारी की मौत के बाद, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गहरी संवेदना व्यक्त करते हुऐ कहा : "मैं क्षुब्ध हूं और जो जिम्मेदार हैं उन्हें कड़ी सजा मिलेगी लेकिन विपक्षियों द्वारा झारखंड को ‘भीड़ की हिंसाओं का गढ़’ कहा जाना गलत है." साल 2000 में झारखण्ड राज्य बनने के बाद से भारतीय जनता पार्टी या तो खुद सत्ता में रही है या सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा रही है. 2014 के राज्य चुनावों में बीजेपी ने राज्य में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया, जिसमें उसे 81 सदस्यीय राज्य विधानसभा में से 37 सीटें मिलीं थीं.

18 मई 2017 की घटी पहली घटना में, सुबह-सुबह चार मुस्लिम मवेशी व्यापारी शेख हलीम, मोहम्मद सज्जाद, सिराज खान और नईम सेराइक खरसावां के पास शोभापुर गांव में भीड़ की हिंसा के शिकार हुए थे. इनमें पहले तीन, पास के गांव हल्दीपोखर के निवासी थे और नईम राज्य के पूर्वी सिंहभूम जिले के शहर घाटशिला में रहते थे. उसी दिन घटी दूसरी घटना में, पूर्वी सिंहभूम के नागडीह गांव में तीन उच्च-जाति के हिंदू विकास वर्मा और गौतम वर्मा, जो भाई थे, और उनके दोस्त गंगेश गुप्ता की हत्या कर दी गई.

जांच में मुस्लिम समुदाय के खिलाफ स्पष्ट पक्षपात का पता चलता है और स्थानीय सरकारी तंत्र की मानसिकता भी उजागर होती है. रिपोर्ट में हिंदुओं और मुस्लिमों की लिंचिंग को लेकर समिति के सदस्यों की सोच में स्पष्ट अंतर है

22 मई 2017 को, झारखंड सरकार ने राज्य के गृह, जेल और आपदा प्रबंधन विभाग की देखरेख में दो घटनाओं की जांच के लिए नागरिक और पुलिस अधिकारियों की दो सदस्यीय समिति का गठन किया. इन समितियों में कोल्हान के संभागीय आयुक्त प्रदीप कुमार और कोल्हान के उप महानिरीक्षक प्रभात कुमार शामिल थे. समिति के गठन की घोषणा करते हुए एक संवाददाता सम्मेलन में, राज्य के तत्कालीन गृह सचिव एसकेजी रहाते ने कहा था, "उनका काम अफवाहें कहां से फैलीं, इसके पीछे के लोगों, इस तरह की कार्रवाई के पीछे के उद्देश्य और कई अन्य कोणों की जांच करना है, जो अब तक अनुत्तरित हैं.” समिति ने जुलाई 2017 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और मैंने उस साल सूचना के अधिकार कानून के तहत इसकी एक प्रति हासिल की.

सागर कारवां के स्‍टाफ राइटर हैं.

Keywords: mob lynching Jharkhand BJP caste atrocities communalism
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