सौदेबाज़ी

राम मंदिर चंदा चोरी मामले में मोदी के तीन आदमियों की भूमिका

25 नवंबर, 2025 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में राम मंदिर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी. (प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो / अनाडोलु / गैटी इमेजिस)

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(एक)

नरेन्द्र मोदी के दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के पांच महीने बाद, सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सरकार को एक बहुत बड़ा तोहफा दिया. 9 नवंबर, 2019 को सर्वोच्च अदालत ने एक सदी से भी अधिक पुराने अयोध्या के एक ज़मीन विवाद का फ़ैसला हिंदू दक्षिणपंथी पक्ष के हक में सुनाया. राम मंदिर बनाने की लड़ाई भारत की भावना के ख़िलाफ़ दशकों से चल रही राजनीतिक जंग का केंद्र थी, जिसका सबसे हिंसक अध्याय 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस था. यह स्वतंत्र भारत के इतिहास की सबसे घृणित सांप्रदायिक बर्बरताओं में से एक थी.

कोर्ट ने यह ज़रूर स्वीकार किया कि हिंदुओं की भीड़ द्वारा मस्जिद तोड़ना एक आपराधिक कृत्य था. बावजूद इसके यह फ़ैसला भारतीय जनता पार्टी के लिए एक बहुत बड़ी प्रतीकात्मक जीत थी. इससे यह साबित हो गया कि बीजेपी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिंदू राष्ट्र के सपने को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है.

कोर्ट ने मंदिर के निर्माण की देखरेख के लिए केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर एक ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया. सतह पर यह न्यास न तो सरकारी संस्था थी और न ही सत्ताधारी पार्टी का विस्तार, लेकिन असल में संघ आधुनिक भारत के राजनीतिक रूप से सबसे संवेदनशील धार्मिक संस्थानों में से एक का संरक्षक बनने वाला था, जहां जमीन, चंदा और जनता का असीम भरोसा था.

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