मुजफ्फरपुर आश्रय गृह मामला : सीबीआई ने की बिहार पुलिस के महत्वपूर्ण सुरागों की अनदेखी, नहीं बनाया बड़े अधिकारियों को आरोपी

29 जनवरी 2020
1 दिसंबर 2018 को बिहार में पूर्व समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा को बेगूसराय की अदालत में घर में अवैध हथियार रखने के एक मामले में पेश किया गया. मंजू ने अगस्त 2018 में राज्य मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था. रिपोर्ट के अनुसार मंजू वर्मा के पति चंद्रशेखर वर्मा के मुजफ्फरपुर आश्रय गृह मामले के मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर के साथ घनिष्ठ संबंध थे. मामले में आरोपी बनने के बाद मंजू फरार हो गई थीं. जांच के दौरान उनके घर में हथियार होने का पता चला था.
पीटीआई
1 दिसंबर 2018 को बिहार में पूर्व समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा को बेगूसराय की अदालत में घर में अवैध हथियार रखने के एक मामले में पेश किया गया. मंजू ने अगस्त 2018 में राज्य मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था. रिपोर्ट के अनुसार मंजू वर्मा के पति चंद्रशेखर वर्मा के मुजफ्फरपुर आश्रय गृह मामले के मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर के साथ घनिष्ठ संबंध थे. मामले में आरोपी बनने के बाद मंजू फरार हो गई थीं. जांच के दौरान उनके घर में हथियार होने का पता चला था.
पीटीआई

 28 जनवरी 2020 को दिल्ली के साकेत की एक विशेष अदालत ने बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित आश्रय गृह से संबंधित एक मामले में दोषी ठहराए गए 19 लोगों को सजा सुनाए जाने को 4 फरवरी तक ले लिए टाल दिया. एक सप्ताह पहले ही यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण कानून, 2012 (पॉस्को) के तहत इस मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा आरोपित 21 आरोपियों में से दो को अदालत ने दोषी ठहराया था. इस मामले में कारवां की पड़ताल से पता चलता है कि सीबीआई ने बिहार पुलिस द्वारा पर्यवेक्षण रिपोर्ट में दिए गए कई सुरागों की जांच नहीं की. पुलिस ने एजेंसी से पहले जांच की थी. कारवां के पास मौजूद रिपोर्ट में कम से कम नौ लोगों के नाम शामिल थे. इन लोगों में राज्य प्रशासन के वरिष्ठ सदस्य, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी, बिहार के तत्कालीन कैबिनेट मंत्री और यूनिसेफ के एक सलाहकार तथा कुछ अन्य लोग हैं. इन्हें 2013 से 2018 के बीच आश्रय गृह में तीस से अधिक नाबालिगों के यौन और शारीरिक शोषण के बारे में कथित तौर पर जानकारी थी. यह मामला अप्रैल 2018 में प्रकाश में आया था, जब टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टिस) ने एक स्वतंत्र ऑडिट किया था. उस ऑडिट में बिहार के 17 ऐसे आश्रय गृहों की पहचान की गई थी जहां की स्थिति अपमानजनक थी. इसमें मुजफ्फरपुर का आश्रय गृह “बालिका गृह” भी था. इसका संचालन ब्रजेश ठाकुर करता था. अदलात ने ठाकुर को मामले में दोषी पाया है.

 राज्य पुलिस द्वारा प्रस्तुत महत्वपूर्ण साक्ष्यों की जांच करने में सीबीआई की विफलता एक पैटर्न को दर्शाती है : कारवां ने पहले यह खुलासा किया था कि नाबालिगों के बयान सीबीआई के इस दावे का खंडन करते हैं कि आश्रय गृह में कोई हत्या नहीं हुई. अगर एजेंसी जानबूझकर इनकी अनदेखी नहीं करती तो बिहार सरकार के समाज-कल्याण विभाग और कई हाई-प्रोफाइल नेता फंस सकते थे.

 जांच की पर्यवेक्षण रिपोर्ट मुजफ्फरपुर शहर के तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक मुकुल रंजन ने तैयार की थी. रंजन ने मुजफ्फरपुर से जुड़ा मामला दर्ज होने के एक महीने बाद, 3 जुलाई 2018 को रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किए. जुलाई 2018 के अंत में नीतीश कुमार सरकार की सिफारिश पर, सीबीआई ने बिहार पुलिस से इस जांच को अपने हाथों में ले लिया. सीबीआई को औपचारिक रूप से 28 जुलाई को यह मामला सौंप दिया गया था और उसी दिन राज्य पुलिस ने बिहार की एक स्थानीय अदालत के समक्ष मामले में आरोपपत्र दायर किया था. एक हफ्ते से भी कम समय बाद, अगस्त 2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने जांच की निगरानी करने का फैसला किया और एजेंसी से नियमित अपडेट देने के लिए कहा. मामले में मुकदमे की सुनवाई पहले जुलाई 2018 में बिहार की एक स्थानीय अदालत में हुई, लेकिन बाद में शीर्ष अदालत के आदेश पर इसे फरवरी 2019 में साकेत कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया.

 मार्च 2019 में, जब सीबीआई की जांच चल ही रही थी, पटना की पत्रकार निवेदिता झा ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर आरोप लगाया कि एजेंसी की जांच में “लीपापोती” की गई है और इसमें साक्ष्य के विभिन्न पहलुओं की अनदेखी हुई है. झा की याचिका में कहा गया है कि आश्रय गृह में नाबालिगों की हत्या और नाबालिगों के साथ दुर्व्यवहार और तस्करी में नेताओं, अधिकारियों और बाहरी लोगों की कथित संलिप्तता के बारे में मिले सुरागों की सीबीआई ने अनदेखी की. अदालत ने एजेंसी को जून 2019 में झा के दावों पर गौर करने का आदेश दिया. इस साल जनवरी में सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि उसने उन सभी आश्रय गृहों की जांच पूरी कर ली है जिन्हें टिस के ऑडिट में नामित किया गया था. सीबीआई ने अदालत को बताया कि "सभी 35 लड़कियां जीवित हैं" और झा द्वारा लगाए गए आरोपों का कोई सबूत नहीं है.

 पर्यवेक्षण रिपोर्ट के निष्कर्ष महत्वपूर्ण हैं. रिपोर्ट में पीड़िताओं, ठाकुर के एक पड़ोसी, तत्कालीन बाल संरक्षण अधिकारी और दोषी व्यक्तियों में से एक रवि कुमार रौशन, एक स्वतंत्र गवाह के बयान और मामले में पहली जांच अधिकारी ज्योति कुमारी की टिप्पणी और निष्कर्ष तथा रंजन द्वारा की गई सिफारिशें शामिल हैं. इसमें विभिन्न ऐसे सुराग भी शामिल हैं जो अतुल प्रसाद (वरिष्ठ आईएएस अधिकारी), राज कुमार (राज्य के समाज कल्याण विभाग के अधिकारी), आईएएस कार्यालय और समाज कल्याण निदेशालय के निदेशक, समाज कल्याण की तत्कालीन राज्य मंत्री मंजू वर्मा और यूनिसेफ के एक सलाहकार राकेश कुमार सहित अन्य लोगों की अपराध में संभावित संलिप्तता की ओर इशारा करते हैं.

सागर कारवां के स्‍टाफ राइटर हैं.

Keywords: Muzaffarpur shelter-home case CBI Bihar Police House of Horrors Supreme Court of India Sexual Assault
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