मुजफ्फरपुर आश्रय गृह मामला : यौन शोषण का पता था जिनको वही अधिकारी कर रहे थे पीड़िताओं का पुनर्वास

10 फ़रवरी 2020
पीटीआई
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11 फरवरी को दिल्ली की साकेत विशेष अदालत मुजफ्फरपुर आश्रय गृह मामले में दोषी ठहराए गए 19 लोगों को सजा सुनाएगी. इस मामले पर कारवां की पड़ताल से पता चला है कि प्रभावित नाबालिगों के पुनर्वास की देखरेख जिन नौकरशाहों ने गई थी, उन्हें 2013 से 2018 के बीच आश्रृय गृह में 30 से अधिक नाबालिगों के यौन शोषण की जानकारी थी लेकिन वे फिर भी चुप्पी साधे रहे. कारवां ने ऐसे कम से कम दो नौकरशाहों और तीन वरिष्ठ अधिकारियों की पहचान की है जिन्हें राज्य सरकार ने उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के तहत गठित पुनर्वास समिति में शामिल किया. समिति ने 28 अगस्त 2018 को अपनी पहली बैठक की. उनमें से दो नौकरशाहों और एक वरिष्ठ अधिकारी का नाम बिहार पुलिस ने उस साल 3 जुलाई की एक रिपोर्ट में दर्ज किया था और केंद्रीय जांच ब्यूरो ने समिति की पहली बैठक से ठीक एक सप्ताह पहले उनमें से एक के घर छापा मारा था. फिर भी दिसंबर 2018 में दायर एजेंसी के आरोप पत्र में तीनों का नाम नहीं था. अन्य दो अभियोजन पक्ष के गवाह थे.

कारवां के पास उपलब्ध पुनर्वास समिति की बैठकों के मिनट से यह बात सामने आई है. समिति के सदस्यों में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टिस), अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), राष्ट्रीय मानसिक-स्वास्थ्य संस्थान (निमहांस), यूनिसेफ और बिहार सरकार के प्रतिनिधि शामिल हैं. कमेटी में शामिल अधिकारियों में सबसे चौंकाने वाले नाम राज कुमार, सुनील झा और अतुल प्रसाद के हैं. कुमार भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं और अब समाज कल्याण निदेशालय और दिव्यांग सशक्तीकरण के निदेशालय में निदेशक  हैं. राज्य के समाज कल्याण विभाग में उनका औहदा तीसरे स्थान पर है. जैसा कि कारवां ने पिछली रिपोर्ट में बताया था, बिहार पुलिस ने सख्ती से कुमार से पूछताछ की थी और उन्हें आगे की जांच के लिए चिह्नित किया था क्योंकि कुमार को यह पता होने के बावजूद कि "प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है, उन्होंने आंतरिक जांच का आदेश नहीं दिया." पुलिस ने मामले की आगे की जांच के बारे में निष्कर्ष निकालते हुए एक पर्यवेक्षण रिपोर्ट में सिफारिश की थी कि कुमार से उनकी संदिग्ध भूमिका के लिए तुरंत पूछताछ की जाए. इसके बावजूद कुमार ने पुनर्वास समिति की पहली बैठक की अध्यक्षता की. कुमार को कई फोन कॉल और टेक्स्ट मैसेज किए जाने बावजूद उनका कोई जवाब नहीं मिला.

झा राज्य-स्तरीय सरकारी संस्था, राज्य बाल संरक्षण सोसाइटी में वरिष्ठ सलाहकार हैं. इस संस्था का कार्य बाल-संरक्षण योजनाओं को लागू करना है. झा को पहली बैठक में सरकारी अधिकारियों और बाहरी एजेंसियों के बीच एक समन्वयक के रूप में नियुक्त किया गया था. उनका नाम पहली बार जून 2018 में मामले के आरोपी रवि कुमार रौशन ने लिया था जो बाल संरक्षण अधिकारी के रूप में कार्यरत रहा था. रौशन को यौन शोषण के कई मामलों में दोषी ठहराया गया है. रौशन ने बिहार पुलिस को बताया था कि "सुनील झा नाम के आदमी को भी पता था कि बालिका गृह में क्या हो रहा है और वह अभी तक इसके बारे में चुप है." हालांकि, रिपोर्ट में झा या उनके पदनाम की पहचान नहीं थी. मैंने झा से संपर्क किया और पूछा कि क्या उनका नाम बिहार पुलिस की रिपोर्ट में सामने आया है. "मुझे इसके बारे में पता नहीं है," उन्होंने कहा. जब मैंने पूछा कि क्या बिहार पुलिस ने कभी उनसे पूछताछ की तो उन्होंने मुझसे कहा, “मैं यह नहीं बता सकता. मैं आपसे बात करने के लिए अधिकृत नहीं हूं. जो भी जांच होनी थी वह पहले ही हो चुकी है.” झा ने स्वीकार किया कि सीबीआई ने अगस्त 2018 में उनके घर पर छापा मारा था लेकिन उनसे क्या पूछताछ हुई इस बारे में कुछ भी बताने से इनकार कर दिया. "मैं केवल जांच एजेंसी के लिए जवाबदेह हूं और मैंने उन्हें जवाब दे दिया है."

पूर्व समाज कल्याण मंत्री परवीन अमानुल्लाह ने मुझे बताया कि यह विभाग बिहार सरकार के सबसे भ्रष्ट विभागों में से एक है.

प्रसाद 2018 में बिहार सरकार के मुख्य सचिव थे और अब अतिरिक्त मुख्य सचिव हैं. उन्होंने 11 अक्टूबर 2018 को आयोजित पुनर्वास समिति की एक बैठक की अध्यक्षता की थी. बिहार पुलिस की रिपोर्ट में प्रसाद का नाम भी आया है और उस रिपोर्ट में उनके आचरण पर संदेह जताया गया था. रिपोर्ट के अनुसार, प्रसाद ने इस घटना का मामला दर्ज होने से चार दिन पहले  बिहार के 17 आश्रय गृहों में, जिसमें बालिका गृह भी शामिल था, बच्चों के यौन शोषण पर प्रकाश डालने वाली टिस ऑडिट रिपोर्ट पर चर्चा करने के लिए 26 मई 2018 को राज्य स्तरीय बैठक बुलाई थी. पुलिस ने सवाल किया था कि प्रसाद ने इस मुद्दे पर राज्य स्तरीय बैठक आयोजित करने के बाद भी तत्काल कोई कार्रवाई करने का आदेश क्यों नहीं दिया. प्रसाद ने भी कॉल या टेक्स्ट संदेशों का जवाब नहीं दिया.

सागर कारवां के स्‍टाफ राइटर हैं.

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