दरमियान

यौन तस्करी की शिकार महिलाओं की गुमनाम ज़िंदगी 

झारखंड के तोरपा में स्कूल से घर लौटती हुई लड़कियां. 2024 में आई एक रिसर्च के अनुसार, साइकिल बांटने की योजनाओं से ग्रामीण इलाकों में साइकिल से स्कूल जाने वाले छात्रों की संख्या बढ़ी है.
झारखंड के तोरपा में स्कूल से घर लौटती हुई लड़कियां. 2024 में आई एक रिसर्च के अनुसार, साइकिल बांटने की योजनाओं से ग्रामीण इलाकों में साइकिल से स्कूल जाने वाले छात्रों की संख्या बढ़ी है.

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2015 में जब मैं भारत में बलात्कार और यौन हिंसा से जुड़ी एक परियोजना पर काम करने के लिए पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना गई थी, तब मेरी मुलाक़ात 17 वर्षीय एक किशोरी से हुई थी, जिसे स्कूल जाते समय तस्करी का शिकार बनाया गया था. हालांकि, मैंने तब उसकी तस्वीर नहीं खींची, लेकिन उसकी कहानी ने मुझे यौन तस्करी और तस्करी के अन्य रूपों पर और अधिक विस्तार से शोध करने के लिए प्रेरित किया. इसी शोध का परिणाम इस फ़ोटो प्रोजेक्ट के रूप में सामने आया.

मैंने पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, बांग्लादेश के ढाका और खुलना जिलों सहित अन्य स्थानों पर पीड़ितों से मुलाक़ात की और इस मुद्दे पर काम कर रहे कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत की. संयुक्त राष्ट्र के ड्रग्स और अपराध कार्यालय द्वारा जारी ‘मानव तस्करी पर वैश्विक रिपोर्ट 2024’ में कहा गया है कि तस्करी के 55 प्रतिशत मामलों में जबरन मज़दूरी कराई जाती है, जबकि 30 प्रतिशत मामले यौन शोषण से जुड़े थे.

भारत में दुल्हन तस्करी, महिला तस्करी, घरेलू कामगारों की तस्करी और यौन तस्करी से जुड़े मामलों की सटीक संख्या को लेकर अलग-अलग और असंगत आंकड़े मौजूद हैं. यौन तस्करी पर शोध करते समय एक और बात बार-बार सामने आई कि पीड़िताओं के बारे में अक्सर केवल संख्याओं के संदर्भ में बात की जाती थी और उन्हें बचा लिए जाने के बाद ‘वेश्यालय में मिली लड़कियों को बचाया गया’ जैसे बयान दिए जाते थे. लेकिन उन लड़कियों और महिलाओं की कहानियां क्या थीं? उनकी तस्करी कैसे हुई? इस प्रक्रिया के दौरान उनके साथ क्या हुआ? हमने यह जानने या समझने की शायद ही कभी कोशिश की.

पश्चिम बंगाल के डायमंड हार्बर से 16 साल की उम्र में तस्करी करके दिल्ली के जीबी रोड स्थित एक वेश्यालय में लाई गई लड़की की मेडिकल रिपोर्ट. दिल्ली लाए जाने के एक साल बाद, कोठे पर मारपीट के कारण वह बुरी तरह बीमार पड़ गई और उसे शाहदरा के एक सरकारी अस्पताल ले जाया गया. अस्पताल में तीन महीने रहने के बाद वह अपने परिवार से दोबारा मिल पाई. मुझे बताया गया कि उसे गंभीर डिप्रेशन था और वह एचआईवी-पॉज़िटिव थी.

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स्मिता शर्मा दिल्ली स्थित फ़ोटो पत्रकार और विज़ुअल स्टोरीटेलर हैं. वह ग्लोबल साउथ में मानवाधिकारों, जैंडर हिंसा और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर काम करती हैं. उनका काम नेशनल जियोग्राफ़िक, द न्यूयॉर्क टाइम्स, डब्ल्यूएसजे, बीबीसी वर्ल्ड, टाइम और ह्यूमन राइट्स वॉच पर प्रकाशित हुआ है और उनकी फ़ोटोग्राफ़ी को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित किया गया है.