भीमा कोरेगांव मामले में पुणे पुलिस का हासिल: 22 एफआईआर की जांच और चश्मदीदों का बयान दर्ज करना बाकी, जमानत पर घूम रहा मुख्य आरोपी

21 सितंबर 2018
चश्मदीदों के बयानों से सावले और पुलिस के उस दावा की पुष्टि होती है जिसमें कहा गया है कि भिंडे और एकबोटे ने महार और मराठों के बीच हफ्ते भर पहले हुई झड़प के प्रतिरोध में हिंसा की सुनियोजित तैयारी की थी.
संकेत वानखडे/हिन्दुस्तान टाईम्स/GETTY IMAGES
चश्मदीदों के बयानों से सावले और पुलिस के उस दावा की पुष्टि होती है जिसमें कहा गया है कि भिंडे और एकबोटे ने महार और मराठों के बीच हफ्ते भर पहले हुई झड़प के प्रतिरोध में हिंसा की सुनियोजित तैयारी की थी.
संकेत वानखडे/हिन्दुस्तान टाईम्स/GETTY IMAGES

पहली जनवरी को 39 साल की अनीता अनीता सावले भीमा कोरेगांव के लिए निकलीं. पुणे के पिंपरी-चिंचवड की अनीता के साथ उनके पति रविंद्र सावले और उनके दो बच्चे भी थे. सब मिलकर गांव में बने युद्ध स्मारक पर युद्ध के नायक रहे लोगों को याद करने जा रहे थे. भीमा कोरेगांव की लड़ाई में 1818 में मिली जीत के बाद इसका जश्न मनाने के लिए अंग्रेजों ने यहां एक स्तंभ बनवाया था. इस युद्ध में अंग्रेजों के छोटे से सैन्य दल ने पेशवाओं की फौज को हरा दिया था. अंग्रेजों के इस छोटे से सैन्य दल का हिस्सा सताए हुए महार जाति से आने वाले लोग थे और पेशवाओं की फौज में सवर्ण जाति के मराठों का बोलबाला था. महार जाति के लोग इस बात पर गर्व करते हैं कि उन्होंने इस लड़ाई में उन मराठों को हराया था जो इन पर जुल्म करते आए हैं. इसी गौरव को ये लोग “शौर्य दिवस” के रूप में मनाते हैं. साल के इस समय कुछ लोग तो भीमा कोरेगांव के स्मारक पर जाने को किसी तीर्थयात्रा से कम नहीं समझते हैं. लेकिन इसी लड़ाई की 200वीं बरसी के दौरान सावले परिवार की तीर्थयात्रा को जघन्य हिंसा का सामना करना पड़ा.

परिवार वाले सुबह 11 बजे घर ने निकले थे. रास्ते में जब सावले टोल प्लाजा पहुंचे तब उन्होंने देखा कि हथियारों से लैस भीड़ लोगों पर हमले कर रही है, पत्थरबाजी कर रही है, कारों और नीले झंड़ों में आग लगा रही है. घर से निकलने के दो घंटे बाद जब ये लोग वधु बुद्रुक पहुंचे तो वहां की लोकल पुलिस से सुरक्षा मांगी. वधु बुद्रुक युद्ध स्मारक से तीन किलोमीटर दूर है. सावले परिवार को पुलिस से सुरक्षा नहीं मिली जिसके बाद उन्होंने पास की ही एक जगह में छिपना सही समझा. अगले दिन सावले ने पिंपरी पुलिस थाने में एक लिखित शिकायत दर्ज कराई. हालांकि, बाद में मामले की जांच को शिक्रापुर में ट्रांसफर कर दिया गया. इस शिकायत में सावले ने बताया कि छिपने के बावजूद भीड़ ने उन्हें ढूंढ लिया था, लेकिन वे लोग “जैसे तैसे भागने और अपनी जान बचाने में सफल रहे.”

सावले की शिकायत में उनकी दोस्त अंजना गायकवाड का भी अनुभव साझा किया गया है. अंजना अपने भाई और छह साल के बेटे के साथ उसी समय पिंपरी से निकली थी जिस समय सावले का परिवार इस सालाना जश्न के लिए निकला था. सावले के मुताबिक अंजना उस दिन दूसरे रास्ते से निकली थी और सणसवाडी गांव के पास से उन्हें फोन किया. भीमा कोरेगांव से सणसवाडी की दूरी 10 किलोमीटर के करीब है. अंजना ने बताया भी तलवार और रॉड जैसे हथियारों से लैस भीड़ सड़कों पर मौजूद तीर्थयात्रियों पर हमले कर रही है और गाड़ियों को जला रही है. अंजना ने आगे कहा कि वो नीले रंग वाले पंचशील झंडे को भी आग लगा रहे हैं और जिन लोगों के पास भीमराव अंबेडकर की तस्वीरें है या जिन गाड़ियों उनकी पर तस्वीरें लगी हैं उन पर पेट्रोल बम फेंक रहे हैं. आपको बता दें कि बौद्ध धर्म में विश्वास रखने वालों के लिए पंचशील झंडा शांति का प्रतीक है.

एक हफ्ते के भीतर पुणे की ग्रामीण पुलिस ने सावले जैसे कम से कम 22 मामले दर्ज किए. अलग-अलग हुए ये एक जैसे मामले थे जिनमें लड़ाई के स्मारक तक जाने वाले रास्तों पर सफर कर रहे तीर्थयात्रियों पर हमले किए गए थे. राज्य सरकार ने पुणे की अदलात को जानकारी दी कि इन मामलों में 1400 से ज़्यादा लोगों संदेह के घेरे में हैं और हिंसा की इन घटनाओं में लगभग 1 करोड़ 50 लाख रुपए की संपत्ति का नुकसान हुआ है. अपनी शिकायत के लिए लिखवाई गई एफआईआर में सावले ने शिवजागर प्रतिष्ठान के मनोहर भिंडे, हिंदू जनजागरण समिति के अध्यक्ष मिलिंद एकबोटे और उनके “सवर्ण साथीदार”- सवर्ण सहयोगियों का नाम दिया है. एकबोटे और भिंडे दोनों को महाराष्ट्र में बहुत बड़ी आबादी का समर्थन प्राप्त है. यही नहीं, दोनों को भारत भर में अच्छा खासा समर्थन प्राप्त है और इनके समर्थकों में पीएम नरेंद्र मोदी भी शामिल हैं जिन्होंने भीड़े को खुले तौर पर गुरू जी तक बुलाया है.

पुणे से ताल्लुक रखने वाले हिंदुत्व के इन नेताओं को दो मामलों में आरोपी बना कर पेश किया गया. इनमें से एक मामले की हिंसा के दिन एफआईआर दर्ज की गई थी और दूसरी शिकायत अगले दिन सावले ने लिखवाई थी. हिंसा के दो महीने बाद, जब सुप्रीम कोर्ट ने भी अग्रिम जमानत की अर्जी को खारिज कर दिया तो एकबोटे को पुणे की ग्रामीण पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. लेकिन लगभग एक महीने बाद ही एकबोटे को दोनों ही मामलों में जमानत  मिल गई. दंगा करने, गैरकानूनी तरीके से लोगों को इक्ट्ठा करने, खतरनाक हथियरों का इस्तेमाल करने, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोप होने के बावजूद एकबोटे को जमानत दे दी गई. वहीं, भिंडे की कभी गिरफ्तारी नहीं हुई. उल्टे, इस साल मार्च महीने में राज्य के मुख्य मंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने विधानसभा में घोषणा करते हुए ये तक कह दिया कि भिंडे के खिलाफ कोई साक्ष्य ही नहीं है.

सागर कारवां के स्‍टाफ राइटर हैं.

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