​तमिलनाडु का स्वाति हत्याकांड : एक दलित युवक की मौत और अनसुलझे सवाल

रोयापेट्टा सरकारी अस्पताल के बाहर प्रेस जहां पी रामकुमार को कथित तौर पर पुझल सेंट्रल जेल में अपनी जान लेने के बाद मृत घोषित कर दिया गया था. स्थानीय मीडिया ने स्वाति मामले को तमिलनाडु के निर्भया कांड के रूप में फ्रेम किया.
डिनोडिया इमेजिस / एलमे फोटो
रोयापेट्टा सरकारी अस्पताल के बाहर प्रेस जहां पी रामकुमार को कथित तौर पर पुझल सेंट्रल जेल में अपनी जान लेने के बाद मृत घोषित कर दिया गया था. स्थानीय मीडिया ने स्वाति मामले को तमिलनाडु के निर्भया कांड के रूप में फ्रेम किया.
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इस साल फरवरी में जब मैं दिलीपन महेंद्रन से मिली, तो वह एक जुनूनी आदमी लग रहे थे. चेन्नई के बाहरी इलाके में उनका एक कमरे का छोटा सा घर कागज की कतरनों से भरा हुआ था. उनके लैपटॉप में कम से कम एक दर्जन केस फाइलें खुली थीं और एक फेसबुक पेज कभी-कभार पिंग करता था. यह कमरा किसी खोजी पत्रकार की मांद सरीखी थी, जिसने कोई बड़ी स्टोरी का खुलासा किया ​हो या नोयर फिल्म के किसी निजी जासूस का सा था. हालांकि, यह एक संघर्षरत बिरयानी की दुकान के मालिक का था.

वह मामला जिसने दिलीपन को इतना परेशान किया था तमिलनाडु में दशकों में देखी गई सबसे सनसनीखेज हत्याओं में से एक था. लगभग हर शाम, काम पर पसीने से तर बतर दिन बिताने के बाद, वह विवरणों को खंगालते हुए और अपने यूट्यूब चैनल के लिए वीडियो फिल्माने में बिताते थे.

24 जून 2016 की सुबह, चेन्नई के सबसे उन्नत क्षेत्रों में से एक, नुंगमबक्कम में रेलवे स्टेशन पर एक प्लेटफॉर्म पर ब्राह्मण समुदाय की 24 वर्षीय आईटी पेशेवर एस स्वाति की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई. जब तक पुलिस कर्मी मौके पर नहीं पहुंचे करीब दो घंटे तक उसकी लाश वहीं पड़ी रही. पुलिस ने जल्द ही सूचना दी कि राज्य में अनुसूचित जाति के रूप में वर्गीकृत पल्लर जाति के 24 वर्षीय व्यक्ति पी रामकुमार ने उसकी हत्या कर दी थी. उन्होंने दावा किया कि रामकुमार ने कई हफ्तों तक स्वाति का पीछा किया था और कि स्वाति ने उसे ठुकरा दिया था.

स्थानीय मीडिया ने स्वाति मामले को 2012 में दिल्ली में हुए कुख्यात बलात्कार और हत्या की तर्ज पर तमिलनाडु का निर्भया कांड बताया. महीनों तक हर ब्रॉडशीट और न्यूज शो में रामकुमार का चेहरा, हर रेडियो स्टेशन पर उनका नाम था. कामगार वर्ग के पुरुषों के बारे में एक निश्चित उन्माद के साथ था, जो स्टेशन पर लड़कियों का पीछा करते, संपादकीय पन्ने औरतों की सुरक्षा को लेकर भरे पड़े थे. इससे पहले कि पुलिस किसी भी सबूत का खुलासा करती, मीडिया की अदालत ने रामकुमार को जाति-आधारित समाज में सबसे खराब अपराध का दोषी ठहराया: एक उत्पीड़ित-जाति के पुरुष द्वारा एक प्रभावशाली जाति की औरत का यौन हनन और हत्या. पुलिस के मामले का ब्योरा अंततः एक फिल्म, नुंगमबक्कम में याद किया गया, जिसने रामकुमार को दक्षिण एशिया की हिंसक पितृसत्ता की महामारी के एक भयानक उदाहरण के रूप में चित्रित किया.

इस बीच, संदिग्ध सबूतों के आधार पर, पुलिस ने रामकुमार को अपराध का मास्टरमाइंड बताते हुए लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस की. अदालतों को रामकुमार की पुलिस हिरासत देने की जल्दी थी. मीडिया ने कभी भी पुलिस के बयानों की जांच नहीं की और रामकुमार के अपने बचाव में खुद की अदालती फाइलिंग से महत्वपूर्ण विवरणों को हटा दिया.

सुजाता सिवगनानम तमिलनाडु में फ्रीलांस पत्रकार हैं.

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