राजधानी दिल्ली में पीजी की इमारत ढही, भय, दबाव और चुप्पी के माहौल में छात्र

कारवां के लिए अखिलेश पांडेय
सत्य निकेतन में इमारत ढहने वाली जगह के आस-पास जमा लोगों की भीड़. इलाके में रहने वाले छात्रों में घटना के बाद डर का माहौल बना हुआ है. 

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दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में 6 सितंबर, 2026 को दोपहर करीब 1:30 बजे दिल्ली विश्वविद्यालय के पास स्थित एक पांच मंजिला प्राइवेट पीजी इमारत भरभराकर ढह गई. इस घटना ने पूरे इलाके को दहशत में डाल दिया है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मलबे से कुल 12 लोगों को निकाला गया, जिनमें से सात की मौत हो गई और पांच घायल हैं, जिनका इलाज चल रहा है. स्थानीय लोगों और छात्रों का आरोप है कि बचाव कार्य में देरी के चलते मौतों की संख्या बढ़ी और बेसमेंट में काम कर रहे मजदूरों की सही संख्या अभी भी स्पष्ट नहीं हो पाई है.

अभी महज 14 दिन पहले ही बरेली से दिल्ली आए एक युवा छात्र को अंदाजा भी नहीं था कि दिल्ली पहुंचते ही उसका स्वागत डर और कैद भरी जिंदगी करेगी. घटना के तीन दिन बाद जब मैंने सत्य निकेतन की गलियों में घूमते हुए उससे मुलाकात की, तो वे जूस पी रहा था. उसके मन में बहुत कुछ कहने को था, लेकिन डर और दबाव के चलते चुप था. उसने नाम न छापने का आग्रह किया और भरोसा देने पर कुछ हद तक खुल गया.

छात्र ने बताया, 'घटना के बाद जीवन एक बंद कमरे जैसा हो गया है. हम बाहर जा सकते हैं, लेकिन किसी मीडियाकर्मी से बात नहीं कर सकते. रिश्तेदारों या चाहने वालों को भी पीजी में एंट्री नहीं मिलती, जब तक मालिक एकदम यह तय न कर लें कि वे रिपोर्टर नहीं हैं. पीजी मालिकों ने मकानों से पीजी के बोर्ड हटा दिए हैं. बच्चों को सख्त हिदायत दी गई है कि किसी भी रिपोर्टर से बात न करें. अगर किसी ने बात करते हुए देख लिया तो मकान खाली करना पड़ेगा और सिक्योरिटी भी नहीं मिलेगी.' वे बताते हैं कि पांच मंजिल से अधिक ऊंची इमारतों पर कार्रवाई चल रही है और वे भी ऐसे ही मकान में रहते हैं. अगर कार्रवाई हुई तो वे कहां जाएंगे और सिक्योरिटी वापस मिलेगी या नहीं, यह सवाल उनके मन में था.

यह स्थिति सिर्फ एक छात्र की नहीं, बल्कि सत्य निकेतन में रहने वाले लगभग सभी छात्रों की है. वे भय, असुरक्षा और दबाव महसूस कर रहे हैं.

हबीब खान खुद को भाग्यशाली मानते हैं कि घटना के दिन वे अपनी पीजी में नहीं थे. लेकिन वे दुखी भी हैं, क्योंकि उनके कई दोस्त, जो उसी पीजी में रहते थे, इमारत ढहने से मारे गए. हबीब के अनुसार, उस पीजी में कुल 14 लोग रहते थे. घटना के समय कम से कम 10 छात्र अंदर होने की संभावना है, जबकि बाकी मजदूर हो सकते हैं जो बेसमेंट के काम में लगे थे. हबीब ने बताया कि 'बचाव कार्य में देरी हुई. अगर समय पर काम होता तो और जानें बच सकती थीं.' उन्होंने कहा कि 'बेसमेंट में कितने लोग थे, यह सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि कोई दबा न रह जाए.'

कई अन्य छात्रों ने भी यही बात कही कि बेसमेंट में काम चल रहा था. मजदूर अंदर थे या बाहर-इसकी साफ जानकारी सामने आनी चाहिए, ताकि आंकड़ों को लेकर संशय दूर हो सके.

घटना के बाद से ढही इमारत के आसपास बैरिकेडिंग का दायरा बढ़ा दिया गया. पुलिस उन मीडियाकर्मियों, यूट्यूबर्स और पूछताछ करने वालों की तस्वीरें भी ले रही थी, जो ज्यादा सवाल पूछ रहे थे. स्वतंत्र पत्रकार और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर प्रियांशी सिंह पहले दिन से इस घटना को कवर कर रही हैं. उन्होंने बताया कि जब उन्होंने बैरिकेडिंग बढ़ाने और बेसमेंट के बारे में पूछा, तो पुलिस ने उनकी भी तस्वीर ली. प्रियांशी कहती हैं, 'इलाका एक तरह से बदल गया है. स्थानीय लोग और दुकानदार अब वे बातें नहीं कर रहे, जो पहले दिन कर रहे थे. सब संभालकर बोल रहे हैं.'

मैंने भी अपने 3-4 दिन के दौरे में ये अनुभव किया कि लोग इस बात को अब समझ रहे हैं कि मीडिया में खबर आने से इलाके की बदनामी हो रही है और इसका असर आगे वहां के पीजी उद्योग पर पड़ेगा इसलिए वे या तो संभाल कर बात कर रहे हैं या बात नहीं कर रहे. कुछ ऐसे स्थानीय लोग भी मिले जिन्होंने मीडिया का विरोध किया और इलाके का फ़ोटो-वीडियो लेने से मन भी किया.

घटना स्थल के पास बैरिकेडिंग के बाहर की जगह पर मैनें लोगों की भीड़ देखी. कहीं छात्र अपने दोस्तों के साथ ग्रुप में थे तो कहीं कोई परिवार था, कहीं दंपति थे तो कहीं मीडियाकर्मियों का झुंड था. मैंने बहुत से लोगों से बात की और जाना कि उनके मन में एक विस्मय और घटना को लेकर एक सवाल है. वहां रह रहे छात्र एक भय में है और उस जगह को छोड़ने की तैयारी में भी हैं. कुछ माता-पिता अपने बच्चों के साथ सड़क पर सामान शिफ्ट करते दिखे.

मैंने उत्तर-पूर्व राज्य से आए छात्रों के एक ग्रुप से उनके मन की बात जानने की कोशिश की जो घटना स्थल के पास खड़े थे और आपस में बातें कर रहे थे. पहले तो वे बहुत झिझक रहे थे पर मेरे आग्रह करने पर उन्होंने अपनी स्थिति बताई. मणिपुर से आई जीसस एंड मेरी कॉलेज की छात्रा किम दो साल से दोस्तों के साथ वहां रह रही हैं. वे कहती हैं, 'बहुत डर है. दिल्ली में उत्तर-पूर्व के छात्रों को लेकर पहले से अस्वीकार का भाव है. ऊपर से यह घटना और चुप रहने का दबाव.' उन्होंने कहा 'बहुत बुरा लगता है जब आप अन्याय पर बोलना चाहते हैं और मजबूरी में नहीं बोल पाते. ये जगह जिसमें हमलोग रहते हैं यहां कुछ ठीक नहीं हैं. हमलोग अपनी पढ़ाई के लिए यहां रहने को मजबूर हैं.'

सत्य निकेतन की यह घटना राजनीतिक रंग भी ले चुकी है. घटना स्थल के बाहर एबीवीपी, एआईएसए, एनएसयूआई, एसएफआई समेत विभिन्न छात्र संगठनों ने प्रदर्शन किए. वे कई मुद्दों पर अलग हो सकते हैं, लेकिन छात्रों की सुरक्षा और होस्टल व्यवस्था की मांग पर एकजुट नजर आए.

स्थानीय लोगों और छात्रों में गुस्सा साफ दिख रहा है. वे बचाव कार्य में देरी, बेसमेंट की खुदाई न होने और सही आंकड़े सामने न आने को लेकर प्रशासन पर सवाल उठा रहे हैं. घटना के बाद सत्य निकेतन में जो माहौल बना है, वह सिर्फ एक इमारत के गिरने की कहानी नहीं, बल्कि छात्रों के भय, दबाव और चुप्पी की भी कहानी है.

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