यूनिवर्सल बेसिक इन्कम योजना को लागू करना मुमकिन है- अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी

14 मार्च 2019
मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अभिजीत बनर्जी कांग्रेस को अपनी प्रस्तावित “न्यूनतम आय गारंटी योजना” की व्यवहार्यता पर सलाह दे रहे हैं.
सौम्या खंडेलवाल/हिंदुस्तान टाइम्स/गैटी इमेजिस
मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अभिजीत बनर्जी कांग्रेस को अपनी प्रस्तावित “न्यूनतम आय गारंटी योजना” की व्यवहार्यता पर सलाह दे रहे हैं.
सौम्या खंडेलवाल/हिंदुस्तान टाइम्स/गैटी इमेजिस

28 जनवरी को कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने घोषणा की कि उनकी पार्टी की सरकार बनने पर “गरीबी ओर भूख” का अंत करने के लिए गरीबों के लिए “न्यूनतम आय गारंटी योजना " लागू की जाएगी. उनकी यह घोषणा भारतीय जनता पार्टी नी​त सरकार के अं​तरिम बजट से कुछ दिन पहले आई थी. इस योजना के तहत भारतीय आबादी के एक हिस्से को नगद हस्तांतरण की गारंटी दी जाएगी. यह योजना यूनिवर्सल बेसिक इन्कम (यूबीआई) की तर्ज पर होगी. आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार “यूबीआई काम की आवश्यकता के बिना समय समय पर व्यक्तिगत आधार पर बिना शर्त नगद भुगतान है.”

2016—2017 के आर्थिक सर्वेक्षण में पहली बार पूर्व प्रमुख आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रामण्यम ने इस विचार को पेश किया था. इसके बाद ओडिशा और तेलंगाना जैसे राज्यों ने थोड़े बदलाव के साथ गरीब किसानों के लिए ऐसी योजनाओं की घोषणा की और​ सिक्किम ने साल 2022 तक यूनीवर्सल बेसिक इन्कम गारंटी का प्रस्ताव दिया है. इस साल फरवरी में केन्द्र सरकार ने सीमांत और गरीब किसानों के लिए तीन किस्तों में सालाना 6000 रुपए की योजना की घोषणा की.

हाल में फ्रांस के अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने पुष्टि की कि वे और एमआईटी में अर्थशास्त्र के फोर्ड फाउंडेशन प्रोफेसर अभिजीत बनर्जी इस योजना पर कांग्रेस पार्टी को सलाह देंगे. बनर्जी और पिकेटी विश्व असमानता डाटाबेस या डब्ल्यूआईडी में सहयोगी हैं. यह आय और सम्पत्ति के वितरण की ऐतिहासिक विकास का डाटाबेस है.

आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार “यूबीआई काम की आवश्यकता के बिना समय-समय पर व्यक्तिगत आधार पर बिना शर्त नगद भुगतान है.”

दिल्ली के पत्रकार रोहित इनानी ने बनर्जी से बातचीत की. दोनों ने न्यूनतम आय गांरटी योजना की भारत में संभावना और इसकी चुनौतियों पर चर्चा की. बनर्जी का कहना है, ''हमें बैंकों में पूंजी डालनी होगी ताकि वे खत्म न हो जाएं और अपना काम करने लगें.''

रोहित इनानी दिल्ली स्थित पत्रकार हैं. टाइम, द नेशन और हिमाल साउथ एशिया एवं अन्य पत्रिकाओं में लिखते हैं.

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