बैंकों का विलय अर्थव्यवस्था को इस मंदी से बाहर नहीं लाएगा: अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक

14 सितंबर 2019
शाहिद तांत्रे/कारवां
शाहिद तांत्रे/कारवां

जुलाई में पेश किए गए बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने महत्वाकांक्षी दावा किया कि भारत की अर्थव्यवस्था 2025 तक 5 खरब डॉलर हो जाएगी. इसके बाद के हफ्तों में केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने खुलासा किया कि अप्रैल-जून तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद विकास दर गिर कर छह साल के निम्नतम स्तर पांच प्रतिशत पर पहुंच गई; भारतीय रिजर्व बैंक ने केन्द्र सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपए का अधिशेष हस्तांतरित किया और सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के दस बैंकों के चार संयोजनों में विलय की घोषणा की. ये घोषणाएं भारतीय अर्थव्यवस्था की अनिश्चित स्थिति की पृष्ठभूमि में आईं हैं. देश में आर्थिक मंदी देखी जा रही है जो ऑटो सेक्टर से होते हुए दूसरे क्षेत्रों में फैल गई है, बेरोजगारी दर 45 साल के उच्च स्तर पर है और पिछले वित्त वर्ष का कर संकलन भारतीय जनता पार्टी सरकार के अनुमानित राजस्व से 1.67 लाख करोड़ रुपए कम रहा है. सीतारमण और भारतीय अर्थव्यवस्था दोनों के लिए यह मुश्किल दिखाई पड़ता है.

कारवां के स्टाफ राइटर कौशल श्रॉफ ने अर्थशास्त्री और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के पूर्व प्रोफेसर प्रभात पटनायक से बात की. पटनायक राजकोषीय घाटे - सरकार के कुल राजस्व और उसके कुल व्यय के बीच का अंतर- पर भारत की नीति के एक जाने-माने आलोचक हैं. भारतीय आर्थिक नीति सकल घरेलू उत्पाद के 3.3 प्रतिशत तक राजकोषीय-घाटे के लक्ष्य को निर्धारित करती है, जो सरकार के लिए बड़े सार्वजनिक खर्च को कम करने की बहुत कम गुंजाइश छोड़ती है. पटनायक ने उन परिस्थितियों को समझाया जो अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति का कारण बनीं और सरकार की इस पर प्रतिक्रिया अप्रभावी क्यों होगी इस पर भी उन्होंने बात की. पटनायक ने कहा, "बीजेपी सरकार के पास इस संकट से निपटने का कोई तरीका नहीं है.”

कौशल श्रॉफ: जीडीपी के आंकड़े बताते हैं कि अर्थव्यवस्था ने अप्रैल-जून तिमाही में पांच प्रतिशत की वृद्धि दर दर्ज की. इसी समय, सरकार ने बड़े बैंकों के विलय की घोषणा कर इन आंकड़ों के प्रभाव को मंद करने का प्रयास किया. हमें इन दो घोषणाओं को कैसे देखना चाहिए?

प्रभात पटनायक: यदि यह धारणा प्रस्तुत की जाती है कि बैंक के विलय से अर्थव्यवस्था गिरावट या मंदी से बाहर निकल जाएगी तो इसका कोई आधार नहीं है. बैंक विलय से इस संकट पर रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ने वाला है. बैंक विलय क्या करेंगे? यह कुछ बड़ी मात्रा में व्यापार में परिचालन लागत का प्रसार करेगा और यह लेनदेन लागतों को कुछ कम कर सकता है - जिनमें से सभी अंततः बैंकिंग सेवाओं के लिए इकाई लागत को कम करने में मदद करेंगे. सरकार उम्मीद कर रही है कि यह वास्तव में बैंकों द्वारा वसूली जाने वाली ब्याज दरों को कम करने में सक्षम होगा.

अब, मुद्दा यह है कि बड़े खर्चों को बढ़ाने में स्वयं ब्याज दरें बहुत प्रभावी नहीं होती हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि ब्याज दर मुख्य रूप से निवेश के स्तर को बढ़ाकर मदद कर सकती हैं. ऐसी स्थिति में, जहां अर्थव्यवस्था में मांग नहीं बढ़ रही है, भले ही सरकार ब्याज दर में कमी लाए, लेकिन इससे अर्थव्यवस्था में निवेश के स्तर पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है. इन निवेशों में काफी हद तक ब्याज में कमी है (जिसका अर्थ है कि ब्याज दर के आधार पर निवेश में बदलाव नहीं होता है). नतीजतन, यह विचार कि यदि आप ब्याज दर कम करते हैं तो व्यय बढ़ जाएगा, एक त्रुटिपूर्ण विचार है.

कौशल श्रॉफ कारवां के स्‍टाफ राइटर हैं.

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