भारत के खेतों में खतरनाक लैंटाना का प्रकोप

सैमुअल कर्टिस और विलियम जैक्सन हूकर / विकिमीडिया कॉमन्स
सैमुअल कर्टिस और विलियम जैक्सन हूकर / विकिमीडिया कॉमन्स
31 October, 2022

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मदाबा कर्नाटक के एक स्वदेशी चारागाही समुदाय बेट्टा कुरुबा जनजाति के नागरिक हैं. घास की देसी प्रजातियों की एक गहरी समझ होने के कारण वह बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान के एक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं, जिन्होंने 2019 से अपने घास के मैदान को बहाल करने और उसके प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित किया है. इस योजना में अन्य चीजों के अलावा, खरपतवार निकालकर उसके स्थान पर देसी घास की प्रजातियों को लगाना शामिल है. यह थका देने वाला काम है क्योंकि बांदीपुर यूपेटोरियम, पार्थेनियम और लैंटाना सहित विभिन्न प्रकार के खरपतवारों से भरा हुआ है.

बांदीपुर के एक वन अधिकारी मुनीराजू ने मुझे बताया, “केवल आदिवासियों के पास ही इस काम को करने की विशेषज्ञता है.” मुनिराजू अपने रेंज में राष्ट्रीय उद्यान के 13 में से एक घास के मैदान का प्रबंधन देखते हैं. साथ ही गर्मी शुरू होने से पहले जंगल में आग की सीमा रेखाएं भी तय करते हैं ताकि जंगल की आग को नियंत्रित किया जा सके.

खरपतवार निकालना इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. मदाबा और उनके समुदाय के साठ अन्य सदस्य अपने हाथों से तीन से चार महीने तक पूरे दिन इसे हटाने का काम करते हैं, लेकिन हर वर्ष खरपतवार फिर उग आती है. नवंबर 2019 में मदाबा ने मुझे बताया, "मैं यह काम बीस साल से कर रहा हूं. मैंने देखा है कि ये खरपतवार और भी खराब होते जा रहे हैं." वह लैंटाना कैमारा से विशेष रूप से परेशान थे. जो झाड़ियों में उगने वाला कांटेदार पौधा है. उन्होंने कहा, "बाकी खरपतवार से ज्यादा कठिनाई इसे निकालने में होती है." झाड़ियों को काटने के बाद ही पौधे को उखाड़कर किनारे कर दिया जाता है, जहां बाद में इसे जला दिया जाता है.

यह सिर्फ बांदीपुर नहीं है जो दुनिया के दस सबसे खराब आक्रामक पौधों में से एक माने जाने वाले लैंटाना कैमारा से परेशान रहा है. भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि सर्वेक्षण किए गए 207,100 वर्ग किलोमीटर में से 154,837 में लैंटाना मौजूद था.इसके आधार पर अध्ययन के लेखकों ने अनुमान लगाया कि भारत में सम्पूर्ण वन भूमि का 44 प्रतिशत यानी 303,607 वर्ग किलोमीटर खरपतवार के लिए उपयुक्त है, अर्थात गर्म, आर्द्र, उपजाऊ क्षेत्र जो मानव द्वारा उपयोग में नहीं है."

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आरती मेनन कर्नाटक स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार हैं. वह पर्यावरण, स्थिरता और जेंडर पर लिखती हैं।