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यारबल बुक्स से प्रकाशित पुस्तक 'एम/नो/नहीं' हमें मेघालय के पश्चिमी खासी हिल्स ले जाती है. इस फ़ोटोबुक का केंद्रीय विषय वह घटना है जिसमें डोमियासियत की 90 वर्षीय कोंग स्पेलिटी लिंगदोह लैंग्रिन ने अपनी ज़मीन पर यूरेनियम के खनन की अनुमति देने से इनकार कर दिया था और इसके बाद वहां एक बड़े यूरेनियम खनन विरोधी आंदोलन का जन्म हुआ. इस पुस्तक में दिखाई गई तस्वीरें और 2006 से 2023 तक की अवधि के अप्रकाशित नोट्स फिल्म निर्माता, फिल्म संपादक, वेबज़ीन ‘रैयत’ के सह-संस्थापक और संपादक रहे तरुण भारतीय द्वारा तैयार किए गए हैं. ये चित्र और लेख 'एम/नो/नहीं' नामक प्रदर्शनी से लिए गए हैं, जिन्हें तरुण भारतीय की 25 जनवरी, 2025 को निधन के बाद प्रथम राष्ट्रीय फ़ोटोग्राफ़ी महोत्सव में पहली बार प्रदर्शित किया गया था. पुस्तक का उपसंहार मेघालय स्थित मानवाधिकार कार्यकर्ता और भारतीय की साथी एंजेला रंगड ने लिखा है. इस अंश में, वह पश्चिम खासी हिल्स में यूरेनियम खनन के ख़िलाफ़ हुए नागरिक संघर्ष के बारे में बताती हैं.
खासी हिल्स में यूरेनियम खनन की शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी. तब डोमियासियत में यूरेनियम का पता लगाने के लिए खुदाई की गई थी. 1990 के दशक में जनता के दबाव के चलते यूरेनियम खनन की योजना टाल दी गई. यूरेनियम के प्रस्तावित खनन पर पहली सार्वजनिक सुनवाई 2007 में नोंग्बाह जिनरिन में हुई और इसके साथ ही खासी छात्र संघ और पश्चिम खासी हिल्स के युवा समूहों द्वारा विरोध प्रदर्शन भी किए गए. यूरेनियम खनन पर साफ़ तौर से आपत्तियां जताई गईं. डोमियासियत की कोंग स्पेलिटी लिंगदोह लैंग्रिन ने एक शब्द ‘नहीं’ कह कर खनन से इनकार कर दिया. उन पहाड़ियों का अधिकांश जिसके नीचे उच्च श्रेणी का यूरेनियम बड़ी मात्रा में मौजूद था, कोंग स्पेलिटी लिंगदोह लैंग्रिन का था.
दूर से ही घटनाओं के बारे में पढ़ने के बजाए भारतीय वहां घटित हो रही घटनाओं का दस्तावेजीकरण और फ़िल्मांकन करने के लिए डोमियासियत गए. वह कम से कम तीन बार वहां गए और वहां के लोगों से मिले. इन यात्राओं के दौरान भारती ने कोंग स्पेलिटी और उनके परिजनों की तस्वीरें लीं. इसके साथ ही उन्होंने सामुदायिक कार्यक्रमों, क्षेत्र में हुए राज्य चुनावों और वैवाहिक आयोजन की तस्वीरें लीं.
कोंग स्पेलिटी की ओर से कड़ा विरोध हो रहा था और खासी छात्र संघ द्वारा यूरेनियम खनन को रोकने के लिए निरंतर रणनीतिक अभियान चलाए जा रहे थे, लेकिन दूसरी ओर दशकों से उपेक्षा के शिकार गांव योजना पर सहमति जताने लगे. क्षेत्र के विकास की दुहाई और उससे मिलने वाले लाभ लोगों को आकर्षित करने लगे, ख़ासकर ऐसे स्थानों पर जहां सड़कें लगभग न के बराबर थीं. राजनीति तंत्र सक्रिय हो उठा और जल्द ही योजना से क्षेत्र के विकास का प्रचार शुरू हो गया.
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