हालात सामान्य होने के आभास का निर्माण

भारतीय मीडिया ने कश्मीर को कैसे कवर किया

15 जनवरी 2020
कारवां के लिए आशीम राज
कारवां के लिए आशीम राज

ईद-उल-अजहा से पहले के आखिरी शुक्रवार को 9 अगस्त के दिन, श्रीनगर के सौरा इलाके में भारत सरकार के खिलाफ बहुत बड़ा प्रदर्शन करने के लिए हजारों की संख्या में लोग जमा हुए. इससे चार दिन पहले भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने संविधान के अनुच्छेद 370 को तत्काल प्रभाव से हटाने की घोषणा की थी. यह वह अनुच्छेद था जिसने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दे रखा था जिसके तहत इस राज्य को अपना खुद का संविधान और झंडा रखने की अनुमति मिली हुई थी. इसके अलावा सरकार ने इस राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख इन दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया. इस कदम ने यहां के स्थानीय नेतृत्व से उसकी राजनीतित शक्ति पूरी तरह छीन ली और इसे पूरी तरह से केंद्र सरकार के हाथों में दे दिया.

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक इस भीड़ ने आजादी के नारे लगाए और कश्मीरी झंडे लहराए. इस जुलूस को सुरक्षा बलों ने रोक दिया जो द वॉशिंगटन पोस्ट के अनुसार “भीड़ पर आंसू गैस के गोले और पैलेट राउंड वाली शॉटगन चलाने लगे.” हालांकि इन दोनों अखबारों ने अपने खुद के चश्मदीद गवाह ढूंढ़ लिए थे, लेकिन वे बीबीसी और अल जजीरा द्वारा लगाई गई वीडियो रपट की मदद भी ले रहे थे जिसमें सब जिक्र की गई बातों को देखा और सुना जा सकता है.

ये कहानियां और वीडियो बहुत महत्वपूर्ण थे क्योंकि इन्होंने ऐसा कश्मीर दिखाया जो उस कश्मीर से बिलकुल अलग था जिसे भारत का राष्ट्रीय मीडिया दिखा रहा था. जब से शाह ने घोषणा की, तब से भारत सरकार को यह दिखाने में भारी सिरदर्दी हुई है कि इस फैसले को लेकर राज्य में कोई बड़ा असंतोष नहीं है. राष्ट्रीय मीडिया ने लगातार दोहराया कि कश्मीर में सबकुछ “सामान्य” है. हालात सामान्य होने का यह कथानक (नैरेटिव) प्राइम टाइम टेलीविजन और अखबारों के पहले पन्नों पर दिखाया गया और उन पत्रकारों ने इसे अंतहीन ढंग से दोहराया जिन्होंने शेखी बघारी थी कि वे सरकारी हैलीकॉप्टरों में कश्मीर गए थे. सौरा में इकट्ठा हुए भारी जनसमुदाय के वीडियो, इधर-उधर भागते लोगों का दृश्य और पृष्ठभूमि से आती शॉटगनों की जोरदार गर्जना ने इस कथानक को पंक्चर कर दिया.

सरकार ने तुरंत बयान जारी किया और कहा कि ऐसा कोई प्रदर्शन हुआ ही नहीं. गृह मंत्रालय ने 10 अगस्त 2019 को ट्वीट किया कि यह खबर “पूरी तरह मनगढंत और झूठी है.” एक पूर्व सैन्य अधिकारी और रक्षा विश्लेषक गौरव आर्य ने अगले दिन ट्विटर पर दावा किया कि ये वीडियो जाली थे. इन प्रदर्शनों के बारे में सवाल करने वाले एक ट्वीट के जवाब में गौरव ने कहा, “कश्मीर में अभी 100 से ज्यादा रिपोर्टर हैं, जो पिछले 5 दिन से लगातार रिपोर्टिंग कर रहे हैं. बीबीसी झूठ बोल रहा है.” दिल्ली स्थित रक्षा विश्लेषक और द प्रिंट के लिए नियमित रूप से लिखने वाले अभिजीत अय्यर-मित्रा ने एक ट्विट्टर थ्रेड शुरू की, ताकि हर संभावित तरीके से प्रदर्शनकारियों को बदनाम किया जा सके. उसने कहा कि वीडियो में प्रदर्शनकारियों ने जो झंडे ले रखे थे, उन पर इस्लामिक स्टेट और जैश-ए-मोहम्मद के निशान बने हैं और यह कि वे सब अल-कायदा के आतंकवादियों के नाम पुकार रहे थे. (उसने खुद जिस वीडियो का स्क्रीनशॉट लगाया था उसमें सबसे बड़ा बैनर था वह अनुच्छेद 370 हटाए जाने को लेकर था) वे सब पत्थर फेंक रहे थे. और वे “जरूर हमेशा कि तरह हिंसक हो गए होंगे ताकि उन पर गोली चलाई जा सके.” अभिजीत अय्यर-मित्रा के ट्वीट के बारे में एक खबर स्वराज्य ने अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित की.

एक वरिष्ठ कश्मीरी पत्रकार ने मुझे कहा, “आप लोग कश्मीर की तरफ राष्ट्रीय गौरव और राष्ट्रीय सुरक्षा के चश्मे से देखते हो. वहीं बाकी दुनिया के लिए यह एक कॉनफ्लिक्ट जोन यानी संघर्ष क्षेत्र है.”

अतुल देव कारवां के स्‍टाफ राइटर हैं.

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