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इरादा अगर अपनी ही जनता के बीच राष्ट्रवादी प्रोपेगेंडा थोपना हो, तो यह काम लोकप्रिय सितारों से सजी किसी जासूसी फ़िल्म से बेहतर भला और कौन कर सकता है. यथार्थ और फ़साने के घालमेल से निर्मित ये फ़िल्में एक-दूसरे का दामन थामे रहती हैं और एक को सहारा देने के लिए दूसरे का चतुराई से उपयोग करती हैं.
ये फ़िल्में जासूसों की तिलिस्मी दुनिया, राष्ट्रीय नायक और राष्ट्रीय शत्रु गढ़ने के लिए अत्यंत उपजाऊ ज़मीन पेश करती हैं. जब राष्ट्रवाद किसी फ़िल्म की पहचान बन जाता है, तो उस पर प्रश्न उठाना 'देशद्रोह' माना जाने लगता है. आदित्य धर की 'धुरंधर' (प्रथम भाग) पिछले वर्ष दिसंबर के प्रारंभ में रिलीज़ हुई थी. इस फ़िल्म पर ऑनलाइन सार्वजनिक विमर्श का स्तर अभूतपूर्व था. पहले ट्रॉल्स केवल शिक्षाविदों, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को लक्षित करते थे, लेकिन इस बार उन्होंने सीधे तौर पर फ़िल्म समीक्षकों को ही अपना निशाना बनाया.
धुरंधर की पृष्ठभूमि में सन 2000 के दशक का पाकिस्तानी शहर कराची है. लयारी की सघन बस्ती उस समय परस्पर युद्धरत बलूच और पश्तून अपराध सरगनाओं के नियंत्रण में एक भयावह और ख़ूनी दौर से गुज़र रही थी. अभिनेता रणवीर सिंह ने हमज़ा अली मज़ारी का किरदार निभाया है. गोरिल्ला जैसी कद-काठी वाला मज़ारी एक भारतीय जासूस है, जो रहमान बलूच (अभिनेता अक्षय खन्ना) के गिरोह में घुसपैठ करता है. खन्ना का कैरियर उनके सिर के गुम हो चुके बालों की तरह एक बार फिर लोगों को दिखाई देने लगा है.
संजय दत्त बलूचों पर संदेह करने वाले एक पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं, जिसका बेखौफ़ और दमदार एक्शन उसके भ्रष्ट पहलू को छिपा लेता है. अभिनेता अर्जुन रामपाल पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस अफ़सर बने हैं.
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