सवाल करोगे तो देशद्रोही कहे जाओगे: भीमा कोरेगांव मामले पर मानवाधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी

ग्लैडसन डुंगडुंग
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28 अगस्त को पुणे पुलिस ने देश भर के 9 प्रतिष्ठित मानवाधिकार कार्यकर्ता और समाजसेवियों के घर पर छापेमारी की. ट्रेड यूनियन नेता और वकील सुधा भारद्वाज, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा, वकील और सामाजिक कार्यकर्ता वेरनॉन गोंजाल्विस और अरुण फरेरा, वकील सुसन अब्राहम और माओवादी विचारक और लेखक वरवरा राव, लेखक और प्रोफेसर आनंद तेलतुमडे, पत्रकार क्रांति टेकुला और कैथलिक पादरी स्टेन स्वामी के घर पुलिस ने छापेमारी की. इनमें से पांच लोगों को उसी दिन गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, जैसे सख्त कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया. इस कानून में जमानत की मनाही है. फिलहाल, सर्वोच्च अदालत के दखल के बाद गिरफ्तार लोगों को नजरबंद रखा गया है.

31 अगस्त को महाराष्ट्र के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक परमबीर सिंह ने प्रेसवार्ता कर इन लोगों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई का ब्यौरा दिया. परमबीर सिंह ने बताया कि 6जून को जिन कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था उनके पास से बरामद सामग्री में हजारों की संख्या में पासवर्ड सुरक्षित संदेश और साहित्य मिला है जिनके आधार पर 28अगस्त की गिरफ्तारियां की गई हैं. सिंह ने यह दावा भी किया कि गिरफ्तार किए गए कार्यकर्ता प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के खुले सदस्य हैं, इन लोगों ने सरकार के तख्तापलट की साजिश की, प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रची, और पुणे के भीमा कोरेगांव नगर में जनवरी में हुई हिंसा के लिए लोगों को भड़काया.

इस साल 8 जनवरी के दिन पुणे के एक व्यवसायी तुषार दामगुडे की एफआईआर के आधार पर ये छापेमारी और गिरफ्तारियां की गईं. 1 जनवरी को पुणे की रहनेवाली अनीता सांवले ने एक एफआईआर कर हिंदुत्ववादी नेता मिलंद एकबोटे और संभाजी भिंडे को हिंसा का जिम्मेदार बताया था. अपनी प्रेसवार्ता में परमबीर सिंह ने 1 जनवरी की एफआईआर से संबंधित किसी भी सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया.

हालांकि स्टेन स्वामी को गिरफ्तार नहीं किया गया है लेकिन सिंह का कहना था कि जिनके यहां भी छापेमारी की गई है वे लोग संदिग्ध हैं और उन पर नजर रखी जा रही है और जांच की जा रही है. 81 वर्षीय स्वामी झारखण्ड के रांची शहर में बगईचा परिसर में एक कमरे के मकान में रहते हैं. यह एक सामाजिक शोध और प्रशिक्षण केन्द्र है जिसकी स्थापना 2006 में हुई थी. स्‍वामी निरंतर बगईचा के काम के बारे में झारखंड के आदिवासी और ग्रामीण समुदायों को जानकारी देते हैं. एक फोन साक्षात्कार में पत्रकार चित्रांगदा चौधरी ने पुलिस कार्रवाई और पिछले कई दशकों से झारखण्ड के आदिवासी क्षेत्रों में उनके कामकाज के बारे में स्वामी से बातचीत की. स्वामी ने कहा कि, ‘‘हम लोग आदिवासी मामालों को लेकर सीधे अदालत के सामने सरकार का मुकाबला करते हैं.’ स्वामी कहते हैं, ‘‘हम सवाल पूछते हैं इसलिए सताए जा रहे हैं.‘‘

चित्रांगदा चौधरी ओडिशा में मल्टीमीडिया पत्रकार, शोधकर्ता और ओपन सोसाइटी इंस्टीट्यूट की फेलो हैं.

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