कोयले पर अदालत के फैसले और अपने ही कानून से बेपरवाह सरकार

04 अक्टूबर 2018
कंपनियों के बीच होने वाले करारों की जांच करने में कोयला मंत्रालय की असफलता के चलते सर्वोच्च अदालत के 2014 के विपरीत निजी कंपनियों को इस व्यावसाय में दोबारा पैर पसारने का अवसर मिला है.
डेनिअल बेरेहूलक/Getty Images
कंपनियों के बीच होने वाले करारों की जांच करने में कोयला मंत्रालय की असफलता के चलते सर्वोच्च अदालत के 2014 के विपरीत निजी कंपनियों को इस व्यावसाय में दोबारा पैर पसारने का अवसर मिला है.
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2014 में चुनाव अभियान के वक्त नरेन्द्र मोदी ने कोयला उद्योग में सुधार को अपने विकास एजेंडे के केन्द्र में रखने का वादा किया था. उस साल सितंबर में सर्वोच्च अदालत अपने ऐतिहासिक फैसला में कोयला खंड में प्रायः समस्त आबद्ध खनन को रद्द कर दिया था. इस फैसले ने एक बड़े घोटाले- कोलगेट- पर रोक लगा दी थी. संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार के पतन में इस घोटाले का कम योगदान नहीं था. सर्वोच्च अदालत ने भारत सरकार और सार्वजनिक कंपनियों को निजी कंपनियों के साथ संयुक्त उपक्रम बनाने से रोक दिया था जिसके जरिए आवंटित कोयला खंड में निशुल्क उत्खनन कर निजी कंपनियां मुनाफा कमा रही थीं. अदालत ने अपने फैसले में कहा थाः ‘‘सरकार से यह उम्मीद की जाती है कि वह देश की प्राकृतिक संपदा को कुछ लोगों की निजी संपत्ति नहीं मानेगी जो मनमर्जी से इसे लुटा दें.’’ अपने फैसले में अदालत ने कुल 214 संयुक्त उपक्रम और कोयला खंड आवंटनों को रद्द कर दिया था.

2014 के सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले ने कोयला उद्योग के लिए नए कानूनों और सुधारों के लिए जमीन तैयार की. अगले साल राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने इन बदलावों को लक्षित कर दो कानून पारित किएः कोयला खान (विशेष प्रावधान) विधेयक 2015 और खान और खनिज विकास विनियमन अधिनियम. कोयला मंत्रालय ने अपनी प्रेस रिलीज में इसके बारे में कहा, ‘‘यह वर्ष इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा.’’ कोयला खनन कानून में यह व्यवस्था की गई है कि पहले जिन खंडों का आवंटन रद्द किया गया है वे खंड निजी या सार्वजनिक कंपनियों को नीलामी के जरिए आवंटित होंगे या सीधे सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को सौंप दिए जाएंगे.’’

कानून को पारित हुए तीन साल हो चुका है. लेकिन क्या यह लागू हो रहा है? यह एक बड़ा सवाल है. सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकरी से पता चलता है कि कोयला मंत्रालय के पास निजी कंपनियों और सार्वजनिक कंपनियों के बीच हुए करारों से जुड़े दस्तावेजों की कॉपी नहीं हैं. सरकारी जांच के अभाव में आज भी वह सब हो रहा है जिसे अवैध कह कर सर्वोच्च अदालत ने रोक दिया था. 2014 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और उसके बाद बनाए गए कानूनों के अप्रभावी क्रियांवयन से आज भी निजी कंपनियों को वैसा ही फायदा हो रहा है जैसा पहले होता था.

कोयला खान कानून के पारित होने के बाद से अब तक कुल कोयला खंड का 27 प्रतिशत नीलामी के जरिए आवंटित किया गया है और 84 प्रतिशत के आस पास को सीधे सार्वजनिक कंपनियों को सौंप दिया गया. निलामी के जरिए आवंटित खंडों के बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने घोषणा की थी, ‘‘मात्र 33 खंडों के आवंटन से दो लाख करोड़ रुपय की आय यह साबित करती है कि नीतिगत प्रशासन से भ्रष्ट व्यवस्था को खत्म किया जा सकता है.’’ किंतु कोयला और स्टील के लिए संसद की स्थाई समिति की इस साल अगस्त की रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान सरकार के कार्यकाल में इस वर्ष अप्रैल माह तक कोयला आवटंन से प्राप्त राजस्व 5399 करोड़ रुपए है. समाचार पत्र बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के हवाले से इस साल जून तक कोयला आवंटन से प्राप्त कुल राजस्व 5684 करोड़ रुपए है जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दावे का मात्र 3 प्रतिशत है.

जिन सार्वजनिक कंपनियों को कोयला खंड आवंटित किया गया उनमें से अधिकांश ने निजी कंपनियों को माइन डिवेलपर कम आपरेटर (एमडीओ) नियुक्त किया है जिन पर खदान के रखरखाव, विकास और संचालन की जिम्मेदारी है. जबकि सार्वजनिक कंपनियों और एमडीओ के बीच होने वाले करार केन्द्र सरकार और कोयला मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं हो सकते तो भी निजी कंपनियां इन समझौतों की शर्तों का खुलासा करने से इनकार करती हैं. इस तरह की अपारदर्शिता 2014 के सर्वोच्च अदालत के फैसले और उसके बाद पारित कानूनों के खिलाफ है.

निलीना एम एस करवां की रिपोर्टिंग फेलो हैं.

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