वेंटिलेटर की कमी को पूरा करने की जल्दबाजी में सुरक्षात्मक उपकरणों की गलती दोहरा रही सरकार

30 मार्च 2020
मनी शर्मा/एएफपी/गैटी इमेजिस
मनी शर्मा/एएफपी/गैटी इमेजिस

मार्च के अंत तक पहुंचते-पहुंचते कोविड-19 संकट से निपटने में तेजी आई. इससे पता चलता है कि सरकार आखिरकार तेजी से फैल रही महामारी को लेकर अपनी नींद से जाग रही है. पहले से ही चिकित्सा उपकरणों की भारी कमी का सामना कर रहे भारत के डॉक्टरों को इन महत्वपूर्ण वस्तुओं की राशनिंग करनी पड़ेगी. खासतौर आज के वक्त में सोने से भी महत्वपूर्ण वस्तु यांत्रिक वेंटिलेटर की. पिछले सप्ताह केंद्र ने वेंटिलेटरों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की अधिसूचनाएं जारी की, इनकी खरीद के लिए एक राष्ट्रीय-स्तर की समिति का गठन किया और नागरिक-उड्डयन विभाग के साथ बैठक कर वेंटिलेटर की अनिवार्य रूप से होने वाली कमी के संबंध में योजना बनाई. फिर भी ऐसा लगता है कि केंद्र ने अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों और कच्चे माल के भंडारण में विफलता से कोई सबक नहीं सीखा है क्योंकि उसने सभी श्वसन उपकरणों और श्वास यंत्रों के निर्यात को प्रतिबंधित करने के लिए 24 मार्च तक का समय लिया.

वेंटिलेटर उन रोगियों की मदद करता है जिन्हें सांस लेने में तकलीफ होती है. वह फेफड़ों में एक ट्यूब के माध्यम से हवा पंप करता है. कोविड-19 वायरस श्वसन प्रणाली को प्रभावित करता है जिसके कारण सांस लेने में तकलीफ वाले मरीजों की संख्या में वृद्धि हुई है. इटली और चीन, जिन्हें महामारी का सबसे बुरा सामना करना पड़ा, दोनों पहले से ही इससे निपट रहे हैं और यह संभावना है कि भारत भी इसका सामना करेगा. "उद्योग पर नजर रखने वाली एक गैर-लाभकारी संस्था ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क की सह-संयोजक मालिनी आयसोला ने कहा, "ये फैसले एक-दो सप्ताह की देरी से लिए जा रहे हैं, मैं बस आशा ही कर सकती हूं कि इस देरी की हमें बहुत ज्यादा कीमत न चुकानी पड़े. लगता है कि अब जगह-जगह एक बहुस्तरीय ठोस प्रयास होने लगा है और यह उम्मीद जगाती है कि ये सुनिश्चित करेंगे कि जब मामले बढ़ने शुरू होंगे तो हमारे पास पर्याप्त वेंटिलेटर होंगे."

मामलों में वृद्धि के अंतर्राष्ट्रीय पैटर्न और कई देशों द्वारा देखी गई आवश्यक चिकित्सा उपकरणों की कमी के बावजूद, भारत सरकार चेतावनी जारी करने और संक्रमण के फैलने से पहले कमद उठाने में बार-बार विफल रही है. सार्वजनिक-स्वास्थ्य संकट के दौरान वेंटिलेटर के निर्यात को प्रतिबंधित करने की अपनी पहली अधिसूचना जारी करने में केंद्र सरकार ने 19 मार्च तक का समय लगा दिया. विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा चिकित्सा कर्मचारियों के लिए सुरक्षात्मक उपकरणों की आपूर्ति में व्यवधान की आशंका से संबंधित दिशानिर्देश जारी करने के तीन सप्ताह बाद. इसी अधिसूचना ने कवरऑल और मास्क के लिए कच्चे माल के निर्यात पर भी प्रतिबंध लगाया. फिर भी सरकार को वेंटिलेटर के हिस्सों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी करने में और 5 दिन लगे. 24 मार्च को विदेश व्यापार महानिदेशालय ने "सभी वेंटिलेटर, किसी भी तरह के कृत्रिम श्वसन उपकरण या ऑक्सीजन थैरेपी उपकरण या किसी अन्य श्वास उपकरण/यंत्र" के निर्यात पर रोक लगा दी.

22 मार्च को एक प्रेस वार्ता में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने बताया तो था कि केंद्र ने 1200 नए वेंटिलेटर खरीदने का आदेश दिया है लेकिन यह अभी भी डॉक्टरों की आवश्यक मांग से कम हो सकता है. विशेष रूप से यह महाराष्ट्र के लिए सच है जहां राज्य सरकार ने निर्दिष्ट किया है कि भारत में बने वेंटिलेटर को संयुक्त राज्य के खाद्य और औषधि प्रशासन या यूरोपीय संघ द्वारा सीई प्रमाणित किया जाना चाहिए. सीई दर्शाता है कि उत्पाद यूरोपीय आर्थिक क्षेत्र में लागू स्वास्थ्य मानकों को पूरा करता है. समय की कमी और वैश्विक स्तर पर उड़ानों के बंद होने को देखते हुए सख्त मानकों का पालन करना असंभव है. यह देखते हुए कि भारतीय राज्यों के बीच महाराष्ट्र अब तक सबसे बुरी तरह प्रभावित हुआ है जहां 100 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं, उपरोक्त निर्णय तात्कालिकता के अभाव को भी दर्शाता है.

एक वेंटिलेटर निर्माता ने नाम न छापने की शर्त पर मुझसे कहा कि उन्होंने अव्यवहारिक मानकों पर पुनर्विचार करने का आग्रह करते हुए राज्य सरकार से संपर्क किया था. उन्होंने सरकार को लिखा, "संकट के इस समय में, यह बहुत भयावह है कि सीई अनुमोदन और यूएस एफडीए को अनिवार्य बनाया गया है." उन्होंने राज्य से उन विशिष्टताओं को विकसित करने का अनुरोध किया जो भारतीय निर्माताओं के लिए "व्यावहारिक, प्राप्त करने योग्य और संभव हो", उन्होंने साथ में यह भी कहा कि "केवल न्यूनतम मोड या विनिर्देशों के बारे में ही पूछा जाना चाहिए."

विद्या कृष्णन स्वास्थ्य मामलों की पत्रकार हैं और गोवा में रहती हैं. एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा पर उनकी पहली किताब 2020 में प्रकाशित होगी.

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