भोपाल गैस त्रासदी अस्पताल को कोविड अस्पताल बनाने के चलते एक गैस पीड़िता की मौत

13 अप्रैल 2020
भोपाल गैस त्रासदी में जीवित बचे लोगों के लिए काम करने वाले एनजीओ द्वारा संचालित क्लिनिक में सात साल के बच्चे का इलाज करते हुए फिजियोथेरेपिस्ट. 1984 को हुए रासायनिक रिसाव ने एक ही रात में हजारों लोगों की जान ली. साथ ही आगे के कई वर्षों में विषाक्त गैस के असर से अन्य हजारों की जान गई है.
सौरभ दास/एपी फोटो
भोपाल गैस त्रासदी में जीवित बचे लोगों के लिए काम करने वाले एनजीओ द्वारा संचालित क्लिनिक में सात साल के बच्चे का इलाज करते हुए फिजियोथेरेपिस्ट. 1984 को हुए रासायनिक रिसाव ने एक ही रात में हजारों लोगों की जान ली. साथ ही आगे के कई वर्षों में विषाक्त गैस के असर से अन्य हजारों की जान गई है.
सौरभ दास/एपी फोटो

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा राज्य की राजधानी भोपाल के मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर (बीएमएचआरसी) को कोविड-19 के लिए समर्पित अस्पताल में बदलने के निर्णय से भारत के एक सबसे कमजोर समुदाय पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा है. बीएमएचआरसी 500 बिस्तरों वाला एक सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल है. इसे 1984 की भोपाल गैस त्रासदी में बचे पहली, दूसरी और तीसरी पीढ़ी के लोगों की देखभाल के लिए स्थापित किया गया था. लेकिन 23 मार्च को राज्य के लोक स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के एक निर्देश के अनुसार बीएमएचआरसी ने मौजूदा रोगियों के लिए सभी स्वास्थ्य देखभाल बंद कर दी है. केवल चार रोगियों को छोड़कर, जिन्हें उनकी गंभीर स्थिति के कारण वहां से हटाया नहीं किया जा सका था, अन्य सभी रोगियों को अस्पताल से बाहर निकाल दिया गया. अस्पताल से निकाले गए रोगियों में से एक 68 साल मुन्नी बी भी थीं. 9 अप्रैल को चिकित्सा देखभाल के अभाव में उनकी मौत हो गई.

3 दिसंबर 1984 की आधी रात को, चालीस टन से अधिक जहरीली गैस मिथाइल आइसोसाइनेट एक कीटनाशक संयंत्र से लीक हो गई और भोपाल की हवा जहर में बदल गई. रिसाव के तत्काल बाद हजारों लोगों की मौत हो गई. जहरीली गैस के असर से बाद के सालों में हजारों अन्य लोगों की भी मौत हुई. भोपाल गैस त्रासदी अभी भी दुनिया की सबसे घातक औद्योगिक आपदा है. पीढ़ियों बाद भी रिसाव से बचे लोगों में कैंसर और जन्म दोष की दर में वृद्धि जारी है.

पिछले तीन हफ्तों में कोविड-19 को लेकर मध्य प्रदेश की प्रतिक्रिया से पता चला है कि राज्य महामारी से निपटने के लिए तैयार नहीं है. बीएमएचआरसी को बंद करने का राज्य का बड़ा फैसला इसी पैटर्न को दिखाता है. एक्टिविस्टों के मुताबिक, इसने गैस रिसाव में बचे लोगों को बिना किसी स्वास्थ्य सुविधा के अधर पर लाकर छोड़ दिया है और अभी तक बीएमडब्ल्यूआरसी में कोविड​​-19 मामले के संदिग्ध या पुष्टि रोगी किसी का भी इलाज नहीं किया गया है. रिसाव में बचे लोग पहले से ही कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली से पीड़ित हैं और उनमें से अधिकांश अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों में रहने को मजबूर हैं. यह कारक उनमें नोवल कोरोनवायरस के संपर्क में आने का खतरा बढ़ा देता है. इस परिदृश्य में मुन्नी बी की कहानी रिसाव में जीवित बचे लोगों पर लादी जा रही असीम हृदय विदारक स्थिति को बयान करती है.

गैस रिसाव में जीवित बचे लोगों के साथ काम करने वाले भोपाल ग्रुप ऑफ इंफॉर्मेशन एंड एक्शन की एक कार्यकर्ता, रचना ढींगरा ने मुझे बताया कि जब बीएमएचआरसी को बदलने का आदेश जारी किया गया था, "लगभग तुरंत, मेरा फोन बजने लगा." उन्होंने कहा कि घबराए हुए परिवारों ने उन्हें बुलाया और कहा कि "रोगियों को जबरन छुट्टी दी जा रही है.'' उन्होंने बताया, जब मैंने फोन किया तो मुझे महसूस हुआ कि वे उन रोगियों को भी डिस्चार्ज करने की ​कोशिश कर रहे ​थे जो वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे. हमने इसे अदालत में चुनौती देने का फैसला किया.” ढींगरा ने मुझसे कहा, "स्वास्थ्य का अधिकार, समान रूप से इलाज किया जाना और जीवन का अधिकार गैस त्रासदी के बचे लोगों के लिए काफी निकटता से जुड़ा हुआ है."

7 अप्रैल को ढींगरा और मुन्नी बी ने सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप करने के लिए कहा. याचिका के अनुसार, अस्पताल में "86 रोगियों को जबरन छुट्टी दे दी गई है." याचिका ने राज्य सरकार के आदेशों को चुनौती दी और कहा कि अस्पताल संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के उल्लंघन कर रहा है जो क्रमशः समानता के अधिकार और जीवन के अधिकार की गारंटी देते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को इसके बजाय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर पीठ से संपर्क करने को कहा. मामला अभी तक सुनवाई के लिए नहीं आया है.

विद्या कृष्णन स्वास्थ्य मामलों की पत्रकार हैं और गोवा में रहती हैं. एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा पर उनकी पहली किताब 2020 में प्रकाशित होगी.

Keywords: COVID-19 Madhya Pradesh Bhopal gas tragedy coronavirus lockdown
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