कोरोनावायरस : विज्ञान को नकारने की मोदी सरकार की नीति पर कायम गुजरात

गुजरात सरकार ने क्षेत्र में नोवेल कोरोनावायरस के कई मामलों का पता चलने के बाद बड़ौदा के बरसाना में निवासियों को होम्योपैथी की गोलियां दीं. वैज्ञानिक चेतना का सहारा लेने के बजाय, जो संपर्क ट्रेकिंग और परीक्षण को आवश्यक बताती है, गुजरात सरकार कोरोनोवायरस के प्रसार को रोकने के लिए छद्म और गैर-वैज्ञानिक उपचार पर ध्यान केंद्रित करती दिखाई देती है.
गुजरात सरकार ने क्षेत्र में नोवेल कोरोनावायरस के कई मामलों का पता चलने के बाद बड़ौदा के बरसाना में निवासियों को होम्योपैथी की गोलियां दीं. वैज्ञानिक चेतना का सहारा लेने के बजाय, जो संपर्क ट्रेकिंग और परीक्षण को आवश्यक बताती है, गुजरात सरकार कोरोनोवायरस के प्रसार को रोकने के लिए छद्म और गैर-वैज्ञानिक उपचार पर ध्यान केंद्रित करती दिखाई देती है.

पिछले चार महीनों से, जब से भारत नोवेल कोरोनावायरस महामारी की चपेट में आया है, नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार की प्रतिक्रिया, होम्योपैथी से लेकर अर्ध-वैज्ञानिक आयुर्वेद उपचार तक, छद्म वैज्ञानिक उपायों से प्रेरित है. इस प्रतिक्रिया को आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी मंत्रालय या आयुष मंत्रालय का समर्थन है. बीमारी के फैलने को रोकने में मदद करने तथा प्रतिरक्षा-बूस्टर या रोगनिरोधी के रूप में प्रभावी होने के लिए कई राज्यों में सरकारें होम्योपैथिक उपचारों की पेशकश कर रही हैं जो वैश्विक रूप से अप्रमाणित है. पिछले कुछ हफ्तों में तेजी से होने वाली मौतों के साथ, मोदी प्रशासन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की महामारी के लिए अनुशंसित प्रतिक्रियाओं के साथ-साथ इक्कीसवीं सदी के स्वीकृत वैज्ञानिक ज्ञान के विपरीत उपायों को जारी रखा है.

मई 2014 में सत्ता में आने के बाद से वैज्ञानिक साक्ष्य के लिए अरुचि मोदी सरकार की एक सुसंगत विशेषता रही है. इसके पहले निर्णयों में से एक भारतीय चिकित्सा विभाग और होम्योपैथी को आयुष मंत्रालय की स्थिति तक ऊपर उठाना था. उस वर्ष जून में, नव नियुक्त स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने मध्य दिल्ली में राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन के कार्यालय का दौरा किया. एचआईवी और एड्स से निपटने के लिए सरकार के उपायों पर बात रखते हुए, वर्धन ने नाको के अधिकारियों को कंडोम वितरण के सफल उपाय के बजाय "संयम" को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी- नाको ने पाया था कि भारत में एड्स के 86 प्रतिशत मामले असुरक्षित यौन संबंधों के चलते थे. आयुष पर नव-निर्वाचित सरकार का जोर अन्य प्रमुख स्वास्थ्य कार्यक्रमों में कटौती के साथ था, जिनमें एचआईवी और एड्स तथा तपेदिक और स्वास्थ्य के तहत सेवा प्रदान करने वाले क्षेत्रों के लिए सरकार की योजना राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन शामिल है.

सरकार के इस दृष्टिकोण को बेहतर रूप से चित्रण मोदी के गृह राज्य गुजरात के अलावा और कहां हो सकता है जहां उन्होंने 13 साल तक राज किया और जिस पर उनका प्रॉक्सी शासन आज भी जारी है. देश के सबसे अधिक कोविड मामले वाले राज्यों में से एक होने के अलावा, पिछले छह वर्षों में सरकार के सार्वजनिक-स्वास्थ्य नीति से संबंधित जो फैसले लिए हैं वह अब अपना रंग दिखाने लगे हैं. गुजरात में सरकार ने महामारी से निपटने के लिए छद्म और गैर-वैज्ञानिक तरीकों के उपयोग का लगातार समर्थन किया है, यहां तक ​​कि कोरोनोवायरस के मामलों में वृद्धि के बावजूद इसकी परीक्षण दरों में गिरावट आई है. इसने अपने क्वारंटीन केंद्रों को छद्म वैज्ञानिक उपायों के लिए "प्रायोगिक" केंद्रों में बदल दिया है, जहां सरकार भारतीय कानून के तहत निर्धारित किसी भी शोध प्रोटोकॉल का पालन नहीं करती थी.

गुजरात वायरस के हॉटस्पॉटों में से एक है. राज्य में 19 मार्च को कोविड-19 का पहला मामला दर्ज किया गया था. 23 जून तक राज्य में संक्रमण के पुष्ट मामलों की संख्या 27260 थी. इस मामले में महाराष्ट्र और दिल्ली के बाद देश का तीसरा सबसे बड़ा हॉटस्पाट गुजरात है. 1663 मौतों और 6.1 मृत्यु दर के साथ वह सभी राज्यों में अव्वल है जबकि राष्ट्रीय औसत 3.32 प्रतिशत है. 22 जून तक, गुजरात सरकार की वेबसाइट के अनुसार, अकेले अहमदाबाद में 1332 मौतें दर्ज की गईं. शहर में कुल मामलों की संख्या सरकारी वेबसाइट पर सूचीबद्ध नहीं है लेकिन समाचार रिपोर्टों के अनुसार, 7 जून तक 20000 से अधिक मामले दर्ज हो चुके थे.

वैज्ञानिक ज्ञान के खिलाफ जाते हुए, जो व्यापक रूप से संपर्क ट्रेसिंग और जांच के लिए कहता है, गुजरात सरकार ने होम्योपैथी की गोलियां और आयुर्वेदिक मिश्रणों को हॉटस्पॉट में वितरित किया. बड़ौदा के एक रिहायशी इलाके वसाना में, जहां संक्रमण के मामलों का पता चला था, राज्य सरकार ने कुछ मोहल्लों में होम्योपैथिक दवा बांटी. 11 मई को "एक पड़ोसी के सकारात्मक परीक्षण के बाद, मेरी बिल्डिंग को सील कर दिया गया था," क्षेत्र के एक अपार्टमेंट परिसर की एक 21 वर्षीय निवासी ने नाम नहीं छापने का आग्रह करते हुए मुझे बताया. "यहां रहने वालों का एक व्हाट्सएप ग्रुप है, जिसमें हमें बताया गया था​ कि अब किसी को बाहर जाने की इजाजत नहीं है. मैं बौखला रही थी,” उसने कहा.

विद्या कृष्णन स्वास्थ्य मामलों की पत्रकार हैं और गोवा में रहती हैं. एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा पर उनकी पहली किताब 2020 में प्रकाशित होगी.

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