कोरोना पर मोदी के भावुक भाषण से असली सवाल गायब, महामारी के खिलाफ रणनीति बनाने में फेल सरकार

21 मार्च 2020

इतिहास याद रखेगा कि कोविड-19 महामारी के समय 19 मार्च को प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम अपने पहले संबोधन में भारतीयों को इटली के लॉकडाउन की नकल करने की सलाह देते हुए रविवार को अपनी-अपनी बालकनियों पर खड़े होकर डॉक्टरों, नर्सों और जारी जन स्वास्थ्य संकट से लड़ रहे स्वास्थ्य कर्मियों का शुक्रिया अदा करने को कहा था. मोदी ने महामारी की तुलना विश्व युद्धों से की और दुनिया भर में कोविड के विस्फोट के बारे में बात तो की लेकिन उनके भाषण से जो जरूरी चीज गायब थी वह यह कि सरकार इस संकट को कम करने की कैसी रणनीति बना रही है.

मोदी सरकार ने जमीन पर काम कर रहे मेडिकल स्टाफ, जो मास्क, गाउन और अन्य प्रकार के सुरक्षा उपकरणों की समस्या झेल रहे हैं, के लिए किसी तरह के आर्थिक पैकेज या अन्य ढांचागत उपायों की पेशकश नहीं की. छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं देने वाले गैर सरकारी संगठन “जन स्वास्थ्य सहयोग” के डॉ. योगेश जैन ने कहा, “मोदी का भाषण भावनात्मक था, वह लोगों से सहयोग मांग रहे थे जबकि उन्हें इस संकट को कम करने की सरकार की रणनीति के बारे में बताना चाहिए था.” जैन ने आगे कहा, “मुझे नहीं लगता कि उनका भाषण नागरिकों या मेडिकल स्टाफ की चिंताओं को दूर करने वाला था. उन्होंने बस इतना किया कि महामारी की तुलना विश्व युद्धों से कर दी और लोगों को बालकनियों में खड़े होकर ताली बजाने, संयम रखने और संकल्प करने की अपील की. उन्होंने यह नहीं बताया कि युद्ध जैसी हालत में उनकी सरकार की तैयारी कैसी है.”

मोदी की नाटकीय प्रस्तुति का मुख्य आकर्षण 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का आह्वान करना था. जन स्वास्थ्य जानकारों के बीच इस एक दिन के बंद का कोई वैज्ञानिक स्पष्टीकरण नहीं है लेकिन इसे आने वाले दिनों में संभावित लंबे लॉकडाउन की तैयारी की तरह देखा जा रहा है. उन्होंने उस विवाद की चर्चा नहीं की जिसमें भारत को दुनिया के सबसे कम कोविड-19 की जांच करने वाले देशों में गिना जा रहा है. उन्होंने जांच किटों की संख्या से संबंधित चिंताओं पर बात नहीं की और यह भी नहीं बताया कि जनता को कितनी कीमत पर कोविड-19 का इलाज उपलब्ध होगा जबकि विशेषज्ञ आने वाले दिनों में मामलों की सुनामी की चेतावनी दे रहे हैं.

मोदी का संबोधन न नागरिकों को शांत कर पाया और न ही गिरते हुए शेयर मार्केट को ऊपर उठा सका. इसने बस इतना साफ कर दिया कि भारत सरकार संकट कम करने की रणनीति को गुप्त रखने वाली है और वह मेडिकल सेवा देने वाले समुदायों की जरूरतों को प्राथमिकता नहीं देने जा रही है.

संकट से लड़ रहे मेडिकल स्टाफ ने मोदी के भाषण से मिली निराशा को ट्वीटर पर साफ कर दिया. तामिल नाडु की डॉ. शलीका मालवीय ने ट्वीट कर लिखा, “कृपा रविवार 5 बजे घर से निकल कर हमारा हौसला न बढ़ाएं बल्कि आप जहां हैं वहीं से प्रधानमंत्री ने अनुरोध करें कि वह आपको कोविड-19 की जांच करवाने दें. उनसे अस्पतालों में बिस्तरों, वैंटीलेटरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए मास्क जैसे पीपीई को बढ़ाने और सबसे हाशिए के लोगों के लिए आर्थिक सहयोग की मांग करें.” इसी प्रकार कोविड रोगियों का उपचार कर रहे एक डॉक्टर की पत्नी डॉक्टर आफरीन उस्मान ने ट्वीट पर लिखा, “एक डॉक्टर और कोविड मरीजों का उपचार करने वाले डॉक्टर की पत्नी होने के नाते मैं आप से कहना चाहती हूं कि हम नहीं चाहते कि आप हमारे लिए ताली बजाएं. वास्तम में हमें और अधिक टेस्टिंग किटों, बेहतर क्वारंटीन सुविधाओं, हजमत पोशाकों और ज्यादा जागरुकता यानी सही तरह की जागरुकता की जरूरत है.”

विद्या कृष्णन स्वास्थ्य मामलों की पत्रकार हैं और गोवा में रहती हैं. एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा पर उनकी पहली किताब 2020 में प्रकाशित होगी.

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