पंजाब में धूल खा रहे सैकड़ों पीएम केयर्स वेंटिलेटर, राज्य और केंद्र सरकार एक-दूसरे पर मढ़ रहे आरोप

14 मई 2021 को कोविड-19 की दूसरी लहर के बीच अमृतसर के एक अस्पताल में एक खराब वेंटिलेटर को रखते हुए एक स्वास्थ्य कर्मी. खबर है कि पंजाब में सैकड़ों पीएम केयर्स वेंटिलेटर मरम्मत और इंस्टॉलेशन के आभाव में अप्रयुक्त पड़े हैं. नरिंदर नानू / एएफपी / गैट्टी इमेजिस

मई 2020 में कैंसर रोगियों के साथ काम करने वाली एक गैर-लाभकारी संस्था के संस्थापक गुरप्रीत सिंह चांदबाजा ने पहली बार पंजाब के फरीदकोट जिले के गुरु गोबिंद सिंह मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में इस्तेमाल न होने वाले वेंटिलेटर का मुद्दा उठाया. उन्होंने चिकित्सा अधीक्षक से इस्तेमाल न हो रहे उन वेंटिलेटर के बारे में पूछा जो उन 809 वेंटिलेटरों में से थे जिन्हें केंद्र सरकार ने पीएम केयर्स फंड के तहत पंजाब को आवंटित किए थे. पिछले साल भी चांदबाज ने कई बार अस्पताल का दौरा किया और देखा कि पड़े-पड़े धूल खा रहे वेंटिलेटरों की संख्या बढ़ती जा रही है. अंततः इस साल मई में चांदबाजा ने अस्पताल में दर्जनों ऐसे वेंटिलेटरों की फोटो ली जो बाद में फरीदकोट के कोटकपूरा शहर से आम आदमी पार्टी के विधायक कुलतार सिंह संधवान तक पहुंच गई. संधवान ने यह तस्वीर 11 मई को ट्वीट कर दी. इसके तुरंत बाद खबर आई कि पंजाब में सैकड़ों ​अप्रयुक्त वेंटिलेटरों को लगाना और उनकी मरम्मत बाकी है.

कांग्रेस के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार ने अपनी ओर से केंद्र सरकार को प्रधान मंत्री नागरिक सहायता और आपातकालीन स्थितियों में राहत (पीएम केयर्स फंड) के तहत खराब वेंटिलेटर देने का आरोप लगाया है. मई 2020 में केंद्र ने 50000 “मेड-इन-इंडिया वेंटिलेटर” के निर्माण के लिए 2000 करोड़ रुपए के आवंटन की घोषणा की गई थी. केंद्र सरकार के मुताबिक, इस साल अप्रैल तक पंजाब को सभी 809 वेंटिलेटर दिए जा चुके थे लेकिन उनमें से कम से कम 251 को अनइंस्टॉल कर दिया गया. इस बीच राज्य ने दावा किया है कि राज्य के पास मौजूद कई पीए केयर्स वेंटिलेटर या तो खराब हैं या बिना इस्तेमाल के पड़े हैं क्योंकि डॉक्टरों का मानना है कि वे ठीक से काम नहीं करते.

दूसरी ओर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बार बार यह दावा किया है कि वेंटिलेटर ठीक काम कर रहे हैं. केंद्र ने अपने बचाव में कहा है कि जिन इंजीनियरों को वेंटिलेटर लगाने के लिए पंजाब में प्रतिनियुक्त किया गया है उनके अनुसार वेंटिलेटर काम कर रहे हैं. अपने दावे के समर्थन में केंद्र ने कहा है कि 12 मई को संधवान द्वारा फोटो ट्वीट करने के अगले दिन एक इंजीनियर ने फरीदकोट अस्पताल का दौरा किया था और पांच वेंटिलेटरों को चालू कर दिया था. केंद्र सरकार ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि, "इससे यह और स्पष्ट होता है कि जब वेंटिलेटरों को ठीक से संचालित किया जाए तो वह विश्वसनीय प्रदर्शन करेंगे."

यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है कि सैकड़ों वेंटिलेटर के लिए कौन सी सरकार जिम्मेदार है जबकि मरीजों की सांस अटकी हुई है और उन्हें आईसीयू में बेड नहीं मिल रहे हैं. पूरा दोष एक सरकार पर नहीं डाला जा सकता. इसमें कोई शक नहीं कि पंजाब और केंद्र सरकार महीनों तक राजनीति करते रहीं जबकि इसका नतीजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है.

चांदबाजा फरीदकोट स्थित भाई घन्नया कैंसर रोको सेवा सोसाइटी के संस्थापक हैं और महामारी के दौरान भी दवा और कीमोथेरेपी के जरिए कैंसर रोगियों की मदद करने के लिए अक्सर गुरु गोबिंद सिंह अस्पताल जाते रहे थे. चांदबाजा ने मुझे बताया कि उन्होंने सबसे पहले मई 2020 में गुरु गोबिंद सिंह अस्पताल में बिना इस्तेमाल पड़े वेंटिलेटरों का मुद्दा उठाया था. हालांकि, अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक शिलेख मित्तल ने मुझे बताया कि पीएम केयर्स वेंटिलेटर की पहली खेप जून में आई थी. इससे पता चलता है कि अस्पताल के पास पहले से ही बिना इस्तेमला के वेंटिलेटर थे जिनकी महामारी की पहली लहर के वक्त से ही मरम्मत नहीं हुई थी.

मई में एक महीने तक मामलों में गिरावट देखने के बाद जून 2020 में पंजाब में एक बार फिर मामले बढ़ने लगे. राज्य में 1 जून को 231 सक्रिय कोविड-19 मामलों से बढ़कर 1 अगस्त तक लगभग 5000 मामले हो गए. 31 जुलाई तक राज्य के आधिकारिक स्वास्थ्य बुलेटिन में 135 मरीजों को ऑक्सीजन सपोर्ट पर और 18 को वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा बताया गया था. इस दौरान पीएम केयर्स फंड के तहत बने वेंटिलेटर विभिन्न राज्यों को भेजे जाने लगे थे.

23 जून को केंद्र सरकार ने 50000 "मेड-इन-इंडिया वेंटिलेटर" के विवरण के साथ एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की जिसमें से 30000 राज्य के स्वामित्व वाली भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड द्वारा निर्मित किए जा रहे थे और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड ने बाकी के लिए खरीद आदेश जारी किए थे. प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि राज्यों को 1340 वेंटिलेटर आवंटित किए गए हैं. हालांकि इसमें यह उल्लेख नहीं किया गया था कि तब तक पंजाब को कितने वेंटिलेटर आवंटित किए गए. अगले महीने तक, एक आरटीआई आवेदन से पता चला कि एचएलएल के खरीद आदेश प्राप्त करने वाली दो फर्मों को नैदानिक ​​​​मूल्यांकन में विफल होने के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय की निर्माताओं की सूची से हटा दिया गया था. 20 जुलाई 2020 की आरटीआई प्रतिक्रिया से पता चला कि बीईएल के अलावा केवल दो कंपनियां- एलाइड मेडिकल और एग्वा हेल्थकेयर- पीएम केयर्स फंड के तहत वेंटिलेटर का निर्माण कर रही थीं और उत्पादित होने वाली कुल संख्या 40350 तक आ गई थी.

चांदबाजा के अनुसार, जैसे-जैसे पंजाब को पीएम केयर्स फंड के तहत वेंटिलेटर मिलते रहे फरीदकोट अस्पताल में अप्रयुक्त वेंटिलेटर की संख्या भी बढ़ती रही. उन्होंने मुझे बताया कि शुरुआती महीनों में उन्होंने अस्पताल के डॉक्टरों के सामने यह मामला उठाया और नेताओं या मीडिया के सामने अपनी चिंता नहीं जताई क्योंकि वह महामारी से निपटने वाले स्वास्थ्य कर्मचारियों पर और बोझ नहीं डालना चाहते थे. चांदबाजा ने मुझे बताया, “मुझे मरीजों के रिश्तेदारों से यह जानकारी मिलती रही कि अस्पताल में कइयों वेंटिलेटर बिना इस्तेमाल के पड़े हैं.” उन्होंने कहा, 'मैंने एक बार फिर इस मामले को उठाया और मुझे आश्वस्त किया गया कि जरूरी उपाय किए जाएंगे. चिकित्सा अधीक्षक इस मामले और हमारी मांग से भी भलीभांति परिचित थे. हम नहीं चाहते थे कि डॉक्टर किसी भी तरह से दबाव महसूस करें इसलिए हमने कही गई बात पर भरोसा किया.”

अगस्त में चांदबाजा के गैर लाभकारी और अन्य समूहों ने इस मुद्दे को मीडिया और नेताओं तक ले जाना शुरू किया. उन्होंने कहा कि विभिन्न संगठनों द्वारा 29 अगस्त को फरीदकोट में अप्रयुक्त वेंटिलेटर के बारे में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई और दो दिन बाद पंजाब विधानसभा के तीन सदस्यों के पास एक प्रतिनिधि मंडल भेजा गया. चांदबाजा ने बताया कि 8 सितंबर को किसान संघ के नेताओं का एक प्रतिनिधि मंडल भी अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक से मिला था लेकिन वेंटिलेटर अप्रयुक्त ही रहे.

पंजाब में सरकारी मेडिकल कॉलेजों के लिए वेंटिलेटर का आवंटन राज्य के चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान विभाग के दायरे में आता है, जिसके प्रमुख मंत्री ओम प्रकाश सोनी हैं. चांदबाजा ने मुझे बताया कि उन्होंने इस साल 15 मार्च को सीधे सोनी के सामने इस मुद्दे को उठाया था. चांदबाजा ने कहा, "सोनी ने 16 मार्च को एक समिति का गठन किया. 17 मार्च को मेडिकल कॉलेज के अधिकारियों के साथ एक और बैठक हुई और 6 अप्रैल को जिला अधिकारियों के साथ एक और बैठक हुई.” अंततः 11 मई को जब चांदबाजा और उनके संगठन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष कुलतार सिंह ने “एक कोने में पड़े 14 ऐसे वेंटिलेटर देखे और एक आईसीयू में भी, तब हमने इस मुद्दे को उठाया.” सोनी ने अगले दिन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन से बात की, जिन्होंने तब मीडिया को सूचित किया कि वेंटिलेटर को ठीक करने के लिए विशेषज्ञों की एक टीम भेजी जाएगी. 13 मई को स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि वेंटिलेटर खराब नहीं थे.

जब मैंने इस साल मई में चंदबाजा के आरोपों के बारे में सोनी को फोन किया, तो उन्होंने मुझे मंत्री के विशेष ड्यूटी अधिकारी संजीव शर्मा से बात करने का निर्देश दिया. शर्मा ने चांदबाजा की शिकायत की पुष्टि की कि फरीदकोट में अधिकांश वेंटिलेटर खराब थे. उन्होंने कहा कि पंजाब द्वारा पीएम केयर्स के तहत प्राप्त 809 वेंटिलेटर में से 320 तीन सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पतालों को आवंटित किए गए, 113 फरीदकोट के गुरु गोबिंद सिंह अस्पताल को, 109 अमृतसर में गुरु नानक देव अस्पताल को और 98 पटियाला के राजेंद्र अस्पताल को.

इनमें से शर्मा ने मुझे बताया कि फरीदकोट में 113 वेंटिलेटर में से 90 खराब थे, अमृतसर में 109 में से 97 खराब थे और अमृतसर में केवल 12 वेंटिलेटर काम कर रहे थे. शर्मा के अनुसार, पटियाला में 48 वेंटिलेटरों की मरम्मत की गई थी लेकिन अस्पताल के डॉक्टरों ने वेंटिलेटर पर भरोसा न होने के कारण उनका उपयोग करने से इनकार कर दिया है. शर्मा ने कहा कि इसके चलते अस्पताल 61 वेंटिलेटरों का उपयोग कर रहा था जो उसके पास महामारी से पहले से थे. कुल मिलाकर सितंबर 2020 तक इन अस्पतालों को आवंटित किए गए 320 वेंटिलेटरों में से केवल 47 वेंटिलेटर यानी 15 प्रतिशत से भी कम काम कर रहे थे.

लेकिन पंजाब के स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि इन मुद्दों को बार-बार केंद्र के सामने लाया गया और उनकी चिंताओं को बार-बार नजरअंदाज किया जाता रहा. 17 सितंबर को राज्य के स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव हुसैन लाल ने केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण को "भारत सरकार द्वारा बीईएल के माध्यम से आपूर्ति किए गए आईसीयू वेंटिलेटर के कामकाज के संबंध में शिकायतों के बारे में लिखा." लाल ने लिखा कि राज्य को बीईएल द्वारा निर्मित वेंटिलेटर प्राप्त हुए थे और उन्हें सरकारी और निजी अस्पतालों को आवंटित किया गया था जहां से जल्द ही उनके खराब होने की शिकायत मिलने लगी.

लाल ने लिखा, "अफसोस की बात है कि शुरू में इन वेंटिलेटरों को इंस्टॉल करने की गति बेहद धीमी थी क्योंकि आपूर्तिकर्ता द्वारा इन्हें इंस्टॉल करने के लिए केवल एक इंजीनियर को आवंटित किया गया था. मंत्रालय के साथ साथ आपूर्तिकर्ताओं के प्रतिनिधियों के साथ बार-बार अनुवर्ती कार्रवाई के बाद, इंस्टॉल करने प्रक्रिया में तेजी लाई गई. अब जिन अस्पतालों में यह वेंटिलेटर लगाए गए हैं वे इन वेंटिलेटरों के काम करने में दिक्कत को लेकर शिकायत कर रहे हैं.” लाल ने केंद्रीय सचिव से "आपूर्तिकर्ता के साथ मामले को उठाने" का अनुरोध किया और बीईएल को "100 प्रतिशत अपटाइम सुनिश्चित करके, समयबद्ध तरीके से वेंटिलेटर के कामकाज के संबंध में निवारण के लिए एक उचित तंत्र स्थापित करने के लिए निर्देश देने की मांग की."

लाल ने अप्रयुक्त वेंटिलेटर पर उनके पत्राचार के बारे में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया. स्वास्थ्य मंत्रालय के लिए मीडिया और अतिरिक्त संचार महानिदेशक मनीषा वर्मा ने मुझे अपने प्रश्न प्रेस सूचना ब्यूरो के स्वास्थ्य विभाग के ईमेल अकाउंट पर भेजने के लिए कहा. पीआईबी स्वास्थ्य टीम ने मुझे स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्तियों का निर्देश देते हुए जवाब दिया. मैंने बताया कि प्रेस विज्ञप्ति से मेरे प्रश्नों का जवाब नहीं मिला. इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली.

पंजाब में चिकित्सा देखभाल के विस्तार और सुधार के लिए जिम्मेदार वैधानिक निकाय पंजाब हेल्थ सिस्टम्स कॉरपोरेशन की प्रबंध निदेशक तनु कश्यप ने भी मुझे बताया कि राज्य सरकार ने इस मुद्दे को हल करने के लिए कई प्रयास किए हैं. कश्यप राज्य में वेंटिलेटर से संबंधित सभी मुद्दों के समन्वय के लिए जिम्मेदार नोडल अधिकारी भी हैं. मैंने उनसे 14 मई को बात की थी. उन्होंने मुझे बताया कि राज्य के स्वास्थ्य अधिकारी पिछले साल से केंद्र में अपने समकक्षों के साथ मौखिक और लिखित रूप से इस मामले को उठा रहे हैं. “वीडियो कॉन्फ्रेंस में हमने लगभग 200 वेंटिलेटर अप्रयुक्त पड़े होने के बारे में बताया था. हमने केंद्र के अधिकारियों से इन्हें वापस लेने का आग्रह किया था लेकिन उन्होंने मना कर दिया,” कश्यप ने कहा.

इस बीच केंद्र ने लगातार पंजाब सरकार को वेंटिलेटर संचालित करने में असमर्थ होने और एक अक्षम स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे के लिए दोषी ठहराया है जो पीएम केयर्स फंड के तहत प्रदान किए गए वेंटिलेटरों का उपयोग नहीं कर रहा. इसने राज्य सरकार के सामने भी अपनी चिंता जताई है. 11 अप्रैल को भूषण ने पंजाब के मुख्य सचिव विनी महाजन को राज्य को प्रदान किए गए 809 में से 251 वेंटिलेटरों के इंस्टॉल नहीं होने के बारे में पत्र लिखा. भूषण ने पत्र में उल्लेख किया है कि इंस्टॉल ही न हो पाना "भारत सरकार के उद्देश्य को निष्फल कर रहा है." मंत्रालय ने पंजाब सरकार से जल्द से जल्द वेंटिलेटर इंस्टॉल करने और संचालित करने का आग्रह किया और कहा कि “यदि वेंटिलेटर की कोई अतिरिक्त आवश्यकता है, तो अगले एक सप्ताह के भीतर स्वास्थ्य मंत्रालय को इसकी सूचना दी जा सकती है.”

वेंटिलेटर स्थापित करने में विफलता के पीछे केंद्रीय मुद्दों में से एक सरकारों के बीच सामंजस्य की कमी है. इसमें इंस्टॉलेशन और सर्विसिंग की जिम्मेदारी भी निहित है. जबकि केंद्र सरकार यह मानती है कि उसने कई निर्माता उपलब्ध कराएं हैं और वेंटिलेटर की आपूर्ति के बाद उनको इंस्टॉल करने और उनकी मरम्मत की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है, वहीं पंजाब के स्वास्थ्य अधिकारियों ने बार-बार असहायता व्यक्त की है और केंद्र और बीईएल को इंस्टॉल करने और मशीनों की मरम्मत करने के लिए कहा है.

लेकिन कश्यप के अनुसार, दूसरी लहर के बीच भी पंजाब के अस्पतालों के डॉक्टर पीएम केयर्स फंड के तहत दिए गए वेंटिलेटरों का उपयोग करने से हिचकिचा रहे थे. शर्मा की तरह कश्यप ने कहा कि 320 वेंटिलेटर सरकारी मेडिकल कॉलेजों को प्रदान किए गए थे और बाकी को राज्य भर के अन्य निजी और सार्वजनिक जिला अस्पतालों में वितरित किया गया था. कश्यप ने मुझे बताया, "डॉक्टर मरीजों की जान जोखिम में डालने के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि इनमें से कई वेंटिलेटरों ने शुरुआती दो-तीन घंटों में ही काम करना बंद कर दिया."

नाम न छापने की शर्त पर बात करने वाले पंजाब के एक वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारी के अनुसार, इन वेंटिलेटरों का उपयोग करने में न केवल डॉक्टर असहज थे, बल्कि राज्य सरकार को भी उनके बारे में संदेह था. स्वास्थ्य अधिकारी ने कहा कि राज्य में वेंटिलेटर और आईसीयू बेड संचालित करने के लिए आवश्यक एनेस्थेटिस्ट, पल्मोनोलॉजिस्ट और यहां तक ​​​​कि आवश्यक प्रशिक्षित पैरामेडिकल स्टाफ- जिसमें नर्स, वार्ड अटेंडेंट और तकनीशियन शामिल हैं- नहीं हैं.

अमृतसर के एक निजी अस्पताल के मालिक ने मुझे बताया कि राज्य सरकार ने वेंटिलेटर लेने के लिए उनके अस्पताल से संपर्क किया था. अस्पताल के मालिक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “लेकिन हमें तब से कुछ गड़बड़ लग रही थी, तब तक खराब वेंटिलेटर और सरकार द्वारा कर्मचारियों की कमी के चलते निजी अस्पतालों में इन्हें बंद करने की कोशिश की खबर सभी डॉक्टरों तक पहुंच गई थी. तो हमने इस कबाड़ में से कोई भी नहीं लिया."

बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज, जिसके तहत फरीदकोट, अमृतसर और पटियाला में तीन सरकारी मेडिकल कॉलेज संचालित होते हैं, के कुलपति डॉ. राज बहादुर ने भी कहा कि इन वेंटिलेटरों की खराब गुणवत्ता ने डॉक्टरों को डरा दिया. बहादुर ने कहा, "जिस क्षण हमने उन्हें इंस्टॉल किया, वेंटिलेटरों ने काम करना बंद कर दिया." जब मैंने उनसे 14 मई को बात की, तो उन्होंने मुझे बताया कि उन्होंने करीब ढाई महीने पहले इन गड़बड़ियों की जानकारी अधिकारियों को दी थी. बहादुर ने बताया कि अब तक उन्होंने 28 वेंटिलेटर की मरम्मत की थी, लेकिन मेडिकल कॉलेज उन्हीं वेंटिलेटरों का उपयोग करने पर जोर दे रहे थे जो उनके पास पहले से थे.

हालांकि, बहादुर ने कहा कि पटियाला में महामारी से पहले के 61 वेंटिलेटर हैं, अमृतसर में 39 और फरीदकोट में 42 और ये पर्याप्त थे. उन्होंने मुझे बताया, "डॉक्टर ही तय करते हैं कि किसे वेंटिलेटर पर रखा जाए और किसे ऑक्सीजन सप्लीमेंट की जरूरत है. जिन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया है, वे जीवित नहीं हैं. वेंटिलेटर पर रखे गए मरीजों में से सिर्फ पांच फीसदी ही वापसी कर पाते हैं.” यह स्पष्ट नहीं है कि पांच प्रतिशत रोगियों ने बहादुर को अप्रयुक्त वेंटिलेटर के बारे में अधिक गंभीर कार्रवाई करने के लिए क्यों नहीं प्रेरित किया.

1 मई को लाल ने स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव मंदीप कुमार भंडारी को एक और पत्र लिखा जिसमें कहा गया था कि "बिक्री के बाद सेवाओं को इंस्टॉल करने और प्रदान करने की जिम्मेदारी बीईएल की है." उन्होंने कहा कि "इन वेंटिलेटर के खराब होने के संबंध में कई शिकायतें थीं" और "आज तक कुछ स्थानों पर वेंटिलेटर इंस्टॉल नहीं किए गए हैं." लाल ने कहा कि राज्य सरकार ने "कंपनी के प्रतिनिधियों से ... बार-बार खराब वेंटिलेटर की मरम्मत के लिए संपर्क किया" लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

उन्होंने वेंटिलेटर की तात्कालिकता पर जोर दिया क्योंकि "राज्य कोविड की गंभीर दूसरी लहर की चपेट में है." लाल ने आगे कहा, "यहां तक ​​कि बिक्री के बाद सेवा लिए नियुक्त सर्विस इंजीनियर्स और तकनीकी कर्मचारियों कहना है कि उनके पास आवश्यक पुर्जे और वस्तुएं नहीं हैं.”

आठ दिन बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में संयुक्त सचिव भंडारी ने सभी राज्यों के स्वास्थ्य सचिवों को लिखा कि पीएम केयर्स फंड के तहत प्रदान किए गए वेंटिलेटर “कीमती राष्ट्रीय संपत्ति हैं और जरूरी है कि कोविड-19 रोगियों के लिए उनका वाजिब उपयोग सुनिश्चित हो.” उन्होंने वेंटिलेटर निर्माताओं के ईमेल पते और फोन नंबर दिए और राज्यों से "उन्हें प्रदान किए गए वेंटिलेटर का त्वरित सत्यापन करने और उनका वाजिब उपयोग सुनिश्चित करने” का आह्वान किया. भंडारी ने कहा, “उनके इंस्टॉलेशन और वाजिब प्रदर्शन में आने वाली बाधाओं को भी सत्यापित और संबोधित किया जा सकता है."

संयुक्त सचिव ने वेंटिलेटर इंस्टॉल करने में राज्यों की विफलता के कारणों की ओर भी इशारा किया. “ऐसा उपयोग करने के लिए प्रशिक्षित और कुशल कार्यबल की कमी, उपकरणों का बेतरतीब इस्तेमाल, ऑक्सीजन पाइपलाइन के साथ उचित कनेक्शन की कमी, वाजिब ऑक्सीजन दबाव की कमी, गैर-आवंटन सहित अस्पतालों और गोदामों में अतिरिक्त स्टॉक के रूप में रखने, उपभोग्य सामग्रियों की खरीद की व्यवस्था का अभाव आदि से हुआ होगा.”

चार दिन बाद पंजाब में अप्रयुक्त वेंटिलेटरों की रिपोर्टों के मद्देनजर स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की जिसका शीर्षक था, "पीएम केयर्स के तहत आपूर्ति किए गए वेंटिलेटर के बारे में अपडेट." प्रेस विज्ञप्ति ने फरीदकोट अस्पताल में अप्रयुक्त वेंटिलेटरों के बारे में मीडिया रिपोर्टों को "निराधार, मामले की पूरी जानकारी न होना" करार दिया गया. इसमें कहा गया है कि बीईएल “इंजीनियरों ने प्राप्त शिकायतों को दूर करने के लिए अतीत में विभिन्न अवसरों पर उक्त मेडिकल कॉलेज का दौरा किया है और तुरंत आवश्यक मामूली मरम्मत की है. उन्होंने वहां के कर्मचारियों को लिए वेंटिलेटर के कामकाज का बार-बार प्रदर्शन भी किया है.”

पंजाब अकेला राज्य नहीं है जिसने पीएम केयर्स फंड के तहत दिए गए वेंटिलेटर के बारे में चिंता जताई है. इस साल अप्रैल में इंडियन एक्सप्रेस ने बताया था कि राजस्थान सरकार ने केंद्र को “दोषपूर्ण” वेंटिलेटरों के बारे में भी लिखा था. रिपोर्ट के अनुसार, इस मुद्दे को पहली बार 5 अप्रैल को राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की अध्यक्षता में एक कोविड-19 समीक्षा बैठक के दौरान उठाया गया था. रिपोर्ट में उदयपुर के रवींद्र नाथ टैगोर मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. लखन पासवान के हवाले से कहा गया है, “हमें पीएम केयर्स के तहत 85 वेंटिलेटर मिले थे और हमारे अलावा अन्य मेडिकल कॉलेजों से प्रतिक्रिया यह है कि वे प्रभावी नहीं हैं." ऐसा लगता है कि पासवान ने भी उसी तरह की चिंता जाहिर की थी जो पंजाब के स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा की गई है.

इसके अलावा फरीदकोट के वेंटिलेटरों के खराब होने की खबर के बाद इंडिया टुडे ने बताया कि पीएम केयर्स फंड के तहत निर्मित 43788 वेंटिलेटर 6 अप्रैल तक राज्यों को भेजे गए थे और उनमें से केवल 38803 ही इंस्टॉल किए गए हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जब बीईएल के इंजीनियरों की एक टीम ने वेंटिलेटरों की मरम्मत के लिए पंजाब का दौरा किया तो “उन्होंने पाया कि अस्पताल में मशीनों को पाइप ऑक्सीजन गैस सिस्टम से जोड़ने के लिए कोई कनेक्टर नहीं था.”

केंद्र सरकार की स्थिति और अप्रयुक्त वेंटिलेटरों के लिए निर्माता की जिम्मेदारी भी इस तथ्य से गंभीर रूप से प्रभावित होती है कि पत्रों के आदान प्रदान के बीच, राज्य सरकार ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर 809 वेंटिलेटरों की उपलब्धि हासिल करने का दावा किया. इस साल 2 मई को जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है, “जीवन-मृत्यु का सामना कर रहे कोविड रोगियों की सुविधा की दिशा में एक और कदम उठाते हुए और बढ़ती हुई विनाशकारी वायरस की दूसरी लहर को जीतने के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं को और बेहतर बनाने के लिए, पंजाब सरकार ने राज्य के जिलों में 809 और वेंटिलेटर प्रदान किए हैं.” इसमें आगे कहा गया है कि राज्य के मुख्य सचिव महाजन ने "सभी उपायुक्तों को आज ही नए वेंटिलेटर इंस्टॉल करने और यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि एक भी ऑक्सीजन कंसंटेटर और वेंटिलेटर अप्रयुक्त न रहे.” यह स्पष्ट नहीं है कि राज्य सरकार उपायुक्तों को वेंटिलेटर इंस्टॉल करने का निर्देश कैसे दे सकती है जबकि वह स्वयं केंद्र सरकार और निर्माताओं को उन्हें इंस्टॉल करने में विफल रहने का दोषी बता रही हो.

इस सारी अनिश्चितता के मद्देनजर 13 मई को गैर-लाभकारी संगठन पंजाब अगेंस्ट करप्शन के अध्यक्ष सतनाम सिंह ने भारत के राष्ट्रपति और केंद्रीय जांच ब्यूरो को पत्र लिखकर मामले की एफआईआर दर्ज करने की मांग की है.