कोविड-19 के सामुदायिक संक्रमण न होने का आईसीएमआर का दावा आधारहीन

20 मार्च 2020
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने दावा किया है कि देश में कोविड-19 के सामुदायिक संक्रमण का कोई सबूत नहीं मिला है. इस तर्क को सुनकर एक पुरानी कहावत याद आती है: किसी बात का सबूत न होना उस बात के न होने का का सबूत नहीं है.
​दीपतेंदु दत्ता/ एफएपी/ गैटी इमेजिस
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने दावा किया है कि देश में कोविड-19 के सामुदायिक संक्रमण का कोई सबूत नहीं मिला है. इस तर्क को सुनकर एक पुरानी कहावत याद आती है: किसी बात का सबूत न होना उस बात के न होने का का सबूत नहीं है.
​दीपतेंदु दत्ता/ एफएपी/ गैटी इमेजिस

मैं दो दशकों से छत्तीसगढ़ में सामुदायिक चिकित्सक के रूप में काम कर रहा हूं. मैं ग्रामीण छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने वाले गैर-सरकारी संगठन जन स्वास्थ्य सहयोग के संस्थापकों में से एक हूं और मैं राज्य की ढांचागत समस्याओं को समझता हूं. राज्य के सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे में मात्र 150 वेंटिलेटर हैं और बहुत कम ऐसे डॉक्टर हैं जो इन वेंटिलेटरों को चलाना जानते हैं. भारत में कोविड​​-19 के 100 से भी ज्यादा मामलों की पुष्टि हो जाने पर स्वास्थ्य प्रणाली की इस स्थिति को देखते हुए मैं इस बीमारी के सामुदायिक संक्रमण के बारे में चिंति​त हूं और भयभीत हो जाता हूं कि कहीं यह संक्रमण हमारी लचर सार्वजनिक और निजी स्वास्थ्य प्रणालियों को डुबो न दे. अगर भारत में वायरस के मामलों में इटली जैसी तीव्र वृद्धि हुई तो मुझे राज्य की 22 करोड़ जनता की देखभाल कर पाने की हमारी क्षमता को लेकर भी चिंता होगी.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का वर्तमान परीक्षण मानदंड अंतरराष्ट्रीय यात्रियों और उनके प्रत्यक्ष संपर्कों तक ही सीमित है और केवल तभी जब उनमें बुखार, खांसी और सांस लेने में परेशानी जैसे लक्षण दिखते हैं. ऐसे लोगों के लिए परीक्षण उपलब्ध नहीं हैं जिन्हें गंभीर श्वसन संबंधी बीमारियां तो हैं लेकिन पिछले 14 दिनों में विदेश यात्रा नहीं की है और उनकी कोविड-19 से संक्रमित होने की पुष्टि नहीं हुई है. नतीजतन, मेरे अस्पताल में कोई भी मरीज आज की स्थिति में परीक्षण के लिए पात्र नहीं है. कोविड परीक्षण के लिए भारत की नीतिनिर्माता एजेंसी भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने जो स्पष्टीकरण दिया है, वह यह है कि देश में वायरस के सामुदायिक संक्रमण का कोई सबूत नहीं है. यह तर्क या कहें कि कुतर्क मुझे एक पुरानी कहावात की याद दिलाता है कि किसी बात का सबूत न होना उस बात के न होने का सबूत नहीं है.

तकनीकी नितिनिर्माताओं ने दावा किया है कि वायरस के सामुदायिक संक्रमण का कोई सबूत नहीं है. लेकिन इस सबूत का स्रोत बहुत ही झीना और डांवाडोल है. 15 से 29 फरवरी के बीच, आईसीएमआर ने श्वसन संबंधी बीमारियों वाले 20 नमूनों का रैंडम परीक्षण किया ताकि पता लगाया जा सके कि भारत में कोविड-19 का सामुदायिक संक्रमण हुआ है या नहीं. नमूनों को देश भर के विभिन्न वायरल अनुसंधान और नैदानिक ​​प्रयोगशालाओं में आरटी-पीसीआर परीक्षण के जरिए यह जांचने के लिए भेजा था कि क्या वे कोविड-19 से संक्रमित हैं. आरटी-पीसीआर एक आणविक जीवविज्ञान तकनीक है जो वायरस के न्यूक्लिक एसिड कोर की जांच करती है.

आईसीएमआर ने कहा कि उसे उन नमूनों में कोविड-19 का कोई सबूत नहीं मिला और इस आधार पर उसने निष्कर्ष निकाला कि भारत में सामुदायिक संक्रमण नहीं है. अगर हम इन नमूनों की औसत तिथि 22 फरवरी मानते हैं, तो तीन सप्ताह से अधिक समय बीत चुका है. लेकिन इस निष्कर्ष में एक मूलभूत दोष है. कोविड-19 के लिए तीन सप्ताह का अर्थ है महामारी के विकास का जीवनकाल. उदाहरण के लिए इटली में अल्प अवधि में घातक वृद्धि दिखाई दी है.

15 मार्च के इकोनॉमिक टाइम्स ने बताया है कि आईसीएमआर अगले चरण के परीक्षणों की शुरुआत कर रहा है. रिपोर्ट के अनुसार, प्रत्येक आईसीएमआर प्रयोगशाला सामुदायिक संक्रमण के लिए हर हफ्ते बीस रैंडम नमूनों का परीक्षण करेगी. दो दिन बाद आईसीएमआर ने कहा कि उसने 1020 रैंडम नमूनों केपरीक्षण किए थे और उनमें से 500 के प्रारंभिक परीक्षणों में कोविड-19 वायरस का परिणाम नहीं मिला. इससे आईसीएमआर के महानिदेशक बलराम भार्गव ने निष्कर्ष निकाला कि "सामुदायिक संक्रमण के कोई संकेत नहीं मिले हैं."

योगेश जैन छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में सार्वजनिक-स्वास्थ्य पर काम करने वाले एक एनजीओ, जन स्वास्थ्य सहयोग के सामुदायिक चिकित्सक और संस्थापक हैं.

Keywords: COVID-19 public health Indian Council of Medical Research
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