भारत में कोरोनावायरस संकट दशकों की गलत नीतियों का परिणाम

24 मार्च 2020
विप्लव भुयान/हिंदुस्तान टाइम्स/ गैटी इमेजिस
विप्लव भुयान/हिंदुस्तान टाइम्स/ गैटी इमेजिस

वैश्विक कोरोनावायरस संकट के बारे में कई सारी बातें कही जा रही हैं. इसको एक महामारी, एक अभूतपूर्व संकट और एक सदी पहले मानव आबादी को तबाह कर देने वाले स्पेनिश बुखार की वापसी तक कहा जा रहा है. 

भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य का अध्ययन करनेवालों की नजरों में यह संकट दशकों से जारी या शायद आजादी के वक्त से ही जारी तबाही की निरंतरता है.

भारत में कोविड-19 के पहले मामले के सामने आने के बाद के हफ्तों में रिपोर्टिंग करते हुए मैं अभी तक ऐसे एक भी महामारी विशेषज्ञ या संक्रामक रोग विशेषज्ञ से नहीं मिली जिसे इस बात की हैरानी हो रही है कि हमारा देश तैयारी के लिहाज से आने वाले दिनों में संक्रमण के फैलने और उससे होने वाली मौतों की भयावय स्थिति का सामना करने वाला है.

जनवरी में एक मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक आकलन के अनुसार, भारत में प्रति 100000 (एक लाख) लोगों पर 2.3 आईसीयू बेड हैं. ईरान के लिए यह अनुपात 4.6 प्रति एक लाख लोग है. वहां का चिकित्सातंत्र कोविड-19 के मामलों से भर गया है. संयुक्त राज्य में, जहां आईसीयू बेड का अनुपात छह गुना से अधिक होने का अनुमान लगाया गया था, वहां भी विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि जल्द ही आईसीयू बेड कम पड़ जाएंगे. भारत में प्रति हजार लोगों में एक से भी कम एलोपैथिक डॉक्टर है जो विश्व स्वास्थ्य संगठन की अनुशंसा का न्यूनतम है. 2016 तक इंडियन मेडिकल एसोसिएशन दसियों हजारों क्रिटिकलकेयर विशेषज्ञों की कमी दर्शा रहा था. डॉक्टर और बिस्तर मुख्य रूप से निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में हैं, जिसके सामने अपने स्वयं के मूल्य निर्धारित करने और अपने स्वयं के नियम बनाने और साथ ही मरीजों की बजाय मुनाफे को ध्यान में रख कर दोनों का शोषण करने का रास्ता खुला है.

नरेन्द्र मोदी प्रशासन की प्रतिक्रिया की विशेषता रही है कि इसमें पारदर्शिता में कमी और सार्वजनिक आवश्यकता से अधिक पीआर को तवज्जो दी जाती है. स्वास्थ्य मंत्रालय, जिसने वायरस के लिए जैसे-तैसे कुछ परीक्षण किए, ने अनुचित रूप से लंबे समय तक इस धारणा को बनाए रखा है कि भारत में केवल "आयातित" संक्रमण के मामले देखे जा रहे हैं और अपनी प्रतिक्रिया में इसी के मुताबिक कांट-छांट की. जबकि अन्य देशों ने पता लगाने, अलग-थलग करने और जिस किसी के भी संक्रमति होने की संभावना हो उसका परीक्षण करने के आक्रामक रवैये को प्राथमिकता दी, हमारे अधिकारी इसी बात से चिपके रहे कि भारत में "समुदाय" संक्रमण नहीं है. जैसा कि एक डॉक्टर ने चिन्हित किया कि यह विचार गैरमौजूदगी के सबूतों की बजाय सबूतों की गैरमौजूदगी पर आधारित है.

विद्या कृष्णन स्वास्थ्य मामलों की पत्रकार हैं और गोवा में रहती हैं. एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा पर उनकी पहली किताब 2020 में प्रकाशित होगी.

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