फरवरी-मार्च में कोविड-19 संक्रमण के मामलों में हो रही थी वृद्धि लेकिन टास्कफोर्स ने नहीं की बैठक

27 अप्रैल 2021
17 अप्रैल को दिल्ली के एक श्मशान में अन्य चिताओं के बीच कोविड-19 से मरने वाले व्यक्ति का अंतिम संस्कार करता उनका परिवार. इस साल जब भारत संक्रमण के सबसे बुरे दौर में है राष्ट्रीय वैज्ञानिक टास्कफोर्स के दो सदस्यों के अनुसार फरवरी और मार्च में टास्कफोर्स की एक भी बैठक नहीं हुई.
अनिंदितो मुखर्जी/ गैटी इमेजिस
17 अप्रैल को दिल्ली के एक श्मशान में अन्य चिताओं के बीच कोविड-19 से मरने वाले व्यक्ति का अंतिम संस्कार करता उनका परिवार. इस साल जब भारत संक्रमण के सबसे बुरे दौर में है राष्ट्रीय वैज्ञानिक टास्कफोर्स के दो सदस्यों के अनुसार फरवरी और मार्च में टास्कफोर्स की एक भी बैठक नहीं हुई.
अनिंदितो मुखर्जी/ गैटी इमेजिस

भले ही भारत महामारी की सबसे बुरी मार झेल रहा है लेकिन कोविड-19 के लिए बनाए गए राष्ट्रीय वैज्ञानिक कार्यबल या टास्कफोर्स ने फरवरी और मार्च में एक भी बैठक नहीं की. टास्कफोर्स का काम महामारी की रोकथाम के प्रयासों पर केंद्र सरकार को सलाह देना है. राष्ट्रीय वैज्ञानिक टास्कफोर्स के दो सदस्यों, जो देश के प्रमुख वैज्ञानिकों में से हैं, और इसी टास्कफोर्स की उप समिति के एक सदस्य ने पुष्टि की है कि अप्रैल में स्थिति इस कदर विस्फोटक हो जाने से दो महीने पहले तक उनकी एक भी बैठक नहीं हुई. उन्होंने कहा कि इस साल टास्कफोर्स की बैठक 11 जनवरी को हुई थी और फिर 15 अप्रैल और 21 अप्रैल को लेकिन तब तक देश बुरी तरह महामारी की चपेट में आ गया था.

राष्ट्रीय टास्कफोर्स के एक सदस्य ने बताया, "फरवरी के मध्य में यह साफ हो गया था कि भारत विनाशकारी दूसरी लहर की ओर बढ़ रहा है." तीनों वैज्ञानिकों ने नाम न छापने की शर्त पर बात की. पहले सदस्य ने कहा, "जब महाराष्ट्र में चीजें हाथ से बाहर जाने लगीं, तो हममें से कुछ ने इस मुद्दे की तरफ ध्यान दिलाने की कोशिश की." टास्कफोर्स के एक अन्य सदस्य ने मुझे बताया कि टास्कफोर्स की कोई बैठक ''नहीं बुलाई'' गई. उन्होंने बताया, “बैठक तब हुई जब सरकार हमसे चाहती थी कि हम नेताओं द्वारा पहले से ही लिए गए कुछ फैसलों पर मुहर लगा दें."

सदस्यों ने मुझे बताया कि एक और महत्वपूर्ण चूक यह रही कि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने कोविड-19 के लिए उपचार प्रोटोकॉल को जुलाई 2020 से यानी 9 महीनों से अपडेट ही नहीं किया. जबकि दुनिया उभरते हुए साक्ष्यों के साथ अपने उपचार के तरीके को अपडेट करती रही भारतीय रोगियों के लिए रेमडिसीविर ही निर्धारित रही, जो अब विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुशंसित नहीं है. स्वास्थ्य मंत्रालय ने 3 जुलाई 2020 को अपना अंतिम उपचार प्रोटोकॉल अपडेट जारी किया था जिसने "जांच चिकित्सा" के लिए रेमडिसीविर को स्वीकार किया गया था लेकिन इस प्रोटोकॉल को “हालात बदलने पर” और “ज्यादा डेटा उपलब्ध हो जाने पर” अपडेट किया जाना था.

नवंबर 2020 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक बयान प्रकाशित किया कि वह "कोविड-19 रोगियों पर रेमडिसीविर के प्रयोग के खिलाफ सिफारिश करता है." नोट में कहा गया है, "डब्ल्यूएचओ ने अस्पताल में भर्ती मरीजों में, रोग की गंभीरता की परवाह किए बिना, रेमडिसीविर के इस्तेमाल के खिलाफ एक सशर्त सिफारिश जारी की है क्योंकि वर्तमान में इस बात का कोई सबूत नहीं है कि रेमेडिसविर इन रोगियों में जीवन प्रत्याशा और अन्य परिणामों में सुधार करता है." लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय के उपचार प्रोटोकॉल को अपडेट नहीं किया गया और देश भर के निजी अस्पतालों ने रेमडिसीविर का बेशुमार इस्तेमाल करना जारी रखा. वैश्विक मानकों के अनुरूप उपचार दिशानिर्देशों को अपडेट करने में आईसीएमआर की विफलता के चलते रेमडिसीविर की काला बाजारी बढ़ गई जिसका शिकार कमजोर परिवार बन रहे हैं.

इस वर्ष दैनिक मामलों में भारी वृद्धि हुई है. भारत के टास्कफोर्स के शीर्ष वैज्ञानिक इसे देखते रहे लेकिन बैठक नहीं हुई. 1 फरवरी को भारत में 11427 नए मामले दर्ज किए गए, जो 1 मार्च तक 15510 हो गए और 1 अप्रैल तक 72330 नए मामले दर्ज हुए. 5 अप्रैल तक रिकॉर्ड 103558 नए मामले सामने आए, जो हर दिन खतरनाक हद तक बढ़ रहे थे. 21 अप्रैल तक यह तीन गुना होकर लगभग 295041 हो गए और उसी दिन जब भारत ने लगभग तीन लाख नए कोविड-19 मामले दर्ज किए तब राष्ट्रीय वैज्ञानिक कार्यबल ने उपचार प्रोटोकॉल को लेकर एक बैठक की. बैठक में लिए गए निर्णय अभी तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं.

विद्या कृष्णन स्वास्थ्य मामलों की पत्रकार हैं और गोवा में रहती हैं. एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा पर उनकी पहली किताब 2020 में प्रकाशित होगी.

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