कोरोनावायरस : डब्ल्यूएचओ की चेतावनी के बावजूद भारत ने नहीं किया सुरक्षा सामग्री का भंडारण

23 मार्च 2020
रफीक मकबूल/एपी फोटो
रफीक मकबूल/एपी फोटो

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कहने पर 22 मार्च को भारत के 130 करोड़ लोगों ने “जनता कर्फ्यू” में भाग लिया. इस बीच स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए मास्क, गाउन और दस्ताने जैसे पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट या पीपीई का भंडारण करने में सरकार विफल रही. 18 मार्च को जनता कर्फ्यू की अपील करते हुए मोदी ने लोगों से अपनी-अपनी बालकनी से थाली और ताली बजाकर स्वास्थ्य कर्मचारियों की हौसला अवजाई करने को कहा था. लेकिन अगले दिन ही जाकर भारत सरकार ने देश में निर्मित पीपीई के निर्यात पर रोक लगाई. सरकार ने विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा पीपीई की आपूर्ति में संभावित ढिलाई की चेतावनी के तीन सप्ताह बाद ऐसा किया.

इससे पहले 27 फरवरी को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दिशानिर्देश जारी करते हुए बताया था, “दुनियाभर में पीपीई का भंडारण पर्याप्त नहीं है और लगता है कि जल्द ही गाउन और गोगल (चश्में) की आपूर्ति भी कम पड़ जाएगी. गलत जानकारी और भयाक्रांत लोगों की तीव्र खरीदारी और साथ ही कोविड-19 के बढ़ते मामलों के चलते, दुनिया में पीपीई की उपलब्धता कम हो जाएगी.” जैसा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों में बताया गया है, पीपीई का मतलब है : चिकित्सीय मास्क, गाउन और एन95 मास्क. इसके बावजूद भारत सरकार ने घरेलू पीपीई के निर्यात पर रोक लगाने में 19 मार्च तक का समय लगा दिया.

31 जनवरी को भारत में कोविड-19 का पहला मामला सामने आने के बाद, विदेश व्यापार निदेशालय ने सभी पीपीई के निर्यात पर रोक लगा दी थी, लेकिन 8 फरवरी को सरकार ने इस आदेश पर संशोधन कर सर्जिकल मास्क और सभी तरह के दस्तानों के निर्यात की अनुमति दे दी. 25 फरवरी तक जब इटली में 11 मौतें हो चुकी थीं और 200 से अधिक मामले सामने आ चुके थे, सरकार ने उपरोक्त रोक को और ढीला करते हुए 8 नए आइटमों के निर्यात की मंजूरी दे दी. यह बिलकुल साफ है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिशों के बावजूद भारत सरकार ने पीपीई की मांग का आंकलन नहीं किया जिसके परिणाम स्वरूप भारतीय डॉक्टर और नर्स इसकी कीमत चुका रहे हैं और इस संकट का सामना कर रहे हैं.

स्वास्थ्य मंत्रालय, कपड़ा मंत्रालय और सरकारी कंपनी एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड के पिछले दो महीनों के निर्णयों ने स्वास्थ्य कर्मियों और कार्यकर्ताओं को सकते में डाल दिया है. मुझे कई निर्माताओं ने बताया कि सरकार ने एचएलएल को पीपीई की खरीदारी का एकाधिकार दे रखा है और वह बढ़ी हुई कीमतों में उपकरणों को बेच रही है. संकट की ऐसी घड़ी में सरकार का यह फैसला हैरान करने वाला है. एचएलएल पीपीई का निर्माण नहीं कर रही है और उसे एकाधिकार देने से वह सभी आपूर्तिकर्ताओं से इन्हें इकट्ठा कर 1000 रुपए प्रति किट की दर से बेच रही है. इस बीच इन किटों के निर्माताओं ने मुझे बताया है कि यदि सरकार उन्हें अनुमति दे तो वे इन किटों को 400-500 रुपए में उपलब्ध करा सकते हैं. इसके अलावा इन किटों को असेंबल करने से और देरी हो रही है.

साथ ही कीमतों के बढ़ने ने स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की चिंता बढ़ा दी है. उद्योग जगत पर नजर रखने वाली गैर-सरकारी संस्था ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क की सह-संयोजक मालिनी आयसोला ने मुझे बताया कि उनकी संस्था 23 मार्च को प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर एचएलएल को प्राप्त पीपीई खरीद के एकाधिकार को खत्म करने की मांग करेगी.

विद्या कृष्णन स्वास्थ्य मामलों की पत्रकार हैं और गोवा में रहती हैं. एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा पर उनकी पहली किताब 2020 में प्रकाशित होगी.

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