बीमा केंद्रित निजी स्वास्थ्य सेवा को अपने से कमजोर हुई कोविड-19 से मुकाबला करने की भारत की क्षमता

04 अप्रैल 2020
23 सितंबर 2018 को गुवाहाटी में आयुष्मान भारत योजना के आरंभ के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में शिरकत करते लोग. सार्वजनिक-स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया कि व्यवहार में यह योजना कई दलितों और ग्रामीण समुदायों की स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच को रोक देती है. यह महामारी का जवाब देने के देश के प्रयास को भी कमजोर करती है.
डेविड तालुकेदार / नूरफोटो / गैटी इमेजिस
23 सितंबर 2018 को गुवाहाटी में आयुष्मान भारत योजना के आरंभ के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में शिरकत करते लोग. सार्वजनिक-स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया कि व्यवहार में यह योजना कई दलितों और ग्रामीण समुदायों की स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच को रोक देती है. यह महामारी का जवाब देने के देश के प्रयास को भी कमजोर करती है.
डेविड तालुकेदार / नूरफोटो / गैटी इमेजिस

29 मार्च को शाम 5 बजे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की वेबसाइट ने बताया कि भारत में 26 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कोविड-19 के कुल 869 सकारात्मक मामले थे. सात दिन पहले प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने महामारी के प्रसार को रोकने के अपने मुख्य प्रयास के बतौर 21 दिन के अप्रत्याशित देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की. महामारी से निपटने वाले अ​​ग्रिम मोर्चे के कर्मचारियों के लिए सार्वजनिक अस्पतालों में आवश्यक उपकरणों और सेवाओं की कमी की बढ़ती चिंताओं के बीच अचानक हुए लॉकडाउन ने अन्य दोषों को भी उजागर किया. इसने हजारों प्रवासी मजदूरों को उनके गृहनगर और गांवों तक सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने के लिए मजबूर किया. शुरुआती दिनों में निजी अस्पतालों द्वारा कोविड-19 के लक्षणों को दर्शाने वाले रोगियों का इलाज न करने की कई रिपोर्टें सामने आईं जिसमें देश में बीमारी के पहले शिकार लोग भी थे. हालांकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक सलाह जारी की कि किसी भी संदिग्ध कोविड​​-19 रोगी को इलाज से मना नहीं किया जा सकता है फिर भी मरीजों का इलाज करने से इनकार करने वाले निजी अस्पतालों की रिपोर्टें आती रहीं. जिन विशेषज्ञों से मैंने बात की उन्होंने एक और चिंताजनक पहलू के बारे बताया. उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दशकों में देश में निजी स्वास्थ्य बीमा मॉडल को अपने का परिणाम अब यह निकलेगा कि गरीब लोग महामारी में मुफ्त स्वास्थ्य सेवा नहीं प्राप्त कर पाएंगे.

डॉ. टी. सुंदररमन टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में स्कूल ऑफ हेल्थ सिस्टम स्टडीज के पूर्व डीन हैं और पीपुल्स हेल्थ मूवमेंट के वैश्विक समन्वयक हैं. यह मूवमेंट जमीनी स्तर के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का वैश्विक नेटवर्क है. उन्होंने कहा, "भारत का कमजोर सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचा कोविड-19 महामारी से निपटने के लिए तैयार नहीं है." सुंदररमन ने कहा कि आपूर्ति की कमी इस बात को दर्शाती है कि "निजीकृत बीमा वाली स्वास्थ्य सेवा को बल देने के लिए सार्वजनिक-स्वास्थ्य प्रणाली की उपेक्षा ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल से निपटने की भारत की क्षमता को कमजोर किया है."

सितंबर 2018 में सरकार ने प्रधान मंत्री जन आरोग्य योजना या आयुष्मान भारत योजना शुरू की. यह दुनिया की सबसे बड़ी राज्य-प्रायोजित स्वास्थ्य आश्वासन योजना है. गरीब और सबसे कमजोर लोगों पर ध्यान केंद्रित करते हुए आयुष्मान भारत देश की 40 प्रतिशत आबादी को कवर करती है. योजना की आधिकारिक वेबसाइट 10.74 करोड़ ग्रामीण और शहरी परिवारों को चिकित्सा कवर प्रदान करने का दावा करती है. यह पैनल में आने वाले सार्वजनिक और निजी दोनों तरह के अस्पतालों में चिकित्सा उपचार के लिए प्रति परिवार 5 लाख रुपए सालाना का चिकित्सा कवर प्रदान करता है. पीएम-जेएवाई वेबसाइट खुद इस बात को चिन्हित करती है कि भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के अस्पताल "कर्मचारियों, चिकित्सकों और अन्य चिकित्सा स्टाफ की कमी का सामना करते हैं और दवाओं और उपकरणों की कमी की समस्या का भी सामना करते हैं जो उनके कामकाज पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं." कारण बतौर यह चिन्हित करता है कि स्वास्थ्य पर भारत का सरकारी खर्च पिछले दो दशकों में सकल घरेलू उत्पाद के 1.2 प्रतिशत के करीब स्थिर रहा है. बीमा योजना के लिए तर्क यह है कि जहां स्वास्थ्य सेवाओं की मांग में विस्फोटक रूप से वृद्धि हुई है, वहीं सार्वजनिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे की आपूर्ति में तेजी नहीं आई है.

सिद्धांत में, आयुष्मान भारत का कवरेज जनसंख्या और सेवाओं दोनों के संदर्भ में व्यापक है. आयुष्मान भारत के लाभार्थियों की पहचान सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना के आंकड़ों के उपयोग से की जाती है. इसके अतिरिक्त, इस योजना में मानदंड-आधारित अभाव बिंदु भी शामिल हैं जो बीमा के दायरे में व्यक्तियों को शामिल या बाहर करते हैं. उदाहरण के लिए, ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिहीन परिवार, हाथ से मैला ढोने वाले या अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय के लोग शामिल हैं. शहरी क्षेत्रों में योजना के तहत अलग मानदंड हैं.

राज्य सरकारों के बीच क्रियान्वयन के दो मॉडल हैं. पहला आश्वासन मॉडल है, जहां राज्य बीमा कंपनियों की मध्यस्थता के बिना एक राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण स्थापित करता है. सरकार एसएचए के माध्यम से अस्पतालों को पैसा देती है. दूसरा मॉडल बीमा मॉडल है, जहां एसएचए एक निविदा प्रक्रिया के माध्यम से एक बीमा कंपनी का चयन करता है और उसे आवश्यक प्रीमियम का भुगतान करता है. बीमा कंपनी दावों का निपटारा करती है. दोनों मॉडल में खामियां हैं. यह बताया गया है कि आश्वासन मॉडल में सूचीबद्ध अस्पतालों ने अतीत में धोखाधड़ी के दावों के आधार पर धन एकत्र किया है, जबकि बीमा मॉडल में, कंपनियों के पास वैध दावों को अस्वीकार करने का मौका होता है.

तुषार धारा कारवां में रिपोर्टिंग फेलो हैं. तुषार ने ब्लूमबर्ग न्यूज, इंडियन एक्सप्रेस और फर्स्टपोस्ट के साथ काम किया है और राजस्थान में मजदूर किसान शक्ति संगठन के साथ रहे हैं.

Keywords: COVID-19 health policy rural health insurance
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