उचित व्यवस्था के अभाव में प्लाज्मा पाने के लिए जद्दोजहद करते कोविड-19 रोगी

20 अगस्त 2020
नई दिल्ली में इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलीरी साइंसेज (आईएलबीएस) अस्पताल दिल्ली में प्लाज्मा बैंक में कोविड-19 मरीजों को प्लाज्मा दान करते हुए दाता.
टी. नारायण / ब्लूमबर्ग / गैटी इमेजिस
नई दिल्ली में इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलीरी साइंसेज (आईएलबीएस) अस्पताल दिल्ली में प्लाज्मा बैंक में कोविड-19 मरीजों को प्लाज्मा दान करते हुए दाता.
टी. नारायण / ब्लूमबर्ग / गैटी इमेजिस

जुलाई के मध्य में पटना के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में कोविड-19 के एक 74 वर्षीय रोगी का परिवार उहापोह की हालत में था. मरीज पहले से ही गंभीर रूप से बीमार था और उसे वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया था. उसकी हालत और बिगड़ने के साथ, उसके डॉक्टरों ने कहा कि उसे तत्काल प्लाज्मा थेरेपी की जरूरत है. परिवार ने पहले मान लिया था कि अस्पताल खुद इस चिकित्सकीय रूप से निर्धारित प्लाज्मा का बंदोबस्त करेगा. मरीज के दामाद ने मुंबई से फोन पर कहा, "हमने पहले सोचा था कि ब्लड बैंक खुद प्लाज्मा का बंदोबस्त करेगा और हमें इसके लिए भुगतान करना होगा." यह जानकर उन्हें गहरा सदमा लगा कि अस्पताल उनसे ही प्लाज्मा प्राप्त करने की अपेक्षा कर रहा था.

भारत भर के ज्यादा से ज्यादा डॉक्टरों ने गंभीर रूप से बीमार कोविड-19 रोगियों के लिए, आमतौर पर प्लाज्मा थेरेपी के रूप में जाना जाने वाली सामान्य प्लाज्मा थेरेपी निर्धारित करना शुरू कर दिया है. प्लाज्मा एक ऐसे व्यक्ति से लिया जाता है जो बीमारी से उबर गया हो क्योंकि उसमें रोग से लड़ने वाला एंटीबॉडी होते हैं. फिर इसे उसी बीमारी से ग्रस्त रोगी में प्रत्यारोपित किया जाता है जिसकी अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली एंटीबॉडी का उत्पादन नहीं कर रही है. सैद्धांतिक रूप से इससे रोगी में एंटीबॉडी प्रतिक्रिया शुरू हो जानी चाहिए. भले ही अतीत में अन्य संक्रामक रोगों के इलाज के लिए इस प्रणाली को एक चिकित्सा हस्तक्षेप के रूप में इस्तेमाल किया गया हो, लेकिन यह दर्शाने के लिए बहुत कम वैज्ञानिक प्रमाण हैं कि यह कोविड-19 रोगियों की मदद करता है. भारत में प्लाज्मा उपचार प्रणाली के लिए अधिकांश नैदानिक परीक्षणों के परिणाम अभी तक जारी नहीं किए गए हैं, लेकिन चीन में एक प्रमुख परीक्षण से पता चला है कि प्लाज्मा उपचार प्रणाली का रोगियों पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ा था.

चूंकि दुनिया को इस बीमारी के बारे में पता चले अभी महज आठ ही महीने हुए हैं, इसलिए डॉक्टर अपने मरीजों को जीवित रखने के लिए प्लाज्मा और कई अन्य दवाओं को प्रायोगिक उपकरणों के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं.

दिल्ली के मैक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में आंतरिक चिकित्सा के निदेशक और वरिष्ठ सलाहकार डॉ. आरएस मिश्रा ने कहा, “हमारा अनुभव है कि अगर सही समय पर इसका इस्तेमाल किया जाए तो प्लाज्मा थेरेपी काम करती है. यदि इसका उपयोग देर से किया जाता है जब सिस्टम में पहले से ही एंटीबॉडी हैं, तो थेरेपी काम नहीं करेगी. यदि आप 15 से 16 दिनों के बाद प्लाज्मा देते हैं, तो रोगी पहले से ही एंटीबॉडी बना रहा है. समय बहुत ही महत्वपूर्ण बात है.”

अस्पष्ट दिशानिर्देशों और नियमों की कमी के कारण मरीजों और उनके परिजनों को महामारी के बीच प्लाज्मा की खरीद के लिए अतिरिक्त और अनुचित बोझ का सामना करना पड़ रहा है. सभी रोगियों को जिन्हें प्लाज्मा थेरेपी की जरूरत होती है, उनकी विशिष्ट आवश्यकताएं होती हैं. पटना के मरीज को एक ऐसे डोनर से प्लाज्मा की जरूरत थी, जो कम से कम 14 दिन पहले कोविड-19 से उबरा हो और उसका ब्लड ग्रुप ओ पॉजिटिव हो. न तो उनकी पत्नी और न ही उनकी पुत्रवधू, जो उनके साथ रहती थीं, यह पता लगा सकती थीं कि स्रोत प्लाज्मा कहां है. परिवार प्लाज्मा दाताओं को खोजने के लिए मुंबई में रिश्तेदारों और दोस्तों के पास गया. उनके दामाद ने बताया कि उन्होंने रिश्तेदारों और दोस्तों को मिलाकर 100 से अधिक लोगों को फोन किया.

मेनका राव मुंबई स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं. वह कानून और स्वास्थ्य संबंधी विषयों पर लिखती हैं.

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