कोरोनावायरस महामारी से खुली भारत की कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल, भारत में टेस्टिंग किट और अस्पतालों में स्टाफ की कमी

20 मार्च 2020
सीमर सेहगल/हिंदुस्तान टाइम्स/गैटी इमेजिस
सीमर सेहगल/हिंदुस्तान टाइम्स/गैटी इमेजिस

15 मार्च को भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य विशेषज्ञों के साथ कोविड-19 के बढ़ते मामलों के संबंध में एक बैठक की. उस बैठक में मौजूद एक जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ ने नाम न छापने की शर्त पर मुझे बताया, “यह एक सच्चाई है कि भारत के पास इस वायरस को जांचने वाली किटों (उपकरणों) का आभाव हैं. वे लोग जानबूझ कर जांच के मानदंडों का विस्तार नहीं कर रहे हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि यदि वे ऐसे मरीजों को भी जांच के दायरे में ले आते हैं जिन्होंने यात्राएं नहीं की हैं तो बहुत जल्दी जांच का भट्ठा बैठ जाएगा.” केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने जांच को सरकारी अस्पतालों और सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त केंद्रों तक अंतर्राष्ट्रीय यात्रा करने वालों या ऐसे यात्रियों के संपर्क में आने वाले लोगों तक सीमित रखा है. फिलहाल केवल 100 से कुछ अधिक ही मामले सामने आए हैं लेकिन भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था की दरारें दिखाई पड़ने लगी हैं.

कोविड-19 से भारत में हुई पहली मौत के बाद ही ये दरारें स्पष्ट हो गई थीं. 11 मार्च को कर्नाटक के कलबुर्गी शहर में 76 साल के आदमी की मौत हो गई, जो 29 फरवरी को साऊदी अरब से लौटा था. दो निजी अस्पतालों ने उसका इलाज करने से इनकार कर दिया था. कोविड-19 संक्रमण की उस आदमी की रिपोर्ट मौत के एक दिन बाद आई. स्वास्थ्य विशेषज्ञ ने मुझे बताया कि कोविड-19 से हुई पहली मौत से भारत के उस गंभीर स्वास्थ्य संकट को समझा जा सकता है जिसमें हो यह रहा है कि सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त व्यवस्था नहीं है और निजी अस्पताल किसी के लिए जवाबदेह नहीं हैं.

अगले दिन डर और पुख्ता हो गया. कोविड-19 के लक्षण वाले लोगों की जांच में अनावश्यक देरी से परेशान होकर छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टी. एस. सिंह देव ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्ष वर्धन को एक पत्र भेजा. उस खत में देव ने लिखा, “जांच के वर्तमान नियम बहुत अधिक रोक लगाने वाले हें... अन्य राज्यों की तरह छत्तीसगढ़ में भी केवल एक केंद्र है जहां कोविड-19 की जांच हो रही है. हमें चिंता है कि क्या सरकार पर्याप्त किट मुहैया कराएगी यदि हम जांच को विस्तार करने की अनुमति देते हैं.” केरल ने भी जांच के दिशानिर्देशों को विस्तारित किया है. वहां अब गंभीर लक्षणों वाले या फेफड़ों, दिल, लिवर और किडनी, गर्भवति महिलाएं और 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की जांच तब भी की जाएगी जबकि उनका यात्रा का कोई इतिहास नहीं होगा. संशोधित दिशानिर्देश रिस्क असेसमेंट के आधार पर कोविड-19 के मरीजों के क्वारंटीन और अस्पताल में भर्ती करने के लिए हैं.

जारी संकट से निबटने में केंद्र की पूर्ण विफलता इस हद तक पहुंच गई है कि न केवल राज्य सरकारें बल्कि सरकारी चिकित्सकों ने भी सार्वजनिक रूप से स्थिति को लेकर अपनी चिंता जताई है. 14 मार्च को महाराष्ट्र के सेवाग्राम में स्थित कस्तूरबा अस्पताल में औषधि और चिकित्सा के महानिरीक्षक डॉ. एस. पी. कालांतरी ने मरीजों का उपचार न कर पाने की अपनी विवश्ता को ट्विटर पर साझा किया. उन्होंने ट्वीट किया, “गंभीर प्रकार के निमोनिया के मरीज का उपचार आईसीयू में कर रहा हूं. मैं जान नहीं पा रहा हूं कि कौन जिम्मेदार है : बैक्टीरिया या वायरस. इलाके की प्रयोगशाला ने मरीज के सैंपल की कोविड-19 जांच करने से इनकार कर दिया है क्योंकि मरीज का यात्रा इतिहास नहीं है. क्या यह नहीं माना जाना चाहिए कि परीक्षण का मानदंड अत्याधिक सीमित है.” उसी शाम उन्होंने एक बार फिर ट्वीट कर कहा, “कोविड-19 के लिए केवल 10 प्रतिशत लैब क्षमता का अब तक इस्तेमाल किया गया है, सरकारी लैबें निमोनिया के गंभीर रोगियां की जांच करने से मना कर रही हैं बस लिए कि उनका यात्रा का इतिहास नहीं है.”

छत्तीसगढ़ में सामुदायिक डॉक्टर और कार्यकर्ता डॉ. योगेश जैन के अनुसार कर्नाटक के मरीज की मौत इसलिए हुई क्योंकि अस्पतालों और उसके परिवार ने हाथ खड़े कर लिए थे. जैन ने आगे कहा, “अब तक यह बात सही-सही नहीं बताई गई है कि क्यों सैंपल लेने के बाद भी उसे घर जाने दिया गया जबकि मरीज का उपचार सुनिश्चित किया जाना चाहिए था. उसके परिवार को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक धक्के खाने पड़े.” उस मरीज की बेटी में भी कोविड-19 संक्रमण पाया गया. जैन ग्रमीण छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य उपचार प्रदान करने वाले जन स्वास्थ्य सहयोग नाम के गैर-सरकारी संगठन के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं.

विद्या कृष्णन स्वास्थ्य मामलों की पत्रकार हैं और गोवा में रहती हैं. एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा पर उनकी पहली किताब 2020 में प्रकाशित होगी.

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