कोरोना : प्रशासनिक विफलता से उपजे जनआक्रोश का दंश झेलती पंजाब पुलिस

02 अप्रैल 2020
पंजाब में पुलिस को जरूरतमंद लोगों तक राहत पहुंचाने के काम में लगाया गया है लेकिन लॉकडाउन में हुई प्रशासनिक विफलताओं के लिए पुलिस​कर्मियों को जनता के आक्रोश का निशाना बनना पड़ रहा है.
नरिंदर नानू / एएफपी / गैटी इमेजिस
पंजाब में पुलिस को जरूरतमंद लोगों तक राहत पहुंचाने के काम में लगाया गया है लेकिन लॉकडाउन में हुई प्रशासनिक विफलताओं के लिए पुलिस​कर्मियों को जनता के आक्रोश का निशाना बनना पड़ रहा है.
नरिंदर नानू / एएफपी / गैटी इमेजिस

पंजाब के तरनतारन जिले के गोइंदवाल में डेरा साहिब पुलिस चौकी की एक महिला सब-इंस्पेक्टर सोनी 28 मार्च को अपने इलाके में जरूरतमंद लोगों को भोजन बांट रही थीं. उनके साथ कुछ अन्य पुलिस कर्मी और स्थानीय गुरुद्वारा के स्वयंसेवक थे. उन्होंने फोन पर कहा कि लोगों ने इस रवैये की काफी सराहना की लेकिन लोहार गांव में, "कुछ बेईमान और कुख्यात तत्वों ने पुलिस वाहनों पर पत्थर फेंकना और उनका पीछा करना शुरू कर दिया. उन्होंने गुरुद्वारा के स्वयंसेवकों पर भी हमला किया.” तरनतारन के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ध्रुव दहिया ने संपर्क करने पर घटना की पुष्टि की. स्वयंसेवकों में से एक कुलवंत सिंह ने मुझे बताया कि लोग अपनी हताशा दूर करने के लिए पुलिस को निशाना बना रहे हैं क्योंकि कोरोनोवायरस के चलते हुए लॉकडाउन से मची अफरा-तफरी ने सरकार द्वारा योजना बनाने और उसके कार्यान्वयन की असफलता को उजागर किया है. उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर इसी तरह के हमलों के वीडियो चल रहे हैं, और ये जनता को प्रोत्साहित कर रहे हैं.

चंडीगढ़ के एक मोटर वाहन डीलरशिप के सेल्स मैनेजर हरज्योत सिंह को 26 मार्च को पता चला कि उनके सबसे करीबी दोस्तों की उस सुबह एक कार दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. चूंकि उसके दोस्त का परिवार दूर रहता था इसलिए वह खुद एक स्कूटर पर निकला और चंडीगढ़ से सटे मोहाली के नागरिक अस्पताल से शव लेने के लिए चला गया. उसे रास्ते में पुलिस ने रोक लिया. उन्होंने कहा, "मैंने उन्हें समझाने की पूरी कोशिश की, जब एक कॉन्स्टेबल आया और मुझे मारने लगा," उन्होंने कहा. उन्होंने याद किया कि उनके साथ मारपीट करने वाले पुलिस कर्मी ने कहा था, "जब तक स्कूटर घुमा के दौड़ा नहीं देता, डंडे बजते रहेंगे." हरजोत ने एक फेसबुक पोस्ट में इस घटना का जिक्र किया और मीडिया घरानों, मोहाली पुलिस, स्थानीय डिप्टी कमिश्नर कार्यालय और पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को पोस्ट में टैग किया था. जब मोहाली के एसएसपी कुलदीप सिंह चहल से संपर्क किया गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी किसी घटना की जानकारी नहीं है. "मैंने अपने कर्मियों को मनमानी करने से बचने के सख्त निर्देश दिए हैं," उन्होंने कहा.

हरजोत पुलिस के "अनैतिक और बेवकूफाने" तरीकों से नाराज थे. "हम व्हाट्सएप पर आए ऐसे संदेशों को पढ़कर हंसते और आनंद लेते हैं," उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा, "लेकिन यकीन मानिए कि हम कभी नहीं जानते हैं कि हम में से ही किसी को भी बाहर जाने की जरूरत पड़ जाए और यह आप लोगों के साथ भी हो सकता है. जहां अन्य राज्यों की पुलिस लोगों से हाथ जोड़ कर बाहर न आने का अनुरोध कर रही है वहीं बहुत बदनाम, असंवेदनशील और अक्षम पंजाब पुलिस अक्सर भूल जाती है कि वह सार्वजनिक सेवक हैं कोई वर्दीधारी गुंडा नहीं है." 

हाल के महीनों में राज्य में अन्य प्रभावित देशों के अप्रवासी भारतीयों की भारी आमद से पंजाब में कोविड-19 के बड़े प्रकोप की संभावना है. यहां तथा अन्य कई राज्यों में महामारी प्रकोप को रोकने के लिए लागू किया गया लॉकडाउन योजनाबद्ध और योजना को लागू करने की गंभीर कमी को झेल रहा है. लॉकडाउन को लागू करने के काम में पंजाब पुलिस, अच्छे और बुरे दोनों तरह की पुलिस भूमिका में उभर कर सामने आई है. ऐसे उदाहरण भी हैं जहां पुलिस बाहर दिखाई दे रहे लोगों के साथ मारपीट करते या उन्हें अपमानित करते हुए दिख रही है. लोगों ने पुलिस हिंसा के मामलों और बाहर पाए गए लोगों के सार्वजनिक अपमान के कई वीडियो ऑनलाइन पोस्ट किए हैं. कुछ फुटेजों से पता चलता है पुलिस लोगों को जमीन पर लुड़कने या ऐसी तख्ती पकड़ कर खड़े होने को मजबूर कर रही है जिसमें लिखा है कि हम, "लोगों के दुश्मन हैं." खासतौर पर ऐसे राज्य में जहां अपनी ज्यादतियों के लिए पुलिस की लंबे समय से आलोचना होती रही है, जिसमें खालिस्तानी विद्रोह के खिलाफ कार्रवाई भी शामिल है, इन घटनाओं ने सार्वजनिक गुस्से को भड़का दिया है. 26 मार्च को अमरिंदर सिंह ने ट्वीट किया है कि उन्होंने पुलिस को ऐसे "कुछ पुलिसकर्मियों जिनका व्यवहार अनुचित था," के खिलाफ कार्रवाई करने का आदेश दिया था. उन्होंने कहा, "वे ज्यादातर द्वारा किए जा रहे अच्छे काम को फीका कर रहे हैं. मैं इन ज्यादतियों को बर्दाश्त नहीं करूंगा. ”

इस बीच, पुलिस को भी लॉकडाउन में फंसे कमजोर लोगों तक राहत पहुंचाने के लिए कार्रवाई में शामिल किया गया है ताकि वे उन अन्य सरकारी एजेंसियों के काम को संभाल सकें जिनके जिम्मे इस काम को संभालना था और जो बड़े पैमाने पर स्पष्ट रूप से अनुपस्थित हैं. इसका मतलब है कि अतिरिक्त काम के घंटे और अतिरिक्त दबाव, यह तब और बुरा हो जाता है जब बुनियादी सुरक्षा उपायों जैसे कि कर्मियों के लिए मास्क और पुलिस सुविधाओं की स्वच्छता का अभाव होता है. जमीन पर सरकार के सबसे प्रत्यक्ष एजेंट के रूप में, पुलिस प्रशासन की खराबी का प्रतीक बनती जा रही है और साथ ही इस खराबी के चलते पैदा हुए दुष्परिणामों को भी अपनी तरफ आकर्षित कर रही है.

जतिंदर कौर तुर वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले दो दशकों से इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स और डेक्कन क्रॉनिकल सहित विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों में लिख रही हैं.

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