कोविड-19 : 70 रुपए की दवा मिल रही 40 हजार में, मजबूरों को लूट रहीं सरकार और फार्मा कंपनी?

13 जून को स्वास्थ्य मंत्रालय रेमेडिसविर के उपयोग के लिए दिशानिर्देश जारी किए जिसके तहत इस दवा का उपयोग मामूली रूप से बीमार रोगियों के इलाज के लिए हो सकता है.
उलरिच पेर्री / एएफपी / गैटी इमेजिस
13 जून को स्वास्थ्य मंत्रालय रेमेडिसविर के उपयोग के लिए दिशानिर्देश जारी किए जिसके तहत इस दवा का उपयोग मामूली रूप से बीमार रोगियों के इलाज के लिए हो सकता है.
उलरिच पेर्री / एएफपी / गैटी इमेजिस

जिस तेजी के साथ कोरोनावायरस महामारी देश के कोने-कोने फैलती जा रही है उसे देखते हुए कह सकते हैं कि अगले कुछ हफ्तों में भारत को गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ सकता है. अप्रैल और मई में नरेन्द्र मोदी सरकार की परीक्षण पर प्रतिबंधित की नीति ने महामारी को बढ़ा दिया है और जुलाई आते-आते देश के अस्पतालों को इसका सबसे बुरा प्रकोप झेलना पड़ रहा है.

जून में कोरोनोवायरस के सभी रोगियों को धीमे-धीमे एक भयानक अहसास हुआ कि भारत सरकार के पास बीमारी के इलाज में इस्तेमाल की जा रहीं कुछेक भरोसेमंद प्रायोगिक दवाओं में से एक मानी जाने वाली रेमेडिसविर की एक शीशी भी नहीं है. अमेरिकी फार्मास्युटिकल दिग्गज गिलीड साइंसेज द्वारा पेटेंट की गई यह दवा पहली बार जनवरी में संभावित उपचार के रूप में तब सामने आई थी जब इसने चीन में कोविड-19 रोगियों पर एंटी-वायरल काम किया था. मई तक न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन ने एक अध्ययन प्रकाशित किया जिसमें कहा गया था कि रेमेडिसविर ने बीमारी की अवधि को चार दिनों तक कम कर दिया है. लेकिन भारत में सरकार दवा की मांग का अनुमान लगाने और भंडारण करने में विफल रही.

1 मई को संयुक्त राज्य अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने "आपातकालीन उपयोग" के लिए रेमेडिसविर को मंजूरी दी और गिल्ड साइंसेज, जिसकी स्टॉकपाइल में 1.5 मिलियन खुराक थी, ने अमेरिका को इसका अधिकांश हिस्सा दे दिया. यह सब त​ब जब अन्य देश इस दवा के मारामारी करने लगे थे.

मैंने एक ऐसे भारतीय मरीज को जानती हूं जिसे एक अस्पताल ने रेमेडिसविर दवा लिख थी. रोगी का स्वास्थ्य बिगड़ने पर परिवार ने यहां-वहां, जहां-तहां इस दवा का पता लगाया लेकिन वह नहीं मिली. परिवार की यह कहानी उन भारतीय मरीजों की जद्दोजहद को दर्शाती है जिन्हें डॉक्टरों ने रेमेडिसविर दवा लिखी है.

एक्टिविस्ट और रोगियों द्वारा उठाई गई चिंताओं के जवाब में गिलीड साइंसेज ने 12 मई को घोषणा की कि उसने उन भारतीय निर्माताओं के साथ समझौता किया था जो दवा के सामान्य संस्करण का उत्पादन और विपणन कर सकती हैं. ये भारतीय कंपनियां हैं सिप्ला, हेटेरो लैब्स, जाइडस कैडिला हेल्थकेयर, डॉ रेड्डीज लैबोरेट्रीज, जुबलींट लाइफसाइंस और माइलान हैं.

विद्या कृष्णन स्वास्थ्य मामलों की पत्रकार हैं और गोवा में रहती हैं. एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा पर उनकी पहली किताब 2020 में प्रकाशित होगी.

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