अध्ययन कहते हैं कि प्लाज्मा थेरेपी कोविड रोगियों पर बेअसर, फिर भी लिख रहे हैं डॉक्टर

01 जनवरी 2021
18 जुलाई 2020 को वसंत कुंज, दिल्ली के आईएलबीएस अस्पताल में एक दाता से रक्त प्लाज्मा लेते हुए.
बिप्लव भूयान / हिंदुस्तान टाइम्स
18 जुलाई 2020 को वसंत कुंज, दिल्ली के आईएलबीएस अस्पताल में एक दाता से रक्त प्लाज्मा लेते हुए.
बिप्लव भूयान / हिंदुस्तान टाइम्स

नवंबर में नितिन निरंजन ने अपनी 63 वर्षीय मां के लिए प्लाज्मा डोनर की खोज में एक सप्ताह बिताया. वह दिल्ली के एक अस्पताल में आईसीयू में वेंटिलेटर पर थीं. उनकी तबीयत तेजी से बिगड़ रही थी. अस्पताल में एक प्लाज्मा बैंक था जिसमें उनके रक्त के प्रकार से मेल खाता प्लाज्मा था लेकिन उसे तब तक देने से इनकार कर दिया गया जब तक कि उनका परिवार कोई ऐसा प्लाज्मा दाता नहीं तलाश लेता जो मरीज द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले प्लाज्मा की यूनिटों के बदले अपने रक्त से प्लाज्मा देता. निरंजन ने पहली बार ट्विटर अकाउंट बनाया और इस पर प्लाज्मा दाताओं की तलाश शुरू की. उन्होंने पैसे देकर रेडियो विज्ञापन कराने के बारे में भी सोचा. छठे दिन जाकर वह एक पारिवारिक मित्र को दान के लिए तैयार कर पाए. 37 वर्षीय निरंजन उत्तर प्रदेश में जालौन जिले के रहने वाले हैं और सरकारी स्कूल में अध्यापक हैं और अपने परिवार में एकमात्र कमाने वाले सदस्य हैं. उन्होंने अपनी जिंदगी भर की ज्यादातर बचत अपनी मां के इलाज में खर्च कर दी. प्लाज्मा मिलने के बावजूद मां की मृत्यु हो गई.

अगस्त में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कारवां ने बताया था कि कैसे कोविड-19 से संक्रमित मरीज और उनके परिवार प्लाज्मा पाने के लिए कड़ी मशक्कत कर रहे हैं. ज्यादा से ज्यादा डॉक्टर इस इलाज की सिफारिश कर रहे हैं जिसके लिए नियम कानून भी बहुत मामूली हैं. अक्टूबर और नवंबर में भारत और अर्जेंटीना के शोधकर्ताओं की दो टीमों ने अलग-अलग वैज्ञानिक अध्ययन प्रकाशित किए जिनमें दोनों ने दिखाया कि संक्रमण से उभर चुके लोगों के प्लाज्मा से इलाज करने की कॉनविलियसेंट प्लाज्मा थेरेपी से कोविड-19 संक्रमितों की कोई मदद नहीं की. दिसंबर में भी लोग परिवार के गंभीर रूप से बीमार सदस्यों के लिए प्लाज्मा पाने में मुश्किलों का सामना कर रहे हैं.

दुनिया भर के डॉक्टरों ने कोरोनावायरस महामारी के दौरान प्रायोगिक चिकित्सा और पुनर्निर्मित दवाओं पर भरोसा किया है. ज्यादातर मामलों में इस बात का कोई सबूत नहीं था कि ये उपचार वास्तव में कारगर भी हैं लेकिन डॉक्टरों ने उनका उपयोग तब तक किया जब तक वे मानते रहे कि वे कोई नुकसान नहीं करेंगे. उन्होंने बीमारी पर सब कुछ झोंक दिया. वे उम्मीद करते थे कि कोई दवा तो उनके रोगी के ढहते शरीर से वायरस को बाहर निकल देगी. साल बीतते-बीतते चिकित्सा शोधकर्ताओं ने इस पर काफी काम कर लिया था कि कौन-सा उपचार काम करता है और कौन-सा नहीं.

प्लाज्मा थेरेपी एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें डॉक्टर कोविड-19 से उभरने वाले लोगों के रक्त से प्लाज्मा निकालते हैं और इसे बीमारी से पीड़ित लोगों में प्रत्यारोपित कर देते हैं. सिद्धांत यह है कि प्लाज्मा में मौजूद एंटीबॉडी से संक्रमित व्यक्ति को संक्रमण से लड़ने में मदद मिलेगी. हालांकि, दो यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षणों से संकेत मिलता है कि अस्पताल में भर्ती मरीजों के बीच प्लाज्मा थेरेपी से मृत्यु दर या सुधार की अवधि कम नहीं होती है.

भारत में कई संस्थानों के शोधकर्ताओं ने अप्रैल और जुलाई के बीच 39 स्थानों पर अस्पताल में भर्ती 464 वयस्कों के बीच स्वतंत्र अध्ययन किया. अध्ययन ने निष्कर्ष निकाला कि प्लाज्मा थेरेपी ने गंभीर बीमारी के प्रति मृत्यु दर या सुधार की अवधि को कम नहीं किया. दूसरा अध्ययन अर्जेंटीना में शोधकर्ताओं ने मई और अगस्त के बीच किया. 333 अस्पतालों में भर्ती गंभीर कोविड-19 निमोनिया वाले मरीजों में से 228 को प्लाज्मा दिया गया जबकि अन्य को प्लेसबो दिया गया. इस अध्ययन से यह भी पता चला कि दोनों समूहों के बीच नैदानिक स्थिति या समग्र मृत्यु दर में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं है. महाराष्ट्र के सेवाग्राम के कस्तूरबा गांधी अस्पताल में चिकित्सा अधीक्षक डॉ. एसपी कलंत्री ने कहा, "ये दोनों अध्ययन उच्च गुणवत्ता के हैं. काफी बड़ी संख्या में रोगियों के बीच अध्ययन किया गया है जिसमें नियंत्रण समूह होते हैं और उनके विशिष्ट अंत बिंदु होते हैं जिसकी वे जांच करते हैं." कलंत्री किसी भी अध्ययन में खुद शामिल नहीं थे.

चाहत राणा कारवां में​ रिपोर्टिंग फेलो हैं.

Keywords: coronavirus COVID-19 plasma therapy pandemic
कमेंट