चमकी बुखार : हर साल मरते बच्चे, हर साल फेल बिहार सरकार

14 जून 2020
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में भीड़ भरे श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के मेडिकल वार्ड में ड्रिप लाइन की जांच करता एक व्यक्ति. यहां जून 2019 से एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम से पीड़ित बच्चों का इलाज किया जा रहा है. इस वर्ष, बिहार सरकार ने प्रकोप की तैयारी के लिए बहुत कम प्रयास किए और यह ध्यान नहीं रखा कि राष्ट्रव्यापी तालाबंदी किस तरह एईएस के संकट को और गहरा कर सकता है.
परवाज खान / हिंदुस्तान टाइम्स / गैटी इमेजिस
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में भीड़ भरे श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के मेडिकल वार्ड में ड्रिप लाइन की जांच करता एक व्यक्ति. यहां जून 2019 से एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम से पीड़ित बच्चों का इलाज किया जा रहा है. इस वर्ष, बिहार सरकार ने प्रकोप की तैयारी के लिए बहुत कम प्रयास किए और यह ध्यान नहीं रखा कि राष्ट्रव्यापी तालाबंदी किस तरह एईएस के संकट को और गहरा कर सकता है.
परवाज खान / हिंदुस्तान टाइम्स / गैटी इमेजिस

राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के दौरान एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम या चमकी बुखार या दिमागी बुखार के वार्षिक प्रकोप की तैयारी में बिहार सरकार की विफलता के कारण मुजफ्फरपुर में श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में 8 बच्चों की मौत हो गई है. एईएस एक घातक सिंड्रोम है जो मुख्य रूप से छोटे और नवजात बच्चों को प्रभावित करता है. यह उत्तरी बिहार में विशेष रूप से पूर्वी चम्पारण, शेहर, सीतामढ़ी, वैशाली और मुजफ्फरपुर जिलों में व्याप्त है. यह महामारी लगभग हर साल अप्रैल और मई में वापिस उभर कर आ जाती है और इसके चलते पिछले एक दशक में 471 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई है.

इस वर्ष बिहार सरकार ने प्रकोप की तैयारी के लिए बहुत कम प्रयास किए और इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि नोवेल कोरोनवायरस के प्रसार को रोकने के लिए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन एईएस संकट को कैसे बिगाड़ देगा. एईएस की वार्षिक आवृत्ति के बावजूद, सरकार कुपोषण जैसे एईएस के सामाजिक निर्धारकों को संबोधित करने में विफल रही. राज्य सिंड्रोम के मामलों को कुशलता से ट्रैक करने या चिकित्सा बुनियादी ढांचे का निर्माण करने में असमर्थ रहा जिससे इस संकट का जवाब दिया जा सकता था.

24 और 25 अप्रैल की दरमियानी रात को मुजफ्फरपुर के मुसहरी प्रखंड की चार साल की सुक्की कुमारी ने अपने पिता सुखलाल साहनी से बुखार और मतली आने की शिकायत की. जब हालत और बिगड़ने लगी तो उसे मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज और अस्पताल ले जाया गया और बाल गहन चिकित्सा इकाई - या पीआईसीयू में भर्ती कराया गया. चिकित्सा अधीक्षक ने परिवार को बताया कि उसके शरीर में ग्लूकोज का स्तर बहुत कम था. उस रात वह नहीं बच सकी.

एक दिन बाद उसकी जुड़वां बहन मौसमी कुमारी, जिसे इसी तरह के लक्षणों के साथ भर्ती किया गया था, ने भी इस सिंड्रोम के कारण दम तोड़ दिया. उन दोनों की मौत ने सुखलाल को गमगीन कर दिया. संक्रमण, उनके गांव और आसपास के लोगों के बीच का एक हिस्सा बन गया है. एक महीने से भी कम समय में, सकरा ब्लॉक के तीन वर्षीय आदित्य कुमार की मौत हो गई. इस साल एईएस के चलते यह पहली मौत थी. इसके बाद कोरोनावायरस के दौरान दस वर्ष से कम आयु के  सात और लोगों की मौत एईएस की चलते हुई.

एसकेएमसीएच में बाल रोग विभाग के प्रमुख डॉ. गोपाल शंकर साहनी ने कहा कि सुक्की और मौसमी को अगर पहले अस्पताल लाया गया होता तो उनकी जान बचाई जा सकती थी. उन्होंने कहा, "जुड़वा बच्चों को दस घंटे देरी से अस्पताल लाया गया." एईएस में शुरुआती लक्षणों को देखने के बाद तेजी से इलाज की आवश्यकता होती है, जिसके ना होने पर गंभीर हाइपोग्लाइकेमिया - या निम्न रक्त शर्करा- हो जाता है जो रोगी को गंभीर स्थिति में डाल देता है. संक्रमण भयानक कुपोषण से पीड़ित बच्चों को प्रभावित करता है, यह क्षेत्र की एक आम समस्या है, जो बीमारी के घातक होने की संभावना को बहुत बढ़ा देता है. एसकेएमसीएच के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. सुनील कुमार साहनी ने कहा कि 20 मई को अकेले पांच बच्चों को हाइपोग्लाइकेमिया से पीड़ित होने पर गंभीर हालत में भर्ती कराया गया था. सभी एईएस से संक्रमित थे.

सौरव कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं.

Keywords: COVID-19 coronavirus lockdown Bihar public health Muzaffarpur
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