केंद्र सरकार का नया होम्योपैथी कानून भारतीय स्वास्थ्य संकट का इलाज नहीं

16 अक्टूबर 2020
जानकारों का कहना है कि पारंपरिक चिकित्सा को बढ़ावा देने की नहीं बल्कि उसे विनियमित करने की जरूरत है.
विप्लव भुयान/ हिंदुस्तान टाइम्स/ गैटी इमेजिस
जानकारों का कहना है कि पारंपरिक चिकित्सा को बढ़ावा देने की नहीं बल्कि उसे विनियमित करने की जरूरत है.
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22 सितंबर को राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग अधिनियम, 2020 पर हस्ताक्षर कर दिए. इस अधिनियम का लक्ष्य भारत में होम्योपैथी शिक्षा और अभ्यास को मानकीकृत करना और राष्ट्रीय स्वास्थ्य लक्ष्यों को बढ़ावा देना है. लेकिन भारत में वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति में पहले से ही व्याप्त कुरीतियों को रोकने के लिए अधिनियम कोई ठोस कदम नहीं उठाता है.

अधिनियम की प्रस्तावना “सामुदायिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करने वाली समान और सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा” को बढ़ावा देकर होम्योपैथी को “सभी नागरिकों के लिए सुलभ और सस्ती बनाने” का लक्ष्य निर्धारित करती है. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण की संसदीय स्थायी समिति द्वारा विधेयक पर एक रिपोर्ट, साथ ही साथ राज्य सरकारों और देश के विभिन्न हिस्सों से आयुष संगठनों की टिप्पणियों में भी विशेष रूप से कहा गया है कि नए अधिनियम को होम्योपैथी को लोकप्रिय बनाना चाहिए, ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में होम्योपैथी की सेवाओं को सुलभ बनाना चाहिए और स्वास्थ्य कर्मचारियों की कमी को दूर करना चाहिए. लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य मामलों के जानकारों ने बताया है कि भारत में चिकित्सा की पारंपरिक प्रणालियों को बढ़ावा देने की नहीं बल्कि इसे विनियमित करने की जरूरत है और अधिनियम में ऐसा करने के लिए पर्याप्त प्रावधान नहीं हैं.

यह अधिनियम होम्योपैथी केंद्रिय परिषद अधिनियम, 1973 का स्थान लेता है जिसे एक निर्वाचित परिषद रूप में स्थापित किया गया था. यह परिषद भारत में होम्योपैथी शिक्षा और प्रैक्टिस को विनियमित करने के लिए जिम्मेदार वैधानिक निकाय था. परिषद के पास नए और आगामी होम्योपैथी शिक्षा संस्थानों को मंजूरी देने की शक्ति भी थी. नए होम्योपैथी अधिनियम के अलावा संसद के मानसून सत्र में राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग विधेयक, 2020 भी पारित किया गया है. इसका उद्देश्य के दौरान स्वदेशी चिकित्सा प्रणालियों, मुख्य रूप से आयुर्वेद की शिक्षा और प्रैक्टिस को विनियमित करना है. 

ये नए कानून मोदी सरकार के अपने आयुष (आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी) मंत्रालय के तहत वैकल्पिक चिकित्सा प्रणालियों के समग्र प्रचार के अनुरूप ही हैं. कई सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह का प्रचार अनावश्यक है. जन स्वास्थ्य अभियान की राष्ट्रीय सह संयोजक अमूल्य निधि ने कहा, “भारत में आयुष दवाएं पहले से ही हमारी जीवन शैली का हिस्सा हैं. हमें पारंपरिक चिकित्सा में अपने विश्वास को रखने के लिए कानूनों की आवश्यकता नहीं है. यह हमारे जीवंत अनुभव का एक हिस्सा है.”

भारत में लंबे समय से पात्र चिकित्सकों की कमी है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 1456 लोगों पर केवल एक पात्र आधुनिक चिकित्सा डॉक्टर है. यह विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुशंसित प्रत्येक 1000 लोगों के लिए एक डॉक्टर के अनुपात से बहुत कम है. सरकार को उम्मीद है कि होम्योपैथी अधिनियम होम्योपैथी डॉक्टरों को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में शामिल कर स्वास्थ्य सेवा को बढ़ाने में मदद करेगा. विधेयक के खंड 52 में कहा गया है कि प्रत्येक राज्य सरकार, “ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा को संबोधित करने या बढ़ावा देने के उद्देश्य से, स्वास्थ्य पेशेवरों की क्षमता बढ़ाने के लिए आवश्यक उपाय कर सकती है.” “ग्रामीण क्षेत्र” शब्द को अधिनियम पारित होने से पहले खंड से हटा दिया गया था. हालांकि, मूल विचार वही रहा कि यह देश के उन क्षेत्रों को मजबूत करने के लिए होम्योपैथी को मुख्य धारा की चिकित्सा के साथ विलय करना जहां स्वास्थ्य सेवा प्रणाली खराब है. 

चाहत राणा कारवां में​ रिपोर्टिंग फेलो हैं.

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