अपने मृतकों के सम्मान में कोविड-19 की दूसरी लहर की भयावहता की याद बनाए रखनी होगी

हमने जो चौंकाने वाली चीज पाई वह यह थी कि परिवार और दोस्तों की अचानक मौत के बीच, कोई भी ऐसा करता नजर नहीं आया जैसा कि हमेशा ही असीम दुख को तकसीम करने के लिए किया जाता रहा है यानी इसे व्यक्त करने के लिए शब्दों को तलाशना.
दानिश सिद्दीकी/रॉयटर्स
हमने जो चौंकाने वाली चीज पाई वह यह थी कि परिवार और दोस्तों की अचानक मौत के बीच, कोई भी ऐसा करता नजर नहीं आया जैसा कि हमेशा ही असीम दुख को तकसीम करने के लिए किया जाता रहा है यानी इसे व्यक्त करने के लिए शब्दों को तलाशना.
दानिश सिद्दीकी/रॉयटर्स

“वह कल शाम 6 बजे मुझे छोड़ कर चली गई,” एक प्रिय मित्र का संदेश हमारे एक फोन पर आया. दोस्त अपनी मां की बात कर रही थी. दुख की इस लहर के बावजूद जिस बात ने हमें प्रभावित किया वह थी नपी-तुली भाषा. यह सहज शब्द थे, जैसे लेखक और पत्रकार दूसरों की मौत की खबर देते हैं. यह भाषा सटीक है. किसी के पास यह पहले से तैयार नहीं होती. किसी को भी अप्रत्याशित दुख की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. किसी को भी ऐसा जीवन नहीं जीना चाहिए जहां दुख आने पर उसके पास पहले से ही तैयार भाषा हो.

अप्रैल में भारत कोविड-19 की दूसरी लहर की चपेट में इस कदर जकड़ा हुआ था कि हमें इसकी भयावहता को सही मायने में व्यक्त करने के लिए संभवत: नए शब्दों की जरूरत है. इसे सुनामी कहना जायज नहीं होगा क्योंकि सुनामी जल्द पीछे हट जाती है. हमने जो चौंकाने वाली चीज पाई वह यह थी कि परिवार और दोस्तों की अचानक मौत के बीच, कोई भी ऐसा करता नजर नहीं आया जैसा कि हमेशा ही असीम दुख को तकसीम करने के लिए किया जाता रहा है यानी इसे व्यक्त करने के लिए शब्दों को तलाशना. मौतें जितने व्यापक स्तर पर थीं और हर तरफ उसके बारे में बात जितनी सर्वव्यापी थी कि सभी ने इसके लिए रटी-रटाई भाषा हासिल कर ली. यह इस त्रासदी का प्रतीक ​बिंदु है कि हम में से प्रत्येक ने अवचेतन रूप से इसके बारे में बात करने के लिए सटीक भाषा को चुना.

हालांकि इससे दुख का असर कम नहीं हुआ. दुख अभी भी पसरा हुआ था. ऑक्सीजन के स्तर में लगातार 36 घंटे की गिरावट के बाद जिस दोस्त ने अपनी मां को खो दिया था, वह टूट चुकी थी. अपने घर भर में घूमती हुई वह अपनी मां का सामान बटोर एक बैग में इकट्ठा करती रही. वह हेयरब्रश जो उन्होंने कुछ ही घंटे पहले इस्तेमाल किया था, उसके चारों ओर अभी भी टूटे हुए बाल थे, उनकी लिपस्टिक कलैक्शन, अलमारी में रखीं उनकी साड़ियां, तकिए पर उनकी गंध, चादर की तह और उस जगह पर गद्दे का धंसा होना जहां वह आखिरी बार लेटी थी, फ्रिज में रखा बचा हुआ खाना जो उन्होंने पिछली बार छोड़ दिया था- ये सारी चीजें मेरी प्रिय मित्र को अभी भी साफ करनी थीं. ये सारी चीजें हटा देने के बाद एक खालीपन नजर आता है. कोई भी चीज आपको मौत के लिए तैयार नहीं करती, कोई भी चीज आपको मां की मौत के लिए तैयार नहीं कर सकती.

हम दो सौ साल पहले आई एक और आपदा को याद कर सकते हैं. 1840 के दशक में आयरिश लोग आलू के अकाल से तबाह हो गए थे. मदद कम थी और लगभग दस लाख लोग मारे गए. एक समंदर पार ऐसे भी लोग थे जो अपनी अलग त्रासदी झेल रहे थे. संयुक्त राज्य अमेरिका में मूलनिवासी जनजाति चोक्टाव्स को सरकार जबरन स्थानांतरित कर रही थी. उन्हें एक ऐसी जोखिम भरी यात्रा पर ओक्लाहोमा की ओर पलायन करने के लिए मजबूर किया गया था, जिसे "ट्रेल ऑफ टीयर्स" (आंसुओं भरी राह) नाम दिया गया. लेकिन अपनी खुद की दिक्कतों के बावजूद, जब चोक्टावों ने आयरिश लोगों पर आन पड़ी विपदा के बारे में सुना, तो उन्होंने कुछ ऐसा किया जिसके बारे में सोच पाना भी कठिन जान पड़ता है. उन्होंने एक चंदा अभियान चलाया और आयरिश लोगों के लिए 170 डॉलर की मदद भेजी. 170 से अधिक वर्षों के बाद, आयरिश समुदाय कोविड-19 से प्रभावित संयुक्त राज्य अमेरिका में मूलनिवासी समुदायों के लिए चंदा जुटाने वालों को खुले दिल से दान कर रहे हैं. इसके तहत सात लाख डॉलर से ज्यादा की मदद जुटाई जा चुकी है. न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुता​बिक, आयोजकों ने कहा कि "सैकड़ों हजारों डॉलर" आयरिश दानदाताओं से आए हैं. दानदाताओं ने कहा कि वे बस वह कर्ज चुका रहे हैं जो वे भूले नहीं हैं.

इतिहास एक याद है. हम नरसंहारों को याद करते हैं ताकि हम उन्हें दोबारा न होने दें. बचपन में गर्म चूल्हे को छूने पर खाल में जलन का अहसास हमें याद रहता है ताकि हम दोबारा ऐसा न करें. अगर आप भूल जाते हैं, तो आप फिर दोहराने के लिए मजबूर होंगे. हमें याद रखना चाहिए. जब आप अपने घर के खाली कमरों में घूमें तो उन लोगों को भी याद रखें जो वहां रहा करते थे. जब बिस्तर का बगल का हिस्सा ठंडा हो और चादरों में सिलवटें न हों, तो याद रखें. जब दरवाजे के पीछे से झांकते चेहरे और दूसरे कमरे से आती आवाजें न हों, तो याद रखें.

अरकेश अजय लॉस एंजेलिस में फिल्म निर्माता और फिल्म संपादक हैं.

अहाना धर संचार विशेषज्ञ हैं.

Keywords: COVID-19 Deaths Kumbha and Covid COVID-19 memory
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