पंजाब के गांवों ने किया कोविड-19 जांच और अस्पताल में उपचार का बहिष्कार

08 सितंबर 2020
15 जून 2020 को अमृतसर के सिविल अस्पताल में नाक का स्वाव लेते स्वास्थ्य कर्मचारी. पंजाब के कई गांवों ने कोविड-19 की सरकारी जांच और इलाज के विरोध में प्रस्ताव पारित किए हैं.
समीर सहगल/हिंदुस्तान टाइम्स/गैटी इमेजिस
15 जून 2020 को अमृतसर के सिविल अस्पताल में नाक का स्वाव लेते स्वास्थ्य कर्मचारी. पंजाब के कई गांवों ने कोविड-19 की सरकारी जांच और इलाज के विरोध में प्रस्ताव पारित किए हैं.
समीर सहगल/हिंदुस्तान टाइम्स/गैटी इमेजिस

28 अगस्त को पंजाब के मोगा जिले की समालसर गांव की पंचायत ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसके तहत गांव वालों में कोविड-19 संक्रमण पाए जाने पर उन्हें उनके घरों या गांव में बनाए गए आइसोलेशन केंद्र में रखा जाएगा. प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि सरकारी स्वास्थ्य दलों को किसी भी एसिंप्टोमेटिक गांववासी, जो टेस्ट कराना नहीं चाहता, का टेस्ट करने नहीं दिया जाएगा और सरकारी डॉक्टरों को मरीजों को गांव से बाहर ले जाने नहीं दिया जाएगा. प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि कोविड-19 मरीज की देखभाल और उपचार डॉक्टरों का परामर्श लेकर गांव में ही किया जाएगा. इस प्रस्ताव पर सरपंच अमरजीत सिंह के हस्ताक्षर हैं.

अगस्त के आखिरी हफ्ते में पंजाब के कई गांवों ने ऐसे ही प्रस्ताव पारित किए हैं. इन गांवों ने राज्य की चिकित्सा टीमों को गांव वालों की कोविड-19 जांच करने नहीं दी है और सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में कोविड-19 मरीजों का इलाज या उनको क्वारंटीन नहीं होने दिया है. यह कदम गांव वालों ने सरकारी क्वारंटीन और उपचार व्यवस्था में अविश्वास के चलते उठाया है. गांवों ने इन प्रस्तावों में आरोप लगाया गया है कि गैर कोविड-19 मरीजों को कोविड-19 मरीजों के साथ अस्पतालों में रखा जा रहा है. गांव के लोगों ने मुझे बताया कि सोशल मीडिया में ऐसी अफवाह शेयर की जा रही हैं कि कोविड-19 केंद्रों से बड़ी संख्या में शव निकल रहे हैं और मृतकों के शरीरों से उनके अंगों को निकाला जा रहा है. इन अफवाहों का असर यह हुआ है कि कई जगह स्वास्थ्य कर्मियों पर हमले हुए हैं.

अमरजीत ने मुझे बताया कि गलत उपचार और चिकित्सीय लापरवाही से उन्हें निजी तौर पर नुकसान पहुंचा है. जुलाई के आखिरी सप्ताह में फरीदकोट के गुरु गोविंद सिंह मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में उनकी बीवी मनजीत कौर की मौत हो गई. अमरजीत ने बताया कि बीवी को सांस की परेशानी थी जो नोवेल कोरोनावायरस महामारी के फैलने से पहले से थी और जून में भटिंडा के एक निजी अस्पताल में उनका उपचार कराया गया था. एक महीने तक वह एकदम ठीक थीं लेकिन बाद में उन्हें दोबारा सांस की समस्या होने लगी. जुलाई में उन्होंने पत्नी को जीजीएस अस्पताल में भर्ती कराया जहां उनसे जबरदस्ती कोविड जांच के लिए सैंपल लिया गया और कोरोनावायरस रोगियों के साथ रखा गया. दूसरे दिन अमरजीत और उनके बेटे को बताया गया कि मनजीत को वेंटिलेटर में रखा जा रहा है और शाम 4 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. अमरजीत ने दावा किया कि ना उनकी बीवी को किसी डॉक्टर ने चेक किया और ना उसे कोई दवा दी गई. अमरजीत इस बात से भी नाराज थे कि अस्पताल ने उन्हें और उनके बेटे को पत्नी मनजीत से मिलने नहीं दिया जबकि वह निजी खर्च पर सुरक्षा उपकरण या यानी पीपीई खरीदने को तैयार थे. लेकिन जो बात उन्हें लगातार सताती है वह यह कि शायद उनकी बीवी को कोविड-19 था ही नहीं. उन्होंने मुझसे कहा, “ऐसा लगता है जैसे किसी ने हमारे साथ मजाक किया है. बीवी की मौत के बाद उनकी रिपोर्ट नेगेटिव आई.”

अमरजीत ने कहा कि उनके जैसे और भी मामले जीजीएस अस्पताल में देखे गए हैं. उन्होंने बताया कि एक कैंसर मरीज जो अपनी दवाइयां लेने अस्पताल आया था उसे कोविड-19 के नाम पर भर्ती कर लिया गया और बाद में उसकी मौत हो गई. उन्होंने कहा कि उस आदमी की मौत के बाद मरीज के परिवार और डॉक्टरों के बीच गहमागहमी भी हुई. अमरजीत ने बताया कि समालसर पंचायत और अन्य पंचायतों ने सरकार के कहने पर क्वारंटीन सुविधा के लिए बिस्तर और बेड दान दिए थे. “जब सरकारी केंद्रों के पास मरीजों के लिए कुछ है ही नहीं और मरीजों की देखभाल करने वाला कोई नहीं है तो हमें उन अस्पतालों में क्यों भेजा जा रहा है?” समालसर पंचायत ने एक स्कूल को पोस्ट कोविड-19 मरीजों का आइसोलेशन केंद्र बनाया है. पंचायत ने तय किया है कि मरीज की दवाइयां और उनके खर्च का वहन वह करेगी और मरीजों की देखभाल करने के लिए गांव के ही स्वयंसेवकों को लगाया जाएगा.

अमरजीत की तरह ही संगरूर जिले के टोलेवाल गांव के जगतार सिंह टोलेवाल ने सरकारी अस्पतालों में भोजन जैसी बुनियादी सुविधा की कमी की चिंता व्यक्त की. उन्होंने बताया कि उन्होंने देखा है कि कैसे पटियाला स्थित राजेंद्र अस्पताल ने मरीज की हालत की जानकारी परिवार को ही देने से इनकार किया था. जगतार ने उन अफवाहों का उल्लेख किया जिनके अनुसार, कोविड-19 से मरने वालों के अंग निकाल लिए गए थे. अभी यह स्पष्ट नहीं है कि ये अफवाहें कहां से उड़ाई जा रही हैं. टोलेवाल गांव ने भी यह प्रस्ताव पारित किया है कि कानूनन सरपंच को जानकारी दिए बिना पुलिस या सरकारी अधिकारी गांव में दाखिल नहीं हो सकते. उन्होंने बताया कि पंचायत ने सार्वजनिक घोषणा की है कि स्वास्थ्य टीमों का गांव में प्रवेश निषेध है और यदि स्वास्थ्य अधिकारियों ने इस घोषणा को नजरअंदाज किया तो गांव वाले उनका मुकाबला करेंगे. टोलेवाल गांव के सरपंच बेअंत सिंह ने कहा है कि जो भी टीम गांव आना चाहती है उसे पंचायत को जानकारी देनी होगी. उन्होंने यह भी कहा कि वह गांव में ही सामान्य लक्षण वाले कोविड-19 मरीजों के उपचार के सभी आवश्यक प्रोटोकोलों का पालन करने को तैयार हैं.

जतिंदर कौर तुर वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले दो दशकों से इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स और डेक्कन क्रॉनिकल सहित विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों में लिख रही हैं.

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