बेदम होती स्वास्थ्य व्यवस्था : कोविड-19 संकट में तपेदिक के सबक

05 सितंबर 2020
व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण पहने चिकित्सा कर्मचारी दिल्ली के एक अस्पताल में कोविड-19 से पीड़ित रोगी को देखते हुए.
दानिश सिद्दीकी / रॉयटर
व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण पहने चिकित्सा कर्मचारी दिल्ली के एक अस्पताल में कोविड-19 से पीड़ित रोगी को देखते हुए.
दानिश सिद्दीकी / रॉयटर

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दिसंबर 2019 में डॉ. आनंदे वुहान से आने वाली खबरों पर व्याकुलता के साथ नजरें जमाए हुए थे. चीन के शहरों में सार्स जैसा एक रहस्यमय वायरस फैल रहा था. उस समय अपने डॉक्टर मित्रों के साथ होने वाली चर्चा को याद करते हुए आनंदे ने मुझे बताया, “मैंने सुना कि वह वायुजनित बीमारी थी. हम सुन रहे थे कि रोगियों में खांसी, बुखार आदि जैसे ही लक्षण हैं.”

आनंदे की चिंता ने तब दहशत का रूप ले लिया जब फरवरी के आसपास उन्होंने चीन से आने वाले वीडियो देखे जिनमें ज्यादा से ज्यादा लोगों को कोविड-19 से मरते दिखाया गया था . “मैंने सोचा कि वुहान एक बड़ा शहर है लेकिन आबादी के घनत्व के एतबार से मुंबई उससे बड़ा है. अगर ऐसा कुछ हमारे यहां होता है तो क्या होगा”?

वुहान की आबादी एक करोड़ 11 लाख है जबकि उससे छोटे भूभाग पर मुंबई की आबादी एक करोड़ 84 लाख है और मुंबई तो पहले से ही तपेदिक जैसी विभिन्न संक्रामक, वायुजनित सांस की बीमारियों के लिए बदनाम है.

यह समझने के किसी भी प्रयास की शुरुआत कि महामारी के प्रति भारत की प्रतिक्रिया इस बिंदु तक कैसे पहुंची, शुरुआत देश और दुनिया के सबसे अधिक भीड़ वाले शहरों में से एक मुंबई से होनी चाहिए. आनंदे मुंबई के दक्षिण-पूर्वी छोर पर स्थित शिवड़ी टीबी अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक हैं. यह विशाल परिसर तपेदिक के खिलाफ वैश्विक संघर्ष की विशाल रणभूमि में से एक है. इसमें कर्मचारियों के आवासीय परिसर हैं और यह महानगर के अंदर बसा एक चिकित्सा नगर है. जब मैं पिछली बार 2018 में तपेदिक पर अपनी किताब के लिए आनंदे का साक्षात्कार करने आई थी तब उन्होंने कहा था कि वह रोगियों की ‘सुनामी’ का सामना कर रहे हैं. एक व्यंग्यपूर्ण, लगभग कड़वा मजाक, बात आनंदे दोहराना पसंद करते है कि “अगर टीबी एक धर्म होता, तो शिवड़ी उसका मक्का होता”. हकीकत यह है कि मुंबई अब भारत के कोविड-19 के अधिकेंद्रों में से एक है और आनंदे इसे कतई संयोग नहीं मानते.

विद्या कृष्णन स्वास्थ्य मामलों की पत्रकार हैं और गोवा में रहती हैं. एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा पर उनकी पहली किताब 2020 में प्रकाशित होगी.

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